कारक प्रकरण - पञ्चमी विभक्ति (अपादान कारक) की सम्पूर्ण व्याख्या
प्रस्तावना: संस्कृत व्याकरण में कारकों का महत्त्व

कारक प्रकरण - पञ्चमी विभक्ति
1. ध्रुवमपायेऽपादानम् (अष्टाध्यायी 1/4/24)
ग्रामादायाति (गाँव से आता है): यहाँ आने की क्रिया द्वारा व्यक्ति गाँव से अलग हो रहा है। गाँव यहाँ 'ध्रुव' या आधार है, अतः 'ग्राम' की अपादान संज्ञा हुई। धावतोऽश्वात्पतति (दौड़ते हुए घोड़े से गिरता है): यहाँ घोड़ा गतिशील है, फिर भी वह गिरने की क्रिया का प्रारंभिक बिंदु (Point of departure) है। अतः दौड़ता हुआ घोड़ा भी 'ध्रुव' मानकर अपादान संज्ञा को प्राप्त होता है।
2. अपादाने पञ्चमी (अष्टाध्यायी 2/3/28)
वृक्षात् पत्रं पतति (वृक्ष से पत्ता गिरता है)। हिमाालयात् गङ्गा प्रभवति (हिमालय से गंगा निकलती है)।
3. वार्तिक: जुगुप्साविरामप्रमादार्थानामुपसङ्ख्यानम्
जुगुप्सा (घृणा): पापात् जुगुप्सते (वह पाप से घृणा करता है)। नैतिक उदाहरण: "धर्मस्य ग्लानिं दृष्ट्वा सज्जनः पापात् जुगुप्सते।"
विराम (हटना/रुकना): पापात् विरमती (वह पाप से रुकता है)। श्रीमद्भगवद्गीता का भाव: जब मनुष्य अपनी इंद्रियों को विषयों से हटाता है, तो वह 'विषयात् विरमति' कहलाता है।
प्रमाद (असावधानी): धर्मात् प्रमाद्यति (वह धर्म के कार्यों में असावधानी करता है)। उपनिषद् वाक्य: "स्वाध्यायान्मा प्रमदः" (स्वाध्याय में प्रमाद मत करो)। यहाँ 'स्वाध्यायात्' में इसी वार्तिक से पञ्चमी हुई है।
4. भीत्रार्थानां भयहेतुः (अष्टाध्यायी 1/4/25)
चोराद् बिभेति (वह चोर से डरता है)। यहाँ डर का कारण 'चोर' है। चोरात् त्रायते (वह चोर से रक्षा करता है)। यहाँ रक्षा का कारण (जिससे बचाना है) 'चोर' है।
"अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्... युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो..." यहाँ 'एनस्' (पाप) से दूर करने की प्रार्थना है, जहाँ पञ्चमी का भाव निहित है।
5. पराजेरसोढः (अष्टाध्यायी 1/4/26)
अध्ययनात् पराजयते: इसका अर्थ है— 'वह अध्ययन से भागता है' या 'अध्ययन उसे बोझ लगता है'। यहाँ अध्ययन उसके लिए 'असोढ' (असह्य) है।
6. वारणार्थानामीप्सितः (अष्टाध्यायी 1/4/27)
यवेभ्यो गां वारयति (जौ के खेत से गाय को हटाता है)। यहाँ गाय की प्रिय वस्तु 'यव' (जौ) है, जिससे उसे हटाया जा रहा है। अतः 'यव' में पञ्चमी हुई।
7. अन्तर्धौ येनादर्शनमिच्छति (अष्टाध्यायी 1/4/28)
मातुर्निलीयते कृष्णः (माता से कृष्ण छिपते हैं)। यहाँ कृष्ण अपनी माता से छिपना चाहते हैं, अतः 'मातृ' शब्द में पञ्चमी हुई।
8. आख्यातोपयोगे (अष्टाध्यायी 1/4/29)
उपाध्यायादधीते (उपाध्याय से पढ़ता है)। यहाँ शिक्षा एक व्यवस्थित ढंग से ली जा रही है।
9. जनिकर्तुः प्रकृतिः (अष्टाध्यायी 1/4/30)
ब्रह्मणः प्रजाः प्रजायन्ते (ब्रह्मा से प्रजा उत्पन्न होती है)। यहाँ प्रजा के उत्पन्न होने का मूल कारण 'ब्रह्मा' हैं। गोमयात् वृश्चिको जायते (गोबर से बिच्छू उत्पन्न होता है - प्राचीन मान्यतानुसार)।
10. भुवः प्रभवः (अष्टाध्यायी 1/4/31)
हिमवतो गङ्गा प्रभवति (हिमालय से गंगा निकलती है)। गंगा हिमालय में उत्पन्न नहीं होती (वह तो विष्णु पद से आती है), पर हिमालय वह स्थान है जहाँ वह सबसे पहले 'प्रकट' होती है।
11. ल्यब्लोपे कर्मण्यधिकरणे च (वार्तिक)
प्रासादात् प्रेक्षते (महल से देखता है)। इसका वास्तविक अर्थ है— 'प्रासादम् आरुह्य प्रेक्षते' (महल पर चढ़कर देखता है)। यहाँ 'प्रासाद' जो कर्म था, ल्यप् के लोप होने पर पञ्चमी में बदल गया। आसनात् प्रेक्षते (आसन से देखता है)। अर्थ— 'आसने उपविश्य प्रेक्षते' (आसन पर बैठकर देखता है)। श्वशुरान्जिहेति (ससुर से शरमाती है)। अर्थ— 'श्वशुरं वीक्ष्य जिहेति' (ससुर को देखकर लजाती है)।
12. दिशा, काल और मार्ग वाचक विशेष नियम
वनाद् ग्रामो योजनम् (वन से गाँव एक योजन दूर है)।
वनाद् ग्रामो योजनं योजने वा।
कार्तिक्या आग्रहायणी मासः (कार्तिक पूर्णिमा से मार्गशीर्ष मास एक महीने की दूरी पर है)।
13. अन्यारादितरर्ते दिक्शब्दाञ्चूत्तरपदाजाहियुक्ते (2/3/29)
अन्य/इतर/भिन्न: (दूसरा/अलग) - कृष्णात् अन्यः। आरात्: (निकट या दूर) - वनात् आरात्। ऋते: (बिना) - ऋते कृष्णात् न मुक्तिः (कृष्ण के बिना मुक्ति नहीं)। दिक्शब्द (दिशावाची): पूर्वा ग्रामात् (गाँव के पूर्व)। अञ्चूत्तरपद: जहाँ 'अञ्चु' धातु अन्त में हो (जैसे— प्राक्, प्रत्यक्)। आहि युक्त: (जैसे— दक्षिणाहि, उत्तराहि)।
14. कर्मप्रवचनीय सम्बन्धी सूत्र
अप हरेः / परि हरेः संसारः (हरि को छोड़कर संसार)। आमुक्तेः संसारः (मुक्ति तक संसार है)। आसकलात् ब्रह्म (ब्रह्म सब में व्याप्त है)।
15. प्रतिनिधि और प्रतिदान (2/3/11)
प्रद्युम्नः कृष्णात् प्रति (प्रद्युम्न कृष्ण के प्रतिनिधि हैं)। तिलेभ्यः प्रतियच्छति माषान् (तिल के बदले उड़द देता है)।
16. अकर्तर्पणे पञ्चमी (2/3/24)
शताद् बद्धः (सौ रुपये के कर्ज के कारण बँधा हुआ है)। यदि कर्ता हो तो: 'शतेन बन्धितः' (सौ रुपयों ने बँधवा दिया - यहाँ तृतीया होगी)।
17. विभाषा गुणेऽस्त्रियाम् (2/3/25)
जाड्याद् बद्धः / जाड्येन बद्धः (जड़ता या मूर्खता के कारण बँधा है)। गुणे किम्? 'धनेन कुलम्' (यहाँ धन द्रव्य है, गुण नहीं, अतः केवल तृतीया)। अस्त्रियां किम्? 'बुद्ध्या मुक्तः' (बुद्धि स्त्रीलिंग है, अतः केवल तृतीया)।
18. पृथग्विनानानाभिस्तृतीयाऽन्यतरस्याम् (2/3/32)
रामेण पृथक् / रामात् पृथक् / रामं पृथक्। इसी प्रकार: विना रामम् / रामेण / रामात्।
19. स्तोकाल्पकृच्छ्रकतिपयस्य (2/3/33)
स्तोकैन् मुक्तः / स्टोकाद्वा मुक्तः (थोड़े ही प्रयास से मुक्त हो गया)।
20. दूरान्तिकार्थेभ्यो द्वितीया च (2/3/35)
ग्रामस्य दूरम् / दूरात् / दूरेण / दूरे। अन्तिकम् / अन्तिकात् / अन्तिकेन / अन्तिके।
निष्कर्ष: पञ्चमी विभक्ति का आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक पक्ष
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- संज्ञाप्रकरणम् - लघुसिद्धान्तकौमुदी
- सन्धि - अच सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - हल सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - विसर्ग सन्धि (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तद्धित :- अपत्यार्थक एवं मत्वर्थीय (सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार)
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- स्त्री प्रत्यय :- लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रकरण :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रथमा विभक्ति
- कारक द्वितीया विभक्ति
- कारक तृतीया विभक्ति
- कारक चतुर्थी विभक्ति
- कारक पञ्चमी विभक्ति
- कारक षष्ठी विभक्ति
- कारक सप्तमी विभक्ति
- कारक सम्बोधन विभक्ति
- परस्मैपद एवं आत्मनेपद विधान :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।
- वाक्यपदीयम् (ब्रह्मकाण्ड) :- स्फोट का स्वरूप, शब्द-ब्रह्म का स्वरूप, शब्द ब्रह्म की शक्तियाँ, स्फोट एवं ध्वनि का संबंध, शब्द अर्थ संबंध, ध्वनिः के प्रकार, भाषा के स्तर
- वाक्यपदीयम् (ब्रह्मकाण्ड) ( केवल पाठ )