संस्कृत व्याकरण विमर्श: कारक प्रकरण – सप्तमी विभक्ति एवं क्रिया पद विचार (विस्तृत व्याख्या)
प्रस्तावना: व्याकरण का महत्व

कारक प्रकरण – सप्तमी विभक्ति
भाग 1: अधिकरण कारक और सप्तमी विभक्ति
1. आधार की परिभाषा: सूत्र - आधारोऽधिकरणम् (1/4/45)
औपश्लेषिक आधार (Physical Attachment): जहाँ आधार और आधेय (वस्तु) का भौतिक जुड़ाव हो। उदाहरण: कटे आस्ते (चटाई पर बैठता है)। यहाँ बैठने की क्रिया का आधार चटाई है और शरीर का चटाई से भौतिक स्पर्श है। उदाहरण: स्थाल्या पचति (बटलोई/पतीली में पकाता है)। यहाँ पकाने की क्रिया का आधार पात्र है।
वैषयिक आधार (Subjective/Abstract Basis): जहाँ भौतिक जुड़ाव न होकर विषयगत संबंध हो। उदाहरण: मोक्षे इच्छास्ति (मोक्ष में इच्छा है)। यहाँ इच्छा का विषय 'मोक्ष' है, यह कोई भौतिक स्थान नहीं है।
अभिव्यापक आधार (All-pervasive Basis): जहाँ आधेय अपने आधार के कण-कण में व्याप्त हो। उदाहरण: सर्वस्मिन्नात्मास्ति (सब में आत्मा है)। आत्मा शरीर के किसी एक हिस्से में नहीं, बल्कि सर्वत्र व्याप्त है। उदाहरण: तिलेषु तैलम् (तिलों में तेल है)।
2. सप्तमी विभक्ति का विधान: सूत्र - सप्तम्यधिकरणे च (2/3/36)
उदाहरण: वनस्य दूरे अन्तिके वा (वन के दूर या पास)।
3. विशेष वार्तिक एवं प्रयोग
क. क्तस्येन्विषयस्य कर्मण्युपसङ्ख्यानम्
उदाहरण: अधीती व्याकरणे (जिसने व्याकरण पढ़ लिया है)। यहाँ 'अधीत' (क्त) + 'इनि' = अधीती बना है, अतः इसके कर्म 'व्याकरण' में सप्तमी हुई।
ख. साध्वसाधुप्रयोगे च
उदाहरण (साधु): साधुः कृष्णो मातरि (कृष्ण अपनी माता के लिए अच्छे हैं)। उदाहरण (असाधु): असाधुर्मातुले (कृष्ण अपने मामा कंस के लिए बुरे हैं)।
ग. निमित्तात्कर्मयोगे
चर्मणि द्वीपिनं हन्ति दन्तयोर्हन्ति कुञ्जरम् । केशेषु चमरी हन्ति सीनि पुष्कलको हतः ॥
अर्थ: चर्मणि द्वीपिनं हन्ति: खाल के लिए चीते को मारता है। (खाल चीते के शरीर से जुड़ी है)। दन्तयोर्हन्ति कुञ्जरम्: दाँतों के लिए हाथी को मारता है। केशेषु चमरी हन्ति: बालों (पूँछ के बाल) के लिए चमरी गाय को मारता है। सीनि पुष्कलको हतः: कस्तूरी के लिए मृग (पुष्कलक) मारा जाता है।
भाग 2: भावलक्षण और अनादर के नियम
1. क्रिया से क्रिया का ज्ञान: सूत्र - यस्य च भावेन भावलक्षणम् (2/3/37)
उदाहरण: गोषु दुह्यमानासु गतः (जब गाएँ दुही जा रही थीं, तब वह गया)। यहाँ जाने की क्रिया का ज्ञान दोहन क्रिया से हो रहा है।
वार्तिक: अर्हाणां कर्तृत्वेऽनर्हाणामकर्तृत्वे तद्वैपरीत्ये च
सत्सु तरत्सु असन्त आसते (सज्जनों के तैर जाने पर दुर्जन बैठे रहते हैं)। असत्सु तिष्ठत्सु सन्तस्तरन्ति (दुर्जनों के बैठे रहने पर सज्जन तैर जाते हैं)।
2. अनादर अर्थ में विभक्ति: सूत्र - षष्ठी चानादरे (2/3/38)
उदाहरण: रुदति रुदतो वा प्राब्राजीत् (रोते हुए पुत्र आदि का अनादर करके वह संन्यासी हो गया)। यहाँ 'रुदति' (सप्तमी) और 'रुदतः' (षष्ठी) दोनों सही हैं।
भाग 3: स्वामित्व, निपुणता और निर्धारण
1. स्वामित्व बोधक शब्द: सूत्र - स्वामीश्वराधिपतिदायादसाक्षिप्रतिभूप्रसूतैश्च (2/3/39)
उदाहरण: गवां गोषु वा स्वामी (गायों का स्वामी)।
2. चतुरता और निपुणता: सूत्र - आयुक्तकुशलाभ्यां चासेवायाम् (2/3/40)
उदाहरण: आयुक्तः कुशलो वा हरिपूजने हरिपूजनस्य वा (हरि की पूजा में लगा हुआ या निपुण)।
3. निर्धारण (Selection): सूत्र - यतश्च निर्धारणम् (2/3/41)
जाति: नृणां नृषु वा ब्राह्मणः श्रेष्ठः। (मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है)। गुण: गवां गोषु वा कृष्णा बहुक्षीरा। (गायों में काली गाय अधिक दूध देने वाली है)। क्रिया: गच्छतां गच्छत्सु वा धावन शीघ्रः। (जाते हुओं में दौड़ने वाला तेज है)। संज्ञा: छात्राणां छात्रेषु वा मैत्रः पटुः। (छात्रों में मैत्र चतुर है)।
उदाहरण: माथुराः पाटलिपुत्रकेभ्यः आढ्यतराः (मथुरा के लोग पाटलिपुत्र के लोगों से अधिक धनवान हैं)।
4. साधु और निपुण के विशेष नियम: सूत्र - साधुनिपुणाभ्यामर्चायां सप्तम्यप्रतेः (2/3/43)
उदाहरण: मातरि साधुर्निपुणो वा (माता के प्रति अच्छा या निपुण)। यदि आदर न हो: निपुणो राज्ञो भृत्यः (राजा का चतुर नौकर)। यहाँ केवल कार्यकुशलता की बात है, पूज्यता की नहीं।
भाग 4: अन्य विशेष सूत्र
प्रसितोत्सुकाभ्यां तृतीया च (2/3/44): 'प्रसित' (संलग्न) और 'उत्सुक' शब्दों के साथ तृतीया और सप्तमी होती है। उदाहरण: हरिणा हरौ वा प्रसितः/उत्सुकः।
नक्षत्रे च लुपि (2/3/45): नक्षत्र वाचक शब्दों में जहाँ प्रत्यय का लोप (लुप्) हुआ हो, वहाँ तृतीया और सप्तमी होती है। उदाहरण: मूलेनावाहयेद्देवीं श्रवणेन विसर्जयेत् (मूल नक्षत्र में आवाहन और श्रवण में विसर्जन)।
सप्तमीपञ्चम्यौ कारकमध्ये (2/3/7): दो कार्यों या दो स्थानों के बीच की दूरी या समय बताने के लिए सप्तमी और पंचमी होती है। उदाहरण: अद्य भुक्त्वाऽयं व्यहे व्यहाद्वा भोक्ता (आज खाकर यह दो दिन बाद खाएगा)।
भाग 5: परस्मैपद एवं आत्मनेपद प्रक्रिया
प्रमुख सूत्र एवं उदाहरण:
अनुपराभ्यां कृञः: 'कृ' धातु से पहले 'अनु' या 'परा' उपसर्ग हो, तो परस्मैपद होता है। उदाहरण: अनुकरोति (नकल करता है), पराकरोति।
अभिप्रत्यतिभ्यः क्षिपः: 'क्षिप्' धातु से पहले अभि, प्रति, अति हो, तो परस्मैपद। उदाहरण: अभिक्षिपति।
प्राद्वहः: 'वह' धातु से पहले 'प्र' हो, तो परस्मैपद। उदाहरण: प्रवहति।
व्याङ्परिभ्यो रमः: वि, आङ्, परि उपसर्गों के बाद 'रम्' धातु परस्मैपद में होती है। उदाहरण: विरमति, आरमति, परिरमति।
विभाषाऽकर्मकात्: अकर्मक धातुओं के साथ विकल्प से आत्मनेपद होता है। उदाहरण: उपरमति या उपरमते।
ण्यन्त (Causal) प्रक्रिया में प्रयोग:
उदाहरण: बोधयति पद्मम् (सूरज कमल को खिलाता है)। उदाहरण: जनयति सुखम् (सुख उत्पन्न करता है)। उदाहरण: शाययति (सोने के लिए प्रेरित करता है)।
निष्कर्ष
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- संज्ञाप्रकरणम् - लघुसिद्धान्तकौमुदी
- सन्धि - अच सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - हल सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - विसर्ग सन्धि (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तद्धित :- अपत्यार्थक एवं मत्वर्थीय (सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार)
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- स्त्री प्रत्यय :- लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रकरण :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रथमा विभक्ति
- कारक द्वितीया विभक्ति
- कारक तृतीया विभक्ति
- कारक चतुर्थी विभक्ति
- कारक पञ्चमी विभक्ति
- कारक षष्ठी विभक्ति
- कारक सप्तमी विभक्ति
- कारक सम्बोधन विभक्ति
- परस्मैपद एवं आत्मनेपद विधान :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।