संस्कृत व्याकरण की गहन यात्रा: हलन्त पुल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग एवं नपुंसकलिङ्ग प्रकरण का विस्तृत विवेचन
प्रस्तावन: शब्द और ब्रह्म का सम्बन्ध

हलन्त पुल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग एवं नपुंसकलिङ्ग प्रकरण
भाग १: ॥अथ हलन्तपुल्लिङ्गप्रकरणम्॥
१. हकारान्त 'लिह्' शब्द (चाटने वाला)
वृत्ति: हस्य ढः स्याद् झलि पदान्ते च। व्याख्या: यदि पद के अन्त में 'ह' हो या उसके बाद 'झल्' (वर्ग का १, २, ३, ४ वर्ण या श, ष, स, ह) हो, तो 'ह' के स्थान पर 'ढ' आदेश हो जाता है।
प्रथमा: लिट्-लिड्, लिहौ, लिहः द्वितीया: लिहम्, लिहौ, लिहः तृतीया: लिहा, लिड्भ्याम्, लिड्भिः
२. विश्ववाह् शब्द (संसार को धारण करने वाला)
अर्थ: यण् (य, व, र, ल) के स्थान पर होने वाले इक् (इ, उ, ऋ, ऌ) को 'संप्रसारण' कहते हैं।
वृत्ति: भस्य वाहः संप्रसारणम् ऊठ्। व्याख्या: भ-संज्ञक 'वाह' शब्द के 'व' को 'ऊ' (ऊठ्) आदेश होता है।
३. रकारान्त 'चतुर्' शब्द (चार)
अर्थ: 'चतुर्' और 'अनडुह्' शब्दों को 'आम्' का आगम होता है यदि सर्वनामस्थान (सु, औ, जस्, अम्, औ) परे हो।
४. नकारान्त 'राजन्' शब्द (राजा)
अर्थ: 'ङि' (सप्तमी एकवचन) और 'सम्बुद्धि' (हे राजन्) परे होने पर नकार का लोप नहीं होता। उदाहरण: हे राजन्! (यहाँ नकार श्रवण होता है)।
५. युष्मद् और अस्मद् शब्द (सर्वनाम)
उदाहरण: "श्रीगुरुवे नमः। स मे रक्षतु।" (यहाँ 'मे' अस्मद् का षष्ठी एकवचन वैकल्पिक रूप है)।
६. मकारान्त 'इदम्' शब्द (यह)
व्याख्या: 'सु' विभक्ति परे होने पर 'इदम्' के 'इद्' भाग को 'अय' आदेश होता है। जिससे 'अयम्' सिद्ध होता है। अन्य रूप: इमौ, इमे, एनम्, एनेन आदि।
भाग २: ॥अथ हलन्तस्त्रीलिङ्गाः॥
१. नह (उपानह् - जूता)
अर्थ: 'नह' धातु के 'ह' को 'ध' होता है। रूप: उपानत्, उपानहौ, उपानहः।
२. दिव् (द्यु - स्वर्ग/आकाश)
भाग ३: ॥अथ हलन्तनपुंसकलिङ्गाः॥
१. चतुर् (चार)
सूत्र: 'चतुरनडुहो...' से आम् आगम और नुम् आगम होकर 'चत्वारि' सिद्ध होता है।
२. इदम् (यह)
इदम्, इमे, इमानि।
अष्टाध्यायी के प्रमुख सूत्रों का संग्रह (मंत्रवत स्मरण हेतु)
१. हो ढः। २. झलां जशोऽन्ते। ३. वाऽवसाने। ४. न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य। ५. उगितश्च। ६. तदोः सः सावनन्त्ययोः।
विशेष उदाहरण एवं प्रयोग (साहित्य से)
व्याकरण सम्मत प्रक्रिया का महत्त्व
'मघवा बहुलम्' सूत्र से विकल्प से 'तृ' आदेश होता है। रूप: मघवान् / मघवा।
निष्कर्ष: शब्द साधना ही ब्रह्म साधना है
शब्द रूप अभ्यास तालिका (संक्षेप)
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- संज्ञाप्रकरणम् - लघुसिद्धान्तकौमुदी
- सन्धि - अच सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - हल सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - विसर्ग सन्धि (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तद्धित :- अपत्यार्थक एवं मत्वर्थीय (सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार)
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- स्त्री प्रत्यय :- लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रकरण :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रथमा विभक्ति
- कारक द्वितीया विभक्ति
- कारक तृतीया विभक्ति
- कारक चतुर्थी विभक्ति
- कारक पञ्चमी विभक्ति
- कारक षष्ठी विभक्ति
- कारक सप्तमी विभक्ति
- परस्मैपद एवं आत्मनेपद विधान :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।