संस्कृत व्याकरण का महाज्ञान: कृत् प्रत्यय (कृदन्त प्रकरण) - एक संपूर्ण मार्गदर्शिका

कृत् प्रत्यय (कृदन्त प्रकरण) - कृत् - तव्यत्, तव्य तथा अनीयर्
कृत् प्रत्यय: परिभाषा और परिचय
अव्यय बनाने के लिए: 'क्त्वा', 'ल्यप्', 'तुमुन्' प्रत्यय। विशेषण बनाने के लिए: 'शतृ', 'शानच्', 'तव्यत्', 'अनीयर्', 'यत्' आदि। भूतकालिक क्रिया और 'चाहिए' के अर्थ में: 'क्त', 'क्तवतु', 'तव्यत्', 'अनीयर्', 'यत्'। संज्ञा बनाने के लिए: 'तृच्', 'क्तिन्', 'ण्वुल्', 'ल्युट्' आदि।
1. विधि और योग्यता का बोध: तव्यत् और अनीयर् प्रत्यय
सूत्र: तव्यत्तव्यानीयरः (3/1/96)
तव्यत्: इसमें 'त्' की इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है और 'तव्य' शेष रहता है। अनीयर्: इसमें 'र्' का लोप होकर 'अनीय' शेष रहता है।
उदाहरण (Examples):
2. यत्, ण्यत् और क्यप् प्रत्यय: सूक्ष्म अंतर और नियम
(क) यत् प्रत्यय
चि + यत् = चेयः (पु.), चेया (स्त्री.), चेयम् (नपुं.) - चुनने योग्य। जि + यत् = जेयः, जेया, जेयम् - जीतने योग्य। गै + यत् = गेयः, गेया, गेयम् - गाने योग्य। श्रु + यत् = श्रव्यः, श्रव्या, श्रव्यम् - सुनने योग्य। दा + यत् = देयः, देया, देयम् - देने योग्य।
(ख) ण्यत् प्रत्यय
कृ + ण्यत् = कार्यः, कार्या, कार्यम् - करने योग्य। हृ + ण्यत् = हार्यः, हार्या, हार्यम् - हरण करने योग्य। धृ + ण्यत् = धार्यः, धार्या, धार्यम् - धारण करने योग्य। लिख् + ण्यत् = लेख्यः, लेख्या, लेख्यम् - लिखने योग्य। पठ् + ण्यत् = पाठ्यः, पाठ्या, पाठ्यम् - पढ़ने योग्य। त्यज् + ण्यत् = त्याज्यः, त्याज्या, त्याज्यम् - त्यागने योग्य। वच् + ण्यत् = वाच्यः, वाच्या, वाच्यम् - बोलने योग्य।
(ग) क्यप् प्रत्यय
इ + क्यप् = इत्य (जिसके पास जाना चाहिए)। शास् + क्यप् = शिष्य (जिसे उपदेश देना चाहिए)। स्तु + क्यप् = स्तुत्य (स्तुति के योग्य)। वृ + क्यप् = वृत्य (चुनने योग्य)। आ + दृ + क्यप् = आदृत्य (आदरणीय)।
3. वर्तमान कालिक निरंतरता: शतृ और शानच् प्रत्यय
शतृ प्रत्यय (परस्मैपदी धातुओं के लिए)
शानच् प्रत्यय (आत्मनेपदी धातुओं के लिए)
4. पूर्वकालिक क्रिया: क्त्वा प्रत्यय
मयूराः मेघं दृष्ट्वा नृत्यति। (मोर बादल को देखकर नाचता है।) यहाँ 'दृश्' + क्त्वा = दृष्ट्वा। कृ + क्त्वा = कृत्वा (करके) - कार्यं कृत्वा गृहं गच्छ। (काम करके घर जाओ।) गम् + क्त्वा = गत्वा (जाकर) - पणं गत्वा फलं आनय। (बाजार जाकर फल लाओ।) पा + क्त्वा = पीत्वा (पीकर) - दुग्धं पीत्वा शयनं कुरु। (दूध पीकर सो जाओ।)
5. भूतकालिक प्रयोग: क्त (त) और क्तवतु (तवत्)
(क) क्त प्रत्यय
गम् + क्त = गतः, गता, गतम् (गया) कृ + क्त = कृतः, कृता, कृतम् (किया) श्रु + क्त = श्रुतः, श्रुता, श्रुतम् (सुना) हस् + क्त = हसितम् (हँसा गया - भाव में)
(ख) क्तवतु प्रत्यय
गम् + क्तवतु = गतवान्, गतवती, गतवत् (गया) कृ + क्तवतु = कृतवान्, कृतवती, कृतवत् (किया) पा + क्तवतु = पीतवान्, पीतवती, पीतवत् (पिया) श्रु + क्तवतु = श्रुतवान्, श्रुतवती, श्रुतवत् (सुना)
6. प्रयोजनार्थक क्रिया: तुमुन् प्रत्यय
सूत्र: तुमुन्ण्वुलौ क्रियायां क्रियार्थायाम् (3/3/10)
तुमुन् का 'तुम्' शेष रहता है। यह अव्यय बनाता है। सूत्र: कालसमयवेलासु तुमुन् (3/3/167) - समय बताने वाले शब्दों के साथ भी इसका प्रयोग होता है। यथा- पठितुं समयोऽस्ति। (पढ़ने का समय है।) सूत्र: समानकर्तृकेषु तुमुन् (3/3/158) - जब दो क्रियाओं का कर्ता एक ही हो।
गम् + तुमुन् = गन्तुम् (जाने के लिए) - सः गृहं गन्तुं सिद्धः अस्ति। हन् + तुमुन् = हन्तुम् (मारने के लिए) - मृगं हन्तुं सिंहः समुद्यतः अस्ति। पा + तुमुन् = पातुम् (पीने के लिए) - जलं पातुं सः नदीं गतवान्। स्ना + तुमुन् = स्नातुम् (स्नान के लिए) - सः स्नातुं तरणतालमगच्छत्। दृश् + तुमुन् = द्रष्टुम् (देखने के लिए) - कृष्णं द्रष्टुं याति।
7. कर्ता (डूअर) बनाने हेतु: ण्वुल् प्रत्यय
सूत्र: ण्वुल्तृचौ (3/1/133)
ण्वुल् के 'वु' को 'अक' आदेश हो जाता है। धातु के अंत में स्थित स्वर की वृद्धि होती है। उपधा (Second last letter) में स्थित लघु स्वर को गुण होता है।
कृ + ण्वुल् (अक) = कारकः (करने वाला) पच् + ण्वुल् (अक) = पाचकः (पकाने वाला) श्रु + ण्वुल् (अक) = श्रावकः (सुनने वाला) पठ् + ण्वुल् (अक) = पाठकः (पढ़ने वाला) नृत् + ण्वुल् (अक) = नर्तकः (नाचने वाला) लिख् + ण्वुल् (अक) = लेखकः (लिखने वाला) सिच् + ण्वुल् (अक) = सेचकः (सींचने वाला)
कृदन्त प्रत्ययों का आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व
ज्ञान विस्तार हेतु अतिरिक्त उदाहरण और तालिका
निष्कर्ष
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- संज्ञाप्रकरणम् - लघुसिद्धान्तकौमुदी
- सन्धि - अच सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - हल सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - विसर्ग सन्धि (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तद्धित :- अपत्यार्थक एवं मत्वर्थीय (सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार)
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- स्त्री प्रत्यय :- लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रकरण :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रथमा विभक्ति
- कारक द्वितीया विभक्ति
- कारक तृतीया विभक्ति
- कारक चतुर्थी विभक्ति
- कारक पञ्चमी विभक्ति
- कारक षष्ठी विभक्ति
- कारक सप्तमी विभक्ति
- परस्मैपद एवं आत्मनेपद विधान :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।