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हल् सन्धि (व्यंजन सन्धि) का सम्पूर्ण विवेचन - लघुसिद्धान्तकौमुदी

हल् सन्धिः - लघुसिद्धान्तकौमुदी

हल् सन्धि (व्यंजन सन्धि) का सम्पूर्ण विवेचन: पाणिनीय व्याकरण के अनमोल सूत्र

प्रस्तावना

संस्कृत भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड की ध्वनियों का वैज्ञानिक विन्यास है। महर्षि पाणिनी ने 'अष्टाध्यायी' के माध्यम से भाषा को जो अनुशासन दिया, वह आज भी आधुनिक भाषाविज्ञान के लिए अचम्भा है। संस्कृत व्याकरण में 'सन्धि' का अर्थ है—दो वर्णों के अत्यंत समीप आने पर होने वाला परिवर्तन। जब एक व्यंजन का दूसरे व्यंजन या स्वर के साथ मेल होता है, तो उसे 'हल् सन्धि' या 'व्यंजन सन्धि' कहते हैं।

भगवान शिव के डमरू से निकले सूत्रों (माहेश्वर सूत्र) में 'हल्' का अर्थ व्यंजन है। जैसा कि कहा गया है:

नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्।
उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धान् एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्॥

इस ब्लॉग में हम आपके द्वारा दिए गए सभी महत्वपूर्ण सूत्रों की विस्तृत व्याख्या, उनके उदाहरण और उनके पीछे छिपे व्याकरणिक नियमों को समझेंगे।


1. श्चुत्व सन्धि: सूत्र - स्तोः श्रुना श्रुः (8/4/40)

वृत्ति: सकारतवर्गयोः शकारचवर्गाभ्यां योगे शकारचवर्गौ स्तः।
हिन्दी अर्थ: यदि 'स्' (सकार) या 'त्, थ्, द्, ध्, न्' (तवर्ग) के साथ 'श्' (शकार) या 'च्, छ्, ज्, झ्, ञ्' (चवर्ग) का योग (मेल) हो, तो सकार के स्थान पर शकार और तवर्ग के स्थान पर क्रमशः चवर्ग आदेश हो जाता है।

यथासंख्यमनुदेशः समानाम् सूत्र के अनुसार:

  • स् ➔ श्

  • त् ➔ च्

  • थ् ➔ छ्

  • द् ➔ ज्

  • ध् ➔ झ्

  • न् ➔ ञ्

प्रमुख उदाहरण:

  1. रामश्शेते: रामस् + शेते। यहाँ 'स्' के बाद 'श्' है, अतः 'स्' को 'श्' होकर 'रामश्शेते' बना। (राम सोता है)

  2. रामश्चिनोति: रामस् + चिनोति। यहाँ 'स्' के बाद 'च्' है, अतः 'स्' को 'श्' हुआ। (राम चुनता है)

  3. सच्चित्: सत् + चित्। यहाँ 'त्' के बाद 'च्' है, अतः 'त्' को 'च्' होकर 'सच्चित्' बना।

    • अध्यात्म संदेश: 'सच्चिदानंद' शब्द में भी यही सन्धि है। सत् (अस्तित्व) और चित् (चेतना) का मिलन ही ब्रह्म है।

  4. शार्ङ्गिञ्जयः: शार्ङ्गिन् + जयः। यहाँ 'न्' के बाद 'ज्' (चवर्ग) है, अतः 'न्' को 'ञ्' हुआ।


2. श्चुत्व निषेध: सूत्र - शात् (8/4/44)

वृत्ति: शात् परस्य तवर्गस्य श्रुत्वं न स्यात्।
हिन्दी अर्थ: यदि 'श्' (शकार) के बाद तवर्ग (त्, थ्, द्, ध्, न्) आए, तो वहाँ श्चुत्व सन्धि (त् को च् आदि) नहीं होती। यह 'स्तोः श्रुना श्रुः' का अपवाद है।

प्रमुख उदाहरण:

  1. विश्नः: विश् + न। यहाँ 'श्' के बाद 'न्' है। नियमतः 'न्' को 'ञ्' होना चाहिए था, लेकिन 'शात्' सूत्र ने इसे रोक दिया।

  2. प्रश्नः: प्रश् + नः। यहाँ भी 'श्' के बाद 'न' होने के कारण कोई परिवर्तन नहीं हुआ।


3. ष्टुत्व सन्धि: सूत्र - ष्टुना ष्टुः (8/4/41)

वृत्ति: स्तोः टुना योगे ष्टुः स्यात्।
हिन्दी अर्थ: यदि 'स्' या तवर्ग (त्, थ्, द्, ध्, न्) का योग 'ष्' (षकार) या टवर्ग (ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण्) के साथ हो (चाहे पहले हो या बाद में), तो सकार को षकार और तवर्ग को टवर्ग आदेश हो जाता है।

आदेश क्रम:

  • स् ➔ ष्

  • त् ➔ ट्

  • थ् ➔ ठ्

  • द् ➔ ड्

  • ध् ➔ ढ्

  • न् ➔ ण्

प्रमुख उदाहरण:

  1. रामष्षष्ठः: रामस् + षष्ठः = रामष्षष्ठः (छठा राम)।

  2. रामष्टीकते: रामस् + टीकते = रामष्टीकते (राम जाता है)।

  3. पेष्टा: पेष् + ता = पेष्टा (पीसने वाला)। यहाँ 'ष्' पहले है और 'त्' बाद में।

  4. तट्टीका: तत् + टीका = तट्टीका (उसकी व्याख्या/टीका)।

  5. चक्रिण्ढौकसे: चक्रिन् + ढौकसे = (हे चक्रधारी! तुम जाते हो)। यहाँ 'न्' को 'ण्' हुआ है।


4. ष्टुत्व निषेध: सूत्र - न पदान्ताट्टोरनाम् (8/4/42)

वृत्ति: पदान्ताट्टवर्गात्परस्यानामः स्तो ष्टुर्न स्यात्।
हिन्दी अर्थ: यदि टवर्ग पद के अन्त में हो, तो उसके बाद आने वाले सकार और तवर्ग को ष्टुत्व (षकार/टवर्ग) नहीं होता। लेकिन यदि 'नाम्' शब्द का 'न्' हो, तो यह निषेध काम नहीं करता।

प्रमुख उदाहरण:

  1. षट् सन्तः: (छह संत)। यहाँ 'षट्' का 'ट्' पदान्त है, इसलिए 'सन्तः' के 'स्' को 'ष्' नहीं हुआ।

  2. षट् ते: (वे छह)। यहाँ 'त्' को 'ट्' नहीं हुआ।

पदान्तात् किम्? (पद के अंत में होना क्यों जरूरी है?):
यदि टवर्ग पद के मध्य में हो, तो सन्धि होगी। जैसे: ईट्टे (ईड् + ते)। यहाँ 'ड्' पदान्त नहीं है, इसलिए 'त्' को 'ट्' होकर 'ईट्टे' बना।


5. विशेष वार्तिक: अनाम्नवतिनगरीणामिति वाच्यम्

हिन्दी अर्थ: पदान्त टवर्ग के बाद यदि 'नाम', 'नवति' या 'नगरी' शब्द आएँ, तो ष्टुत्व का निषेध नहीं होगा, बल्कि सन्धि अनिवार्यतः होगी।

उदाहरण:

  1. षण्णाम्: षड् + नाम् ➔ षण्णाम्।

  2. षण्णवतिः: षड् + नवतिः ➔ षण्णवतिः (छियानवे)।

  3. षण्णगर्यः: षड् + नगर्यः ➔ षण्णगर्यः (छह नगरियाँ)।

यहाँ 'यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा' सूत्र से 'ड्' को 'ण्' भी होता है।


6. ष्टुत्व निषेध: सूत्र - तो षिः (8/4/43)

वृत्ति: न ष्टुत्वम्।
हिन्दी अर्थ: यदि तवर्ग के बाद 'ष्' (षकार) आए, तो तवर्ग को टवर्ग आदेश नहीं होता। यह 'ष्टुना ष्टुः' का अपवाद है।

उदाहरण:

  1. सन् षष्ठः: सन् + षष्ठः। यहाँ 'न्' के बाद 'ष्' है, फिर भी 'न्' को 'ण्' नहीं हुआ।


7. जशत्व सन्धि: सूत्र - झलां जशोन्ते (8/2/39)

वृत्ति: पदान्ते झलां जशः स्युः।
हिन्दी अर्थ: पद के अन्त में स्थित 'झल्' (वर्ग के 1, 2, 3, 4 अक्षर और श, ष, स, ह) के स्थान पर 'जश्' (वर्ग का तीसरा अक्षर - ग्, ज्, ड्, द्, ब्) आदेश हो जाता है।

उदाहरण:

  1. वागीशः: वाक् + ईशः। यहाँ 'क्' (झल्) पदान्त में है, इसे वर्ग का तीसरा अक्षर 'ग्' (जश्) हो गया।

    • श्लोक सन्दर्भ: वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥ (यहाँ 'वाक्' + 'अर्थ' मिलकर 'वागर्थ' बना है)।


8. अनुनासिक सन्धि: सूत्र - यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा (8/4/45)

वृत्ति: यरः पदान्तस्यानुनासिके परे अनुनासिको वा स्यात्।
हिन्दी अर्थ: यदि पदान्त 'यर' (ह को छोड़कर सभी व्यंजन) के बाद कोई अनुनासिक वर्ण (ङ्, ञ्, ण्, न्, म्) आए, तो 'यर' के स्थान पर विकल्प से उसी वर्ग का पाँचवाँ अक्षर (अनुनासिक) हो जाता है।

उदाहरण:

  1. एतन्मुरारिः / एतद्मुरारिः: एतद् + मुरारिः। यहाँ 'द्' को विकल्प से 'न्' हुआ।

वार्तिक: प्रत्यये भाषायां नित्यम्।
यदि अनुनासिक किसी प्रत्यय का हो, तो यह परिवर्तन नित्य (अनिवार्य) होता है।

  1. तन्मात्रम्: तद् + मात्रम् (मात्रच् प्रत्यय)। यहाँ 'न्' अनिवार्य है।

  2. चिन्मयम्: चित् + मयम् (मयट् प्रत्यय)। 'त्' को 'न्' नित्य होगा।


9. लत्व सन्धि: सूत्र - तोर्लि (8/4/60)

वृत्ति: तोः लकारे परे परसवर्णः।
हिन्दी अर्थ: यदि तवर्ग के बाद 'ल्' आए, तो तवर्ग के स्थान पर 'ल्' ही हो जाता है। विशेष बात यह है कि 'न्' के स्थान पर होने वाला 'ल्' अनुनासिक (ऌँ) होता है।

उदाहरण:

  1. तल्लयः: तद् + लयः = तल्लयः।

  2. विद्वाँल्लिखति: विद्वान् + लिखति। यहाँ 'न्' का 'ल्' हुआ और वह अनुनासिक रहा।


10. पूर्वसवर्ण सन्धि के विशेष सूत्र

सूत्र - उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य (8/4/61)

अर्थ: 'उद्' उपसर्ग के बाद यदि 'स्था' या 'स्तम्भ' धातु आए, तो उनके स्थान पर पूर्वसवर्ण (त्) आदेश होता है।

इसके साथ सहायक सूत्र:

  • तस्मादित्युत्तरस्य (1/1/67): पंचमी निर्देश होने पर कार्य बाद वाले वर्ण को होता है।

  • आदेः परस्य (1/1/54): बाद वाले शब्द का कार्य उसके पहले अक्षर (आदि) पर होता है। (अर्थात् 'स्था' के 'स्' को 'थ्' होगा)।

  • झरो झरि सवर्णे (8/4/65): समान वर्ण होने पर लोप विकल्प से होता है।

  • खरि च (8/4/55): 'खर्' परे होने पर 'झलों' को 'चर्' (पहला अक्षर) हो जाता है।

उदाहरण:

  • उत्थानम्: उद् + स्थानम् ➔ उत् + थानम् ➔ उत्थानम्।

  • उत्तम्भनम्: उद् + स्तम्भनम् ➔ उत्तम्भनम्।


11. हकार के स्थान पर पूर्वसवर्ण: सूत्र - झयो होऽन्यतरस्याम् (8/4/62)

वृत्ति: झयः परस्य हस्य वा पूर्वसवर्णः।
हिन्दी अर्थ: यदि वर्ग के 1, 2, 3, 4 अक्षर के बाद 'ह्' आए, तो 'ह्' के स्थान पर विकल्प से उसी वर्ग का चौथा अक्षर (महाप्राण) हो जाता है।

उदाहरण:

  1. वाग्धरिः / वाग्हरिः: वाक् + हरिः। यहाँ 'ह्' को विकल्प से 'घ्' हुआ।


12. छत्व सन्धि: सूत्र - शश्छोटि (8/4/63)

वृत्ति: झयः परस्य शस्य छोऽटि।
हिन्दी अर्थ: यदि वर्ग के 1, 2, 3, 4 अक्षर के बाद 'श्' आए और उसके बाद कोई 'अट्' (स्वर, ह, य, व, र) हो, तो 'श्' के स्थान पर विकल्प से 'छ्' हो जाता है।

उदाहरण:

  1. तच्छिवः: तद् + शिवः। 'द्' को पहले 'च्' हुआ, फिर 'श्' को 'छ्' होकर 'तच्छिवः' बना।

    • मंत्र सन्दर्भ: तच्छिवं पदं गच्छति। (वह शिव पद को प्राप्त करता है)।


13. अनुस्वार सन्धि: सूत्र - मोऽनुस्वारः (8/3/23)

वृत्ति: मान्तस्य पदस्यानुस्वारो हलि।
हिन्दी अर्थ: यदि किसी पद के अन्त में 'म्' हो और उसके बाद कोई व्यंजन (हल्) आए, तो 'म्' के स्थान पर अनुस्वार ( ं ) हो जाता है।

उदाहरण:

  1. हरिं वन्दे: हरिम + वन्दे।

  2. धर्मं चर: धर्मम् + चर।

सूत्र - नश्चापदान्तस्य झलि (8/3/24):
अपदान्त (पद के बीच में) 'न्' और 'म्' के बाद यदि 'झल्' आए, तो भी अनुस्वार होता है। जैसे: यशांसिआक्रंस्यते


14. परसवर्ण सन्धि: सूत्र - अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः (8/4/58)

हिन्दी अर्थ: यदि अनुस्वार के बाद 'यय्' (श, ष, स, ह को छोड़कर सभी व्यंजन) आए, तो अनुस्वार के स्थान पर बाद वाले वर्ण के वर्ग का पाँचवाँ अक्षर हो जाता है।

उदाहरण:

  1. शान्तः: शाम् + तः ➔ शां + तः ➔ शान्तः (त् वर्ग का पाँचवाँ 'न्')।

  2. अंकितः: अं + कितः ➔ अङ्कितः।

वा पदान्तस्य (8/4/59): पद के अंत में यह कार्य विकल्प से होता है।

  • त्वङ् करोषि / त्वं करोषि।


15. मकार के विशेष नियम

  • मो राजि समः कौ (8/3/25): 'राज्' धातु (क्विप् प्रत्ययान्त) परे होने पर 'सम्' के 'म्' को 'म्' ही रहता है, अनुस्वार नहीं होता। यथा: सम्राट्

  • हे मपरे वा (8/3/26): यदि 'ह' के साथ 'म' जुड़ा हो (ह्म), तो पूर्व 'म्' को विकल्प से 'म्' ही रहता है। यथा: किम् ह्मलयति / किं ह्मलयति

  • नपरे नः (8/3/27): यदि 'ह' के साथ 'न' जुड़ा हो (ह्न्), तो 'म्' को विकल्प से 'न्' होता है। यथा: किन् हुते / किं हुते


16. आगम सन्धि (कुक्, टुक्, धुट्, तुक्)

संस्कृत व्याकरण में 'आगम' मित्र की तरह होता है जो बीच में आकर बैठ जाता है।

  • ङोः कुक् टुक् शरि (8/3/28): ङकार और णकार के बाद 'शर' (श, ष, स) आने पर क्रमशः 'कुक्' और 'टुक्' का आगम होता है।

    • उदाहरण: प्राङ्ग् षष्ठःसुगण्ट् षष्ठः

  • डः सि धुट् (8/3/29): 'ड्' के बाद 'स्' आने पर 'धुट्' (त्) का आगम होता है। यथा: षट् त् सन्तः

  • शि तुक् (8/3/31): पदान्त 'न्' के बाद 'श्' आने पर विकल्प से 'तुक्' (त्) का आगम होता है।

  • छे च (6/1/73): ह्रस्व स्वर के बाद 'छ्' आने पर 'तुक्' (त् ➔ च्) का आगम अनिवार्य है। यथा: शिवच्छाया (शिव + छाया)।


17. ङमुट् आगम: सूत्र - ङमो ह्रस्वादचि ङमुण् नित्यम् (8/3/32)

हिन्दी अर्थ: यदि ह्रस्व स्वर के बाद 'ङ्, ण, न' आएँ और उसके बाद कोई स्वर (अच्) हो, तो उस वर्ण का द्वित्व जैसा आगम (ङमुट्) हो जाता है।

उदाहरण:

  1. प्रत्यङ्गात्मा: प्रत्यङ् + आत्मा।

  2. सुगण्णीशः: सुगण् + ईशः।

  3. सन्नच्युतः: सन् + अच्युतः।


18. रुत्व और विसर्ग प्रक्रिया: सम्, पुम्, कान्

  • समः सुटि (8/3/5): 'सम्' के बाद 'सुट्' (स्) आने पर 'म्' को 'रु' आदेश होता है।

  • अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा (8/3/2): 'रु' से पहले वाले स्वर को विकल्प से अनुनासिक होता है।

  • अनुनासिकात्परोनुस्वारः (8/3/4): अनुनासिक न होने पर अनुस्वार होता है।

  • खरवसानयोर्विसर्जनीयः (8/3/15): 'रु' के 'र्' को विसर्ग होता है।

  • संपुंकानां सो वक्तव्यः (वार्तिक): विसर्ग को पुनः 'स्' हो जाता है।

    • परिणाम: सँस्स्कर्ता / संस्स्कर्ता

इसी प्रकार पुंस्कोकिलः (पुमः खय्यम्परे) और काँस्कान् / कांस्कान् (कानाम्रेडिते) रूप सिद्ध होते हैं।


19. नृन् शब्द का नियम: सूत्र - नॄन् पे (8/3/10)

हिन्दी अर्थ: 'नृन्' शब्द के 'न्' को 'प' परे होने पर विकल्प से 'रु' आदेश होता है।

  • उदाहरण: नृँः पाहि / नृन् पाहि


20. जिह्वामूलीय और उपध्मानीय: सूत्र - कुप्वोः क पौ च (8/3/37)

हिन्दी अर्थ: 'क, ख' परे होने पर विसर्ग को 'जिह्वामूलीय' (ᳲक) और 'प, फ' परे होने पर 'उपध्मानीय' (ᳲप) आदेश होता है, या विसर्ग ही रहता है।


निष्कर्ष और आध्यात्मिक महत्त्व

संस्कृत की 'हल् सन्धि' हमें सिखाती है कि कैसे दो भिन्न स्वभाव वाले वर्ण मिलकर एक नई ध्वनि और शक्ति को जन्म देते हैं। व्याकरण के ये नियम केवल शब्दों को जोड़ने के लिए नहीं हैं, बल्कि यह वाक्-शक्ति की साधना है। जब हम 'सच्चित्' कहते हैं, तो 'सत्' (सत्य) और 'चित्' (चेतना) का जो एकीकरण होता है, वह हमें अद्वैत की ओर ले जाता है।

अन्तिम श्लोक:

वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥

जिस प्रकार शब्द और अर्थ एक-दूसरे से जुड़े हैं, उसी प्रकार व्यंजन सन्धि के ये सूत्र भाषा की आत्मा को अखंड बनाए रखते हैं। आशा है कि हल् सन्धि का यह विस्तृत विवेचन विद्यार्थियों और संस्कृत प्रेमियों के लिए अत्यंत सहायक सिद्ध होगा।




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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।

  • महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।

मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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