यजुर्वेद का समूर्ण परिचय

 यजुर्वेद का समूर्ण परिचय

The full intro of yajurveda

संस्कृत साहित्य की अमूल्य धरोहर में ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद यह सर्वोपरी।  इनमे क्रमसे देखा जाये तो यजुर्वेद दुसरे क्रम में आता हे।  यजुर्वेद में गद्य प्रधान है यह अध्वर्यु के उपयोगी मंत्रो का संकलन है , यज्ञ का वास्तविक विधान अध्वर्यु ही करता है , इसीलिए यजुर्वेद यज्ञविधि के अति निकट संबंधित है ।

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यजुर्वेद के कितने प्रकार है

यजुर्वेद के दो प्रकार है एक कृष्ण यजुर्वेद, ओर दूसरा शुक्ल यजुर्वेद ।
पौराणिक कहते है -- कि व्यास ने वैशम्पायन को वेद का ज्ञान दिया , वैशम्पायन ने याज्ञावल्क्य को । किसी कारण वश रुष्ट होकर वैशम्पायन ने याज्ञावल्क्य कहा मुझसे प्राप्त वेद मुझे लोटा दो । याज्ञावल्क्य गुरुवचन का पालन करने के लिए प्राप्त वेद का ज्ञान वांत(ओक) (मुह से बाहर निकाल दिया) दिया । अन्य वैशम्पायन के शिष्य तित्तर का रूप लेखर उसका ग्रहण कर लिया । और यही गृहीत वेद कृष्ण यजुर्वेद के रूप मे प्रचलित हैं। 
वैशम्पायन के कुपित होने के कारण अधित वेद का विसर्जन करके पुनः वेद पढ़ने याज्ञावल्क्य ने सूर्य की आराधना की , ओर भगवान सूर्य से वेद का ज्ञान प्राप्त किया ओर यह शुक्ल यजुर्वेद के नाम से प्रचलित हुआ। ओर इन दोनों प्रकारों मैं बहोत अंतर है । 

कृष्णयजुर्वेद ओर शुक्लयजुर्वेद का अंतर (भेद) :-

शुक्लयजुर्वेद मैं विनियोग वाक्य रहित केवल मंत्र हु दिखते है , जबकि कृष्णयजुर्वेद में विनियोग वाक्य मंत्र तीनो देखने को मिलते है , इसीलिए अमिश्रित रूप शुक्लयजुर्वेद ओर मिश्रीत रूप कृष्णयजुर्वेद ऐसा लोग कहते है ।

यजुर्वेद का मुख्य विवरण :-

ऋत्विक ;- अध्वर्यु 
मुख्या देवता ;- वायु 
मुख्य आचार्य :- वैशम्पायन 
विषय :- याग 
शाखा :- २ 
अध्याय :- 40 
अनुवाक :- 303
(कंडिका) मंत्र :- 1975  
शब्द :- 29625 
अक्षरों :- 88875

यजुर्वेद के 40 अध्याय के विषय

पहले अध्याय में दर्शपौर्णमास , 
दूसरे अध्याय मैं पिंडपितृयज्ञ ,
तीसरे अध्याय मैं अग्निहोत्र, चातुर्मास ,
चौथै अध्याय से आठवे अध्याय तक अग्निष्टोम ओर सोमयाग विधान ,
नौवें अध्याय मैं वाजपेय , राजसूय विधान,
दसवे अध्याय मैं सौत्रामणी ,
ग्याहरवें अध्याय से अठारवे अध्याय तक - अग्निचयन , उखाभरण , चित, रुद्र , शतरुद्र, वसोर्धारा, रास्ट्रभृच्च आदि ,
उन्नीसवी अध्याय मैं परिशिष्ट का आरंभ होता है ,
बीसवें ओर इक्कीसवे अध्याय मैं सोमसम्पादन विधिः ,
तेइसवें , चौबिस ओर पच्चीसवे अध्याय मैं अश्वमेध ,
छब्बीस से शेष अध्यायों में पुरुष मेध , सर्वमेध , पितृमेध आदि विवरण मिलता है , अंतिम चालीसवे अध्याय मैं ईशावास्योपनिषद ।

शुक्लयजुर्वेद की कितनी शाखाए हैं?


शुक्लयजुर्वेद की संहिता वाजसनेयी संहिता कही जाती है । ऐसा नाम होने का कारण यह है कि याज्ञवल्क्य के द्वारा सूर्य की आराधना करने पर भगवान सूर्य ने वाजी के रूप में उन्हें वेद का ज्ञान दिया था इसीलिए उनकी कही गयी संहिता वाजसनेयी संहिता हुई ।

शुक्लयजुर्वेद की माध्यान्दिनी ओर कण्व ऐसी दो शाखा है । पहली उत्तर भारत मैं प्राप्त होती है और दूसरी महाराष्ट्र प्रान्त मैं । अन्य शाखा स्वल्प भगोमे प्रचलित है ।

कृष्णयजुर्वेद की कितनी शाखाए है?

कृष्णयजुर्वेद की चार शाखाए मिलती है -

१ )  तैत्तिरीय शाखा :- यह इस वेद की प्रधान शाखा है , यहा पर सात (7) खंड है , ये खंड अष्टक शब्द और कांड शब्द से प्रचलित है । हर कांड में कुछ अध्याय है जो प्रपाठक नाम से ख्यात है । और यह प्रपाठक बहोत सारे अनुवाको मैं विभाजित है ।
२ ) मैत्रायणी शाखा  , ३ ) कपिष्ठल शाखा  ओर ३ ) कठ शाखा  यह दोनों तैत्तिरीय संहिता का अनुकरण करते है । केवल क्रम मैं कही कही भिन्नता मिलती है। 

यजुर्वेद के ब्राह्मण कोनसे हे ?

(१) शतपथ ब्राह्मण (माध्यान्दिनी)
(२) शतपथ ब्राह्मण (काण्व )
(३) तैत्तरीय ब्राह्मण 
(४) मैत्रायणी ब्राह्मण
(५) कठ ब्राह्मण
(६) कपिष्ठल ब्राह्मण

यजुर्वेद के आरण्यक कोनसे हे ? 

(१) बृहदारण्यक (माध्यान्दिनी)
(२) बृहदारण्यक (काण्व )
(३) तैत्तरीय आरण्यक 
(४) मैत्रायणीय आरण्यक 

यजुर्वेद के उपनिषद कोनसे हे ? 

(१) ईशावास्य उपनिषद 
(२) बृहदारण्यक उपनिषद 
(३) कठ उपनिषद् 
(४) मैत्रायणी उपनिषद् 
(५) तैत्तरीय उपनिषद
(६) श्वेताश्वतर उपनिषद  






यजुर्वेद पुस्तक PDF :- download free pdf  here 

शुक्ल यजुर्वेदीय माध्यान्दीनीय मंत्र संहिता PDF :- download free pdf  here

बृहत रुद्राष्टाध्यायी PDF (22MB) :- download free pdf  here

यजुर्वेद गंगेश्वरानन्द झेरोक्ष PDF :- download free pdf  here

यजुर्वेद सरल भावार्थ सहित PDF (22MB) :-  download free pdf  here

रुद्राष्टाध्यायी - गीताप्रेस PDF (13MB) :-  download free pdf  here


अब हैम यजुर्वेद का समूर्ण परिचय संस्कृत में भी देखेंगे -

यजुर्वेदस्य सम्पूर्ण परिचयः :-

यजूषि गद्यानि । अध्वर्युणा यज्ञे उपयुज्यमाना मन्त्रा एवात्र यजुवेंदे सङ्क लिताः , यज्ञस्य वास्तविक विधानमध्वर्युरेव करोति , अतोऽयं यजुर्वेदो यज्ञविधेर- तिसन्निकृष्टं सम्बन्धं रक्षति । 

     यजुर्वेदो द्विप्रकारकः , कृष्णयजुः शुक्लयजुश्च । 
     
पौराणिकाः कथयन्ति - व्यासो वैशम्पायनाय वेदं प्रोवाच , स स्वशिष्याय याज्ञवल्क्याय । कुतोऽपि कारणाद् रुष्टो वैशम्पायनो याज्ञवल्क्यमुवाच - देहि मदधीतं वेदमिति । याज्ञवल्क्यो गुरुवचनपालनाय ततोऽधीतं वेदं सद्यो वान्त- वान् । अन्ये वैशम्पायनशिष्यास्तित्तिरिरूपं धृत्वा याज्ञवल्क्येन वान्तं वेदं गृहीतवन्तः । स एवायं वान्तगृहीतो वेदः कृष्णयजुर्वेदः ।
       वैशम्पायने कुपिते ततोऽधीतं वेदं विसृज्य याज्ञवल्क्यः पुनवेंदाधिगतये सूर्यमाराधयामास , ततश्च वेदमाप , ततोऽयं वेदः शुक्लयजुर्वेदनाम्नाऽप्रथत ।

 अनयोरन्तरम् :-

        शुक्लयजुर्वदे विनियोगवाक्यरहिताः केवला मन्त्रा विद्यन्ते , कृष्णयजुर्वेद तु विनियोग वाक्यानि मन्त्राश्च । अतोऽमिथितरूपतया शुक्लयजुर्वेदः , मिश्रित रूपतया च कृष्णयजुर्वेद इति संज्ञा जातेत्यपि लोकाः कथयन्ति । 
     
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शुक्लयजुर्वेद का विवरण

सोऽयं यजुर्वेदः ४० अध्यायान् , ३०३ अनुवाकान् , १ ९ ७५ कण्डिका ( मन्त्रान् ) , २ ९ ६२५ शब्दान , ८८८७५ अक्षराणि च वित्ति । अस्य वेदस्य प्रथमेऽध्याये दर्शपौर्णमासी , द्वितीये पिण्डपितृयज्ञः , तृतीयेऽग्निहोत्रं चातुर्मास्येष्टिः , चतुर्थाध्यायादष्टमाध्यायपर्यन्तमग्निष्टोमविधानं सोमयागः , नवमे वाजपेयो राजसूयश्च , दशमे सौत्रामणिः , एकादशाध्यायादष्टादशाध्यायपर्यन्तम् अग्निः चयनम् , उखाभरणम् , चितयः , रुद्रहः , शतरुद्रियम् , वसोर्धारा , राष्ट्रभूच्च । एकोनविंशतितमाध्यायात् परिशिष्टमारभ्यते , विशे एकविशे च सोमसम्पादन विधिः , तदनु पञ्चविंशतिपर्यन्तमश्वमेधः , ततः शेषे भागे पुरुषमेधसर्वमेधषित मेधादिविवरणच प्रपञ्चितम् । अन्तिमश्चाध्याय ईशावास्योपनिद्रूपः ।

     शुक्लयजुर्वेदस्य संहितैव वाजसनेयिसंहिता कथ्यते । तादृशनामकरणे बीजं त्विदं कथ्यते यत् याज्ञवल्क्येनाराधितः सूर्यो बाजी भूत्वा तस्मै वेदं प्रोक्तवान् अतस्तदुक्ता संहिता वाजसनेयी संहिता समाख्याता ।
     शुक्लयजुर्वेदस्य माध्यन्दिनशाखा कण्वशाखा चेति द्वे शाखे । प्रथमा उत्तर भारते प्राप्यते , द्वितीया च महाराष्ट्र । अनयोः शाखयोः संहिते भिन्ने सत्या बपि स्वल्पमेव भेदं धारयतः , बहुष्वंशेषु तुल्यता वर्तते । 

    कृष्णयजुर्वेदस्य चतस्रः शाखा प्राप्यन्ते 

( क ) तैत्तिरीयशाखा - इयं प्रधानशाखा , अत्र सप्तखण्डाः , ते च खण्डाः अष्टकशब्देन काण्डशब्देन च व्यह्रियन्ते । प्रतिकाण्डं कतिपयेऽध्याया , ये प्रपाठकनाम्ना ख्याताः । इमे प्रपाठका बहुष्वनुवाकेषु विभकाः सन्ति ।
 ( ख ) मैत्रायणीसंहिता  ग ) कपिष्ठल शाखा  इमे द्वे अपि संहिते तैत्तिरीय - संहितामनुकुरुतः ,
 ( घ  ) कठसंहिता केवल क्रमे यत्र तत्र पार्थक्यं विद्यते ।