संस्कृत व्याकरण का गहन अध्ययन: कारक प्रकरण - षष्ठी विभक्ति (विस्तृत मार्गदर्शिका)
प्रसंग और भूमिका (Introduction)

कारक प्रकरण - षष्ठी विभक्ति
1. मुख्य सूत्र: षष्ठी शेषे (2/3/50)
स्व-स्वामी भाव: मालिक और वस्तु का सम्बन्ध। जनक-जन्य भाव: पिता और पुत्र का सम्बन्ध। अवयव-अवयवी भाव: अंग और अंगी का सम्बन्ध।
राज्ञः पुरुषः (राजा का पुरुष/सेवक): यहाँ राजा और पुरुष के बीच 'स्वामी-सेवक' का सम्बन्ध है। राजा में षष्ठी विभक्ति लगी है। वृक्षस्य पर्णम् (वृक्ष का पत्ता): यहाँ अवयव-अवयवी भाव है।
सम्बन्धः षष्ठ्यर्थः प्रोक्तः कारकेभ्यः पृथक् च सः। यथा राज्ञः पुरुष इत्यत्र स्वस्वामिभावो दृश्यते ॥
2. कर्मादि सम्बन्ध की विवक्षा में षष्ठी
सतां गतम् (सत्पुरुषों का गमन): यहाँ 'सतां' में षष्ठी है। मूलतः यह कर्ता हो सकता था, लेकिन यहाँ गमन की क्रिया के साथ सम्बन्ध मात्र बताया गया है। सर्पिषो जानीते (घी के माध्यम से प्रवृत्त होना): यहाँ 'सर्पिष्' (घी) में षष्ठी है। मातुः स्मरति (माता को याद करता है): यहाँ माता 'कर्म' है, पर सम्बन्ध की विवक्षा में षष्ठी हुई। फलानां तृप्तः (फलों से तृप्त): यहाँ 'फलों' के द्वारा तृप्ति मिली (करण), पर सम्बन्ध विवक्षा में षष्ठी हुई। भजे शम्भोश्चरणयोः (मैं भगवान शिव के चरणों की सेवा करता हूँ): यहाँ चरणों का शिव के साथ और भक्त का चरणों के साथ सम्बन्ध है।
3. 'हेतु' शब्द के प्रयोग में षष्ठी
अन्नस्य हेतोर्वसति (अन्न के कारण रहता है): यहाँ रहने का कारण 'अन्न' है और 'हेतु' शब्द का प्रयोग हुआ है, इसलिए 'अन्न' और 'हेतु' दोनों में षष्ठी हुई।
4. सर्वनाम और हेतु का विशेष प्रयोग
कस्य हेतोः अत्र वसति? (षष्ठी) केन हेतुना अत्र वसति? (तृतीया) कस्मात् हेतोः अत्र वसति? (पञ्चमी)
5. निमित्त, कारण और प्रयोजन के प्रयोग (वार्तिक)
किं निमित्तं वसति? (प्रथमा/द्वितीया) केन निमित्तेन / कस्मै निमित्ताय / कस्मात् निमित्तात् / कस्य निमित्तस्य / कस्मिन् निमित्ते। इसी प्रकार: किं कारणम्, को हेतुः, किं प्रयोजनम् आदि।
6. दिशावाचक और देशवाचक शब्दों के योग में षष्ठी
ग्रामस्य दक्षिणतः (गांव के दक्षिण में): 'दक्षिणतः' के योग में 'ग्राम' में षष्ठी। नगरस्य पुरस्तात् (नगर के सामने): 'पुरस्तात्' के योग में षष्ठी। वृक्षस्य उपरि (वृक्ष के ऊपर): यहाँ 'उपरि' के योग में षष्ठी है।
7. 'एनप' प्रत्यय के योग में द्वितीया और षष्ठी
दक्षिणेन ग्रामम् / ग्रामस्य वा (गांव के दक्षिण में): यहाँ द्वितीया और षष्ठी दोनों सही हैं।
8. दूर और समीप वाचक शब्दों के योग में
ग्रामस्य दूरम् / ग्रामात् दूरम् (गांव से दूर)। नगरस्य निकटम् / नगरात् निकटम् (नगर के पास)।
9. विशिष्ट धातुओं के योग में षष्ठी (कर्म में षष्ठी)
(A) अज्ञानार्थक 'ज्ञा' धातु
(B) स्मरण, दया और ईश धातु
मातुः स्मरणम् (माता का स्मरण): यहाँ माता कर्म है, पर षष्ठी हुई। दीनानां दयनम् (दीनों पर दया)। खलानां ईशनम् (दुष्टों पर शासन)।
(C) 'कृ' धातु (गुण-आधान के अर्थ में)
10. रोग और पीड़ा के अर्थ में षष्ठी
चौरस्य रोगस्य रुजा (चोर को रोग की पीड़ा)।
11. आशीर्वाद और हिंसा के अर्थ में प्रयोग
(A) 'नाथ' धातु
(B) हिंसार्थक धातुएं
चौरस्योज्जासनम् (चोर को मारना/तड़पाना)। वृषलस्य पेषणम् (शूद्र या शत्रु का दमन)। नोट: यदि अर्थ हिंसा न हो, तो षष्ठी नहीं होगी। जैसे- 'धानापेषणम्' (अनाज पीसना - यहाँ हिंसा नहीं है)।
12. जुआ, क्रय-विक्रय और व्यापार के अर्थ में
13. वैदिक और यज्ञीय प्रयोग
14. समय और आवृत्ति (Repetition)
पञ्चकृत्वोऽह्रो भोजनम् (दिन में पांच बार भोजन)। द्विरहो भोजनम् (दिन में दो बार भोजन)।
15. कृदन्त शब्दों के साथ षष्ठी (अत्यंत महत्वपूर्ण)
कृष्णस्य कृतिः (कृष्ण की रचना): यहाँ 'कृति' कृदन्त है, कर्ता 'कृष्ण' में षष्ठी हुई। जगतः कर्ता कृष्णः (जगत के कर्ता कृष्ण हैं): यहाँ 'जगत' कर्म है, जिसमें षष्ठी हुई।
16. उभयप्राप्तौ कर्मणि (जब कर्ता और कर्म दोनों हों)
आश्चर्यो गवां दोहोऽगोपेन (बिना ग्वाले के गायों का दुहा जाना आश्चर्यजनक है): यहाँ 'गाँव' (गाय) कर्म है, इसलिए इसमें षष्ठी हुई। 'अगोपेन' कर्ता है, इसमें तृतीया हुई।
17. वर्तमान अर्थ में 'क्त' प्रत्यय के साथ
राज्ञां मतः (राजाओं द्वारा माना गया)। राज्ञां पूजितः (राजाओं द्वारा पूजित)।
18. षष्ठी विभक्ति का निषेध (जहाँ षष्ठी नहीं होती)
ल (लृट् आदि): 'सृष्टिं कुर्वन्' (सृष्टि को करता हुआ)। उ (उक्): 'हरिं दिदृक्षुः' (हरि को देखने का इच्छुक)। अव्यय (क्त्वा, तुमुन्): 'जगत् सृष्ट्वा' (जगत रचकर), 'सुखं कर्तुम्' (सुख करने के लिए)। निष्ठा (क्त, क्तवतु): 'विष्णुना हता दैत्याः' (विष्णु द्वारा दैत्य मारे गए)। खलर्थ: 'ईषत्करः प्रपञ्चो हरिणा'। तृन्: 'कर्ता लोकान्' (लोकों का कर्ता)।
कमेरनिषेधः: 'लक्ष्म्याः कामुको हरिः' (यहाँ षष्ठी हुई)। द्विषः शतुर्वा: 'मुरस्य/मुरं वा द्विषन्'।
19. भविष्यत् काल और ऋण के अर्थ में निषेध
सतः पावकोऽवतरति। शतं दायी (सौ रुपये देने वाला)।
20. कृत्य प्रत्ययों के साथ विकल्प
मया हरिः सेव्यः (तृतीया)। मम हरिः सेव्यः (षष्ठी)।
21. तुलना और सादृश्य के अर्थ में
कृष्णस्य तुल्यः / कृष्णेन तुल्यः (कृष्ण के समान)। कृष्णस्य सदृशः / कृष्णेन सदृशः। अपवाद: 'तुला/उपमा कृष्णस्य नास्ति' (कृष्ण की कोई तुलना नहीं है)।
22. आशीर्वाद और कल्याण के अर्थ में
कृष्णाय आयुष्यं भूयात् / कृष्णस्य आयुष्यं भूयात् (कृष्ण चिरंजीवी हों)। शिवं भद्रं कुशलं वा कृष्णाय/कृष्णस्य भूयात्।
निष्कर्ष (Conclusion)
महत्वपूर्ण स्मरणीय बिन्दु (SEO Highlights)
षष्ठी शेषे: सम्बन्ध बताने वाली मुख्य विभक्ति। हेतु प्रयोग: कारण और हेतु शब्द दोनों में षष्ठी। कृदन्त षष्ठी: कर्ता और कर्म में षष्ठी का विशेष नियम। निषेध नियम: 'न लोकाव्यय...' सूत्र द्वारा षष्ठी का निषेध। आशीर्वाद: आयुष्य, कुशल आदि शब्दों के साथ चतुर्थी/षष्ठी।
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- संज्ञाप्रकरणम् - लघुसिद्धान्तकौमुदी
- सन्धि - अच सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - हल सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - विसर्ग सन्धि (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तद्धित :- अपत्यार्थक एवं मत्वर्थीय (सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार)
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- स्त्री प्रत्यय :- लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रकरण :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रथमा विभक्ति
- कारक द्वितीया विभक्ति
- कारक तृतीया विभक्ति
- कारक चतुर्थी विभक्ति
- कारक पञ्चमी विभक्ति
- कारक षष्ठी विभक्ति
- कारक सप्तमी विभक्ति
- कारक सम्बोधन विभक्ति
- परस्मैपद एवं आत्मनेपद विधान :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।