संस्कृत व्याकरण का गहन अध्ययन: केवल समास और समास प्रक्रिया की विस्तृत मीमांसा
प्रस्तावना: व्याकरण और समास का महत्त्व
संस्कृत भाषा को 'देववाणी' कहा जाता है। इसकी संरचना इतनी वैज्ञानिक और व्यवस्थित है कि आधुनिक कंप्यूटर विज्ञान में भी इसकी प्रशंसा की जाती है। महर्षि पाणिनि द्वारा रचित 'अष्टाध्यायी' संस्कृत व्याकरण का आधार स्तंभ है। व्याकरण के छह अंगों (वेदांग) में 'मुखं व्याकरणं स्मृतम्' कहकर व्याकरण को वेद रूपी पुरुष का मुख माना गया है।
जब हम संस्कृत साहित्य या वाक्यों का अध्ययन करते हैं, तो हमें 'समास' नामक एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया मिलती है। समास का अर्थ है—संक्षिप्तीकरण। जहाँ कई पद मिलकर एक पद बन जाते हैं, उसे समास कहते हैं। आज के इस विशेष लेख में हम 'केवल समास' की गहराई से चर्चा करेंगे, जो समस्त समासों का आधार है।
मंगलाचरण:
येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात्।
कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः ॥
१. समास का स्वरूप और परिभाषा
संस्कृत व्याकरण के अनुसार, "समसनं समासः"। अर्थात् अनेक पदों का मिलकर एक पद हो जाना ही 'समास' है। जब दो या दो से अधिक सुबन्त (शब्द रूप) अपनी विभक्तियों का त्याग कर एक विशिष्ट अर्थ को प्रकट करने के लिए आपस में जुड़ते हैं, तो उस प्रक्रिया को समास कहते हैं।
समास के पाँच भेद (पञ्चधा समासः)
सिद्धांतकौमुदीकार श्री भट्टोजिदीक्षित के अनुसार समास मुख्य रूप से पाँच प्रकार के होते हैं:
केवल समास: जिसे किसी विशेष नाम से अभिहित नहीं किया गया है (विशेषसंज्ञाविनिर्मुक्तः केवलसमासः)।
अव्ययीभाव समास: जिसमें प्रायः पूर्व पद के अर्थ की प्रधानता होती है।
तत्पुरुष समास: जिसमें प्रायः उत्तर पद के अर्थ की प्रधानता होती है। (इसके दो उपभेद हैं: कर्मधारय और द्विगु)।
बहुव्रीहि समास: जिसमें प्रायः अन्य पद (जो समास में साक्षात् नहीं है) के अर्थ की प्रधानता होती है।
द्वन्द्व समास: जिसमें प्रायः उभय पद (दोनों पदों) के अर्थ की प्रधानता होती है।
२. केवल समास: अर्थ एवं विशेषता
सूत्र: तत्र विशेषसंज्ञाविनिर्मुक्तः केवलसमासः प्रथमः।
केवल समास वह समास है जिसका कोई विशेष नाम (जैसे अव्ययीभाव या तत्पुरुष) नहीं रखा गया है। इसे 'सुप-सुपा' समास भी कहा जाता है क्योंकि यह 'सह सुपा' सूत्र के अधिकार में आता है। यह समास अत्यंत प्राचीन और मौलिक है।
३. महत्वपूर्ण सूत्रों की व्याख्या
संस्कृत व्याकरण सूत्रों पर आधारित है। केवल समास को समझने के लिए हमें अष्टाध्यायी के निम्नलिखित सूत्रों को समझना अनिवार्य है:
(क) समर्थः पदविधिः (अष्टाध्यायी २/१/१)
वृत्ति: पदसम्बन्धी यो विधिः स समर्थाश्रितो बोध्यः।
हिन्दी अर्थ: पदों से सम्बन्ध रखने वाला जो भी कार्य (जैसे समास) होता है, वह 'समर्थ' पदों के बीच ही होना चाहिए।
व्याख्या: यहाँ 'सामर्थ्य' के दो अर्थ होते हैं:
व्यपेक्षा: पदों का एक-दूसरे के अर्थ की आकांक्षा रखना (वाक्य में)।
एकार्थीभाव: अलग-अलग अर्थ वाले पदों का मिलकर एक नया विशिष्ट अर्थ देना (समास में)।
बिना सामर्थ्य के समास नहीं हो सकता। जैसे "पश्य मृगो धावति" यहाँ समास नहीं होगा क्योंकि पदों में उस प्रकार का सामर्थ्य नहीं है।
(ख) प्राक्कडारात्समासः (अष्टाध्यायी २/१/३)
वृत्ति: कडाराः कर्मधारय इत्यतः प्राक् समास इत्यधिक्रियते।
हिन्दी अर्थ: अष्टाध्यायी के सूत्र 'कडाराः कर्मधारयः' (२/२/३८) से पहले तक जो भी विधान किए गए हैं, वे 'समास' संज्ञा के अंतर्गत आते हैं। यह एक 'अधिकार सूत्र' है जो समास के कार्यक्षेत्र को निर्धारित करता है।
(ग) सह सुपा (अष्टाध्यायी २/१/४)
वृत्ति: सुप् सुपा सह वा समस्यते।
हिन्दी अर्थ: एक सुबन्त (जिसके अंत में सु, औ, जस आदि विभक्तियाँ हों) का दूसरे सुबन्त के साथ विकल्प से समास होता है।
उदाहरण: 'भूतपूर्वः' में 'भूत' और 'पूर्व' दोनों सुबन्त हैं, जिनका इस सूत्र से समास हुआ है।
४. वृत्ति और विग्रह: शब्द प्रक्रिया का आधार
समास को समझने के लिए 'वृत्ति' और 'विग्रह' को समझना बहुत जरूरी है।
वृत्ति (Vrutti)
परिभाषा: परार्थाभिधानं वृत्तिः।
जब पद अपने मूल अर्थ को छोड़कर एक विशिष्ट अर्थ को बताने लगते हैं, तो उसे वृत्ति कहते हैं। संस्कृत व्याकरण में पाँच वृत्तियाँ मानी गई हैं:
कृत् वृत्ति: कृदन्त शब्दों की रचना।
तद्धित वृत्ति: तद्धित प्रत्ययों से बने शब्द।
समास वृत्ति: दो पदों का मेल।
एकशेष वृत्ति: जहाँ दो शब्दों में से एक ही शेष रहे (जैसे: पितरौ - माता च पिता च)।
सनाद्यन्त धातु वृत्ति: सन् आदि प्रत्ययों से बनी धातुएँ।
विग्रह (Vigraha)
परिभाषा: वृत्त्यर्थावबोधकं वाक्यं विग्रहः।
वृत्ति के अर्थ को समझाने वाले वाक्य को विग्रह कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है:
लौकिक विग्रह: जो लोक व्यवहार में प्रयुक्त होता है। जैसे: पूर्वं भूतः।
अलौकिक विग्रह: जो व्याकरण प्रक्रिया के लिए सुबन्त प्रत्ययों के साथ दिखाया जाता है। जैसे: पूर्व अम् + भूत सु।
५. केवल समास की प्रक्रिया: 'भूतपूर्वः' का उदाहरण
केवल समास का सबसे प्रमुख उदाहरण 'भूतपूर्वः' है। इसकी सिद्धि प्रक्रिया इस प्रकार है:
अर्थ: जो पहले हो चुका हो।
लौकिक विग्रह: पूर्वं भूतः।
अलौकिक विग्रह: पूर्व अम् + भूत सु।
समास: 'सह सुपा' सूत्र से समास संज्ञा हुई।
प्रातिपदिक संज्ञा: 'कृत्तद्धितसमासाश्च' सूत्र से समस्त पद की प्रातिपदिक संज्ञा हुई।
विभक्ति लोप: 'सुपो धातुप्रातिपदिकयोः' सूत्र से 'अम्' और 'सु' का लोप हो गया।
विशेष नियम (पूर्वनिपात): नियमतः 'भूत' शब्द बाद में आना चाहिए था, लेकिन पाणिनीय निर्देश 'भूतपूर्वे चरट्' के कारण 'भूत' शब्द का पूर्वनिपात (पहले प्रयोग) होता है।
सिद्धि: भूत + पूर्व = भूतपूर्वः।
६. विशेष वार्तिक: 'इवेन समासो विभक्त्यलोपश्च'
केवल समास के अंतर्गत एक अत्यंत महत्वपूर्ण वार्तिक आता है जो महाकवि कालिदास के काव्यों में बहुत अधिक प्रयुक्त हुआ है।
वार्तिक: इवेन समासो विभक्त्यलोपश्च।
हिन्दी अर्थ: सुबन्त पद का 'इव' अव्यय के साथ समास होता है, परन्तु इसमें पूर्व पद की विभक्ति का लोप नहीं होता। यह केवल समास का एक अपवाद स्वरूप नियम है।
उदाहरण: वागर्थाविव (Vagarthaviva)
यह रघुवंशम् के मंगलाचरण का प्रथम शब्द है:
वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥
विग्रह: वागर्थौ इव (वाणी और अर्थ के समान)।
प्रक्रिया: यहाँ 'वागर्थौ' (प्रथमा द्विवचन) का 'इव' के साथ समास हुआ है। नियमतः विभक्ति का लोप होना चाहिए था, लेकिन वार्तिक के कारण 'औ' विभक्ति का लोप नहीं हुआ। अतः यह 'वागर्थाविव' बना।
७. केवल समास के अन्य उदाहरण और अभ्यास
पाठकों की सुविधा के लिए यहाँ कुछ और उदाहरण दिए जा रहे हैं जो केवल समास की श्रेणी में आते हैं:
जीमूतस्येव: जीमूतस्य + इव (बादल के समान)। यहाँ भी विभक्ति का लोप नहीं हुआ।
अदृष्टपूर्वः: न दृष्टः पूर्वं इति (जो पहले न देखा गया हो)।
श्रुतपूर्वः: पूर्वं श्रुतः (जो पहले सुना गया हो)।
८. समास का दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्त्व
संस्कृत के शब्द मात्र संवाद के माध्यम नहीं हैं, वे ब्रह्म का रूप हैं। कहा गया है— "शब्दब्रह्मणे नमः"।
जब हम समास करते हैं, तो हम बिखरे हुए विचारों को एक सूत्र में पिरोते हैं। ऋग्वेद का प्रसिद्ध मंत्र हमें संगठन और सामंजस्य (जो समास का ही आध्यात्मिक रूप है) की शिक्षा देता है:
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ॥
जिस प्रकार 'सह सुपा' सूत्र अलग-अलग सुबन्तों को जोड़कर एक कर देता है, उसी प्रकार समाज में भी विभिन्न विचारधाराओं का 'समसन' (एकत्रीकरण) आवश्यक है।
९. SEO हेतु मुख्य बिन्दु और निष्कर्ष
यदि आप संस्कृत व्याकरण के छात्र हैं या NET/JRF, UPSC संस्कृत वैकल्पिक विषय की तैयारी कर रहे हैं, तो 'केवल समास' को समझना अनिवार्य है।
मुख्य निष्कर्ष:
समास का अर्थ संक्षिप्तीकरण है।
केवल समास 'विशेषसंज्ञाविनिर्मुक्त' होता है।
'सह सुपा' इसका आधार सूत्र है।
'भूतपूर्वः' और 'वागर्थाविव' इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं।
विभक्ति लोप और पूर्वनिपात इसके प्रमुख व्याकरणिक चरण हैं।
संस्कृत व्याकरण केवल रटने का विषय नहीं है, यह गणित की तरह सटीक और तर्कसंगत है। केवल समास यह सिद्ध करता है कि भाषा में जहाँ कोई नियम लागू नहीं होता, वहाँ भी एक 'मर्यादा' और 'नियम' (केवल समास के रूप में) विद्यमान रहता है।
१०. अतिरिक्त अभ्यास हेतु प्रश्न
आपकी समझ को गहरा करने के लिए यहाँ कुछ प्रश्न दिए जा रहे हैं:
'समासः पञ्चधा'—यह उक्ति किस ग्रन्थ की है?
'सह सुपा' सूत्र का क्या कार्य है?
'लौकिक' और 'अलौकिक' विग्रह में क्या अंतर है?
'वागर्थाविव' में किस वार्तिक से समास हुआ है?
समाप्ति मंत्र:
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
हमें आशा है कि 'केवल समास' पर आधारित यह विस्तृत लेख आपके ज्ञानवर्धन में सहायक सिद्ध होगा। संस्कृत व्याकरण के अन्य विषयों पर जानकारी प्राप्त करने के लिए हमारे ब्लॉग से जुड़े रहें।
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
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- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
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- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।