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कारक प्रकरण - षष्ठी विभक्ति (विस्तृत मार्गदर्शिका)

षष्ठी विभक्ति

संस्कृत व्याकरण का गहन अध्ययन: कारक प्रकरण - षष्ठी विभक्ति (विस्तृत मार्गदर्शिका) 

प्रसंग और भूमिका (Introduction)

संस्कृत भाषा संसार की सबसे वैज्ञानिक और समृद्ध भाषा मानी जाती है। महर्षि पाणिनी की 'अष्टाध्यायी' इस भाषा का आधार स्तंभ है। पाणिनीय व्याकरण में 'कारक' (Kāraka) का विशेष महत्व है। कारक का अर्थ है—"क्रियान्वयित्वं कारकत्वम्" अर्थात् क्रिया के साथ जिसका सीधा संबंध हो, वह कारक है।

किन्तु, जब हम षष्ठी विभक्ति की बात करते हैं, तो यहाँ एक रोचक तथ्य सामने आता है। पाणिनी ने षष्ठी को 'कारक' की श्रेणी में प्रत्यक्ष रूप से नहीं रखा है, क्योंकि षष्ठी विभक्ति प्रायः दो संज्ञाओं के बीच 'सम्बन्ध' को दर्शाती है, न कि क्रिया के साथ सीधे संबंध को। इसीलिए इसे "शेषे षष्ठी" कहा गया है।

इस आलेख में हम षष्ठी विभक्ति के समस्त सूत्रों, उनके अर्थों, व्यावहारिक प्रयोगों और उनके पीछे के व्याकरणिक रहस्यों को विस्तार से समझेंगे।


1. मुख्य सूत्र: षष्ठी शेषे (2/3/50)

सूत्रम्: षष्ठी शेषे । 2/3/50
वृत्ति: कारकप्रातिपदिकार्थव्यतिरिक्तः स्वस्वामिभावादिसम्बन्धः शेषस्तत्र षष्ठी स्यात् ।

विस्तृत व्याख्या:
इस सूत्र का अर्थ है कि जहाँ 'कारक' (कर्ता, कर्म, करण आदि) और 'प्रातिपदिकार्थ' (नाममात्र) से जो बच गया है, उसे 'शेष' कहा जाता है। इस 'शेष' में सम्बन्ध को प्रकट करने के लिए षष्ठी विभक्ति का प्रयोग होता है। यह सम्बन्ध कई प्रकार का हो सकता है, जैसे:

  • स्व-स्वामी भाव: मालिक और वस्तु का सम्बन्ध।

  • जनक-जन्य भाव: पिता और पुत्र का सम्बन्ध।

  • अवयव-अवयवी भाव: अंग और अंगी का सम्बन्ध।

उदाहरण:

  1. राज्ञः पुरुषः (राजा का पुरुष/सेवक): यहाँ राजा और पुरुष के बीच 'स्वामी-सेवक' का सम्बन्ध है। राजा में षष्ठी विभक्ति लगी है।

  2. वृक्षस्य पर्णम् (वृक्ष का पत्ता): यहाँ अवयव-अवयवी भाव है।

विशेष श्लोक:

सम्बन्धः षष्ठ्यर्थः प्रोक्तः कारकेभ्यः पृथक् च सः।
यथा राज्ञः पुरुष इत्यत्र स्वस्वामिभावो दृश्यते ॥


2. कर्मादि सम्बन्ध की विवक्षा में षष्ठी

सूत्रम्: कर्मादीनामपि सम्बन्धमात्रविवक्षायां षष्ठमेव ।

हिन्दी व्याख्या:
कभी-कभी हम कर्म, करण या सम्प्रदान को 'कारक' के रूप में न दिखाकर केवल एक 'सम्बन्ध' के रूप में दिखाना चाहते हैं। ऐसी स्थिति को 'विवक्षा' (कहने की इच्छा) कहते हैं। जब वक्ता कर्म आदि को सम्बन्ध मात्र बताना चाहता है, तब वहां षष्ठी विभक्ति होती है।

प्रमुख उदाहरण और विश्लेषण:

  1. सतां गतम् (सत्पुरुषों का गमन): यहाँ 'सतां' में षष्ठी है। मूलतः यह कर्ता हो सकता था, लेकिन यहाँ गमन की क्रिया के साथ सम्बन्ध मात्र बताया गया है।

  2. सर्पिषो जानीते (घी के माध्यम से प्रवृत्त होना): यहाँ 'सर्पिष्' (घी) में षष्ठी है।

  3. मातुः स्मरति (माता को याद करता है): यहाँ माता 'कर्म' है, पर सम्बन्ध की विवक्षा में षष्ठी हुई।

  4. फलानां तृप्तः (फलों से तृप्त): यहाँ 'फलों' के द्वारा तृप्ति मिली (करण), पर सम्बन्ध विवक्षा में षष्ठी हुई।

  5. भजे शम्भोश्चरणयोः (मैं भगवान शिव के चरणों की सेवा करता हूँ): यहाँ चरणों का शिव के साथ और भक्त का चरणों के साथ सम्बन्ध है।


3. 'हेतु' शब्द के प्रयोग में षष्ठी

सूत्रम्: षष्ठी हेतुप्रयोगे । 2/3/26
वृत्ति: हेतुशब्दप्रयोगे हेतौ द्योत्ये षष्ठी स्यात् ।

व्याख्या:
जब वाक्य में 'हेतु' शब्द का साक्षात् प्रयोग हो और वह किसी कारण या प्रयोजन को प्रकट करे, तो उस कारणवाचक शब्द और 'हेतु' शब्द—दोनों में षष्ठी विभक्ति होती है।

उदाहरण:

  • अन्नस्य हेतोर्वसति (अन्न के कारण रहता है): यहाँ रहने का कारण 'अन्न' है और 'हेतु' शब्द का प्रयोग हुआ है, इसलिए 'अन्न' और 'हेतु' दोनों में षष्ठी हुई।


4. सर्वनाम और हेतु का विशेष प्रयोग

सूत्रम्: सर्वनाम्रस्तृतीया च । 2/3/27
वृत्ति: सर्वनाम्रो हेतुशब्दस्य च प्रयोगे हेतौ द्योत्ये तृतीया स्यात् षष्ठी च ।

व्याख्या:
यदि 'हेतु' शब्द के साथ किसी 'सर्वनाम' (जैसे- यद्, तद्, किम्) का प्रयोग हो, तो सर्वनाम और हेतु शब्द दोनों में षष्ठी के साथ-साथ तृतीया विभक्ति भी विकल्प से होती है। (कुछ आचार्य यहाँ पञ्चमी भी मानते हैं)।

उदाहरण:

  1. कस्य हेतोः अत्र वसति? (षष्ठी)

  2. केन हेतुना अत्र वसति? (तृतीया)

  3. कस्मात् हेतोः अत्र वसति? (पञ्चमी)


5. निमित्त, कारण और प्रयोजन के प्रयोग (वार्तिक)

वार्तिक: "निमित्तपर्यायप्रयोगे सर्वासां प्रायदर्शनम्"

व्याख्या:
यदि वाक्य में 'निमित्त' शब्द या उसके पर्यायवाची शब्दों (जैसे- कारण, हेतु, प्रयोजन) का प्रयोग हो, तो सर्वनाम के साथ सभी विभक्तियाँ (प्रथमा से सप्तमी तक) देखी जाती हैं।

उदाहरण:

  • किं निमित्तं वसति? (प्रथमा/द्वितीया)

  • केन निमित्तेन / कस्मै निमित्ताय / कस्मात् निमित्तात् / कस्य निमित्तस्य / कस्मिन् निमित्ते।

  • इसी प्रकार: किं कारणम्, को हेतुः, किं प्रयोजनम् आदि।

अपवाद: यदि शब्द सर्वनाम न हो, तो केवल तृतीया आदि होती है, प्रथमा-द्वितीया नहीं। यथा—ज्ञानेन निमित्तेन हरिः सेव्यः।


6. दिशावाचक और देशवाचक शब्दों के योग में षष्ठी

सूत्रम्: षष्ठ्यतसर्थप्रत्ययेन । 2/3/30
वृत्ति: एतद्योगे षष्ठी स्यात् ।

व्याख्या:
जिन शब्दों के अंत में 'अतसच्' प्रत्यय लगा हो (जैसे- दक्षिणतः, उत्तरतः) या जिनका अर्थ 'ऊपर', 'नीचे', 'सामने' आदि हो, उनके योग में जिससे समीपता या दिशा बताई जाए, उसमें षष्ठी होती है।

प्रमुख उदाहरण:

  1. ग्रामस्य दक्षिणतः (गांव के दक्षिण में): 'दक्षिणतः' के योग में 'ग्राम' में षष्ठी।

  2. नगरस्य पुरस्तात् (नगर के सामने): 'पुरस्तात्' के योग में षष्ठी।

  3. वृक्षस्य उपरि (वृक्ष के ऊपर): यहाँ 'उपरि' के योग में षष्ठी है।


7. 'एनप' प्रत्यय के योग में द्वितीया और षष्ठी

सूत्रम्: एनपा द्वितीया । 2/3/31
वृत्ति: एनबन्तेन योगे द्वितीया स्यात् ।

व्याख्या:
'एनप' प्रत्ययान्त शब्दों (जैसे- दक्षिणेन, उत्तरेण) के योग में द्वितीया विभक्ति होती है, परन्तु योगविभाग (व्याकरणिक नियम) से षष्ठी भी होती है।

उदाहरण:

  • दक्षिणेन ग्रामम् / ग्रामस्य वा (गांव के दक्षिण में): यहाँ द्वितीया और षष्ठी दोनों सही हैं।


8. दूर और समीप वाचक शब्दों के योग में

सूत्रम्: दूरान्तिकार्थैः षष्ठमन्यतरस्याम् । 2/3/34
वृत्ति: एतैर्योगे षष्ठी स्यात् पञ्चमी च ।

व्याख्या:
'दूर' (Distance) और 'अन्तिक' (Near) तथा इनके पर्यायवाची शब्दों के योग में विकल्प से षष्ठी और पञ्चमी विभक्तियाँ होती हैं।

उदाहरण:

  • ग्रामस्य दूरम् / ग्रामात् दूरम् (गांव से दूर)।

  • नगरस्य निकटम् / नगरात् निकटम् (नगर के पास)।


9. विशिष्ट धातुओं के योग में षष्ठी (कर्म में षष्ठी)

संस्कृत व्याकरण में कुछ धातुएँ ऐसी हैं जिनके 'कर्म' (Object) में द्वितीया के स्थान पर षष्ठी विभक्ति होती है जब सम्बन्ध की विवक्षा हो।

(A) अज्ञानार्थक 'ज्ञा' धातु

सूत्रम्: ज्ञोऽविदर्थस्य करणे । 2/3/51
वृत्ति: जानातेरज्ञानार्थस्य करणे शेषत्वेन विवक्षिते षष्ठी स्यात् ।
उदाहरण: सर्पिषो ज्ञानम् (घी का ज्ञान/ घी के माध्यम से जानना): यहाँ 'घी' जानने का साधन है, पर षष्ठी का प्रयोग हुआ।

(B) स्मरण, दया और ईश धातु

सूत्रम्: अधीगर्थदयेशां कर्मणि । 2/3/52
व्याख्या: अधि उपसर्ग पूर्वक 'इङ्' (स्मरण करना), 'दय' (दया करना) और 'ईश' (समर्थ होना/शासन करना) धातुओं के कर्म में षष्ठी होती है।
उदाहरण:

  1. मातुः स्मरणम् (माता का स्मरण): यहाँ माता कर्म है, पर षष्ठी हुई।

  2. दीनानां दयनम् (दीनों पर दया)।

  3. खलानां ईशनम् (दुष्टों पर शासन)।

(C) 'कृ' धातु (गुण-आधान के अर्थ में)

सूत्रम्: कृञः प्रतियत्ने । 2/3/53
उदाहरण: एधोदकस्योपस्करणम् (ईंधन और जल में गुणों का आधान करना)।


10. रोग और पीड़ा के अर्थ में षष्ठी

सूत्रम्: रुजार्थानां भाववचनानामज्वरेः । 2/3/54
व्याख्या: 'रुज्' (पीड़ा देना) अर्थ वाली धातुओं के योग में, यदि कर्ता कोई 'भाव' (रोग आदि) हो और 'ज्वर' धातु को छोड़कर, तो कर्म में षष्ठी होती है।

उदाहरण:

  • चौरस्य रोगस्य रुजा (चोर को रोग की पीड़ा)।

वार्तिक: "अज्वरिसंताप्योरिति वाच्यम्"
यदि 'ज्वर' और 'सन्ताप' का प्रयोग हो, तब भी षष्ठी होती है।
उदाहरण: रोगस्य चौरज्वरः (चोर को रोग का बुखार)।


11. आशीर्वाद और हिंसा के अर्थ में प्रयोग

(A) 'नाथ' धातु

सूत्रम्: आशिषि नाथः । 2/3/55
व्याख्या: आशीर्वाद के अर्थ में 'नाथ' धातु के कर्म में षष्ठी होती है।
उदाहरण: सर्पिषो नाथनम् (घी के लिए आशीष मांगना)।

(B) हिंसार्थक धातुएं

सूत्रम्: जासिनिप्रहणनाटकाथपिषां हिंसायाम् । 2/3/56
व्याख्या: जब 'जस्', 'नि+हन्', 'प्र+हन्', 'नट्', 'क्नाथ्' और 'पिष्' धातुओं का प्रयोग 'हिंसा' के अर्थ में हो, तो इनके कर्म में षष्ठी होती है।
उदाहरण:

  1. चौरस्योज्जासनम् (चोर को मारना/तड़पाना)।

  2. वृषलस्य पेषणम् (शूद्र या शत्रु का दमन)।
    नोट: यदि अर्थ हिंसा न हो, तो षष्ठी नहीं होगी। जैसे- 'धानापेषणम्' (अनाज पीसना - यहाँ हिंसा नहीं है)।


12. जुआ, क्रय-विक्रय और व्यापार के अर्थ में

सूत्रम्: व्यवहृपणोः समर्थयोः । 2/3/57
व्याख्या: सौदे का लेन-देन (Trade) या जुआ खेलने के अर्थ में 'व्यवहृ' और 'पण' धातुओं के कर्म में षष्ठी होती है।
उदाहरण: शतस्य व्यवहरणं पणनं वा (सौ रुपये का व्यवहार या दांव)।

सूत्रम्: दिवस्तदर्थस्य । 2/3/58
व्याख्या: 'दिव्' (जुआ खेलना) धातु के योग में भी षष्ठी होती है।
उदाहरण: शतस्य दीव्यति (सौ रुपये का दांव खेलता है)।


13. वैदिक और यज्ञीय प्रयोग

सूत्रम्: प्रेष्यब्रुवोर्हविषो देवतासंप्रदाने । 2/3/61
व्याख्या: जब यज्ञ में देवता को 'हवि' (आहुति) दी जाती है, तब 'प्रेष्य' और 'ब्रू' धातुओं के योग में हविवाचक शब्द में षष्ठी होती है।
उदाहरण: अग्नये छागस्य हविषो वपाया मेदसः प्रेष्य अनुब्रूहि वा। (अग्नि के लिए छाग की वपा और मेद की आहुति का निर्देश दो)।


14. समय और आवृत्ति (Repetition)

सूत्रम्: कृत्वोर्थप्रयोगे कालेऽधिकरणे । 2/3/64
व्याख्या: जब 'बार' (Times) का बोध कराने वाले शब्द (जैसे- द्विरु, पञ्चकृत्वः) का प्रयोग हो, तो समय वाचक शब्द में षष्ठी होती है।
उदाहरण:

  • पञ्चकृत्वोऽह्रो भोजनम् (दिन में पांच बार भोजन)।

  • द्विरहो भोजनम् (दिन में दो बार भोजन)।


15. कृदन्त शब्दों के साथ षष्ठी (अत्यंत महत्वपूर्ण)

सूत्रम्: कर्तृकर्मणोः कृति । 2/3/65
वृत्ति: कृद्योगे कर्तरि कर्मणि च षष्ठी स्यात् ।

व्याख्या:
'कृत्' प्रत्यय (जैसे- तृच्, अण्, घञ्, ल्युट्, क्तिन् आदि) से बने शब्दों के साथ उसके कर्ता और कर्म—दोनों में षष्ठी विभक्ति होती है।

उदाहरण:

  1. कृष्णस्य कृतिः (कृष्ण की रचना): यहाँ 'कृति' कृदन्त है, कर्ता 'कृष्ण' में षष्ठी हुई।

  2. जगतः कर्ता कृष्णः (जगत के कर्ता कृष्ण हैं): यहाँ 'जगत' कर्म है, जिसमें षष्ठी हुई।

वार्तिक: "गुणकर्मणि वेष्यते"
जहाँ दो कर्म हों, वहाँ गौण कर्म में विकल्प से षष्ठी होती है।
उदाहरण: नेता अश्वस्य स्रुघ्नस्य स्रुघ्नं वा।


16. उभयप्राप्तौ कर्मणि (जब कर्ता और कर्म दोनों हों)

सूत्रम्: उभयप्राप्तौ कर्मणि । 2/3/66
व्याख्या: यदि किसी कृदन्त शब्द के साथ कर्ता और कर्म दोनों का प्रयोग एक साथ हो, तो केवल 'कर्म' में षष्ठी होती है, कर्ता में नहीं (कर्ता में तृतीया होगी)।

उदाहरण:

  • आश्चर्यो गवां दोहोऽगोपेन (बिना ग्वाले के गायों का दुहा जाना आश्चर्यजनक है): यहाँ 'गाँव' (गाय) कर्म है, इसलिए इसमें षष्ठी हुई। 'अगोपेन' कर्ता है, इसमें तृतीया हुई।


17. वर्तमान अर्थ में 'क्त' प्रत्यय के साथ

सूत्रम्: क्तस्य च वर्तमाने । 2/3/67
व्याख्या: जब 'क्त' प्रत्ययान्त शब्द 'वर्तमान काल' के अर्थ में प्रयुक्त हो (जैसे- मति, बुद्धि, पूजा के अर्थ में), तो उसके योग में षष्ठी होती है।
उदाहरण:

  • राज्ञां मतः (राजाओं द्वारा माना गया)।

  • राज्ञां पूजितः (राजाओं द्वारा पूजित)।

सूत्रम्: अधिकरणवाचिनश्च । 2/3/68
उदाहरण: इदमेषामासितं शयितं गतं भुक्तं वा (यह इनका बैठना, सोना, जाना या खाना है)।


18. षष्ठी विभक्ति का निषेध (जहाँ षष्ठी नहीं होती)

सूत्रम्: न लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम् । 2/3/69
व्याख्या: निम्नलिखित प्रत्ययों के योग में षष्ठी विभक्ति नहीं होती (निषेध):

  1. ल (लृट् आदि): 'सृष्टिं कुर्वन्' (सृष्टि को करता हुआ)।

  2. उ (उक्): 'हरिं दिदृक्षुः' (हरि को देखने का इच्छुक)।

  3. अव्यय (क्त्वा, तुमुन्): 'जगत् सृष्ट्वा' (जगत रचकर), 'सुखं कर्तुम्' (सुख करने के लिए)।

  4. निष्ठा (क्त, क्तवतु): 'विष्णुना हता दैत्याः' (विष्णु द्वारा दैत्य मारे गए)।

  5. खलर्थ: 'ईषत्करः प्रपञ्चो हरिणा'।

  6. तृन्: 'कर्ता लोकान्' (लोकों का कर्ता)।

विशेष अपवाद (वार्तिक):

  • कमेरनिषेधः: 'लक्ष्म्याः कामुको हरिः' (यहाँ षष्ठी हुई)।

  • द्विषः शतुर्वा: 'मुरस्य/मुरं वा द्विषन्'।


19. भविष्यत् काल और ऋण के अर्थ में निषेध

सूत्रम्: अकेनोर्भविष्यदाधमर्ण्ययोः । 2/3/70
व्याख्या: भविष्यत् काल के अर्थ वाले 'अक' प्रत्यय और ऋण (कर्ज) के अर्थ में षष्ठी नहीं होती।
उदाहरण:

  • सतः पावकोऽवतरति।

  • शतं दायी (सौ रुपये देने वाला)।


20. कृत्य प्रत्ययों के साथ विकल्प

सूत्रम्: कृत्यानां कर्तरि वा । 2/3/71
व्याख्या: कृत्य प्रत्यय (तव्यत्, अनीयर्, यत् आदि) के योग में कर्ता में विकल्प से षष्ठी या तृतीया विभक्ति होती है।
उदाहरण:

  • मया हरिः सेव्यः (तृतीया)।

  • मम हरिः सेव्यः (षष्ठी)।


21. तुलना और सादृश्य के अर्थ में

सूत्रम्: तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां तृतीयाऽन्यतरस्याम् । 2/3/72
व्याख्या: 'तुल्य' (समान) अर्थ वाले शब्दों के योग में विकल्प से षष्ठी या तृतीया होती है। लेकिन 'तुला' और 'उपमा' शब्दों के साथ केवल षष्ठी होती है।

उदाहरण:

  • कृष्णस्य तुल्यः / कृष्णेन तुल्यः (कृष्ण के समान)।

  • कृष्णस्य सदृशः / कृष्णेन सदृशः।

  • अपवाद: 'तुला/उपमा कृष्णस्य नास्ति' (कृष्ण की कोई तुलना नहीं है)।


22. आशीर्वाद और कल्याण के अर्थ में

सूत्रम्: चतुर्थी चाशिष्यायुष्यमद्रभद्रकुशलसुखार्थहितैः । 2/3/73
व्याख्या: जब किसी को आशीर्वाद देना हो, तो 'आयुष्य', 'भद्र', 'कुशल', 'सुख', 'हित' आदि शब्दों के योग में विकल्प से चतुर्थी या षष्ठी विभक्ति होती है।

उदाहरण:

  • कृष्णाय आयुष्यं भूयात् / कृष्णस्य आयुष्यं भूयात् (कृष्ण चिरंजीवी हों)।

  • शिवं भद्रं कुशलं वा कृष्णाय/कृष्णस्य भूयात्।


निष्कर्ष (Conclusion)

षष्ठी विभक्ति केवल 'का, के, की' तक सीमित नहीं है। यह संस्कृत व्याकरण का वह सेतु है जो संज्ञाओं के बीच के सूक्ष्म सम्बन्धों को क्रिया के साथ जोड़ता है। पाणिनी के ये सूत्र बताते हैं कि भाषा में भावों की अभिव्यक्ति कितनी सटीक हो सकती है। जहाँ एक ओर 'षष्ठी शेषे' सामान्य सम्बन्ध बताता है, वहीं 'कर्तृकर्मणोः कृति' जैसे सूत्र साहित्य सृजन के आधार बनते हैं।

षष्ठी विभक्ति का ज्ञान प्राप्त किए बिना संस्कृत के काव्य, पुराण और दर्शन को समझना असंभव है। यह विभक्ति ही है जो भक्त को भगवान से (मम देवः), पुत्र को पिता से (पितुः पुत्रः) और ज्ञान को साधक से जोड़ती है।


महत्वपूर्ण स्मरणीय बिन्दु (SEO Highlights)

  1. षष्ठी शेषे: सम्बन्ध बताने वाली मुख्य विभक्ति।

  2. हेतु प्रयोग: कारण और हेतु शब्द दोनों में षष्ठी।

  3. कृदन्त षष्ठी: कर्ता और कर्म में षष्ठी का विशेष नियम।

  4. निषेध नियम: 'न लोकाव्यय...' सूत्र द्वारा षष्ठी का निषेध।

  5. आशीर्वाद: आयुष्य, कुशल आदि शब्दों के साथ चतुर्थी/षष्ठी।

संस्कृत सीखें, संस्कृति बचाएं।


Disclaimer: यह आलेख शैक्षणिक उद्देश्य से तैयार किया गया है और पाणिनीय अष्टाध्यायी के सिद्धांतों पर आधारित है।

व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।

  • महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।

मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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