🙏 संस्कृतज्ञानपरिवारे🙏 भवतां सर्वेषां स्वगतम् 🙏

Multi-Site Label Widget

संस्कृत-ज्ञानस्य अनुक्रमणिका

Click here to explore labels from all associated sites.

संस्कृत-ज्ञानस्य अनुक्रमणिका

×

Loading labels from all sites…

पुरुरवा-उर्वशी संवाद सूक्त (ऋग्वेद १०.९५): एक विस्तृत विश्लेषण और व्याख्या

पुरुरवा-उर्वशी संवाद

पुरुरवा-उर्वशी संवाद सूक्त (ऋग्वेद १०.९५): एक विस्तृत विश्लेषण और व्याख्या

प्रस्तावना: सूक्त का स्वरूप और महत्त्व

भारतीय वाङ्मय का प्राचीनतम स्रोत ऋग्वेद है। ऋग्वेद के दसवें मण्डल का ९५वाँ सूक्त 'पुरुरवा-उर्वशी संवाद' के नाम से विख्यात है। यह केवल एक काव्य नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, विरह की पराकाष्ठा और दैवीय-मानवीय संबंधों के जटिल ताने-बाने का अद्भुत चित्रण है।

जैसा कि कहा गया है:

“सम्पूर्ण ऋषिवाक्यं तु सूक्तमित्यभिधीयते”

अर्थात् ऋषियों द्वारा कहे गए संपूर्ण अर्थपूर्ण वाक्यों के समूह को 'सूक्त' कहा जाता है। पुरुरवा-उर्वशी संवाद सूक्त ऋग्वेद के 'संवाद सूक्तों' (Dialogue Hymns) की श्रेणी में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

सूक्त का तकनीकी परिचय (Technical Details)

विद्वानों और परीक्षार्थियों के लिए इस सूक्त के विवरणात्मक तथ्य निम्नलिखित हैं:

  • वेद: ऋग्वेद

  • मण्डल: १० (दशम)

  • सूक्त संख्या: ९५

  • कुल मंत्र: १८

  • ऋषि: पुरुरवा ऐल और उर्वशी अप्सरा

  • देवता: उर्वशी और पुरुरवा (जो वक्ता है वह ऋषि, जो श्रोता है वह देवता)

  • छन्द: त्रिष्टुप (Trishtup) - इसमें ११-११ अक्षरों के चार पाद होते हैं।

  • स्वर: धैवत

कथानक की पृष्ठभूमि (Mythological Background)

पुरुरवा एक मर्त्य (मनुष्य) राजा हैं और उर्वशी एक स्वर्ग की अप्सरा। इनकी प्रेम कथा केवल ऋग्वेद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार शतपथ ब्राह्मण (11.5.1), विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण, महाभारत और महाकवि कालिदास के विश्वप्रसिद्ध नाटक 'विक्रमोर्वशीयम्' में मिलता है।

कथा संक्षेप:
उर्वशी और पुरुरवा चार वर्षों तक साथ रहते हैं। उनके मिलन की कुछ शर्तें थीं (जैसे- पुरुरवा कभी नग्न अवस्था में उर्वशी को न दिखें, या भेड़ों की रक्षा आदि)। जब गंधर्वों के षड्यंत्र से वे शर्तें टूट जाती हैं, तो उर्वशी पुरुरवा को छोड़कर चली जाती है। पुत्र 'आयु' के जन्म के बाद, विरह से व्याकुल पुरुरवा उर्वशी को खोजते हुए कुरुक्षेत्र के 'अन्यतःलक्ष' सरोवर के तट पर पहुँचते हैं, जहाँ उर्वशी अपनी सखियों के साथ जलक्रीड़ा कर रही थी। यहीं से उनके मध्य वह संवाद शुरू होता है जो ऋग्वेद के १८ मंत्रों में संकलित है।

पुरुरवा-उर्वशी संवाद



पुरुरवा-उर्वशी संवाद: मंत्रशः व्याख्या (Mantras 1-18)

मंत्र १: पुरुरवा की करुण पुकार

हये जाये मनसा तिष्ठ घोरे वचांसि मिश्राकृण्वावहै नु।
न नौ मन्त्रा अनुदितास एते मयस्करन् परतरे चनाहन् ॥१॥

अर्थ:
पुरुरवा अपनी पत्नी उर्वशी को संबोधित करते हुए कहते हैं— "हे निष्ठुर (घोरे)! हे पत्नी! ठहर जाओ। अपने मन को स्थिर करो। आओ, हम परस्पर कुछ बात करें। यदि हमारे ये विचार और हृदय की बातें अनकही रह गईं, तो भविष्य में हमें कभी सुख प्राप्त नहीं होगा।"

विशेष टिप्पणी: यहाँ पुरुरवा की विरह-व्यथा और संवाद की आतुरता स्पष्ट झलकती है। 'घोरे' शब्द उर्वशी की कठोरता को दर्शाता है जो अपने प्रेमी को बिलखता छोड़कर चली गई।


मंत्र २: उर्वशी का कठोर उत्तर

किमेता वाचा कृणवातवाहं प्राक्रमिषमुषसामग्रियेव।
पुरुरवः पुनरस्तं परेहि दुरापना वातइवाहमस्मि ॥२॥

अर्थ:
उर्वशी उत्तर देती है— "हे पुरुरवा! इन बातों से अब क्या लाभ? मैं उषा की पहली किरण की तरह तुमसे दूर जा चुकी हूँ। तुम अपने घर लौट जाओ। मुझे पाना अब वैसा ही कठिन है जैसे बहती हुई वायु को पकड़ना।"

वैदिक सन्दर्भ: यहाँ उर्वशी स्वयं की तुलना 'वात' (वायु) से करती है, जो अप्सराओं की चंचलता और अनियंत्रित स्वभाव का प्रतीक है।


मंत्र ३: पुरुरवा की हताशा

इषुर्न श्रिय इषुधेरसना गोषाः शतसा न रंहिः।
अवीरे ऋतौ वि दविद्युतन्नोरा न मायुं चितयन्त धुनयः ॥३॥

अर्थ:
पुरुरवा कहते हैं— "तुम्हारे बिना मेरा जीवन व्यर्थ है। मैं इतना शक्तिहीन हो गया हूँ कि तरकश से बाण निकालने का उत्साह भी नहीं बचा। अब न तो विजय की कामना है, न गौओं को जीतने की इच्छा। मेरे सैनिक भी निरुत्साहित हैं। बिना तुम्हारे, मेरा तेज नष्ट हो गया है।"


मंत्र ४: घरेलू सुख की स्मृति

सा वसु दधती श्वसुराय वय उषो यदि वष्ट्यन्तिगृहात्।
अस्तं ननक्षे यस्मिञ्चाकन्दिवा नक्तं नथिता वैतसेन ॥४॥

अर्थ:
यहाँ पुरुरवा उनके साथ बिताए समय को याद करते हैं। उर्वशी अपने श्वसुर को भोजन कराती थी और अपने पति (पुरुरवा) के साथ प्रेमपूर्वक रहती थी। वह घर की लक्ष्मी के समान थी।


मंत्र ५: उर्वशी का प्रतिवाद

त्रिः स्म माहः श्रथयो वैतसनोत स्म मेऽव्यत्यै पृणासि।
पुरुरवोऽनु ते केतमायं राजा मे वीर तन्वस्तदासीः ॥५॥

अर्थ:
उर्वशी कहती है— "हे पुरुरवा! तुम दिन में तीन बार मेरे समीप आते थे। तुमने मुझे हर प्रकार से संतुष्ट किया। मैंने भी तुम्हारे शासन और तुम्हारी इच्छा का पालन किया। तुम मेरे शरीर के स्वामी थे।"


मंत्र ६: सखियों का वर्णन

या सुजूर्णिः श्रेणिः सुम्नआपिह्रदेचक्षुर्न ग्रन्थिनी चरण्युः।
ता अञ्जयोऽरुणयो न सनुः श्रिये गावो न धेनवोऽनवन्त ॥६॥

व्याख्या:
यहाँ अन्य अप्सराओं (सुजूर्णि, श्रेणि, सुम्न आदि) का वर्णन है। उर्वशी बताती है कि कैसे वे अप्सराएँ गौओं के समान मधुर ध्वनि करती हुई विचरण करती थीं, लेकिन अब वे सब बदल गई हैं।


मंत्र ७: पुरुरवा का देवत्व और महत्त्व

समस्मिञ्जायमान आसत ना उतेमवर्धन्नद्यः स्वगूर्ताः।
महे यत्त्वा पुरुरवो रणायावर्धयन् दस्युहत्याय देवाः ॥७॥

अर्थ:
जब पुरुरवा का जन्म हुआ, तब देवस्त्रियाँ उपस्थित थीं। नदियों ने भी उनकी प्रशंसा की। देवताओं ने पुरुरवा को असुरों (दस्युओं) के विनाश और धर्म की रक्षा के लिए शक्ति प्रदान की थी।


मंत्र ८: अप्सराओं का पलायन

सचा यदासु जहतीष्वत्कममानुषीषु मानुषो निषेवे।
अप स्म मत्तरसन्ती न भुज्युस्ता अत्रसन्रथस्पृशो नाश्वाः ॥८॥

अर्थ:
जब पुरुरवा (एक मनुष्य) उन अप्सराओं के पास गए, तो वे भयभीत होकर ऐसे भाग गईं जैसे रथ से जुते हुए घोड़े या वन की डरी हुई हिरनी भागती है।


मंत्र ९: अलौकिक सौंदर्य और चंचलता

यदासु मर्तो अमृतासु निस्पृक्सं क्षोणीभिः क्रतुभिर्न पृङ्क्ते।
ता आतयो न तन्वः शुम्भत स्वा अश्वासो न क्रीडयो दन्दशानाः ॥९॥

अर्थ:
मर्त्य मनुष्य जब अमर अप्सराओं के साथ क्रीड़ा करना चाहता है, तो वे उसे तृप्त नहीं करतीं। वे पक्षियों (आतयो) की तरह अपने शरीर को चमकाती हैं और चंचल घोड़ों की तरह निकल जाती हैं।


मंत्र १०: पुत्र और दीर्घायु की कामना

विद्युन्न या पतन्ती दविद्योद्भरन्ती मे अप्या काम्यानि।
जनिष्टो अपो नर्यः सुजातः प्रोर्वशी तिरत दीर्घमायुः ॥१०॥

अर्थ:
पुरुरवा कहते हैं कि उर्वशी बिजली के समान चमकने वाली है। उसने मेरी इच्छाओं को पूर्ण किया। अब जो हमारा पुत्र (आयु) उत्पन्न हुआ है, वह दीर्घायु हो।


मंत्र ११: कर्तव्य का बोध

जज्ञिष इत्था गोपीथ्याय हि दधाथ तत्पुरुरवो म ओजः।
अशासं त्वा विदुषी सस्मिन्नहन्न म आशृणोः किमभुग्वदासि ॥११॥

अर्थ:
उर्वशी कहती है— "हे पुरुरवा! तुमने पृथ्वी की रक्षा के लिए पुत्र को जन्म दिया है। मैंने तुम्हें पहले ही सचेत किया था कि मैं स्थायी रूप से नहीं रुकूँगी। तुम व्यर्थ विलाप क्यों कर रहे हो? अपने राजधर्म का पालन करो।"


मंत्र १२: पिता-पुत्र संबंध

कदा सूनुः पितरं जात इच्छाच्चकन्नाश्रु वर्तयद्विजानन्।
को दम्पती समनसा वि यूयोदध यदग्निः श्वशुरेषु दीदयत ॥१२॥

अर्थ:
पुरुरवा दुखी होकर पूछते हैं— "पुत्र अपने पिता को कब खोजेगा? जब वह जानेगा कि उसकी माता चली गई है, तो वह रोएगा। कौन सा धर्मनिष्ठ व्यक्ति सुखी दंपत्ति को अलग करता है?"


मंत्र १३: उर्वशी का सांत्वना संदेश

प्रति ब्रवाणि वर्तयते अश्रु चक्रन्न क्रन्ददाध्वे शिवायै।
प्र तत्ते हिनवा यत्ते अस्मे परेह्यास्तं नहि मूर मापः ॥१३॥

अर्थ:
उर्वशी आश्वासन देती है— "पुत्र नहीं रोएगा। मैं उसके कल्याण का ध्यान रखूँगी। मैं उसे तुम्हारे पास भेज दूँगी। अब तुम घर लौट जाओ, क्योंकि तुम मुझे पा नहीं सकते।"


मंत्र १४: पुरुरवा का आत्मघाती विचार

सुदेवो अद्य प्रपतेदनावृत्परावतं परमां गन्तवा उ।
अधा शयीत निरृतेरुपस्थेऽधैनं वृका रभसासो अद्युः ॥१४॥

अर्थ:
हताश पुरुरवा कहते हैं— "यदि तुम नहीं लौटीं, तो तुम्हारा यह प्रेमी (सुदेव) आज गिरकर मर जाएगा। मैं मृत्यु को प्राप्त होऊँगा और मेरा शरीर भेड़ियों (वृक) का भोजन बनेगा।"


मंत्र १५: स्त्रियों के स्वभाव पर प्रसिद्ध उक्ति

पुरुरवो मा मृथा मा प्र पप्तो मा त्वा वृकासो अशिवास उ क्षन्।
नवै स्त्रैणानि सख्यानि सन्ति सालावृकाणां हृदयान्येता ॥१५॥

अर्थ:
उर्वशी अत्यंत कठोर सत्य कहती है— "हे पुरुरवा! मरो मत। गिरो मत। भेड़िये तुम्हें न खाएं। स्त्रियों के साथ मित्रता कभी स्थायी नहीं होती। स्त्रियों के हृदय भेड़ियों (सालावृक) के हृदय के समान होते हैं।"

दार्शनिक पक्ष: यहाँ उर्वशी पुरुरवा को वैराग्य की ओर ले जाने का प्रयास कर रही है। वह चाहती है कि पुरुरवा मोह त्याग दें।


मंत्र १६: मानुषी रूप में उर्वशी

यद्विरूपाचरं मर्त्येष्ववसं रात्रीः शरदश्चतस्रः।
घृतस्य स्तोकं सकृदहन् आश्नं तादेवेदं तातृपाणा चरामि ॥१६॥

अर्थ:
उर्वशी बताती है कि उसने चार वर्षों तक मनुष्यों के बीच निवास किया। वह दिन में केवल एक बार थोड़ा सा घी ग्रहण करती थी और उसी से संतुष्ट रहती थी।


मंत्र १७: अंतिम अनुनय

अन्तरिक्षप्रां रजसो विमानीमुप शिक्षाम्युर्वशीं वसिष्ठः।
उप त्वा रातिः सुकृतस्य तिष्ठान्त्रि वर्तस्व हृदयं तप्यते मे ॥१७॥

अर्थ:
पुरुरवा अंतिम बार प्रार्थना करते हैं— "उर्वशी अंतरिक्ष को पूर्ण करने वाली है। मेरा हृदय जल रहा है। हे सुन्दरी! लौट आओ।"


मंत्र १८: अमरत्व का वरदान (उपसंहार)

इति त्वा देवा इम आहुरैळ यथेमेतद्भवसि मृत्युबन्धुः।
प्रजा ते देवान् हविषा यजाति स्वर्ग उत्वमपि मादयासे ॥१८॥

अर्थ:
उर्वशी अंतिम संदेश देती है— "हे पुरुरवा! देवता तुम्हें यह वरदान देते हैं कि तुम मृत्यु पर विजय प्राप्त करोगे। तुम्हारी संतान हवि द्वारा देवताओं का पूजन करेगी और अंततः तुम भी स्वर्ग में आनंद प्राप्त करोगे।"


बृहद्देवता का सन्दर्भ (श्लोक १४७-१५२)

जैसा कि आपने उल्लेख किया, ऋग्वेद के मूल संवाद में कुछ कथा सूत्र कम हो सकते हैं, जिन्हें शौनक कृत 'बृहद्देवता' पूर्ण करता है। बृहद्देवता के ७/१४७-१५२ श्लोकों में इस संवाद की पृष्ठभूमि और शाप के प्रभाव का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह इस कथा को एक तार्किक निरंतरता प्रदान करता है।

दार्शनिक और साहित्यिक महत्व

  1. प्रकृति और पुरुष का संबंध: पुरुरवा 'मर्त्य' (मिट्टी/शरीर) का प्रतीक है और उर्वशी 'अप्सरा' (जल/प्रकृति/दिव्यता) का। इन दोनों का मिलन क्षणभंगुर है, जो जीवन की नश्वरता को दर्शाता है।

  2. कालिदास का 'विक्रमोर्वशीयम्': ऋग्वेद की इस सूखी और कुछ हद तक कठोर कथा को कालिदास ने अपनी लेखनी से अत्यंत सरस और सुखांत बनाया। उन्होंने 'पुरुरवा' को एक उदात्त नायक और 'उर्वशी' को एक समर्पित प्रेमिका के रूप में चित्रित किया।

  3. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: मंत्र १५ में 'स्त्रैणानि सख्यानि' वाली उक्ति स्त्री-पुरुष मनोविज्ञान के एक विशेष पहलू को उजागर करती है, जहाँ उर्वशी स्वयं को मोहपाश से मुक्त करने के लिए निष्ठुर शब्दों का प्रयोग करती है।

UGC-NET संस्कृत (कोड २५) के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  • सूक्त क्रम: १०.९५

  • प्रयुक्त छंद: त्रिष्टुप

  • कुल मंत्र संख्या: १८

  • संवाद के पात्र: पुरुरवा (पुत्र-ऐल) और उर्वशी।

  • पुत्र का नाम: आयु।

  • निवास अवधि: ४ वर्ष।

  • भोजन: दिन में एक बार घृत का अल्प सेवन (उर्वशी द्वारा)।

निष्कर्ष

पुरुरवा-उर्वशी संवाद सूक्त केवल एक प्राचीन कथा नहीं है, बल्कि यह मानव हृदय के द्वंद्व, प्रेम, विरह, कर्तव्य और मोक्ष की यात्रा का प्रतिबिंब है। यह हमें सिखाता है कि सांसारिक संबंध चाहे कितने भी प्रगाढ़ क्यों न हों, अंततः जीव को अपने वास्तविक स्वरूप और ऊर्ध्वलोक की ओर बढ़ना ही होता है।


आशा है यह विस्तृत लेख आपकी शैक्षणिक और आध्यात्मिक जिज्ञासा को शांत करेगा। यदि आप संस्कृत साहित्य के अन्य सूक्तों पर भी जानकारी चाहते हैं, तो टिप्पणी (Comment) करें।


Keywords: पुरुरवा उर्वशी संवाद, Rigveda 10.95, Pururava Urvashi Samvad, Vedic Literature, UGC NET Sanskrit Code 25, Sanskrit Mantras, Vedic Sukta, Kalidasa Vikramorvashiyam.

UGC - net सम्पुर्ण संस्कृत सामग्री कोड - २५ पुरा सिलेबस

वैदिक-साहित्य भाग - १

वैदिक साहित्य का सामान्य परिचय - 

सहिता साहित्य

संवाद सूक्त :

ब्राह्मण साहित्य

मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

एक टिप्पणी भेजें

आपके महत्वपूर्ण सुझाव के लिए धन्यवाद |
(SHERE करे )