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विसर्ग सन्धि का सम्पूर्ण ज्ञान - लघुसिद्धान्तकौमुदी

विसर्गसन्धिः - लघुसिद्धान्तकौमुदी

संस्कृत व्याकरण की अमूल्य निधि: विसर्ग सन्धि का सम्पूर्ण ज्ञान 

संस्कृत भाषा संसार की सबसे प्राचीन, वैज्ञानिक और व्यवस्थित भाषा है। इस भाषा की सुंदरता इसके व्याकरण में निहित है, जिसे 'वेदांग' माना गया है। व्याकरण के बिना वेदों और शास्त्रों का शुद्ध उच्चारण और अर्थ समझना असंभव है। आचार्य पाणिनि की 'अष्टाध्यायी' इसी व्याकरण का आधार स्तंभ है।

सन्धि (Joining of letters) संस्कृत व्याकरण का एक अनिवार्य अंग है। जब दो वर्ण अत्यंत समीप आते हैं, तो उनमें जो विकार या परिवर्तन होता है, उसे सन्धि कहते हैं। सन्धि के मुख्य तीन प्रकार हैं:

  1. अच् सन्धि (स्वर सन्धि)

  2. हल् सन्धि (व्यंजन सन्धि)

  3. विसर्ग सन्धि

आज के इस विशेष लेख में हम विसर्ग सन्धि पर विस्तार से चर्चा करेंगे। विसर्ग (:) के स्थान पर होने वाले परिवर्तनों को ही विसर्ग सन्धि कहा जाता है। आइए, स्पर्धाप्रकाश के आलोक में इन सूत्रों को मंत्रों और उदाहरणों के साथ समझते हैं।


1. सत्व विधान: विसर्जनीयस्य सः

सूत्रम्: विसर्जनीयस्य सः (8/3/34)
वृत्ति: खरि।
हिन्दी अर्थ: यदि विसर्ग के बाद 'खर' प्रत्याहार का कोई वर्ण (प्रत्येक वर्ग का पहला, दूसरा वर्ण और श, ष, स) आए, तो विसर्ग के स्थान पर 'स' (सकार) हो जाता है।

उदाहरण:

  • विष्णुस्त्राता: विष्णुः + त्राता। यहाँ 'त्राता' का 'त्' खर प्रत्याहार में आता है, अतः विसर्ग को 'स' होकर 'विष्णुस्त्राता' बना।

  • रामश्चलति: रामः + चलति = रामश्चलति। (यहाँ सकार को 'स्तो: श्चुना श्चु:' से शकार हो जाता है)।

  • भक्तस्तपति: भक्तः + तपति = भक्तस्तपति।

धार्मिक एवं मन्त्र उदाहरण:
शान्ति पाठ में हम पढ़ते हैं:

"नमो नमस्तेऽस्तु चलच्चलाय..."
यहाँ नमस्ते शब्द (नमः + ते) इसी सूत्र का प्रत्यक्ष प्रमाण है।


2. विकल्प विधान: वा शरि

सूत्रम्: वा शरि (8/3/36)
वृत्ति: शरि विसर्गस्य विसर्गा वा।
हिन्दी अर्थ: यदि विसर्ग के बाद 'शर' प्रत्याहार (श, ष, स) का कोई वर्ण आए, तो विसर्ग के स्थान पर विकल्प से विसर्ग ही रहता है (या फिर सत्व संधि हो जाती है)।

उदाहरण:

  • हरिः शेते (विसर्ग यथावत) अथवा हरिश्शेते (विसर्ग को स होकर फिर शकार)।

  • रामः षष्ठः अथवा रामष्षष्ठः

  • निःसन्देहः अथवा निस्संदेहः

यह सूत्र हमें भाषा में लचीलापन प्रदान करता है, जिससे काव्य की लय बनी रहती है।


3. रुत्व विधान: ससजुषो रुः

सूत्रम्: ससजुषो रु: (8/2/66)
वृत्ति: पदान्तस्य सस्य सजुषश्च रुः स्यात्।
हिन्दी अर्थ: पद के अंत में आने वाले 'स' (सकार) और 'सजुष्' शब्द के 'ष्' के स्थान पर 'रु' (र्) आदेश होता है।

यह विसर्ग सन्धि की प्रक्रिया का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रारंभिक सोपान है। विसर्ग सीधे किसी अन्य रूप में नहीं बदलता, पहले वह 'रु' बनता है।


4. उत्व विधान (भाग-1): अतो रोरप्लुतादप्लुते

सूत्रम्: अतो रोरप्लुतादप्लुते (6/1/113)
वृत्ति: अप्लुतादतः परस्य रोरुः स्यादप्लुतेऽति।
हिन्दी अर्थ: यदि 'रु' (र्) से पहले छोटा 'अ' (अप्लुत अत्) हो और उसके बाद भी छोटा 'अ' (अप्लुत अत्) हो, तो 'रु' के स्थान पर 'उ' आदेश हो जाता है।

सिद्धि प्रक्रिया (शिवोऽर्च्यः):

  1. शिवस् + अर्च्यः (मूल स्थिति)

  2. शिव रु + अर्च्यः (ससजुषो रुः से स को रु)

  3. शिव उ + अर्च्यः (अतो रोरप्लुतादप्लुते से रु को उ)

  4. शिवो + अर्च्यः ('अ + उ' में 'आद्गुणः' से गुण सन्धि होकर 'ओ')

  5. शिवोऽर्च्यः ('एङः पदान्तादति' से पूर्वरूप सन्धि होकर 'ऽ' अवग्रह चिह्न)।

श्लोक उदाहरण:
भगवद्गीता के अनेक श्लोकों में यह सन्धि दिखती है:

"कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥"
यहाँ सन्धि के गूढ़ नियमों का पालन होता है।


5. उत्व विधान (भाग-2): हशि च

सूत्रम्: हशि च (6/1/114)
वृत्ति: तथा।
हिन्दी अर्थ: यदि 'रु' (र्) से पहले छोटा 'अ' हो और बाद में 'हश्' प्रत्याहार (वर्गों के तीसरे, चौथे, पांचवें वर्ण और य, र, ल, व, ह) का कोई वर्ण हो, तो 'रु' को 'उ' आदेश होता है।

उदाहरण:

  • शिवो वन्द्यः: शिवः + वन्द्यः = शिवस् + वन्द्यः → शिवरु + वन्द्यः → शिव उ + वन्द्यः → शिवो वन्द्यः।

  • मनोरथः: मनः + रथः = मनोरथः।

  • तपोवनम्: तपः + वनम् = तपोवनम्।


6. यकार आदेश: भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि

सूत्रम्: भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि (8/3/17)
वृत्ति: एतत्पूर्वस्य रोर्यादेशो ऽशि।
हिन्दी अर्थ: यदि 'रु' से पहले 'भो', 'भगो', 'अघो' शब्द हों या 'अ'/'आ' वर्ण हो, और बाद में 'अश्' प्रत्याहार (सभी स्वर और हश् वर्ण) हो, तो 'रु' के स्थान पर 'य' आदेश होता है।

उदाहरण:

  • देवायिह / देवा इह: देवाः + इह। यहाँ 'आ' के बाद विसर्ग (रु) है और परे 'इ' (अश्) है, अतः यकार आदेश हुआ।


7. यकार लोप: हलि सर्वेषाम्

सूत्रम्: हलि सर्वेषाम् (8/3/22)
वृत्ति: भोभगो अघो अपूर्वस्य यस्य लोपः स्याद्धलि।
हिन्दी अर्थ: 'भो', 'भगो', 'अघो' और 'अ/आ' के बाद आने वाले 'य' का लोप हो जाता है यदि उसके बाद कोई 'हल्' (व्यंजन) वर्ण हो।

उदाहरण:

  • भो देवाः (भोस् + देवाः → भोय् + देवाः → भो देवाः)

  • भगो नमस्ते (भगवान् को नमस्कार)

  • अघो याहि (हे पापी, जाओ)


8. अहन शब्द का परिवर्तन: रोऽसुपि

सूत्रम्: रोऽसुपि (8/2/69)
वृत्ति: अह्नो रेफादेशो न तु सुपि।
हिन्दी अर्थ: 'अहन्' शब्द के अंतिम 'न' के स्थान पर 'रेफ' (र्) आदेश होता है, यदि उसके बाद 'सुप्' प्रत्यय न हो।

उदाहरण:

  • अहरहः (प्रतिदिन): अहन् + अहः।

  • अहर्गणः: अहन् + गणः।


9. रेफ लोप: रोरि

सूत्रम्: रोरि (8/3/14)
वृत्ति: रेफस्य रेफे परे लोपः।
हिन्दी अर्थ: यदि 'र' के बाद पुनः 'र' आए, तो पूर्व 'र' का लोप हो जाता है।

यह सूत्र संस्कृत की ध्वन्यात्मक स्पष्टता के लिए अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि दो 'र' का एक साथ उच्चारण कठिन होता है।


10. दीर्घ विधान: ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः

सूत्रम्: ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः (6/3/111)
वृत्ति: ढरेफयोर्लोपनिमित्तयोः पूर्वस्याणो दीर्घः।
हिन्दी अर्थ: जिस 'ढ' या 'र' का लोप हुआ हो, उसके ठीक पहले वाले 'अण्' (अ, इ, उ) को दीर्घ आदेश हो जाता है।

उदाहरण:

  • पुना रमते: पुनर् + रमते। यहाँ 'रोरि' से पहले 'र' का लोप हुआ, फिर 'पुन' के 'अ' को दीर्घ होकर 'पुना रमते' बना।

  • हरी रम्यः: हरिर् + रम्यः = हरी रम्यः।

  • शम्भू राजते: शम्भुः + राजते = शम्भू राजते।

अपवाद (अणः किम्?): यदि अ, इ, उ के अलावा कोई वर्ण हो, तो दीर्घ नहीं होगा। जैसे: तृढः, वृढः


11. कार्य प्राथमिकता: विप्रतिषेधे परं कार्यम्

सूत्रम्: विप्रतिषेधे परं कार्यम् (1/4/2)
वृत्ति: तुल्यबलविरोधे परं कार्यं स्यात्।
हिन्दी अर्थ: जब दो सूत्र समान रूप से प्राप्त हों (विरोध की स्थिति), तो अष्टाध्यायी के क्रम में जो सूत्र बाद में आता है, वह कार्य पहले होता है।

विशेष उदाहरण - मनोरथः की सिद्धि:
मनस् + रथः में 'रु' होने पर 'हशि च' (उत्व) और 'रोरि' (लोप) दोनों प्राप्त थे। यहाँ 'पूर्वत्रासिद्धम्' और 'विप्रतिषेध' के नियमों से 'उत्व' कार्य होता है, जिससे 'मनोरथः' रूप सिद्ध होता है।


12. एतद्-तद् सु-लोप: एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि

सूत्रम्: एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि (6/1/132)
वृत्ति: अककारयोरेतत्तदोर्यः सुस्तस्य लोपो हलि न तु नञ्समासे।
हिन्दी अर्थ: यदि 'एतद्' और 'तद्' शब्द में 'क' वर्ण न हो और वे 'नञ्' समास (अ- से शुरू होने वाले) न हों, तो उनके 'सु' (विसर्ग) का लोप हो जाता है, यदि बाद में कोई व्यंजन (हल्) हो।

उदाहरण:

  • एष विष्णुः: एषः + विष्णुः = एष विष्णुः।

  • स शम्भुः: सः + शम्भुः = स शम्भुः।

सावधानी:

  • एषको रुद्रः (यहाँ 'क' है, अतः लोप नहीं हुआ)।

  • असः शिवः (नञ् समास होने के कारण लोप नहीं हुआ)।

  • एषोऽत्र (बाद में स्वर होने के कारण उत्व हुआ, लोप नहीं)।


13. छन्द पूर्ति हेतु लोप: सोऽचि लोपे चेत्पादपूरणम्

सूत्रम्: सोऽचि लोपे चेत्पादपूरणम् (6/1/134)
वृत्ति: स इत्यस्य सोर्लोपः स्यादचि पादचेल्लोप सत्येव पूर्यते।
हिन्दी अर्थ: यदि श्लोक के किसी चरण (पाद) की मात्राओं या अक्षरों की पूर्ति केवल विसर्ग के लोप से ही हो रही हो, तो स्वर परे होने पर भी 'सः' के विसर्ग का लोप हो जाता है।

उदाहरण:

  • सैष दाशरथी रामः (सः + एषः)। यहाँ छन्द की आवश्यकतानुसार सन्धि कार्य हुआ है।

  • समामविड्ढि प्रभृतिम्


मंत्रों और श्लोकों में विसर्ग सन्धि का महत्व

विसर्ग सन्धि केवल व्याकरण का नियम नहीं है, बल्कि यह मंत्रों की शक्ति और नाद ब्रह्म का आधार है। जब हम "ॐ नमः शिवाय" कहते हैं, तो 'नमः' के विसर्ग का उच्चारण उसके बाद आने वाले वर्ण पर निर्भर करता है।

वैदिक मंत्रों में विसर्ग सन्धि के कारण ही उदात्त, अनुदात्त और स्वरित का संतुलन बनता है। यदि हम सन्धि नियमों का उल्लंघन करते हैं, तो मंत्र का फल परिवर्तित हो सकता है। इसीलिए कहा गया है:

"मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह।"
अर्थात: स्वर या वर्ण से हीन मंत्र अपना अर्थ खो देता है।

विसर्ग सन्धि अभ्यास हेतु कुछ अतिरिक्त उदाहरण:

  1. कविः + जयति = कविर्जयति (रुत्व)

  2. बालः + गच्छति = बालो गच्छति (उत्व)

  3. नृपः + अत्र = नृपोऽत्र (उत्व एवं पूर्वरूप)

  4. भानुः + उदयति = भानुरुदयति (रुत्व)

  5. मुनिः + इतः = मुनिरितः (रुत्व)


निष्कर्ष (Conclusion)

"स्पर्धाप्रकाश" का यह विसर्ग सन्धि प्रकरण हमें सिखाता है कि किस प्रकार एक सूक्ष्म विसर्ग (:) के स्थान पर 'स', 'रु', 'उ', 'य' या लोप के माध्यम से शब्दों का निर्माण होता है। ये सूत्र केवल प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए ही नहीं, बल्कि संस्कृत साहित्य की आत्मा को समझने के लिए भी अनिवार्य हैं।

पाणिनीय व्याकरण की यह वैज्ञानिकता ही है जो संस्कृत को 'कंप्यूटर के लिए सर्वश्रेष्ठ भाषा' बनाती है। आशा है कि यह विस्तृत लेख आपके ज्ञानवर्धन में सहायक सिद्ध होगा। यदि आप व्याकरण के इन गूढ़ रहस्यों को आत्मसात करते हैं, तो आप न केवल शुद्ध संस्कृत बोल पाएंगे, बल्कि शास्त्रों के वास्तविक मर्म तक पहुँच पाएंगे।


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लेखक का सुझाव: इन सूत्रों को कंठस्थ करने के लिए प्रतिदिन एक सूत्र का 11 बार पाठ करें और उसके 5 नए उदाहरण खोजें।

॥ इति विसर्गसन्धिः ॥

व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।

  • महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।

मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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