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बहुव्रीहि समास की विस्तृत व्याख्या और शास्त्रीय विवेचन

अथ बहुव्रीहिः

संस्कृत व्याकरण का महासागर: बहुव्रीहि समास की विस्तृत व्याख्या और शास्त्रीय विवेचन

प्रसंग और भूमिका

संस्कृत वाङ्मय में शब्दों की व्युत्पत्ति और उनके अर्थ-गांभीर्य को समझने के लिए 'समास' एक अनिवार्य विधा है। महर्षि पाणिनी ने 'अष्टाध्यायी' के द्वितीय अध्याय के द्वितीय पाद में समासों का क्रमबद्ध विवेचन किया है। जहाँ तत्पुरुष उत्तरपद प्रधान होता है, द्वन्द्व उभयपद प्रधान होता है और अव्ययीभाव पूर्वपद प्रधान होता है, वहीं 'बहुव्रीहि समास' अपनी एक अद्वितीय विशेषता के साथ खड़ा है— 'अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः'

इस विस्तृत लेख में हम बहुव्रीहि समास के उन रहस्यों को जानेंगे जो साधारण व्याकरण की पुस्तकों में दुर्लभ हैं। हम सूत्र-दर-सूत्र इसकी संरचना, वार्तिकों का प्रभाव और समासान्त प्रत्ययों के विधान को समझेंगे।


१. बहुव्रीहि का स्वरूप और अधिकार सूत्र

सूत्रम्: शेषो बहुव्रीहिः (२/२/२३)

वृत्ति: चार्थे द्वन्द्व इत्यतः प्राक् बहुव्रीहिरित्यधिक्रियते।
हिन्दी अर्थ: 'चार्थे द्वन्द्वः' (२/२/२९) सूत्र से पहले तक जितने भी समास विधायक सूत्र आएंगे, वे 'शेष' के अधिकार में होंगे। यहाँ 'शेष' का अर्थ है—जो अव्ययीभाव, तत्पुरुष और द्वन्द्व के विधान से बच गया है, वह बहुव्रीहि है।

शास्त्रीय विवेचन:
समास की प्रक्रिया में पदों का मेल केवल शब्दों का मेल नहीं, बल्कि अर्थों का संघात है। जब हम कहते हैं "पीताम्बर", तो यहाँ न तो 'पीत' (पीला) प्रधान है और न 'अम्बर' (वस्त्र), बल्कि इन दोनों से इतर कोई 'अन्य' व्यक्ति (भगवान विष्णु) प्रधान है।

श्लोक:
अव्ययीभावः पूर्वपदप्रधानो भवति,
तत्पुरुष उत्तरपदप्रधानः,
द्वन्द्व उभयपदप्रधानः,
बहुव्रीहिरन्यपदप्रधानः।

सूत्रम्: अनेकमन्यपदार्थे (२/२/२४)

वृत्ति: अनेकं प्रथमान्तमन्यस्य पदस्यार्थे वर्तमानं वा समस्यते स बहुव्रीहिः।
हिन्दी अर्थ: अन्य पद के अर्थ में विद्यमान दो या दो से अधिक प्रथमान्त पदों का परस्पर विकल्प से समास होता है।

उदाहरण और विश्लेषण:

  • पीताम्बरः (हरिः): पीतं अम्बरं यस्य सः।

    • यहाँ 'पीत' और 'अम्बर' दोनों प्रथमान्त हैं, पर वे मिलकर विष्णु (अन्य पद) का बोध करा रहे हैं।

  • चक्रपाणिः (विष्णुः): चक्रं पाणौ यस्य सः।

    • यह व्याधिकरण बहुव्रीहि का उदाहरण है।


२. पद व्यवस्था और पूर्वनिपात

बहुव्रीहि समास में कौन सा पद पहले आएगा, इसके लिए आचार्य पाणिनी ने विशेष नियम दिए हैं।

सूत्रम्: सप्तमीविशेषणे बहुव्रीौ (२/२/३५)

वृत्ति: सप्तम्यन्तं विशेषणं च बहुव्रीहौ पूर्वं स्यात्। ज्ञापकाद्व्यधिकरणपदो बहुव्रीहिः।
हिन्दी अर्थ: बहुव्रीहि समास में यदि कोई पद सप्तम्यन्त (Saptami Vibhakti) हो या विशेषण हो, तो वह पहले प्रयुक्त होना चाहिए।

महत्वपूर्ण तथ्य: इस सूत्र से सिद्ध होता है कि बहुव्रीहि समास 'व्याधिकरण' (जहाँ पदों की विभक्तियाँ अलग-अलग हों) भी होता है।

उदाहरण:
१. कण्ठेकालः (शिवः): कण्ठे कालः यस्य सः। (कण्ठ में विष है जिसके)। यहाँ 'कण्ठे' सप्तम्यन्त है, अतः पूर्व प्रयोग हुआ।
२. प्राप्तोदकः (ग्रामः): प्राप्तं उदकं यं सः। (जिस गाँव को जल प्राप्त हो गया है)। यहाँ 'प्राप्त' विशेषण है।


३. विशेष नियम और अलुक् विधान

सामान्यतः समास होने पर विभक्तियों का लोप (लुक) हो जाता है, किन्तु कुछ विशेष स्थितियों में विभक्ति सुरक्षित रहती है।

सूत्रम्: हलन्तात्सप्तम्याः संज्ञायाम् (६/३/९)

वृत्ति: हलन्ताददन्ताच्च सप्तम्या अलुक्।
हिन्दी अर्थ: यदि समास के बाद बनने वाला शब्द किसी की 'संज्ञा' (नाम) का बोध करा रहा हो, तो हलन्त और अजन्त शब्दों के बाद आने वाली सप्तमी विभक्ति का लोप नहीं होता।

प्रमुख उदाहरण:

  • कण्ठेकालः: शिव का नाम होने के कारण 'कण्ठे' की सप्तमी सुरक्षित रही।

  • प्राप्तोदको ग्रामः: प्राप्तं उदकं यं सः।

  • ऊढरथोऽनङ्खान्: ऊढः रथः येन सः। (वह बैल जिसने रथ खींच लिया है)।

  • उपहृतपशू रुद्रः: उपहृतः पशुः यस्मै सः। (जिसके लिए पशु की बलि दी गई)।

  • उद्धृतौदना स्थाली: उद्धृतः ओदनः यस्याः सा। (वह बटलोई जिससे चावल निकाल लिए गए हैं)।


४. प्रादि और नञ् बहुव्रीहि (विशेष वार्तिक)

कुछ स्थितियों में उत्तरपद का लोप हो जाता है, जिसे 'उत्तरपदलोपी बहुव्रीहि' कहते हैं।

वार्तिक: प्रादिभ्यो धातुजस्य वाच्यो वा चोत्तरपदलोपः

हिन्दी अर्थ: 'प्र' आदि उपसर्गों के बाद यदि कोई धातुज (कृदन्त) शब्द हो, तो समास करते समय उस उत्तरपद का विकल्प से लोप हो जाता है।

उदाहरण:

  • प्रपतितपर्णः → प्रपर्णः: प्रपतितानि पर्णानि यस्मात् सः। (जिस वृक्ष से पत्ते गिर चुके हैं)। यहाँ 'पतित' शब्द का लोप हो गया।

वार्तिक: नञोऽस्त्यर्थानां वाच्यो वा चोत्तरपदलोपः

हिन्दी अर्थ: 'नञ्' (न) के बाद यदि 'अस्ति' (विद्यमानता) अर्थ वाला शब्द हो, तो उस उत्तरपद का विकल्प से लोप होता है।

उदाहरण:

  • अविद्यमानपुत्रः → अपुत्रः: अविद्यमानः पुत्रः यस्य सः। (जिसका पुत्र नहीं है)। यहाँ 'विद्यमान' का लोप हुआ।


५. पुंवद्भाव और स्त्रीलिंग सम्बन्धी नियम

बहुव्रीहि समास में स्त्रीलिंग शब्दों के साथ विशेष व्याकरणिक प्रक्रियाएँ होती हैं।

सूत्रम्: स्त्रियाः पुंवद्भाषितपुंस्कादनूङ्खमानाधिकरणेस्त्रियाम् अपूरणीप्रियादिषु (६/३/३४)

वृत्ति: उक्तपुंस्कादनूङ्... तुल्ये प्रवृत्तिनिमित्ते यदुक्तपुंस्कं तस्मात्पर ऊङोऽभावो यत्र तथाभूतस्य स्त्रीवाचकशब्दस्य पुंवाचकस्येव रूपं स्यात्।

हिन्दी अर्थ: यदि कोई स्त्रीलिंग शब्द ऐसा है जिसका पुल्लिंग रूप भी समान अर्थ में चलता है (भाषितपुंस्क), और उससे 'ऊङ्' प्रत्यय न लगा हो, तो समानाधिकरण स्त्रीलिंग उत्तरपद परे होने पर वह शब्द पुल्लिंग की तरह व्यवहार करेगा। किन्तु 'पूरणी' (संख्यावाचक) और 'प्रिया' आदि शब्दों के परे रहते यह नहीं होगा।

उदाहरण:

  • रूपवद्भार्यः: रूपवती भार्या यस्य सः। (यहाँ 'रूपवती' पुंवद्भाव होकर 'रूपवत्' बन गया)।

  • चित्रगुः: चित्राः गावो यस्य सः। (रंग-बिरंगी गायों वाला)। यहाँ 'गो' शब्द को 'गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य' से ह्रस्व हुआ।

  • अपवाद (अनूङ् किम्?): वामोरूभार्यः (यहाँ 'वामोरू' में ऊङ् प्रत्यय है, अतः पुंवद्भाव नहीं हुआ)।


६. समासान्त 'अप्' प्रत्यय विधान

सूत्रम्: अप्पूरणीप्रमाण्योः (५/४/११६)

हिन्दी अर्थ: पूरणार्थक (जैसे पञ्चमी, दशमी) स्त्रीलिंग शब्दों और 'प्रमाणी' शब्द के अन्त में होने पर बहुव्रीहि समास में 'अप्' प्रत्यय जुड़ता है।

उदाहरण:

  • कल्याणीपञ्चमा रात्रयः: कल्याणी पञ्चमी यासां रात्रीणां ताः। (वे रातें जिनकी पांचवीं रात कल्याणकारी है)।

  • स्त्रीप्रमाणः: स्त्री प्रमाणी यस्य सः। (वह जिसका प्रमाण स्त्री है)।


७. शरीर के अंगों (स्वाङ्ग) से सम्बन्धित विशेष सूत्र

बहुव्रीहि में जब शरीर के अंगों की बात आती है, तो पाणिनी ने विशेष समासान्त प्रत्ययों का विधान किया है।

सूत्रम्: बहुव्रीहौ सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात्षच् (५/४/११३)

हिन्दी अर्थ: यदि बहुव्रीहि के अन्त में 'सक्थि' (जांघ) या 'अक्षि' (आंख) शब्द हो और वे शरीर के वास्तविक अंग (स्वाङ्ग) हों, तो 'षच्' (अ) प्रत्यय लगता है।

उदाहरण:

  • दीर्घसक्थः: दीर्घे सक्थिनी यस्य सः। (लम्बी जांघों वाला)।

  • जलजाक्षी: जलज इव अक्षिणी यस्याः सा। (कमल जैसी आँखों वाली)।

नोट: यदि अंग कृत्रिम हो, तो यह नियम नहीं लगेगा। जैसे— 'स्थूलाक्षा वेणुयष्टिः' (बांस की गांठ)।

सूत्रम्: द्वित्रिभ्यां षः मूर्ध्नः (५/४/११५)

हिन्दी अर्थ: 'द्वि' और 'त्रि' के बाद यदि 'मूर्धन्' (सिर) शब्द हो, तो 'ष' (अ) प्रत्यय होता है।

  • उदाहरण: द्विमूर्धः (दो सिर वाला), त्रिमूर्धः (तीन सिर वाला)।


८. अव्यय और उपमान सम्बन्धी नियम

सूत्रम्: अन्तर्बहिभ्यां च लोम्नः (५/४/११७)

हिन्दी अर्थ: 'अन्तर' और 'बहिस्' अव्यय के बाद यदि 'लोमन्' शब्द हो, तो 'अप्' प्रत्यय होता है।

  • उदाहरण: अन्तर्लोमः (अन्दर के बालों वाला), बहिर्लोमः (बाहर के बालों वाला)।

सूत्रम्: पादस्य लोपोऽहस्त्यादिभ्यः (५/४/१३८)

हिन्दी अर्थ: उपमानवाचक शब्द (हाथी आदि को छोड़कर) के बाद यदि 'पाद' शब्द हो, तो उसके 'अ' का लोप हो जाता है।

  • उदाहरण: व्याघ्रपात् (व्याघ्रस्य इव पादौ अस्य—बाघ जैसे पैरों वाला)।

  • अपवाद: हस्तिपादः (हाथी के पैर जैसा)।

सूत्रम्: संख्यासुपूर्वस्य (५/४/१४०)

हिन्दी अर्थ: संख्यावाचक या 'सु' के बाद 'पाद' शब्द का लोप होता है।

  • उदाहरण: द्विपात् (दो पैरों वाला), सुपात् (सुन्दर पैरों वाला)।


९. काकुद और हृदय शब्द के विशेष रूप

सूत्रम्: उद्विभ्यां काकुदस्य (५/४/१४८)

हिन्दी अर्थ: 'उद्' और 'वि' के बाद 'काकुद' (तालु) शब्द का लोप होता है।

  • उदाहरण: उत्काकुत्, विकाकुत्।

सूत्रम्: पूर्णाद्विभाषा (५/४/१४९)

हिन्दी अर्थ: 'पूर्ण' शब्द के बाद 'काकुद' का लोप विकल्प से होता है।

  • उदाहरण: पूर्णकाकुत् या पूर्णकाकुदः।

सूत्रम्: सुहृद्दुर्हृदौ मित्रामित्रयोः (५/४/१५०)

हिन्दी अर्थ: 'सु' और 'दुर्' के बाद 'हृदय' शब्द को क्रमशः 'हृद्' आदेश होता है जब अर्थ 'मित्र' और 'शत्रु' हो।

  • उदाहरण: सुहृत् (मित्र), दुर्हृत् (शत्रु)।


१०. समासान्त 'कप्' प्रत्यय और विसर्ग सन्धि

बहुव्रीहि के अन्त में 'कप्' प्रत्यय का जुड़ना एक व्यापक प्रक्रिया है।

सूत्रम्: उरःप्रभृतिभ्यः कप् (५/४/१५१)

हिन्दी अर्थ: 'उरस्' (छाती) आदि शब्दों के अन्त में होने पर 'कप्' प्रत्यय अनिवार्य रूप से जुड़ता है।

विसर्ग सन्धि के नियम (बहुव्रीहि के सन्दर्भ में):
१. सोऽपदादौ (८/३/३८): पाश, कल्प, क, काम्य परे होने पर विसर्ग को 'स्' होता है।
२. कस्कादिषु च (८/३/४८): कुछ शब्दों में विसर्ग को 'ष्' या 'स्' होता है।
३. इणः षः (८/३/३९): यदि विसर्ग से पहले इ, उ आदि (इण् प्रत्याहार) हों, तो विसर्ग को 'ष्' हो जाता है।

उदाहरण:

  • व्यूढोरस्कः: व्यूढम् उरः यस्य सः। (विशाल छाती वाला)। यहाँ 'उरस् + कप्' होकर विसर्ग को 'स्' हुआ।

  • प्रियमर्पिष्कः: प्रियं सर्पिः यस्य सः। यहाँ 'इण' (इ) के बाद विसर्ग होने से 'ष्' हुआ।


११. निष्ठा और शेष नियम

सूत्रम्: निष्ठा (२/२/३६)

हिन्दी अर्थ: 'क्त' और 'क्तवतु' प्रत्यय (निष्ठा) वाले शब्द बहुव्रीहि में पहले आते हैं।

  • उदाहरण: युक्तयोगः (युक्तः योगः येन सः)।

सूत्रम्: शेषाद्विभाषा (५/४/१५४)

हिन्दी अर्थ: जिन बहुव्रीहि समासों के लिए कोई विशेष समासान्त प्रत्यय नहीं कहा गया है, वहाँ विकल्प से 'कप्' प्रत्यय होता है।

  • उदाहरण: महायशस्कः या महायशाः।


आध्यात्मिक एवं दार्शनिक महत्व

बहुव्रीहि समास केवल व्याकरण का नियम नहीं है, यह वेदों और उपनिषदों की व्याख्या का आधार है। जब हम 'ॐ' को परिभाषित करते हैं या ईश्वर के नामों का जप करते हैं, तो अक्सर बहुव्रीहि का ही आश्रय लेते हैं।

मन्त्र उदाहरण:

"शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं..."

यहाँ 'पद्यनाभम्' (पद्मं नाभौ यस्य सः) एक उत्तम बहुव्रीहि है। यह दर्शाता है कि भगवान विष्णु की नाभि से सृष्टि का कमल उत्पन्न हुआ है।

एक और सुन्दर श्लोक:

पीताम्बरं करविराजितचक्रशङ्ख-
कौमोदकीसरसिजं करुणासमुद्रम्।

यहाँ 'करुणासमुद्रम्' (करुणायाः समुद्रः इव) और 'पीताम्बरम्' साक्षात् बहुव्रीहि के चमत्कार हैं जो भक्त के हृदय में इष्ट की छवि अंकित करते हैं।


निष्कर्ष

बहुव्रीहि समास संस्कृत व्याकरण का वह शिखर है जहाँ शब्द अपनी सीमाएं तोड़कर किसी विराट अर्थ की ओर संकेत करते हैं। आचार्य पाणिनी के इन सूत्रों (अनेकमन्यपदार्थे से लेकर शेषाद्विभाषा तक) का अध्ययन हमें न केवल भाषा की शुद्धता सिखाता है, बल्कि यह भी बताता है कि कैसे दो सामान्य शब्द मिलकर एक 'असाधारण' सत्ता का बोध करा सकते हैं।

चाहे वह 'कण्ठेकालः' के रूप में महादेव की महिमा हो या 'रूपवद्भार्यः' जैसे व्यावहारिक उदाहरण, बहुव्रीहि हर जगह व्याप्त है।


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यह लेख संस्कृत के जिज्ञासुओं, प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे NET, JRF, UPSC Sanskrit) के छात्रों और भारतीय संस्कृति के प्रेमियों के लिए एक पूर्ण मार्गदर्शिका है। 

व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।

  • महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।

मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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