Ashish joshi - 9662941910

सुविचार - सुभाषित - संस्कृत सुभाषित

सुविचार - सुभाषित - संस्कृत सुभाषित

सुविचार - सुभाषित【संस्कृत सुभाषित】subhashit for suvichar ]

-: सुभाषित :-

 स्वभावो नोपदेशेन 
 शक्यते कर्तुमन्यथा ।
 सुतप्तमपि पानीयं
 पुनर्गच्छति शीतताम् ।।
  • हिन्दी अर्थ :-
किसी भी व्यक्ति का मूल स्वभाव कभी नहीं बदलता है | चाहे आप उसे कितनी भी सलाह दे दो, ठीक उसी तरह जैसे पानी तभी गर्म होता है, जब उसे उबाला जाता है | लेकिन कुछ देर के बाद वह फिर ठंडा हो जाता है |
प्राप्तव्यमर्थं लभते मनुष्यो
देवोऽपि तं लङ्घयितुं न शक्तः।
तस्मान्न शोचामि न विस्मयो मे 
यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम् ॥
  • हिन्दी अर्थ :-
मनुष्य को जो प्राप्त होना होता है, उसका उल्लंघन करने में देवता भी समर्थ नहीं हैं इसलिए मुझे न आश्चर्य है और न शोक क्योंकि जो मेरा है वह किसी दूसरे का नहीं है। 
 कुसुमस्तबकस्येव
 द्वयीवृत्तिर्मनस्विनः।
 मूर्ध्नि वा सर्वलोकस्य
 विशीर्येत वनेऽथवा॥

फूलों की तरह मनस्वियों की दो ही गतियाँ होती हैं; वे या तो समस्त विश्व के सिर पर शोभित होते हैं या वन में अकेले मुरझा जाते हैं।

 सत्यानुसारिणी लक्ष्मीः
 कीर्तिस्त्यागानुसारिणी।
 अभ्याससारिणी विद्या
 बुद्धिः कर्मानुसारिणी॥
  • हिन्दी अर्थ :-
लक्ष्मी सत्य का अनुसरण करती हैं, कीर्ति त्याग का अनुसरण करती है, विद्या अभ्यास का अनुसरण करती है और बुद्धि कर्म का अनुसरण करती है।

 सप्तैतानि न पूर्यन्ते
 पूर्यमाणान्यनेकशः।
 स्वामी पयोधिरुदरं 
 कृपणोऽग्निर्यमो गृहम्॥
  • हिन्दी अर्थ :-
ये सात कभी पूरे नहीं होते और पूरे करने पर बढकर अनेक हो जाते हैं - मालिक, समुद्र, पेट, कंजूस, अग्नि, मृत्यु और घर।

 न तु अहं कामये राज्यं
 न स्वर्गं न अपुनर्भवम्।
 कामये दु:खतप्तानां 
 प्राणिनाम् आर्तिनाशनम्॥
  • हिन्दी अर्थ :-
न मैं राज्य की इच्छा रखता हूँ, न स्वर्ग या मोक्ष की ही, मेरी तो यही अभिलाषा है कि दुःख से पीड़ित सभी प्राणियों के दुःख का नाश हो जाये।

अमॄतं चैव मॄत्युश्च 
द्वयं देहप्रतिष्ठितम्।
मोहादापद्यते मॄत्यु: 
सत्येनापद्यतेऽमॄतम्॥
  • हिन्दी अर्थ :-
अमरता और मॄत्यु दोनों एक ही शरीर में निवास करती हैं, मोह से मॄत्यु प्राप्त होती है और सत्य से अमरत्व।

 क्रोध: सुदुर्जय: शत्रु:
 लोभो व्याधिरनन्तक:।
 सर्वभूतहित: साधु:
 असाधुर्निदय: स्मॄत:॥
  • हिन्दी अर्थ :-
क्रोध को मनुष्य का जीतने में कठिन शत्रु कहा गया है, लोभ कभी न ख़त्म होने वाला रोग कहा गया है। साधु पुरुष वह है जो दूसरों के कल्याण में लगा हुआ है और असाधु वह है जो दया से रहित है।
मरणान्तानि वैराणि 
प्रसवान्तञ्च यौवनम् ।
कोपिता प्रणतान्ता हि 
याचितान्तं च गौरवम् ।।
  • हिन्दी अर्थ :-
दुश्मनी परलोक जानेसे ही खतम होती है । युवावस्था गर्भवती बननेसे समाप्त होती है। सिर झुकानेसे गुस्सा भी झुक जाता है। अहंकार भी दूसरोंके सामनॆ भीख माँगनेसे खत्म हो जाता है ।

सत्येन लोकं जयति 
दानर्जयति दीनताम् ।
गुरुन् शुश्रुषया जीया
द्धनुषा एव शात्रवान् ।।
  • हिन्दी अर्थ :-
सारी दुनिया सत्य से, गमको धर्मदान से , पित्रुजनों को सेवा से और दुश्मनों को शस्त्र से जीती जा सकता है।

चिन्तनीया हि विपदा
मादावेव प्रतिक्रिया ।
न कूपखननं युक्तं पर
दीप्ते वह्निना गृहे ।।
  • हिन्दी अर्थ :-
दुर्घटना की अभिक्रिया पहेले से सोंच लेनी चाहीये । जब घर मॆं आग लगे तब कुआँ खोदकर पानी निकालने का कोइ मतलब नही होता।

अतिदानाद्धतः कर्णस्त्व
तिलोभात् सुयोधनः।
अतिकामाद्दशग्रीवस्त्व् 
अति सर्वत्र वर्जयेत् ।।
  • हिन्दी अर्थ :-
अतिशय दान करनेसे कर्ण के पास कुछ भी नही बचा और खुदका नाश हो गया ।
अत्यंत लोभ से सुयोधन का सर्वनाश हो गया ।
काम-वासना से राजा रावण भी मृत्यु के आधीन हो गया ।
हद से अधिक कुछ भी अच्छा नही होता, उससे बचते रहना ।

यौवनं धनसंपत्ति 
प्रभुत्वमविवेकिता ।
एकैकमप्यनर्थाय
किमु यत्र चतुष्टयम् ॥
  • हिन्दी अर्थ :-
यहा कहते है कि 

वानी, धन, सत्ता और अविवेकिता ये हर अपने आप में ही अनर्थकारी है, तो फिर जहाँ (एक के पास) चारों चार इकट्ठे हो, तब तो पूछना ही क्या ?

अश्वस्य भूषणं वेगो 
मत्तं स्याद् गजभूषणं ।
चातुर्यम् भूषणं नार्या -
उद्योगो नरभूषणं ।।
  • हिन्दी अर्थ :-
यहा कहते है कि वेग(झड़प) अश्व (घोड़े) का आभूषण है , वैसे ही हाथी का आभूषण मत्त चाल है , चतुरता किसी नारी का आभूषण है और परिश्रम पुरुषों का आभूषण है ।

यो भूतेष्वभयं दद्यात् 
भूतेभ्यस्तस्य नो भयम् ।
यादृग् वितीर्यते दानं
तादृगासाद्यते फलम् ॥
  • हिन्दी अर्थ :-
यहा वैसा ही अर्थ जैसे मुहावरा है कि जैसा करोगे वैसा भरोगे यहा कहते है कि जो दूसरोंको अभय देता है उसके जीवन मे भय नही रहता । क्योकि जैसा दान करेंगे वैसा फल मिलेगा ।
 खल: सर्षपमात्राणि
 पराच्छिद्राणि पश्यति ।
 आत्मनो बिल्वमात्राणि
 पश्यन्नपि न पश्यति ।।
  • हिन्दी अर्थ :-
जो मनुष्य खल(दुर्जन) है वह अन्य के सरसव के दाने जितने दोषो को भी देख लेते है परंतु स्वयं के बिल्वदल(बिलीपत्र) के समान दोष भी नही दिखती ।
पदाहतं सदुत्थाय 
मूर्धानमधिरोहति।
स्वस्थादेवाबमानेपि 
देहिनस्वद्वरं रज:।।
  • हिन्दी अर्थ :-
बहोत लोगो को आपमान सहने की आदत हो जाती है उनके लिए यहा कहते है कि जो राज किसीके पेर की ठोकर से ऊपर उड़ति है वह उस ठोकर न उड़ने वाले कण से महान है । इसी लिए अपमान सहन कर बैठ नही जाना चाहिए ।
 इंद्रियाणि पराण्याहु:
 इंद्रियेभ्य: परं मन: ।
 मनसस्तु परा बुद्धि:
 यो बुद्धे: परतस्तु स: ।।
  • हिन्दी अर्थ :-
यहा आत्मा का स्थान कहा वह बताते है कहते कि इंद्रिया यो के परे मन है और मनसे परे बुद्धि है , ओर जो उस बुद्धि से भी परे है उसे आत्मा कहते है ।
उभाभ्यामेव पक्षाभ्यां 
शथा खे पक्षिणां गति: ।
तथैव ज्ञानकर्मभ्यां
जायते परमं पदम् ॥
  • हिन्दी अर्थ :-
यहा कहते है कि खग(पक्षी) जैसे अपने पंखो के कारण गति पाते है आकाश ऊंची ऊंची उड़ान भरते है , बस उसी तरह जीवन मे ज्ञान और कर्म स्वरूप पंखों से परम पद ( इच्छित स्थान ) पा सकता है ।
यथा काष्ठं च काष्ठं च 
समेयातां महोदधौ ।
समेत्य च व्यपेयातां
तद्वद् भूतसमागम: ।।
  • हिन्दी अर्थ :-
जिस तरह महासागर में कभी जो लकड़ी के टुकड़े जल प्रवाह से मिलते है और दूसरे ही क्षण प्रवाह के कारण अलग हो जाते है , वैसे हम मनुष्यो के बीच भी इस संसारसागर मै मिलना और बिछड़ना होता रहता है ।
न मांसभक्षणे दोषो
न मद्ये न च मैथुने ।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां 
निवृत्तिस्तु महाफला ॥
  • हिन्दी अर्थ :-
यहा कहते है कि मास भक्षण करना , मद्य पठानं करना , मैथुन करना यह मनुष्य की प्रकृति में है अतः दोष नही है परंतु इनका त्याग करने से महा फल की प्राप्ति होती है ।
 चलत्येकेन पादेन 
 तिष्ठत्येकेन पण्डितः ।
 न समीक्ष्यापरं स्थानं
 पूर्वमायातनं त्यजेत् ॥
  • हिन्दी अर्थ :-
जो मनुष्य बुद्धिमान है चतुर है वे लोग एक पैर से चलते है और एक पैर पर खड़े रहते है अर्थात् वे लोग किसीभी स्थान का अच्छी तरह से समीक्षा किये बिना पूर्व का स्थान नही छोड़ते ।
 कोऽतिभारः समर्थानां
 किं दूरं व्यवसायिनाम् ।
 को विदेशस्तु विदुषां 
 कः परः प्रियवादिनाम् ॥
  • हिन्दी अर्थ :-
जो मनुष्य सामर्थ्यवान है उसे किसी भी कार्य का केसा भार ? ओर परिश्रमी मनुष्य है उसके लिये कोई लक्ष्य दूर नही है । जो विद्वान है उसे विदेश में कहा है , ओर जो मनुष्य मीठा बोलता है उसके लिये पराया कौन है ? सब आपने है।
यावत् भ्रियेत जठरं 
तावत् सत्वं हि देहीनाम् ।
अधिकं योभिमन्येत 
स स्तेनो दण्डमर्हति ।।
  • हिन्दी अर्थ :-
जिससे हमारा जठर भर जाए उतने पर ही हमारा अधिकार है , उससे अधिक यदि हम लेते है तो वह दंड के योग्य है ।
गुणेषु क्रियतां यत्न: 
किमाटोपै: प्रयोजनम् ।
विक्रीयन्ते न घण्टाभि:
गाव: क्षीरविवर्जिता: ।।
  • हिन्दी अर्थ :-
हमे जीवन मे आटोप(दिखावा )नही करना चाहिए क्योंकि गुण और क्रिया से मनुस्य की किम्मत होती है । जैसे केवल घंटी बांध लेने से दूध ना देनेवाली गाय , दूध देती है  ऐसा समझकर कभी नही बेची जा सकती ।


2 टिप्‍पणियां:

Niraj joshi ने कहा…

Good information

Learn Physics Easily ने कहा…

सुंदरम

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