संस्कृत व्याकरण की अद्भुत यात्रा: ण्यन्त से नामधातु प्रक्रिया तक का गहन विश्लेषण
प्रस्तावना: व्याकरण का महत्त्व
संस्कृत वाङ्मय में व्याकरण को 'वेदाङ्ग' माना गया है। महर्षि पाणिनि की अष्टाध्यायी वह आधारशिला है जिस पर संपूर्ण संस्कृत भाषा टिकी है। कहा गया है:
"मुखं व्याकरणं स्मृतम्"
अर्थात्, व्याकरण वेदों का मुख है। किसी भी भाषा की गहराई को समझने के लिए उसकी धातु-प्रक्रिया (Verb formation) को समझना अनिवार्य है। आज के इस विशेष लेख में हम 'धातु' के उन परिवर्तित रूपों का अध्ययन करेंगे जो क्रिया की अवस्था, इच्छा, पुनरावृत्ति और संज्ञा से क्रिया के निर्माण को दर्शाते हैं।
प्रथम अध्याय: ण्यन्तप्रक्रिया (Causal Verbs)
जब कोई कर्ता स्वयं कार्य न करके किसी अन्य को कार्य के लिए प्रेरित करता है, तो उसे 'प्रयोजक' (Causative) कहा जाता है। इस प्रक्रिया को 'ण्यन्त' कहते हैं।
1. स्वतन्त्रः कर्ता (1/4/54)
वृत्ति: क्रियायां स्वातन्त्र्येण विवक्षितोऽर्थः कर्ता स्यात्।
व्याख्या: क्रिया को करने में जिसकी स्वतंत्रता मुख्य रूप से विवक्षित (कहने की इच्छा) हो, वह 'कर्ता' कहलाता है। उदाहरण के लिए, "रामः पठति" में 'राम' स्वतंत्र रूप से पढ़ने की क्रिया कर रहा है।
2. तत्प्रयोजको हेतुश्च (1/4/55)
वृत्ति: कर्तुः प्रयोजको हेतुसंज्ञः कर्तृसंज्ञश्च स्यात्।
व्याख्या: जो कर्ता को क्रिया में प्रवृत्त करता है (प्रेरक), उसकी 'हेतु' संज्ञा और 'कर्ता' संज्ञा दोनों होती है।
उदाहरण: यदि गुरु शिष्य को पढ़ाता है, तो गुरु 'प्रयोजक' है।
3. हेतुमति च (3/1/26)
वृत्ति: प्रयोजकव्यापारे प्रेषणादौ वाच्ये धातोर्णिच् स्यात्।
हिन्दी व्याख्या: जब प्रेरक कर्ता का व्यापार (प्रेरणा, आदेश देना आदि) कहना हो, तो मूल धातु से 'णिच्' प्रत्यय जुड़ता है।
उदाहरण: 'भू' (होना) + णिच् = भावयति (वह उत्पन्न करता है या होने की प्रेरणा देता है)।
मंत्र सन्दर्भ: ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। यहाँ 'प्रचोदयात्' (प्र+चुद्+णिच्) एक ण्यन्त रूप ही है, जिसका अर्थ है "हमें प्रेरित करे"।
4. ओः पुयण्ज्यपरे (7/4/80)
वृत्ति: सन् परे होने पर जो अङ्ग, उसके अवयव अभ्यास के स्थान पर इकार आदेश होता है यदि पवर्ग, यण, जकार में से कोई परे हो तो परन्तु इससे भी परे अकार होना आवश्यक है।
उदाहरण: 'अबीभवत्' (लुङ् लकार में)। यहाँ अभ्यास के 'उ' को 'इ' होकर रूप सिद्ध होता है।
5. अर्तिह्रीब्लीरीक्नूयीक्ष्माय्यातां पुङ् णौ (7/3/36)
व्याख्या: ऋ, ह्री, ब्ली, री, क्नूयी, क्ष्मायी और आकारान्त (आ- ending) धातुओं को णिच् परे होने पर 'पुक्' (प्) का आगम होता है।
उदाहरण: स्था (ठहरना) + णिच् = स्थापयति (वह स्थापित करता है)।
6. तिष्ठतेरित् (7/4/5)
वृत्ति: उपधाया इदादेशः स्याच्चङ्परे णौ।
व्याख्या: यदि चङ् (लुङ् लकार) परक णिच् बाद में हो, तो 'स्था' धातु की उपधा के स्थान पर 'इ' आदेश होता है।
7. मितां ह्रस्वः (6/4/92)
वृत्ति: घटादीनां ज्ञपादीनां चोपधाया ह्रस्वः स्याण्णौ।
व्याख्या: 'मित्' संज्ञक धातु (जैसे घट्, ज्ञप् आदि) की उपधा के स्वर को णिच् परे होने पर ह्रस्व (छोटा) कर दिया जाता है।
उदाहरण:
घट् + णिच् = घटयति।
ज्ञप् (जानना/बताना) = ज्ञपयति।
अजिज्ञपत् (लुङ्)।
द्वितीय अध्याय: सन्नन्तप्रक्रिया (Desiderative Verbs)
जब कर्ता किसी कार्य को करने की 'इच्छा' करता है, तो उसे 'सन्नन्त' कहते हैं।
1. धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा (3/1/7)
वृत्ति: इषिकर्मण इषिणैककर्तृकाद्धातोः सन्प्रत्ययो वा स्यादिच्छायाम्।
व्याख्या: जब एक ही कर्ता किसी क्रिया को करने की इच्छा करे (इच्छार्थक 'इष्' धातु का कर्म हो), तब उस धातु से विकल्प से 'सन्' प्रत्यय होता है।
उदाहरण: पठितुमिच्छति = पिपठिषति (वह पढ़ने की इच्छा करता है)।
विशेष: यदि कर्ता भिन्न हो (जैसे: गुरु चाहता है कि शिष्य पढ़े), तो सन् नहीं होगा।
2. सन्यङोः (6/1/9)
वृत्ति: सन्नन्तस्य यङन्तस्य च धातोरनभ्यासस्य प्रथमस्यैकाचो द्वे स्तोऽजादेस्तु द्वितीयस्य।
व्याख्या: सन्नन्त (सन्) और यङन्त (यङ्) धातुओं में प्रथम एकाच् (एक स्वर वाला भाग) को द्वित्व (double) हो जाता है।
उदाहरण: पठ् + सन् = पिपठिषति।
3. सः स्यार्धधातुके (7/4/49)
व्याख्या: सकारादि आर्धधातुक प्रत्यय परे होने पर धातु के सकार के स्थान पर तकार (त्) आदेश होता है।
उदाहरण: अद् (खाना) + सन् = जिघत्सति (खाने की इच्छा करता है)।
4. अज्झनगमां सनि (6/4/16)
व्याख्या: अजन्त (स्वरान्त) धातु, 'हन्' धातु और अजादेश 'गम्' धातु के स्वर को झलादि 'सन्' परे होने पर दीर्घ हो जाता है।
5. इको झल् (1/2/9)
वृत्ति: इगन्ताज्झलादिः सन् कित् स्यात्।
व्याख्या: इगन्त (इ, उ, ऋ, लृ) धातुओं से परे झलादि 'सन्' प्रत्यय 'कित्' (क् की संज्ञा वाला) हो जाता है।
उदाहरण: कृ (करना) + सन् = चिकीर्षति (करने की इच्छा करता है)।
6. सनि ग्रहगुहोश्च (7/2/12)
व्याख्या: ग्रह्, गुह् और उगन्त धातुओं से परे 'सन्' को 'इट्' (इ) का आगम नहीं होता।
उदाहरण: भू (होना) + सन् = बुभूषति (होने की इच्छा करता है)।
तृतीय अध्याय: यङन्तप्रक्रिया (Intensive/Frequentative)
जब किसी कार्य को बार-बार (पौनःपुन्य) या अत्यधिकता (भृशार्थ) के साथ किया जाए, तो वह 'यङन्त' कहलाता है।
1. धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् (3/1/22)
वृत्ति: पौनःपुन्ये भृशार्थे च द्योत्ये धातोरेकाचो हलादेर्यङ् स्यात्।
व्याख्या: बार-बार होने वाली क्रिया या क्रिया की तीव्रता बताने के लिए एकाच् हलादि धातु से 'यङ्' प्रत्यय होता है। यह आत्मनेपद में होता है।
उदाहरण: पुनः पुनः भवति = बोभूयते।
2. गुणो यङ्गुकोः (7/4/82)
व्याख्या: यङ् या यङ्-लुक् प्रत्यय परे होने पर अभ्यास (द्वित्व का पूर्व भाग) को गुण (ए, ओ) हो जाता है।
3. नित्यं कौटिल्ये गतौ (1/3/23)
व्याख्या: गत्यर्थक धातुओं से 'कुटिल गमन' (टेढ़ा चलना) अर्थ होने पर ही यङ् होता है, क्रिया की पुनरावृत्ति में नहीं।
उदाहरण: कुटिलं व्रजति = वाव्रज्यते।
4. दीर्घोऽकितः (7/4/83)
व्याख्या: जो अभ्यास 'कित्' नहीं है, उसे यङ् या यङ्-लुक् परे होने पर दीर्घ हो जाता है।
उदाहरण: वाव्रज्यते (यहाँ 'व' का 'वा' हुआ)।
5. रीगृदुपधस्य च (7/4/90)
व्याख्या: यदि धातु की उपधा (second last letter) में ऋकार (ऋ) हो, तो अभ्यास को 'रीक्' (री) का आगम होता है।
उदाहरण: वृत् -> वरीवृत्यते।
चतुर्थ अध्याय: यङ्लुक् प्रक्रिया (Intensive without 'ya')
यङ्लुक् वह प्रक्रिया है जहाँ यङ् प्रत्यय का लोप (लुक्) हो जाता है, लेकिन अर्थ वही 'बार-बार' वाला रहता है।
1. यङोऽचि च (7/4/74)
व्याख्या: अच् (स्वर) आदि प्रत्यय परे होने पर 'यङ्' का लुक हो जाता है। चकार के कारण कहीं-कहीं अच् के बिना भी लुक होता है। इसमें धातु परस्मैपद की तरह चलती है।
2. यङो वा (7/3/94)
व्याख्या: यङ्लुक् प्रत्यय के बाद हलादि पित् सार्वधातुक प्रत्यय को विकल्प से 'ईट्' (ई) का आगम होता है।
उदाहरण:
बोभवीति (अत्यधिक होता है - ईट् आगम के साथ)।
बोभोति (ईट् आगम के बिना)।
पंचम अध्याय: नामधातु प्रक्रिया (Denominative Verbs)
यह संस्कृत व्याकरण का एक अद्भुत हिस्सा है जहाँ संज्ञा (Noun) शब्दों को धातुओं (Verbs) की तरह प्रयोग किया जाता है।
1. सुप आत्मनः कयच् (3/1/8)
वृत्ति: इषिकर्मण एपितु संबन्धिन सुबन्तादिच्छायामर्थं कयच् प्रत्यय वा स्यात्।
व्याख्या: अपनी वस्तु की इच्छा करने के अर्थ में सुबन्त पद से 'क्यच्' प्रत्यय होता है।
उदाहरण: आत्मनः पुत्रमिच्छति = पुत्रीयति (वह अपने लिए पुत्र की कामना करता है)।
2. सुपो धातुप्रातिपदिकयोः (2/4/71)
व्याख्या: धातु और प्रातिपदिक के अवयव 'सुप्' (विभक्ति) का लोप (लुक) हो जाता है।
3. क्यचि च (7/4/33)
व्याख्या: क्यच् परे होने पर पूर्ववर्ती अकार (अ) के स्थान पर ईकार (ई) हो जाता है।
उदाहरण: पुत्र + क्यच् = पुत्रीयति।
4. नः क्ये (1/4/15)
व्याख्या: क्यच् और क्यङ् परे होने पर नकारान्त (न् जिसके अंत में हो) शब्दों की पद संज्ञा होती है।
उदाहरण: राजन् + क्यच् = राजीयति।
5. काम्यच्च (3/1/9)
व्याख्या: इच्छा अर्थ में सुबन्त से विकल्प से 'काम्यच्' प्रत्यय भी होता है।
उदाहरण: पुत्रकाम्यति (पुत्र की कामना करता है)।
6. उपमानादाचारे (3/1/10)
व्याख्या: उपमान स्वरूप कर्म सुबन्त से 'आचरण' (behavior) अर्थ में 'क्यच्' प्रत्यय होता है।
उदाहरण: पुत्रमिवाचरति = पुत्रीयति (शिष्य के साथ पुत्र जैसा व्यवहार करता है)।
विष्णूयति (द्विज के साथ विष्णु जैसा व्यवहार)।
7. वार्तिक: सर्वप्रातिपदिकेभ्यः क्विप् वा वक्तव्यः
व्याख्या: सभी प्रातिपदिकों से 'आचरण' अर्थ में विकल्प से 'क्विप्' प्रत्यय होता है।
उदाहरण: कृष्ण इवाचरति = कृष्णति।
8. कष्टाय क्रमणे (3/1/14)
व्याख्या: 'कष्ट' शब्द से उत्साह या पाप करने के उत्साह अर्थ में 'क्यङ्' प्रत्यय होता है।
उदाहरण: कष्टायते (पाप करने के लिए उत्साहित होना)।
9. शब्दवैरकलहाभ्रकण्वमेघेभ्यः करणे (3/1/17)
व्याख्या: शब्द, वैर, कलह, अभ्र, कण्व और मेघ—इन शब्दों से 'करना' अर्थ में क्यङ् प्रत्यय होता है।
उदाहरण: शब्दं करोति = शब्दायते (शोर करता है)।
निष्कर्ष: व्याकरण की व्यापकता
महर्षि पतंजलि ने 'महाभाष्य' में कहा है:
"एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग्भवति।"
अर्थात्, एक भी शब्द यदि अच्छी तरह से जानकर सही तरीके से प्रयोग किया जाए, तो वह स्वर्ग और लोक दोनों में मनोकामना पूर्ण करने वाला होता है।
इस लेख में हमने देखा कि कैसे पाणिनि के सूत्र एक छोटी सी धातु को इच्छा (सन्), प्रेरणा (णिच्), पुनरावृत्ति (यङ्) और व्यवहार (नामधातु) के सांचे में ढालकर भाषा को असीम विस्तार देते हैं। यह व्याकरण केवल नियमों का समूह नहीं, बल्कि शब्दों का विज्ञान (Science of Words) है।
आशा है कि यह विस्तृत विश्लेषण आपके अध्ययन और आध्यात्मिक ज्ञान में सहायक सिद्ध होगा। संस्कृतम् जयतु, भारतम् जयतु।
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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।