गुरु - सुभाषित - संस्कृत सुभाषित

गुरु - सुभाषित - संस्कृत सुभाषित

     गुरु शब्द बहोत ही शक्तिशाली है , संस्कृत में एक सूक्ति है कि ' गुरु सुश्रुषया विद्या ' अर्थात् यदि कोई पूरी श्रद्धा के साथ गुरु की सेवा-पूजा के साथ नम्र भावसे अभ्यास करता है, तो वह किसीभी क्षेत्र में सफल हो सकता है । इस बात की पुष्टि करती एक ओर सूक्ति के ' श्रद्धावान लभते ज्ञानम् ' मतलब श्रध्दावान व्यक्ति ज्ञान को पता है । "गुरु" शब्द का शाब्दिक अर्थ 'गु' यानी अज्ञान(अंधकार) एवं 'रु' यानी ज्ञान(प्रकाश) अर्थात् अज्ञान स्वरूप अंधकार से ज्ञान स्वरूप प्रकाश की ओर ले जाते है ।

गुरु - सुभाषित【संस्कृत सुभाषित 】[ sanskrit subhashit for guru teacher]

आईये आज गुरु की महत्ता ओर गुरू कृपा के बारेमें शास्त्रो के अनुसार सुभाषितो के माध्यम से जानते है गुरू सुभाषीत ...

-: सुभाषित :- 

प्रेरकः सूचकश्वैव
वाचको दर्शकस्तथा ।
शिक्षको बोधकश्चैव 
षडेते गुरवः स्मृताः ॥
  • हिंदी अर्थ 
नीति अनुसार हम किसे गुरु कह सकते है यहां कुछ गुरु के गुण बताये है , 1 प्ररणा देने वाला , 2 सूचन देनेवाला , 3 वाचक, 4 दिशा दिखाने वाला 5 शिक्षा देने वाला , 6 बोध देने वाला इन छह गुणों से युक्त गुरु होता है । 

-: सुभाषित :- 

गुरुरात्मवतां शास्ता 
शास्ता राजा दुरात्मनाम् ।
अथा प्रच्छन्नपापानां 
शास्ता वैवस्वतो यमः ॥
  • हिन्दी अर्थ :-
आत्मवान् मनुष्य पर गुरु शासन करते हैं अर्थात्  उनको सही रास्ते ले जाकर अनुशासन सिखाते है उसी तरह जो दृष्ट मनुष्य है उन पर राजा शासन करता है, एवम्  इसी तरह गुप्तरुप से पापी मनुष्यको अनुशासन में लाने के लिए उनपर स्वयं यमराज शासन करते है । (अर्थात् सभी पर अनुशासन तो अनिवार्य हि है)

-: सुभाषित :- 

किमत्र बहुनोक्तेन 
शास्त्रकोटि शतेन च ।
दुर्लभा चित्त विश्रान्तिः
विना गुरुकृपां परम् ॥
  • हिन्दी अर्थ :-
यहा पर बहोत बोलने से क्या लाभ ?, हजारो शास्त्रो के होने से भी क्या लाभ ? जब चित्त को शांति प्राप्त करना गुरु कृपा के बिना दुर्लभ है ।।अर्थात् गुरु कृपा के बिना सब निरर्थक है ।।

-: सुभाषित :- 

गुरूशुश्रूषया विद्या 
पुष्कलेन धनेन वा ।
अथवा विद्यया विद्या 
चतुर्थो न उपलभ्यते ॥
  • हिन्दी अर्थ :-
जो मनुष्य सहिमे विद्या प्राप्त करना चाहता है तो तीन तरीको से प्राप्त कर सकता 1 जो उत्तम है गुरु की सेवा कर गुरु कृपा से विद्या प्राप्त करे 2 कोई विद्यावान को धन देकर 3 पढ़ी हुई विद्या से पुस्तको के माद्यम से स्वयं पढ़कर इन तीनो के सिवा विद्या प्राप्त करने हेतु चौथा मार्ग नही है ।।

यथा खनन् खनित्रेण
नरो वार्यधिगच्छति।
तथा गुरुगतं विद्यां
शुश्रूषुरधिगच्छति ||
  • हिन्दी अर्थ :-
यहा गुरु की कृपा से विद्या केसे प्राप्त होती है वह तुलनात्मक ज्ञान बताते हुए कहते है कि जिस तरह खनित्र से गड्डा खोदने पर अर्थात् कुवा बनाने पर अंत मे जल (वारी) की प्राप्ति होती है , उसी तरह गुरु के पास जाकर गुरु की सेवा (शुश्रुषा) करने पर विद्या की प्राप्ति होती है ।।

अज्ञानतिमिरान्धस्य
ज्ञानाञ्जनशलाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन
तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
  • हिन्दी अर्थ :-
यहा पर गुरु की महिमा बताते हुए कहते है कि अज्ञान स्वरूप अंधकार है उसे ज्ञान स्वरुप अंजन की शलाका से ऐसे मनुस्य की आंखे खोल दी वह गुरु है और ऐसे गुरु को मेरा नमस्कार है ।
ज्येष्ठो भ्राता पिता चैव
यश्च विद्यां प्रयच्छति ।
त्रयस्ते पितरो ज्ञेया
धर्मे वर्त्मनि वर्तिनः ॥
  • हिन्दी अर्थ :-
जो व्यक्ति धर्म मार्ग पर चल रहा है उसके लिए बड़ा भाई , पिता , ओर जो विद्या देता है वह इन तीनो को पिता के समान जानने चाहिए ।।
स्वर्गो धनं वा धान्यं
वा विद्या पुत्रास्सुखानि च ।
गुरुवॄत्त्यनुरोधेन न
किञ्चिदपि दुर्लभम् ॥
  • हिन्दी अर्थ :-
यहा बताते है कि गुरु की कृपा से स्वर्ग , धन (संपत्ति) , धान्य , विद्या , पुत्र , सुख यह सब प्राप्त होते है इनमे से कोई भी थोड़ा भी दुर्लभ नही रहता सब मिल जाता है ।
शत्रोरपि गुणा वाच्या
दोषा वाच्या गुरोरपि।
सर्वदा सर्वयत्नेन 
पुत्रे शिष्यवदाचरेत्।।
  • हिन्दी अर्थ :-
यहा कहते है कि नीति के आधार पर हमें शत्रु यदि गुणवान है तो उसके गुण को स्वीकार करना चाहिए , ओर गुरु में यदि दोष हो तो उसको प्रकट करने में संकोच नही करना चाहिए आगे गुरु के कर्तव्य कहते कि हमेशा सभी प्रयत्न से पुत्र को भी शिष्य के समान गिनना चाहिए पुत्र और शिष्य में भेदभाव नही करना चाहिए ।
रिक्तपाणीर्नपश्येत
राजानं दैवतं गुरुम्।
दैवज्ञं पुत्रकं मित्रं
फलेन फलमादिशेत्।।
  • हिन्दी अर्थ :-
यहा व्यवहारीक ज्ञान देते हुए कहते है कि खालिहाथ(रिक्तपाणी) राजा के , देवता के , गुरु के, ज्योतिषी के
, पुत्र के , मित्र के पास नही जाना चाहिए हाथ मे कुछ ना कुछ फल , उपहार , दक्षिणा इत्यादि लेकर ही जाना चाहिए ।

पादाभ्यां न स्पृशेदग्निं
गुरुं ब्राह्मणमेव च।
नैव गां न कुमारीं च
न वृद्धं न शिशुं तथा।।
  • हिन्दी अर्थ :-
यहा बताते है कि अग्नि , गुरु , ब्राह्मण , गाय, कुमारिका , वृद्ध , शिशु इस को कभीभी हमारे पैर का स्पर्श नही होना चाहिए ।

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