संस्कृत व्याकरण की अद्भुत यात्रा: ण्यन्त से नामधातु प्रक्रिया तक का गहन विश्लेषण
प्रस्तावना: व्याकरण का महत्त्व
"मुखं व्याकरणं स्मृतम्"

प्रत्ययान्त - ण्यन्त - सन्नन्त - यङन्त - यङ्गुक् - प्रक्रिया, नामधातवः
प्रथम अध्याय: ण्यन्तप्रक्रिया (Causal Verbs)
1. स्वतन्त्रः कर्ता (1/4/54)
2. तत्प्रयोजको हेतुश्च (1/4/55)
3. हेतुमति च (3/1/26)
उदाहरण: 'भू' (होना) + णिच् = भावयति (वह उत्पन्न करता है या होने की प्रेरणा देता है)। मंत्र सन्दर्भ: ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। यहाँ 'प्रचोदयात्' (प्र+चुद्+णिच्) एक ण्यन्त रूप ही है, जिसका अर्थ है "हमें प्रेरित करे"।
4. ओः पुयण्ज्यपरे (7/4/80)
5. अर्तिह्रीब्लीरीक्नूयीक्ष्माय्यातां पुङ् णौ (7/3/36)
उदाहरण: स्था (ठहरना) + णिच् = स्थापयति (वह स्थापित करता है)।
6. तिष्ठतेरित् (7/4/5)
उदाहरण: अतिष्ठिपत्।
7. मितां ह्रस्वः (6/4/92)
उदाहरण: घट् + णिच् = घटयति। ज्ञप् (जानना/बताना) = ज्ञपयति। अजिज्ञपत् (लुङ्)।
द्वितीय अध्याय: सन्नन्तप्रक्रिया (Desiderative Verbs)
1. धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा (3/1/7)
उदाहरण: पठितुमिच्छति = पिपठिषति (वह पढ़ने की इच्छा करता है)। विशेष: यदि कर्ता भिन्न हो (जैसे: गुरु चाहता है कि शिष्य पढ़े), तो सन् नहीं होगा।
2. सन्यङोः (6/1/9)
उदाहरण: पठ् + सन् = पिपठिषति।
3. सः स्यार्धधातुके (7/4/49)
उदाहरण: अद् (खाना) + सन् = जिघत्सति (खाने की इच्छा करता है)।
4. अज्झनगमां सनि (6/4/16)
5. इको झल् (1/2/9)
उदाहरण: कृ (करना) + सन् = चिकीर्षति (करने की इच्छा करता है)।
6. सनि ग्रहगुहोश्च (7/2/12)
उदाहरण: भू (होना) + सन् = बुभूषति (होने की इच्छा करता है)।
तृतीय अध्याय: यङन्तप्रक्रिया (Intensive/Frequentative)
1. धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् (3/1/22)
उदाहरण: पुनः पुनः भवति = बोभूयते।
2. गुणो यङ्गुकोः (7/4/82)
उदाहरण: भू -> बोभूयते।
3. नित्यं कौटिल्ये गतौ (1/3/23)
उदाहरण: कुटिलं व्रजति = वाव्रज्यते।
4. दीर्घोऽकितः (7/4/83)
उदाहरण: वाव्रज्यते (यहाँ 'व' का 'वा' हुआ)।
5. रीगृदुपधस्य च (7/4/90)
उदाहरण: वृत् -> वरीवृत्यते।
चतुर्थ अध्याय: यङ्लुक् प्रक्रिया (Intensive without 'ya')
1. यङोऽचि च (7/4/74)
2. यङो वा (7/3/94)
उदाहरण: बोभवीति (अत्यधिक होता है - ईट् आगम के साथ)। बोभोति (ईट् आगम के बिना)।
पंचम अध्याय: नामधातु प्रक्रिया (Denominative Verbs)
1. सुप आत्मनः कयच् (3/1/8)
उदाहरण: आत्मनः पुत्रमिच्छति = पुत्रीयति (वह अपने लिए पुत्र की कामना करता है)।
2. सुपो धातुप्रातिपदिकयोः (2/4/71)
3. क्यचि च (7/4/33)
उदाहरण: पुत्र + क्यच् = पुत्रीयति।
4. नः क्ये (1/4/15)
उदाहरण: राजन् + क्यच् = राजीयति।
5. काम्यच्च (3/1/9)
उदाहरण: पुत्रकाम्यति (पुत्र की कामना करता है)।
6. उपमानादाचारे (3/1/10)
उदाहरण: पुत्रमिवाचरति = पुत्रीयति (शिष्य के साथ पुत्र जैसा व्यवहार करता है)। विष्णूयति (द्विज के साथ विष्णु जैसा व्यवहार)।
7. वार्तिक: सर्वप्रातिपदिकेभ्यः क्विप् वा वक्तव्यः
उदाहरण: कृष्ण इवाचरति = कृष्णति।
8. कष्टाय क्रमणे (3/1/14)
उदाहरण: कष्टायते (पाप करने के लिए उत्साहित होना)।
9. शब्दवैरकलहाभ्रकण्वमेघेभ्यः करणे (3/1/17)
उदाहरण: शब्दं करोति = शब्दायते (शोर करता है)।
निष्कर्ष: व्याकरण की व्यापकता
"एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग्भवति।"
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- संज्ञाप्रकरणम् - लघुसिद्धान्तकौमुदी
- सन्धि - अच सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - हल सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - विसर्ग सन्धि (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तद्धित :- अपत्यार्थक एवं मत्वर्थीय (सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार)
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- स्त्री प्रत्यय :- लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रकरण :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रथमा विभक्ति
- कारक द्वितीया विभक्ति
- कारक तृतीया विभक्ति
- कारक चतुर्थी विभक्ति
- कारक पञ्चमी विभक्ति
- कारक षष्ठी विभक्ति
- कारक सप्तमी विभक्ति
- परस्मैपद एवं आत्मनेपद विधान :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।