पुरुरवा-उर्वशी संवाद सूक्त (ऋग्वेद १०.९५): एक विस्तृत विश्लेषण और व्याख्या
प्रस्तावना: सूक्त का स्वरूप और महत्त्व
“सम्पूर्ण ऋषिवाक्यं तु सूक्तमित्यभिधीयते”
सूक्त का तकनीकी परिचय (Technical Details)
वेद: ऋग्वेद मण्डल: १० (दशम) सूक्त संख्या: ९५ कुल मंत्र: १८ ऋषि: पुरुरवा ऐल और उर्वशी अप्सरा देवता: उर्वशी और पुरुरवा (जो वक्ता है वह ऋषि, जो श्रोता है वह देवता) छन्द: त्रिष्टुप (Trishtup) - इसमें ११-११ अक्षरों के चार पाद होते हैं। स्वर: धैवत
कथानक की पृष्ठभूमि (Mythological Background)
पुरुरवा-उर्वशी संवाद: मंत्रशः व्याख्या (Mantras 1-18)
मंत्र १: पुरुरवा की करुण पुकार
हये जाये मनसा तिष्ठ घोरे वचांसि मिश्राकृण्वावहै नु। न नौ मन्त्रा अनुदितास एते मयस्करन् परतरे चनाहन् ॥१॥
मंत्र २: उर्वशी का कठोर उत्तर
किमेता वाचा कृणवातवाहं प्राक्रमिषमुषसामग्रियेव। पुरुरवः पुनरस्तं परेहि दुरापना वातइवाहमस्मि ॥२॥
मंत्र ३: पुरुरवा की हताशा
इषुर्न श्रिय इषुधेरसना गोषाः शतसा न रंहिः। अवीरे ऋतौ वि दविद्युतन्नोरा न मायुं चितयन्त धुनयः ॥३॥
मंत्र ४: घरेलू सुख की स्मृति
सा वसु दधती श्वसुराय वय उषो यदि वष्ट्यन्तिगृहात्। अस्तं ननक्षे यस्मिञ्चाकन्दिवा नक्तं नथिता वैतसेन ॥४॥
मंत्र ५: उर्वशी का प्रतिवाद
त्रिः स्म माहः श्रथयो वैतसनोत स्म मेऽव्यत्यै पृणासि। पुरुरवोऽनु ते केतमायं राजा मे वीर तन्वस्तदासीः ॥५॥
मंत्र ६: सखियों का वर्णन
या सुजूर्णिः श्रेणिः सुम्नआपिह्रदेचक्षुर्न ग्रन्थिनी चरण्युः। ता अञ्जयोऽरुणयो न सनुः श्रिये गावो न धेनवोऽनवन्त ॥६॥
मंत्र ७: पुरुरवा का देवत्व और महत्त्व
समस्मिञ्जायमान आसत ना उतेमवर्धन्नद्यः स्वगूर्ताः। महे यत्त्वा पुरुरवो रणायावर्धयन् दस्युहत्याय देवाः ॥७॥
मंत्र ८: अप्सराओं का पलायन
सचा यदासु जहतीष्वत्कममानुषीषु मानुषो निषेवे। अप स्म मत्तरसन्ती न भुज्युस्ता अत्रसन्रथस्पृशो नाश्वाः ॥८॥
मंत्र ९: अलौकिक सौंदर्य और चंचलता
यदासु मर्तो अमृतासु निस्पृक्सं क्षोणीभिः क्रतुभिर्न पृङ्क्ते। ता आतयो न तन्वः शुम्भत स्वा अश्वासो न क्रीडयो दन्दशानाः ॥९॥
मंत्र १०: पुत्र और दीर्घायु की कामना
विद्युन्न या पतन्ती दविद्योद्भरन्ती मे अप्या काम्यानि। जनिष्टो अपो नर्यः सुजातः प्रोर्वशी तिरत दीर्घमायुः ॥१०॥
मंत्र ११: कर्तव्य का बोध
जज्ञिष इत्था गोपीथ्याय हि दधाथ तत्पुरुरवो म ओजः। अशासं त्वा विदुषी सस्मिन्नहन्न म आशृणोः किमभुग्वदासि ॥११॥
मंत्र १२: पिता-पुत्र संबंध
कदा सूनुः पितरं जात इच्छाच्चकन्नाश्रु वर्तयद्विजानन्। को दम्पती समनसा वि यूयोदध यदग्निः श्वशुरेषु दीदयत ॥१२॥
मंत्र १३: उर्वशी का सांत्वना संदेश
प्रति ब्रवाणि वर्तयते अश्रु चक्रन्न क्रन्ददाध्वे शिवायै। प्र तत्ते हिनवा यत्ते अस्मे परेह्यास्तं नहि मूर मापः ॥१३॥
मंत्र १४: पुरुरवा का आत्मघाती विचार
सुदेवो अद्य प्रपतेदनावृत्परावतं परमां गन्तवा उ। अधा शयीत निरृतेरुपस्थेऽधैनं वृका रभसासो अद्युः ॥१४॥
मंत्र १५: स्त्रियों के स्वभाव पर प्रसिद्ध उक्ति
पुरुरवो मा मृथा मा प्र पप्तो मा त्वा वृकासो अशिवास उ क्षन्। नवै स्त्रैणानि सख्यानि सन्ति सालावृकाणां हृदयान्येता ॥१५॥
मंत्र १६: मानुषी रूप में उर्वशी
यद्विरूपाचरं मर्त्येष्ववसं रात्रीः शरदश्चतस्रः। घृतस्य स्तोकं सकृदहन् आश्नं तादेवेदं तातृपाणा चरामि ॥१६॥
मंत्र १७: अंतिम अनुनय
अन्तरिक्षप्रां रजसो विमानीमुप शिक्षाम्युर्वशीं वसिष्ठः। उप त्वा रातिः सुकृतस्य तिष्ठान्त्रि वर्तस्व हृदयं तप्यते मे ॥१७॥
मंत्र १८: अमरत्व का वरदान (उपसंहार)
इति त्वा देवा इम आहुरैळ यथेमेतद्भवसि मृत्युबन्धुः। प्रजा ते देवान् हविषा यजाति स्वर्ग उत्वमपि मादयासे ॥१८॥
बृहद्देवता का सन्दर्भ (श्लोक १४७-१५२)
दार्शनिक और साहित्यिक महत्व
प्रकृति और पुरुष का संबंध: पुरुरवा 'मर्त्य' (मिट्टी/शरीर) का प्रतीक है और उर्वशी 'अप्सरा' (जल/प्रकृति/दिव्यता) का। इन दोनों का मिलन क्षणभंगुर है, जो जीवन की नश्वरता को दर्शाता है। कालिदास का 'विक्रमोर्वशीयम्': ऋग्वेद की इस सूखी और कुछ हद तक कठोर कथा को कालिदास ने अपनी लेखनी से अत्यंत सरस और सुखांत बनाया। उन्होंने 'पुरुरवा' को एक उदात्त नायक और 'उर्वशी' को एक समर्पित प्रेमिका के रूप में चित्रित किया। मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: मंत्र १५ में 'स्त्रैणानि सख्यानि' वाली उक्ति स्त्री-पुरुष मनोविज्ञान के एक विशेष पहलू को उजागर करती है, जहाँ उर्वशी स्वयं को मोहपाश से मुक्त करने के लिए निष्ठुर शब्दों का प्रयोग करती है।
UGC-NET संस्कृत (कोड २५) के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
सूक्त क्रम: १०.९५ प्रयुक्त छंद: त्रिष्टुप कुल मंत्र संख्या: १८ संवाद के पात्र: पुरुरवा (पुत्र-ऐल) और उर्वशी। पुत्र का नाम: आयु। निवास अवधि: ४ वर्ष। भोजन: दिन में एक बार घृत का अल्प सेवन (उर्वशी द्वारा)।
निष्कर्ष
UGC - net सम्पुर्ण संस्कृत सामग्री कोड - २५ पुरा सिलेबस
वैदिक-साहित्य भाग - १
वैदिक साहित्य का सामान्य परिचय -
सहिता साहित्य
संवाद सूक्त :
ब्राह्मण साहित्य
