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हलन्त पुल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग एवं नपुंसकलिङ्ग प्रकरण

अथ हलन्तपुल्लिङ्ग - स्त्रीलिङ्गाः - नपुंसकलिङ्गाः प्रकरणम्

संस्कृत व्याकरण की गहन यात्रा: हलन्त पुल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग एवं नपुंसकलिङ्ग प्रकरण का विस्तृत विवेचन

प्रस्तावन: शब्द और ब्रह्म का सम्बन्ध

संस्कृत साहित्य में कहा गया है— "एकः शब्दः सुज्ञातः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग्भवति।" अर्थात् एक भी शब्द यदि अच्छी तरह से ज्ञात हो और उसका सही प्रयोग किया जाए, तो वह स्वर्ग और इस लोक में मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है।

पाणिनीय व्याकरण की अष्टाध्यायी में शब्दों को दो मुख्य श्रेणियों में बाँटा गया है: अजन्त (स्वरान्त) और हलन्त (व्यञ्जनान्त)। जिस शब्द के अन्त में 'हल्' अर्थात् व्यञ्जन वर्ण होता है, उसे 'हलन्त' कहा जाता है। आज के इस विशेष लेख में हम लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार 'हलन्त पुल्लिङ्ग', 'हलन्त स्त्रीलिङ्ग' और 'हलन्त नपुंसकलिङ्ग' प्रकरणों का गहन विश्लेषण करेंगे।


भाग १: ॥अथ हलन्तपुल्लिङ्गप्रकरणम्॥

हलन्त पुल्लिङ्ग उन शब्दों को कहते हैं जो पुरुषत्व का बोध कराते हैं और जिनके प्रातिपदिक के अन्त में व्यञ्जन वर्ण होता है।

१. हकारान्त 'लिह्' शब्द (चाटने वाला)

'लिह्' शब्द आस्वादन (चाटना) अर्थ वाली 'लिह्' धातु से बना है। इसके रूप बनाने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण सूत्र है:

सूत्र: हो ढः (८/२/३१)

  • वृत्ति: हस्य ढः स्याद् झलि पदान्ते च।

  • व्याख्या: यदि पद के अन्त में 'ह' हो या उसके बाद 'झल्' (वर्ग का १, २, ३, ४ वर्ण या श, ष, स, ह) हो, तो 'ह' के स्थान पर 'ढ' आदेश हो जाता है।

सिद्धि प्रक्रिया (लिट् / लिड्):
१. 'लिह् + सु' (प्रथमा एकवचन) में 'सु' के सकार का लोप होने पर 'लिह्' पदान्त हो गया।
२. 'हो ढः' से 'ह' को 'ढ' हुआ -> 'लिढ्'।
३. 'झलां जशोऽन्ते' से 'ढ' को 'ड' हुआ -> 'लिड्'।
४. 'वाऽवसाने' से विकल्प से 'ड' को 'ट' हुआ -> लिट्, लिड्

विभक्ति रूप तालिका:

  • प्रथमा: लिट्-लिड्, लिहौ, लिहः

  • द्वितीया: लिहम्, लिहौ, लिहः

  • तृतीया: लिहा, लिड्भ्याम्, लिड्भिः


२. विश्ववाह् शब्द (संसार को धारण करने वाला)

यह शब्द 'विश्व' उपसर्ग पूर्वक 'वह्' धातु से बना है। यहाँ संप्रसारण की प्रक्रिया अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

सूत्र: इग्यणः संप्रसारणम् (१/१/४५)

  • अर्थ: यण् (य, व, र, ल) के स्थान पर होने वाले इक् (इ, उ, ऋ, ऌ) को 'संप्रसारण' कहते हैं।

सूत्र: वाह ऊठ् (६/४/१३२)

  • वृत्ति: भस्य वाहः संप्रसारणम् ऊठ्।

  • व्याख्या: भ-संज्ञक 'वाह' शब्द के 'व' को 'ऊ' (ऊठ्) आदेश होता है।

सिद्धि (विश्वौहः):
जब 'विश्ववाह + अस्' (शस/ङस) की स्थिति होती है, तब 'व' को 'ऊ' संप्रसारण होता है। 'संप्रसारणाच्च' सूत्र से पूर्वरूप होकर और 'एत्येधत्यूठ्सु' से वृद्धि होकर 'विश्वौहः' रूप सिद्ध होता है।


३. रकारान्त 'चतुर्' शब्द (चार)

'चतुर्' शब्द नित्य बहुवचनान्त है, अर्थात् इसके रूप केवल बहुवचन में ही चलते हैं।

सूत्र: चतुरनडुहो रामुदात्तः (७/१/९८)

  • अर्थ: 'चतुर्' और 'अनडुह्' शब्दों को 'आम्' का आगम होता है यदि सर्वनामस्थान (सु, औ, जस्, अम्, औ) परे हो।

सिद्धि (चत्वारः):
'चतुर् + जस्' की स्थिति में 'आम्' आगम होकर 'चतु आ र् अस्' बना। उकार को यण् (व) करने पर 'चत्वारः' बना।

षष्ठी बहुवचन (चतुर्णाम्):
यहाँ 'षट्चतुर्भ्यश्च' सूत्र से 'नुट्' आगम होता है और 'रषाभ्यां नो णः समानपदे' से नकार को णकार होकर 'चतुर्णाम्' सिद्ध होता है।


४. नकारान्त 'राजन्' शब्द (राजा)

राजन् शब्द की सिद्धि संस्कृत व्याकरण में विशेष स्थान रखती है।

सूत्र: न ङिसम्बुद्धयोः (८/२/८)

  • अर्थ: 'ङि' (सप्तमी एकवचन) और 'सम्बुद्धि' (हे राजन्) परे होने पर नकार का लोप नहीं होता।

  • उदाहरण: हे राजन्! (यहाँ नकार श्रवण होता है)।

नकार लोप की प्रक्रिया:
प्रथमा एकवचन में 'राजन् + सु' में 'सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ' से उपधा दीर्घ होकर 'राजान्' और फिर 'न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य' से नकार का लोप होकर 'राजा' रूप बनता है।


५. युष्मद् और अस्मद् शब्द (सर्वनाम)

ये दोनों शब्द 'उत्तम पुरुष' और 'मध्यम पुरुष' के आधार हैं। इनके रूप अत्यंत जटिल और विशिष्ट सूत्रों से सिद्ध होते हैं।

मुख्य सूत्र और प्रक्रिया:
१. त्वाहौ सौ (७/२/९४): 'सु' परे रहने पर युष्मद् को 'त्व' और अस्मद् को 'अह' आदेश होता है। जिससे त्वम् और अहम् बनते हैं।
२. युवावौ द्विवचने (७/२/९२): द्विवचन में 'युव' और 'आव' आदेश। (युवाम्, आवाम्)
३. यूयवयौ जसि (७/२/९३): जस् परे होने पर 'यूय' और 'वय' आदेश। (यूयम्, वयम्)

वैकल्पिक रूप (Enclitic Forms):
संस्कृत में 'त्वा, मे, ते, वाम्, नौ' जैसे लघु रूप भी पाए जाते हैं जो 'पदात्पर' (किसी पद के बाद) होने पर प्रयुक्त होते हैं।

  • उदाहरण: "श्रीगुरुवे नमः। स मे रक्षतु।" (यहाँ 'मे' अस्मद् का षष्ठी एकवचन वैकल्पिक रूप है)।


६. मकारान्त 'इदम्' शब्द (यह)

'इदम्' शब्द के पुल्लिङ्ग रूपों में 'अयम्' सबसे प्रमुख है।

सूत्र: इदोऽय् पुंसि (७/२/१११)

  • व्याख्या: 'सु' विभक्ति परे होने पर 'इदम्' के 'इद्' भाग को 'अय' आदेश होता है। जिससे 'अयम्' सिद्ध होता है।

  • अन्य रूप: इमौ, इमे, एनम्, एनेन आदि।


भाग २: ॥अथ हलन्तस्त्रीलिङ्गाः॥

स्त्रीलिङ्ग में हलन्त शब्द कम हैं, परन्तु जो हैं वे अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।

१. नह (उपानह् - जूता)

सूत्र: नहो धः (८/२/३४)

  • अर्थ: 'नह' धातु के 'ह' को 'ध' होता है।

  • रूप: उपानत्, उपानहौ, उपानहः।

२. दिव् (द्यु - स्वर्ग/आकाश)

रूप: द्यौः, दिवौ, दिवः। यहाँ 'दिव उत्' सूत्र से उकारान्त आदेश होकर 'द्यौः' बनता है।


भाग ३: ॥अथ हलन्तनपुंसकलिङ्गाः॥

नपुंसकलिङ्ग में भी हलन्त शब्दों की अपनी विशेषता है।

१. चतुर् (चार)

नपुंसकलिङ्ग में 'चत्वारि' रूप बनता है।

  • सूत्र: 'चतुरनडुहो...' से आम् आगम और नुम् आगम होकर 'चत्वारि' सिद्ध होता है।

२. इदम् (यह)

नपुंसकलिङ्ग में प्रथमा और द्वितीया के रूप इस प्रकार हैं:

  • इदम्, इमे, इमानि।


अष्टाध्यायी के प्रमुख सूत्रों का संग्रह (मंत्रवत स्मरण हेतु)

यहाँ कुछ ऐसे सूत्र दिए जा रहे हैं जो हलन्त प्रक्रिया की आत्मा हैं:

१. हो ढः।
२. झलां जशोऽन्ते।
३. वाऽवसाने।
४. न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य।
५. उगितश्च।
६. तदोः सः सावनन्त्ययोः।


विशेष उदाहरण एवं प्रयोग (साहित्य से)

संस्कृत साहित्य में इन हलन्त शब्दों का प्रयोग प्रचुर मात्रा में मिलता है।

१. राजन् शब्द का प्रयोग:
"राजा कालस्य कारणम्।" (राजा ही समय का निर्माता है)।

२. अस्मद् शब्द का प्रयोग (भगवद्गीता):
"अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।"
यहाँ 'अहम्' (प्रथमा एकवचन) और 'मत्तः' (पञ्चमी एकवचन) अस्मद् शब्द के रूप हैं।

३. विद्वस् शब्द का प्रयोग:
"विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।"
यहाँ 'विद्वस्' शब्द के प्रथमा एकवचन का रूप 'विद्वान्' है। इसकी सिद्धि 'अत सांतमहतः संयोगस्य' सूत्र से दीर्घ होकर होती है।


व्याकरण सम्मत प्रक्रिया का महत्त्व

हलन्त शब्दों का ज्ञान होने से वेदों और उपनिषदों के अर्थ समझने में सुगमता होती है। उदाहरण के लिए, जब हम वेदों में 'मघवा' शब्द पढ़ते हैं, तो हमें ज्ञात होना चाहिए कि यह 'मघवन्' शब्द का प्रथमा एकवचन है, जो इन्द्र के लिए प्रयुक्त हुआ है।

मघवन् शब्द की सिद्धि:

  • 'मघवा बहुलम्' सूत्र से विकल्प से 'तृ' आदेश होता है।

  • रूप: मघवान् / मघवा


निष्कर्ष: शब्द साधना ही ब्रह्म साधना है

संस्कृत व्याकरण का यह 'हलन्त प्रकरण' केवल शब्दों के रूप रटने की विद्या नहीं है, बल्कि यह ध्वनि विज्ञान (Acoustics) और तर्कशास्त्र का अनूठा संगम है। पाणिनी की अष्टाध्यायी के सूत्रों का पालन करते हुए जब एक शब्द 'प्रातिपदिक' से 'पद' बनता है, तो वह एक संस्कारित ध्वनि बन जाता है।

"संस्कृतं नाम दैवी वागन्वाख्याता महर्षिभिः।"

इस लेख के माध्यम से हमने हलन्त पुल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग के जटिल सूत्रों को सरल हिन्दी व्याख्या के साथ समझने का प्रयास किया है। चाहे वह 'विश्ववाह्' का संप्रसारण हो या 'राजन्' का नकार लोप, हर नियम के पीछे एक वैज्ञानिक कारण है।


शब्द रूप अभ्यास तालिका (संक्षेप)

प्रातिपदिकप्रथमा एकवचनअर्थ
लिह्लिट् / लिड्चाटने वाला
राजन्राजाराजा
विद्वस्विद्वान्ज्ञानी
पथिन्पन्थाःमार्ग
युष्मद्त्वम्तुम
अस्मद्अहम्मैं
उपानह्उपानत्जूता

लेखक का संदेश:
संस्कृत व्याकरण की यह यात्रा अनंत है। इस लेख में समाहित 'लघुसिद्धान्तकौमुदी' के अंश आपको व्याकरण के गूढ़ रहस्यों को समझने में सहायता करेंगे। निरंतर अभ्यास ही शब्द-शुद्धि का एकमात्र मार्ग है।

॥ इति हलन्त प्रकरणम् सम्पूर्णम् ॥
॥ जयतु संस्कृतम्, जयतु भारतम् ॥

व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।

  • महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।

मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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