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अजन्त पुंल्लिङ्ग प्रकरण

अथ षङ्गेिषु अजन्तपुंल्लिङ्गाः

अजन्त पुंल्लिङ्ग प्रकरण: संस्कृत व्याकरण का गहन विश्लेषण और शब्द सिद्धि

प्रस्तावना: संस्कृत व्याकरण की महिमा

संस्कृत भाषा को 'देववाणी' कहा गया है। इस भाषा की संरचना और व्याकरण की शुद्धता विश्व की समस्त भाषाओं में अद्वितीय है। महर्षि पाणिनि द्वारा रचित 'अष्टाध्यायी' संस्कृत व्याकरण का आधार स्तंभ है। किसी भी शब्द के अर्थबोध के लिए उसकी 'पद' संज्ञा का होना अनिवार्य है— 'न केबलं प्रकृतिः प्रयोक्तव्या नापि केवलः प्रत्ययः' अर्थात् न तो केवल प्रकृति (मूल शब्द) का प्रयोग किया जा सकता है और न ही केवल प्रत्यय का।

इस लेख में हम लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार 'अजन्त पुंल्लिङ्ग' (वे पुल्लिंग शब्द जिनके अंत में स्वर अर्थात् 'अच्' हो) की शब्द सिद्धि और उनसे संबंधित महत्वपूर्ण सूत्रों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।


1. प्रातिपदिक संज्ञा और उसकी अनिवार्यता

संस्कृत में किसी भी शब्द रूप (जैसे रामः, हरिः) को बनाने से पहले उस मूल शब्द की 'प्रातिपदिक' संज्ञा करनी पड़ती है। इसके लिए दो प्रमुख सूत्र हैं:

सूत्र १: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् (1/2/45)

  • वृत्ति: धातुं प्रत्ययं प्रत्ययान्तं च वर्जयित्वा अर्थवच्छब्दस्वरूपं प्रातिपदिकसंज्ञं स्यात्।

  • व्याख्या: जो शब्द धातु न हो, प्रत्यय न हो और प्रत्ययान्त (जिसके अंत में प्रत्यय लगा हो) भी न हो, किंतु 'अर्थवान' हो, उसकी प्रातिपदिक संज्ञा होती है।

  • उदाहरण: 'राम' शब्द जब अपनी मूल अवस्था में होता है और उसका अर्थ 'दशरथ पुत्र' या 'परमात्मा' होता है, तब इस सूत्र से उसकी प्रातिपदिक संज्ञा होती है।

सूत्र २: कृत्तद्धितसमासाश्च (1/2/46)

  • वृत्ति: कृत्तद्धितान्तौ समासाश्च तथा स्युः।

  • व्याख्या: कृदन्त (कृत् प्रत्यय से बने), तद्धितान्त (तद्धित प्रत्यय से बने) और समस्त पदों (समास) की भी प्रातिपदिक संज्ञा होती है।

  • विशेष: जब 'राम' शब्द की व्युत्पत्ति 'रमु क्रीडायाम्' धातु से 'घञ्' प्रत्यय लगाकर की जाती है, तब इस सूत्र से संज्ञा होती है।


2. स्वादि प्रत्यय और विभक्ति विचार

प्रातिपदिक संज्ञा होने के बाद, पद बनाने के लिए 21 प्रत्यय लगाए जाते हैं, जिन्हें 'सुप्' प्रत्यय कहा जाता है।

सूत्र ३: स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङेभ्याम्भ्यस्ङसिभ्याम्भ्यस्ङसोसाम्ङ्योस्सुप् (4/1/2)

यह सूत्र 21 प्रत्ययों का विधान करता है, जो सात विभक्तियों और तीन वचनों में विभाजित हैं:

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमासुजस्
द्वितीयाअम्औट्शस्
तृतीयाटाभ्याम्भिस्
चतुर्थीङेभ्याम्भ्यस्
पंचमीङसिभ्याम्भ्यस्
षष्ठीङस्ओस्आम्
सप्तमीङिओस्सुप्

अधिकार और परिभाषा सूत्र:

  • ड्याप्प्रातिपदिकात् (4/1/1): यह अधिकार सूत्र है, जो कहता है कि प्रत्यय प्रातिपदिक के बाद ही लगेंगे।

  • प्रत्ययः (3/1/1) एवं परश्च (3/1/2): प्रत्यय शब्द के 'पर' अर्थात् पीछे जुड़ते हैं।

  • सुपः (1/4/103): यह सूत्र बताता है कि 'सुप्' के प्रत्येक त्रिक (तीन-तीन के समूह) की क्रम से एकवचन, द्विवचन और बहुवचन संज्ञा होती है।

  • द्व्येकयोद्विवचनैकवचने (1/4/22): द्वित्व (दो) की विवक्षा में द्विवचन और एकत्व (एक) की विवक्षा में एकवचन का प्रत्यय होता है।

  • बहुषु बहुवचनम् (1/4/21): बहुत्व (दो से अधिक) की विवक्षा में बहुवचन का प्रयोग होता है।


3. अकारान्त पुंल्लिङ्ग: 'राम' शब्द की सिद्धि

'राम' शब्द अजन्त पुल्लिंग प्रकरण का आधार है। इसकी सिद्धि में प्रयुक्त प्रमुख सूत्रों को देखते हैं:

रामः (प्रथमा एकवचन)

  1. 'राम' की प्रातिपदिक संज्ञा हुई।

  2. प्रथमा एकवचन में 'सु' प्रत्यय आया: राम + सु

  3. 'उ' की इत् संज्ञा होकर लोप हुआ: राम + स्

  4. ससजुषो रुः से 'स्' को 'रु' हुआ।

  5. विरामोऽवसानम् (1/4/110): वर्णों के अभाव की अवसान संज्ञा होती है।

  6. खरवसानयोर्विसर्जनीयः: अवसान में 'र्' को विसर्ग हो जाता है।

  7. रूप बना: रामः

रामौ (प्रथमा द्विवचन)

  1. राम + राम + औ (दो राम की विवक्षा)।

  2. सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ (1/2/64): समान रूप वाली विभक्तियों में एक ही शब्द शेष रहता है। अतः एक 'राम' शेष बचा: राम + औ

  3. प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (6/1/102): यहाँ दीर्घ एकादेश प्राप्त था।

  4. नादिचि (6/1/104): अवर्ण (अ) से 'इच्' (औ) परे होने पर पूर्वसवर्ण दीर्घ नहीं होता।

  5. वृद्धिरेचि: पुनः वृद्धि होकर रूप बना: रामौ

रामाः (प्रथमा बहुवचन)

  1. राम + जस्

  2. चुटू (1/3/7): प्रत्यय के आदि में स्थित 'च' वर्ग या 'ट' वर्ग की इत् संज्ञा होती है। यहाँ 'ज' का लोप हुआ: राम + अस्

  3. विभक्तिश्च (1/4/104): सुप् और तिङ् की विभक्ति संज्ञा होती है।

  4. न विभक्तौ तुस्माः (1/3/4): विभक्ति के अंत में स्थित 'त' वर्ग, 'स' और 'म' की इत् संज्ञा नहीं होती। अतः 'अस्' का 'स्' सुरक्षित रहा।

  5. 'अ' + 'अ' मिलकर दीर्घ हुआ, 'स्' को विसर्ग: रामाः


4. सम्बोधन और अन्य विभक्तियाँ

सम्बोधन: हे राम

  • एकवचनं सम्बुद्धिः (1/2/49): सम्बोधन की प्रथमा के एकवचन की 'सम्बुद्धि' संज्ञा होती है।

  • एङ् ह्रस्वात्सम्बुद्धेः (6/1/69): ह्रस्व अङ्ग से परे सम्बोधन के हल् (स्) का लोप होता है।

  • परिणाम: हे राम, हे रामौ, हे रामाः

द्वितीया विभक्ति: रामम्, रामौ, रामान्

  • अमि पूर्वः (6/1/107): अक् (अ) से 'अम्' का अच् परे होने पर पूर्वरूप एकादेश होता है। राम + अम् = रामम्

  • तस्माच्छसो नः पुंसि (6/1/103): पूर्वसवर्ण दीर्घ के बाद 'शस्' के 'स्' को 'न्' हो जाता है।

  • अङ्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि (8/4/2): र् या ष् के बाद न् को ण् होता है। किंतु पदान्तस्य (8/4/37) सूत्र से पद के अंत में ण् नहीं होता। अतः: रामान्

तृतीया विभक्ति: रामेण, रामाभ्याम्, रामैः

  • टाङसिङसामिनात्स्याः (7/1/12): अदन्त अङ्ग से परे 'टा' को 'इन' आदेश होता है। राम + इन = रामेन। फिर णत्व होकर: रामेण

  • सुपि च (7/3/102): यञादि सुप् परे होने पर अदन्त अङ्ग को दीर्घ होता है। राम + भ्याम् = रामाभ्याम्

  • अतो भिस ऐस् (7/1/9): अदन्त अङ्ग से 'भिस' को 'ऐस्' आदेश होता है। राम + ऐस् = रामैः

चतुर्थी/पंचमी/षष्ठी/सप्तमी विशेष सूत्र:

  • ङेर्न्यः (7/1/13): 'ङे' को 'य' आदेश। राम + य = रामाय

  • बहुवचने झल्येत् (7/3/103): झलादि बहुवचन सुप् परे होने पर 'अ' को 'ए' होता है। रामेभ्यः

  • वाऽवसाने (8/4/56): पंचमी एकवचन में 'रामात्' और 'रामाद्' दोनों बनते हैं।

  • ह्रस्वनद्यापो नुट् (7/1/54) एवं नामि (6/4/3): षष्ठी बहुवचन में 'नुट्' आगम और दीर्घ होकर रामाणाम् बनता है।

  • आदेशप्रत्यययोः (8/3/59): इण् या कु (कवर्ग) से परे सकार को मूर्धन्य 'ष' होता है। रामेशु -> रामेषु


5. सर्वनाम शब्द सिद्धि: 'सर्व' शब्द

सर्व, विश्व आदि शब्दों की 'सर्वादीनि सर्वनामानि' सूत्र से सर्वनाम संज्ञा होती है। इनके रूप राम शब्द से कुछ भिन्न होते हैं।

  1. सर्वे (प्रथमा बहुवचन): जसः शी (7/1/17) सूत्र से 'जस्' को 'शी' (ई) आदेश होता है। सर्व + ई = सर्वे

  2. सर्वस्मै (चतुर्थी एकवचन): सर्वनाम्नः स्मै (7/1/14) सूत्र से 'ङे' को 'स्मै' आदेश होता है।

  3. सर्वस्मात्/सर्वस्मिन्: ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ (7/1/15) से 'ङसि' को 'स्मात्' और 'ङि' को 'स्मिन्' आदेश।

  4. सर्वेषाम्: आमि सर्वनाम्नः सुट् (7/1/52) से 'आम्' को 'सुट्' आगम होता है।


6. इकारान्त पुंल्लिङ्ग: 'हरि' और 'सखि' शब्द

हरि शब्द (विष्णु):

  • जसि च (7/3/109): जस् परे होने पर ह्रस्व इकार को गुण (ए) होता है। हरि + अस् = हरे + अस् = हरयः

  • शेषो घ्यसखि (1/4/7): सखि शब्द को छोड़कर ह्रस्व इकारान्त और उकारान्त शब्दों की 'घि' संज्ञा होती है।

  • आङो नास्त्रियाम् (7/3/120): घि संज्ञक शब्द से परे 'टा' को 'ना' आदेश होता है। हरिणा

  • घेर्डिति (7/3/111): ङित् प्रत्यय (ङे, ङसि, ङस्, ङि) परे होने पर गुण होता है। हरये, हरेः

  • अच्च घेः (7/3/119): सप्तमी एकवचन में 'ङि' को 'औ' और इकार को 'अ' होता है। हरौ

सखि शब्द (मित्र):

सखि शब्द की 'घि' संज्ञा नहीं होती, इसलिए इसके रूप 'हरि' से भिन्न हैं।

  • अनङ् सौ (7/1/93): सु परे होने पर सखि को 'अनङ्' आदेश होता है। सखा

  • सख्युरसंबुद्धौ (7/1/92): सम्बोधन को छोड़कर अन्य सर्वनामस्थान प्रत्ययों में सखि शब्द 'णिद्वत्' (वृद्धि करने वाला) हो जाता है। सखायौ, सखायः

  • ख्यत्यात्परस्य (6/1/112): जहाँ यण् हुआ हो, वहाँ 'अस्' के 'अ' को 'उ' होता है। सख्युः


7. ओकारान्त और ऐकारान्त शब्द: 'गो' और 'रै'

गो शब्द (गाय/बैल):

  • गोतो णित् (7/1/90): ओकारान्त शब्द से परे सर्वनामस्थान प्रत्यय 'णित्' होता है (वृद्धि करता है)। गो + सु = गौः। गो + औ = गावौ

  • औतोऽम्शसोः (6/1/93): ओकार से 'अम्' और 'शस्' परे होने पर आकार एकादेश होता है। गाम्, गाः

रै शब्द (धन):

  • रायो हलि (7/2/85): हलादि विभक्ति परे होने पर 'रै' के 'ऐ' को 'आ' होता है। राः, राभ्याम्, राभिः


8. शब्द सिद्धि का आध्यात्मिक पक्ष (श्लोक)

संस्कृत व्याकरण केवल शब्दों का मेल नहीं, बल्कि साधना है। जैसा कि कहा गया है:

एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः सुप्रयुक्तः शास्त्रान्वितः।
स्वर्गे लोके च कामधुग्भवति॥
(एक भी शब्द यदि व्याकरण सम्मत विधि से पूर्णतः जान लिया जाए, तो वह इस लोक और परलोक में कामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है।)

'राम' शब्द की सिद्धि करते समय योगी 'रमु क्रीडायाम्' धातु का ध्यान करते हैं, जिसका अर्थ है वह सत्ता जिसमें योगी रमण करते हैं— 'रमन्ते योगिनो यस्मिन् स रामः'


निष्कर्ष

अजन्त पुंल्लिङ्ग प्रकरण का अध्ययन हमें यह सिखाता है कि किस प्रकार एक मूल शब्द विभिन्न प्रत्ययों और सूत्रों के माध्यम से विशिष्ट अर्थों को धारण करता है। चाहे वह 'राम' की मर्यादा हो, 'हरि' की व्यापकता हो, या 'सर्व' की समग्रता—प्रत्येक शब्द रूप एक वैज्ञानिक प्रक्रिया से सिद्ध होता है।

व्याकरण के इन सूत्रों का ज्ञान न केवल भाषा की शुद्धता बनाए रखता है, बल्कि वेदों और शास्त्रों के वास्तविक अर्थ को समझने की दृष्टि भी प्रदान करता है।


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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।

  • महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।

मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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