अपत्याधिकार प्रकरणम्: महर्षि पाणिनि के व्याकरण में 'संतान' और 'वंश' का दार्शनिक एवं व्याकरणिक स्वरूप
प्रस्तावना: अपत्य का अर्थ और भारतीय संस्कृति
भारतीय संस्कृति में 'अपत्य' (संतान) केवल जैविक उत्पत्ति नहीं है, बल्कि यह कुल, गोत्र और पितृ-ऋण से मुक्ति का माध्यम है। निरुक्तकार यास्क के अनुसार— "अपततं भवति" अर्थात् जो कुल को गिरने न दे, वह अपत्य है।
महर्षि पाणिनि ने अपने 'अष्टाध्यायी' के चतुर्थ अध्याय में 'तद्धित' प्रत्ययों के अंतर्गत 'अपत्याधिकार' का विस्तृत वर्णन किया है। यह प्रकरण न केवल भाषा विज्ञान की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह प्राचीन भारत के वंश-वृक्ष, गोत्र-परम्परा और सामाजिक संरचना को समझने का सबसे प्रामाणिक स्रोत भी है।
आज के इस वृहद् लेख में हम आपके द्वारा प्रदान किए गए सूत्रों, वार्तिकों और उदाहरणों की ऐसी व्याख्या करेंगे जो छात्र, शोधार्थी और संस्कृत-प्रेमी—सभी के लिए ज्ञान का अक्षय कोष सिद्ध होगी।
१. स्त्रीपुंसाभ्यांनञ्ञौभवनात्: स्त्री और पुरुष का व्याकरणिक स्वरूप
अपत्याधिकार की चर्चा में सबसे पहले मूल स्रोतों—स्त्री और पुरुष—पर विचार किया जाता है।
सूत्र: स्त्रीपुंसाभ्यांनञ्ञौभवनात् (४.१.८७)
व्याख्या: स्त्री शब्द से 'नञ्' प्रत्यय और पुंस् शब्द से 'ञ्' प्रत्यय होता है।
उदाहरण:
स्त्री + नञ् = स्त्रैणः (स्त्री की संतान या स्त्री संबंधी)।
पुंस् + ञ् = पौंस्रः (पुरुष की संतान)।
श्लोक सन्दर्भ:
"आत्मा वै जायते पुत्रः।" (उपनिषद्)
अर्थात् पिता ही पुत्र के रूप में जन्म लेता है। यही कारण है कि व्याकरण में 'पुंस्' और 'स्त्री' से उत्पन्न संतान के लिए विशेष प्रत्ययों का विधान किया गया है।
२. द्विगोर्लुगनपत्ये: द्विगु समास और तद्धित लुक्
जब हम संख्यावाचक शब्दों से संतान या अन्य अर्थों में शब्द बनाते हैं, तो वहां विशेष नियम लागू होते हैं।
सूत्र: द्विगोर्लुगनपत्ये
प्रक्रिया: यदि द्विगु समास के बाद कोई तद्धित प्रत्यय आए (अपत्य अर्थ को छोड़कर), तो उसका 'लुक्' (लोप) हो जाता है।
उदाहरण: पञ्चसुकपालेषु संस्कृतः पुरोडाशः। यहाँ 'पञ्चकपाल' शब्द में तद्धित प्रत्यय का लोप होकर मूल रूप ही रहता है।
३. गोत्र और युव संज्ञा: वंश परम्परा का विस्तार
पाणिनीय व्याकरण में संतान के तीन स्तर माने गए हैं:
अनन्तरापत्य: ठीक बाद की संतान (पुत्र/पुत्री)।
गोत्र: पौत्र (पोता) और उसके बाद की संतान। (सूत्र: पौत्रप्रभृति गोत्रम्)
युव: जब पिता या दादा जीवित हों और प्रपौत्र आदि की संज्ञा करनी हो।
सूत्र: गोत्रे ऽलुगचि और आपत्यस्य च तद्धितेऽनाति।
व्याख्या: गोत्र प्रत्यय का लोप विशेष परिस्थितियों में होता है।
उदाहरण:
गर्ग के छात्र = गार्गीयाः।
गर्ग की संतान = गार्ग्यः। यहाँ यलोप का नियम भी कार्य करता है।
४. युव प्रत्यय और लुक् विधान
जब गोत्र परम्परा में चौथी पीढ़ी की बात आती है, तो उसे 'युवा' कहा जाता है।
सूत्र: यूनिलुक् (४.१.९०) और पैलादिभ्यश्च।
उदाहरण:
ग्लुचुक का गोत्रापत्य = ग्लुचुकायनिः।
पैल का युवापत्य = पैलः। (यहाँ युव प्रत्यय का लोप हो गया है)।
५. तस्यापत्यम्: अधिकार सूत्र का महासागर
यह 'अपत्याधिकार' का सबसे प्रमुख सूत्र है। इसी के अधिकार में आगे के सभी प्रत्यय (अण्, इञ्, ढक् आदि) चलते हैं।
सूत्र: तस्यापत्यम् (४.१.९२)
मंत्र सन्दर्भ:
"ॐ अंगदंगात् सम्भवसि हृदयादधिजायसे। आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम्॥" (सामवेद मन्त्र)
यह मन्त्र 'तस्यापत्यम्' की दार्शनिक व्याख्या करता है—अंग-अंग से उत्पन्न पुत्र ही आत्मा है।
६. अण् प्रत्यय: शिव, शक्ति और ऋषियों की संतानें
सबसे व्यापक प्रत्यय 'अण्' है। यह प्रायः 'अ' शेष रखता है और शब्द के प्रथम स्वर की 'वृद्धि' करता है।
सूत्र: शिवादिभ्योऽण् (४.१.११२)
उदाहरण और विस्तार:
शिवस्य अपत्यं शैवः (भगवान शिव की संतान या उनके वंशज)।
गंगा का अपत्य = गाङ्गः (भीष्म पितामह)।
यमुना का अपत्य = यामुनः।
नर्मदा का अपत्य = नार्मदः।
ऋषियों के उदाहरण (ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च अण्):
वशिष्ठ का अपत्य = वासिष्ठः।
विश्वामित्र का अपत्य = वैश्वामित्रः।
अन्धक वंश: श्वाफल्क का अपत्य = श्वाफल्कः।
वृष्णि वंश: वसुदेव का अपत्य = वासुदेवः (भगवान श्रीकृष्ण)।
कुरु वंश: नकुल का अपत्य = नाकुलः; सहदेव का अपत्य = साहदेवः।
७. मातृ शब्द के विशेष प्रयोग
माता के नाम से जब अपत्य का बोध कराना हो, तो विशेष नियम लागू होते हैं।
सूत्र: मातुरुत्संख्यासंभद्रपूर्वायाः
उदाहरण:
दो माताओं का पुत्र = द्वैमातुरः (भगवान गणेश)।
छह माताओं का पुत्र = षाण्मातुरः (कार्तिकेय)।
भद्रा माता का पुत्र = भाद्रमातुरः।
८. कन्यायाः कनीन च: विशेष संज्ञाएं
अविवाहित कन्या से उत्पन्न संतान के लिए 'कनीन' आदेश होता है।
उदाहरण:
कन्या (कुन्ती) का पुत्र = कानीनः (कर्ण)।
कन्या (सत्यवती) का पुत्र = कानीनः (महर्षि वेदव्यास)।
९. ढक् प्रत्यय: 'एय' की ध्वनि का सौंदर्य
जब शब्द के अंत में विशेष स्वर हों या वह 'स्त्री' वाचक हो, तो 'ढक्' प्रत्यय होता है, जिसका 'एय' शेष रहता है।
सूत्र: स्त्रीभ्योढक् (४.१.१२०)
प्रमुख उदाहरण:
विनता का पुत्र = वैनतेयः (गरुड़)।
दत्ता का पुत्र = दात्तेयः।
शुभ्रा का पुत्र = शौभ्रेयः।
कल्याणनी का पुत्र = काल्याणिनेयः (यहाँ 'इनङ्' आगम भी हुआ है)।
कुलटा का पुत्र = कौलटिनेयः या कौलटेयः।
१०. इञ् प्रत्यय: संक्षिप्तता का नियम
अत इञ् सूत्र से अकारान्त शब्दों से 'इ' प्रत्यय होता है।
उदाहरण:
दक्ष का पुत्र = दाक्षिः (महर्षि पाणिनि स्वयं दाक्षिपुत्र कहलाते थे)।
उपगु का अपत्य = औपगविः।
११. फक् और फिञ्: 'आयन' प्रत्यय की महिमा
जब वंश को बहुत ही आदर या प्राचीनता के साथ दर्शाना हो, तो 'आयन' ध्वनि वाले प्रत्यय जुड़ते हैं।
सूत्र: अश्वादिभ्यः फञ् और नडादिभ्यः फक्।
उदाहरण:
अश्व का अपत्य = आश्वायनः।
नड का अपत्य = नाडायनः।
गर्ग का युवापत्य = गार्गायणः।
१२. विशेष भौगोलिक और क्षत्रिय अपत्य (जनपद शब्द)
पाणिनि ने केवल परिवार ही नहीं, बल्कि जनपदों (राज्यों) के राजाओं और उनकी संतानों के लिए भी नियम दिए हैं।
सूत्र: जनपदशब्दात्क्षत्रियादञ्
उदाहरण:
पञ्चाल देश का राजा या अपत्य = पाञ्चालः।
मगध का अपत्य = मागधः।
कलिङ्ग का अपत्य = कालिङ्गः।
कुरु देश का राजा = कौरव्यः (ण्य प्रत्यय)।
पाण्डु का अपत्य = पाण्ड्यः (वार्तिक: पाण्डोडर्यण)।
१३. विचित्र प्रत्यय और अपवाद (एरक, द्रक, ठक् आदि)
व्याकरण में कुछ शब्द बहुत ही विशिष्ट प्रक्रिया से बनते हैं।
चटकाया ऐरक्: चटका का अपत्य = चाटकैरः।
गोधायाः: गोधा का अपत्य = गौधेरः या गौधेयः।
पितृष्वसुश्छण्: पिता की बहन (बुआ) का पुत्र = पैतृष्वसेयः या पैतृष्वस्त्रीयः।
मातृष्वसुश्च: माता की बहन (मौसी) का पुत्र = मातृष्वसेयः या मातृष्वस्त्रीयः।
१४. सामाजकि एवं जातीय संज्ञाएं (क्षत्रिय, ब्राह्मण आदि)
क्षत्रिय: क्षत्राद् घ सूत्र से क्षत्रिय शब्द सिद्ध होता है।
कुलीनः: कुलात् खः सूत्र से उत्तम कुल में उत्पन्न व्यक्ति 'कुलीन' कहलाता है।
स्वस्त्रीयः: स्वसुरछ सूत्र से बहन का पुत्र (भांजा) 'स्वस्त्रीय' कहलाता है।
भ्रातृव्यः: भ्रातुर्व्यव सूत्र से भाई का पुत्र (भतीजा) या शत्रु 'भ्रातृव्य' कहलाता है।
१५. व्याकरणिक गहराई: प्रकृतिभाव और वृद्धि
तद्धित प्रत्यय लगने पर शब्द के प्रथम स्वर में 'वृद्धि' होती है (जैसे अ का आ, इ का ऐ, उ का औ)।
उदाहरण:
दित्य + यत् = दैत्यः।
उत्स + अण् = औत्सः।
रेवती + ठक् = रैवतिकः।
१६. अपत्याधिकार की तालिका (Quick Reference Table)
| शिव | अण् | शैवः | शिवादिभ्योऽण् |
| दिति | ण्य | दैत्यः | दित्यदित्यादित्य... |
| विनता | ढक् | वैनतेयः | स्त्रीभ्योढक् |
| उपगु | अण् | औपगवः | तस्यापत्यम् |
| नड | फक् | नाडायनः | नडादिभ्यः फक् |
| कुन्ती | अण् | कौन्तेयः (ढक्) | स्त्रीभ्योढक् |
| मनु | अञ्/यत् | मानुषः / मनुष्यः | मनोरजातवञ्यतौ |
१७. दार्शनिक निष्कर्ष: अपत्य क्यों आवश्यक है?
संस्कृत व्याकरण का यह 'अपत्याधिकार' केवल शब्दों की व्युत्पत्ति नहीं सिखाता, बल्कि यह बताता है कि हम सब अपने पूर्वजों की ऊर्जा के विस्तार हैं।
मंत्र:
"पुन्नाम्नो नरकात् त्रायते इति पुत्रः।"
(जो 'पुम्' नामक नरक से रक्षा करे, वही पुत्र है।)
पाणिनि ने 'तस्यापत्यम्' के माध्यम से पूरे समाज को एक सूत्र में पिरोया है। चाहे वह 'वासुदेव' (वसुदेव के पुत्र) हों या 'पार्थ' (पृथा/कुन्ती के पुत्र), ये नाम हमें उनके गौरवशाली इतिहास की याद दिलाते हैं।
१८. छात्रों के लिए विशेष निर्देश (SEO Tips for Sanskrit Students)
यदि आप इस प्रकरण का अध्ययन कर रहे हैं, तो इन बिंदुओं पर ध्यान दें:
प्रकृति-प्रत्यय विभाग: मूल शब्द और प्रत्यय को अलग करना सीखें।
आदि-वृद्धि: शब्द के पहले अक्षर को बदलना न भूलें।
लुक् प्रक्रिया: कहाँ प्रत्यय गायब हो जाता है (जैसे कम्बोजः), इसे याद रखें।
उपसंहार
'अपत्याधिकार प्रकरणम्' महर्षि पाणिनि की मेधा का एक अद्भुत उदाहरण है। ५००० से अधिक वर्षों से चली आ रही हमारी वंश परम्परा को इन सूत्रों ने एक वैज्ञानिक आधार प्रदान किया है। इस लेख में दिए गए ६९ से अधिक सूत्रों और वार्तिकों का अभ्यास करने से न केवल व्याकरण की शुद्धि होती है, बल्कि भारतीय इतिहास और संस्कृति के प्रति गौरव का भाव भी जागृत होता है।
आशा है कि यह विस्तृत ब्लॉग पोस्ट आपके लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। संस्कृत व्याकरण के ऐसे ही अन्य गूढ़ विषयों के लिए हमारे साथ जुड़े रहें।
"जयतु संस्कृतम्, जयतु भारतम्"
Disclaimer: यह लेख शैक्षणिक उद्देश्य के लिए तैयार किया गया है और इसमें दिए गए सभी सूत्र पाणिनीय अष्टाध्यायी एवं कौमुदी परम्परा पर आधारित हैं।
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।