लघुसिद्धान्तकौमुदी: संज्ञाप्रकरणम् - संस्कृत व्याकरण का प्रवेश द्वार (विस्तृत व्याख्या)

लघुसिद्धान्तकौमुदी: संज्ञाप्रकरणम्
१. मंगलाचरणम्: विद्या की देवी की वंदना
नत्वा सरस्वतीं देवीं शुद्धां गुण्यां करोम्यहम्। पाणिनीयप्रवेशाय लघुसिद्धान्तकौमुदीम्॥
२. चतुर्दश माहेश्वर सूत्र: वर्णमाला का दिव्य उद्भव
अइउण् ऋऌक् एओङ् ऐऔच् हयवरट् लण् ञमङणनम् झभञ् घढधष् जबगडदश् खफछठथचटतव् कपय् शषसर् हल
३. प्रमुख संज्ञा सूत्र और उनकी व्याख्या
(क) हलन्त्यम् (१/३/३)
उपदेश क्या है? 'धातुसूत्रगणोणादिवाक्यलिङ्गानुशासनम्। आगमप्रत्ययादेशा उपदेशाः प्रकीर्तिताः॥' अर्थात् धातु, सूत्र, गण, उणादि सूत्र, वाक्य, लिंगानुशासन, आगम, प्रत्यय और आदेश - ये 'उपदेश' कहलाते हैं।
(ख) अदर्शनं लोपः (१/१/६०)
(ग) तस्य लोपः (१/३/९)
४. प्रत्याहार निर्माण की विधि
सूत्र: आदिरन्त्येन सहेता (१/१/७१)
उदाहरण १ (अण्): 'अइउण्' में 'अ' आदि वर्ण है और 'ण्' इत् वर्ण। अतः 'अण्' कहने से अ, इ, उ - इन तीन वर्णों का बोध होगा। उदाहरण २ (अच्): यह सभी स्वरों (अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ) का बोध कराता है। उदाहरण ३ (हल्): यह सभी व्यंजनों का बोध कराता है।
५. स्वरों का वर्गीकरण (ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत)
सूत्र: ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः (१/२/२७)
ह्रस्व: १ मात्रा (अ, इ, उ) दीर्घ: २ मात्रा (आ, ई, ऊ) प्लुत: ३ मात्रा (हे कृष्ण३!)
उच्चैरुदात्तः (१/२/२९): कंठ-तालु आदि के ऊपरी भाग से बोला जाने वाला स्वर 'उदात्त' है। नीचैरनुदात्तः (१/२/३०): नीचे के भाग से बोला जाने वाला स्वर 'अनुदात्त' है। समाहारः स्वरितः (१/२/३१): जहाँ उदात्त और अनुदात्त दोनों का मेल हो, वह 'स्वरित' है।
६. अनुनासिक और वर्णों के भेद
सूत्र: मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः (१/२/८)
जैसे: अूँ, इूँ।
अ, इ, उ, ऋ: प्रत्येक के १८ भेद होते हैं (३ काल × ३ स्वर × २ अनुनासिक/अननुनासिक)। ऌ: इसके १२ भेद होते हैं (इसमें 'दीर्घ' नहीं होता)। ए, ओ, ऐ, औ (एच्): इनके १२ भेद होते हैं (इनमें 'ह्रस्व' नहीं होता)। ऋ + ऌ: वार्तिक 'ऋऌवर्णयोर्मिथः सावर्ण्यं वाच्यम्' के अनुसार इनकी सवर्ण संज्ञा होती है, अतः इनके कुल ३० भेद माने जाते हैं।
७. उच्चारण स्थान और प्रयत्न (Phonetics)
(अ) उच्चारण स्थान (Sthana)
अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः: अ, कवर्ग (क, ख, ग, घ, ङ), ह और विसर्ग का स्थान 'कण्ठ' है। इचुयशानां तालु: इ, चवर्ग, य और श का स्थान 'तालु' है। ऋटुरषाणां मूर्धा: ऋ, टवर्ग, र और ष का स्थान 'मूर्धा' है। लृतुलसानां दन्ताः: ऌ, तवर्ग, ल और स का स्थान 'दन्त' है। उपूपध्मानीयानामोष्ठौ: उ, पवर्ग और उपध्मानीय का स्थान 'ओष्ठ' है। ञमङणनानां नासिका च: ञ, म, ङ, ण, न का स्थान नासिका भी है। एदैतोः कण्ठतालु: ए और ऐ का स्थान कण्ठ और तालु है। ओदौतोः कण्ठौष्ठम्: ओ और औ का स्थान कण्ठ और ओष्ठ है। वकारस्य दन्तोष्ठम्: 'व' का स्थान दन्त और ओष्ठ है। जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम्: जिह्वामूलीय वर्णों का स्थान जिह्वा का मूल है।
(ब) प्रयत्न (Effort)
१. आभ्यन्तर प्रयत्न (५ प्रकार):
स्पृष्ट: स्पर्श वर्णों (क से म) का। ईषत्स्पृष्ट: अन्तःस्थ वर्णों (य, र, ल, व) का। ईषद्विवृत: ऊष्म वर्णों (श, ष, स, ह) का। विवृत: सभी स्वरों (अच्) का। संवृत: प्रयोग की अवस्था में ह्रस्व 'अ' का।
२. बाह्य प्रयत्न (११ प्रकार):
खरो विवाराः श्वासा अघोषाश्च: खर् प्रत्याहार के वर्ण विवार, श्वास और अघोष होते हैं। हशः संवारा नादा घोषाश्च: हश् प्रत्याहार के वर्ण संवार, नाद और घोष होते हैं। अल्पप्राण: वर्गों के १, ३, ५ वर्ण और यण्। महाप्राण: वर्गों के २, ४ वर्ण और शल्।
८. सवर्ण संज्ञा और अणुदित् सूत्र
सूत्र: तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् (१/१/९)
सूत्र: अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्ययः (१/१/६९)
जैसे: 'कु' कहने से क, ख, ग, घ, ङ - इन पाँचों का बोध होता है।
९. संहिता, संयोग और पद संज्ञा
१. परः संनिकर्षः संहिता (१/१/१०९)
२. हलोऽनन्तराः संयोगः (१/१/७)
उदाहरण: 'अग्नि' में 'ग्' और 'न्' के बीच कोई स्वर नहीं है, अतः यहाँ संयोग संज्ञा है।
३. सुप्तिङन्तं पदम् (१/१/१४)
शब्दों में लगने वाले २१ प्रत्यय (सु, औ, जस्...) 'सुप्' कहलाते हैं। धातुओं में लगने वाले १८ प्रत्यय (तिप्, तस्, झि...) 'तिङ्' कहलाते हैं। जिनके अंत में सुप् या तिङ् हो, वही 'पद' कहलाते हैं और भाषा में प्रयोग के योग्य होते हैं।
निष्कर्ष
"व्याकरणं मुखं स्मृतम्" (वेदांगों में व्याकरण को वेद पुरुष का मुख माना गया है।)
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- संज्ञाप्रकरणम् - लघुसिद्धान्तकौमुदी
- सन्धि - अच सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - हल सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - विसर्ग सन्धि (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तद्धित :- अपत्यार्थक एवं मत्वर्थीय (सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार)
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- स्त्री प्रत्यय :- लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रकरण :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रथमा विभक्ति
- कारक द्वितीया विभक्ति
- कारक तृतीया विभक्ति
- कारक चतुर्थी विभक्ति
- कारक पञ्चमी विभक्ति
- कारक षष्ठी विभक्ति
- कारक सप्तमी विभक्ति
- परस्मैपद एवं आत्मनेपद विधान :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।