धर्म - सुभाषित - संस्कृत सुभाषित

धर्म - सुभाषित - संस्कृत सुभाषित

यहाँ संस्कृत सुभाषितों के बारे में अर्थ के साथ बताया गया हे। धर्म सुभाषित का तात्पर्य हे की यहाँ उन्ही सुभाषितों को बताया गया जो धर्म के विषय पर , धर्म  की विशेषता दर्शाता हो या सही धर्म समजाता हो ऐसे सुभाषित  यहाँ दिए गए हें। धर्म क्या हे शास्त्रों में धर्म पर क्या कहा गया हे। शास्त्रों में मिलता हे की, 'अहिंसा परमो धर्मो ' अर्थात मन , वचन और कर्म से हिंसा का त्याग अहिंसा कहलाता हे और वह जो भाव हे उसे अपने चरित्र में उतारना धर्म का पालन हे - 

धर्म - सुभाषित 【संस्कृत सुभाषित】[best sanskrit subhashit]

ऐसे कुछ महत्व पूर्ण धर्म सुभाषित यहाँ दिए जा रहे हे आशा हे आपको उपयोगी हो। ...

-: सुभाषित :-

 आहार निद्रा भय मैथुनं च
 सामान्यमेतत्पशुभि: नराणाम् ।
 धर्मो हि तेषामधिको विशेष:
 धर्मेण हीना: पशुभिः समाना: ॥

संस्कृत अर्थ:- 
  
भोजनम् , निद्रा , भय एवं मैथुनम एतत पशु एवं मानुषे समानं एव अस्ति , केवलम् धर्मः हि तत्र विशेष अस्ति , धर्मेण हिनाः जनाः पशुसमानाः एव सन्ति ।

हिंदी भावार्थ:-

 यहाँ पर मनुस्य और पशु के बिच का भेद क्या हे वह बहोत ही सरलता से बताया हे यहाँ पहला आहार  दूसरी  निद्रा तीसरा भय एवं चौथा मैथुन यह मनुस्य और पशुोओ दोनों में सामान  है। किन्यु मनुस्य की यह विशेषता हे की धर्म का ज्ञान उसे हे  , अन्यथा धर्म के बिना वह एक पशु के समान ही है।

-: सुभाषित :-

अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च
शास्त्रेभ्य: कुशलो नर:।
सर्वत: सारमादद्यात्
पुष्पेभ्य इव षट्पद:।।

संस्कृत अर्थः-

कुशलः नरः शास्त्रेषु यत् सारः अस्ति तस्य ग्रहणं करोति यथा भ्रमरःपुष्पेभ्यः मधुग्रहणं करोति ।।

हिन्दी अर्थ:-

जो बुद्धिमान  व्यक्ति  हे उसे अपनी बुद्धि से छोटे या बड़े सभी शास्त्रों का सार ग्रहण कर लेना चाहिए , जैसे भ्रमर (षट्पद:) फूलो से रस  ग्रहण करता हे।  

-: सुभाषित :-

अजरामरवत्प्राज्ञो
विद्यामर्थ च साधयेत् ।
गृहीत इव केशेषु
मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥

संस्कृत अर्थ:- 

अजरः एवं अमरः स्मः एवं विचिन्त्य विद्या एवं धनं अर्जयेत् । 
परन्तु  मृत्यु निर्धारितः अस्ति ईति विचिन्त्य धर्मं आचरेत् ।।

हिन्दी अर्थ:- 

यहाँ पर विद्या एवं धन का चिंतन किस तरह  करना चाहीए और धर्म के आचरण में केसा चिंतन करना चाहिए यह तुलनात्मक अर्थ प्राप्त होता हे , क्योकि यहाँ धन और विद्या अर्जन के समय हम अमर हे ऐसे विचार रखने चाहिए एवं जब धर्म पालन की बात आती हे तो कहा की मृत्यु निश्चित हे मानो केश पकड़ कर बैठी हे ऐसा मानकर करना चाहिए।  


धर्म एव हतो हन्ति 
धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यः
मानो धर्मो हतोवाधीत् ॥

हिन्दी अर्थ:- 

यदि मनुष्य धर्म का पालन नहीं करता हे उसका अर्थ की वह धर्म नाश कर रहा हे और धर्म का नाश होता हे तो मनुष्य को भी विनाश की और ले जाता हे।  इसीलिए धर्म की रक्षा करनी चाहिए यदि धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म भी हमारी रक्षा करेगा | अर्थात कह सकते हे की हम धर्म का पालन कर स्वयं की ही रक्षा कर रहे हे। इसीलिए धर्म का नाश नहीं करना चाहिए जो धर्म का नाश करता हे उसका विनाश निश्चित हे। 


ब्राम्हण: सम शान्तो
दीनानां समुपेक्षक: ।
स्त्रवते ब्रम्ह तस्यापि 
भिन्नभाण्डात् पयो यथा ॥

हिन्दी अर्थ:- 

सामान दृष्टि के अभाव यदि कोई ब्राम्हण किसी पिडीत जातक की सहायता नही करता हे, तो उस कारण से उसका ब्रम्हत्व का नाश होता जैसे किसी घड़े के फुट जाने पर दूध का नाश होता हे। अतः ब्राह्मण को सभी को सामान दृष्टि से देखना चाहिए। 
नाम्नामकारि बहुधा निज सर्व शक्ति,
स्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः 
एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि,
दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः ।।

हे भगवान आपने अपनी शक्ति आपको भक्त जिस नाम से पुकारते हे , उसमे भर दी हे और इन नमो का स्मरण कोईभी कभीभी कर शकता है , इस तरह की आपकी हम पर हे , परन्तु मेरा दुर्भाग्य हे की मुझे इन उत्तम नाम में अनुराग नहीं आ रहा। 
ॐ असतो मा सद्गमय 
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
मृत्यो र्मा अमृतं गमय 

यहाँ इस उपनिषदों के सूक्तिओं में कहा गया हे की मुझे असत् (असत्य) से सत्य की और ले जाए, तमस (अज्ञानता/अंधकार) से ज्योतिः(ज्ञान/प्रकाश) की और ले जाए, मृत्यु से अमरत्व की और ले जाए।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं
पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय
 पूर्णमेवावषिष्यते॥

यह सब जो आसपास हे वह पूर्ण हे , और जो पूर्ण हे वो स्वयं सम्पूर्ण हे , पूर्णसे ही पूर्णता हे। यह पूर्ण ऐसा हे की इससे पूर्ण निकाले तब भी पूर्ण ही बचता हे। 

ॐ सहनाववतु,
सहनौ भुनक्तु,
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु
 मा विद्विषा वहै। 

यहाँ बताया गया हे की विश्वमे हम सब साथ चले , साथ बोले , साथ में मिलके वीरता वाले कार्य करे। अच्छा ज्ञान प्राप्त कर तेजस्वी बने , हमारे बिच विद्वेष (झगडे) न हो। 

समुद्र वसने देवी
पर्वतस् तन मण्डले ।
विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं
पादस्पर्शं क्षमस्वमे ।।

हे माँ पृथ्वी (धरणी ) आप समुद्र में वास करने वाली हे , पर्वतो के शिखर पर भी आप हीं हे , आप ही विष्णु पत्नी लक्ष्मी स्वरूप हे , में प्रातः (सबेरे ) अपने पैर आपकी गोद में रख रहा हु बालक समझकर मुझे क्षमा करे। 

कायेन वाचा मनसेंद्रियौर्वा ।
बुदध्यात्मनाभावा प्रकृतिस्वभावात् ।
करोमि यद्यत् सकलं परस्मै 
 नारायणायेति समर्पयामि ।।

हे नारायण में अपने इस मन ,वचन या कर्म से , बुद्धिके अभावसे या फिर प्रकृति के स्वभाव से में जो भी कर रहा वह सब हे परस्मै में आपको अर्पण करता हु। 

हिरण मयेन पात्रेण
सत्यस्या पिहितं मुखम् 
तत्त्वम् पूषन्न् अपावृणु
सत्य धर्माय दृष्टये ।

हे सभी जीवो के पालन - पोषणकर्ता परमेश्वर, तुम्हारी यह तेजस्वी मुखाकृति हिरण्य (प्रकाशित )पात्र रोपी आवरण से ढकी हुई है । सत्य धर्म के ज्ञान हेतु तत्त्व को जानने हेतु हे पूषन इसे हटा दीजिये 

नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये , 
सहस्रपादाक्षि शिरोरुबाहवे |
सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते ,
सहस्रकोटी युगधारिणे नमः ॥ 

हे अनंत ईश्वर , हज़ारमूर्ति स्वरूप ,हजार  हाथ, पैर, नेत्र एवं शिर के साथ जिनके हज़ारो नाम हे  अनेक रुप में सर्वव्यापक है जो शाश्वत हे  जो करोडो युगो को धारण किये हुवे हे में उन्हें नमन करता हूँ ।

ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षीभूतम्
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुंतं नमामि ॥

ब्रह्म आनंद स्वरूप , परम सुख दायक , ज्ञानमूर्ति स्वरूप जिनके जैसा दूसरा कोई नहीं हे और आकाश की तरह जो अनंत स्वरुपवाले, तत्त्व को जानने वाले ,जो एक हे, नित्य हे , जो विमल और अचल हे ,  साक्षीभूत हे भावातीत हे तीनो गुणों से रहित हे ऐसे सद्गुरु को सदर नमन हे। 

आकाशात् पतितं तोयं
यथा गच्छति सागरम् ।
सर्वदेवनमस्कार:
केशवं प्रति गच्छति ।।
जैसे आकाश से बारीश के रूप मि गिरा पानी धरती पर गिरकर झरने और नदी से होता हुआ अंता में समुद्र मॆं मिल जाता है उसी तरह प्रत्येक देवताओको किये गए नमस्कार भी एक ही सर्वशक्तिशाली भगवान केशव (कृष्ण )  तक पहूँच जाते  है।

श्रद्धाभक्तिसमायुक्ता
नान्यकार्येषु लालसा:।
वाग्यता: शुचयश्चैव
श्रोतार: पुण्यशालिन:॥

यहाँ उत्तम और पुण्यशाली श्रोता के लक्षण बताये गए हे, श्रद्धा एवं भक्ति से  युक्त, अन्य कार्यों की लालच न रखने वाला ,मधुर और सुन्दर वचन बोलने वाले, श्रोता पुण्यशाली हैं।

धॄति: क्षमा दमोऽस्तेयं
शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो
दशकं धर्मलक्षणम्॥
यहाँ पर धर्म के १० दस लक्षण दिए  हैं -१  धैर्य, २ क्षमा, ३ आत्म- नियंत्रण, ४ चोरी न करना, ५ पवित्रता, ६  इन्द्रिय-संयम,७  बुद्धि,८  विद्या, ९ सत्य और १०  क्रोध न करना॥

प्रदोषे दीपकश्चंद्र:
प्रभाते दीपको रवि:।
त्रैलोक्ये दीपको
धर्म: सुपुत्र: कुलदीपक:॥

संस्कृत अर्थ:- 

रात्री चन्द्रः दीपकः अस्ति , सुर्यः दिवसेे दीपकः अस्ति , त्रीषु लोकेषु धर्मः दीपकः एवं कुले सुपुत्रः दिपकः भवति ।।

हिंदी अर्थ:- 

रात्री को चन्द्रमा प्रकाशित करता है, दिन को सूर्य प्रकाशित करता है, तीनों लोकों को धर्म प्रकाशित करता है और सुपुत्र पूरे कुल को प्रकाशित करता है।

FAQ For Dharm subhashit :-

१. मनुष्य और पशु के बिच क्या भेद हे ?
मनुष्य और पशुओमे आहार , नींद , भय (डर ) , मैथुन ( काम ) ये समान हे केवल धर्म ही विशेष हे जो मनुष्य में पाया जाता हे। 
२. मनुष्य को शास्त्रों को अध्ययन कैसे करना चाहिए ?
मनुष्य को छोटा या बड़ा कोई भी विषय हो, या शास्त्र हो उसका सारभूत अध्ययन होना चाहिए। 
३. धर्म के पालन न करने पर क्या होता हे ?
क्योकी धर्म से ही मनुष्य की रक्षा होती हे , अतः धर्म पालन न करने पर मनुष्य का सम्पूर्ण विनाश हो जाता हे।
४.संसार के मीठे फल क्या हे ? 
किसीने सही कहा की विष वृक्ष सामान संसार में एक सुभाषित और दूजा सत्संगति यह दो मधुर फल हे।  

7 टिप्‍पणियां:

आपके महत्वपूर्ण सुझाव के लिए धन्यवाद |
(SHERE करे )

Blogger द्वारा संचालित.