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यम-यमी संवाद: ऋग्वेद का एक अद्वितीय दार्शनिक और नैतिक विमर्श

यम-यमी संवाद

यम-यमी संवाद: ऋग्वेद का एक अद्वितीय दार्शनिक और नैतिक विमर्श (विस्तृत व्याख्या)

प्रस्तावना

वैदिक साहित्य विश्व के प्राचीनतम ज्ञान का भंडार है। ऋग्वेद, जो चारों वेदों में प्रथम है, न केवल धार्मिक ऋचाओं का संग्रह है, बल्कि यह तत्कालीन समाज, दर्शन, मनोविज्ञान और नैतिकता का जीवंत दस्तावेज भी है। ऋग्वेद के दशम मण्डल में संकलित 'संवाद सूक्तों' की अपनी एक विशिष्ट महत्ता है। इनमें से 'यम-यमी संवाद' (१०.१०) अपनी नाटकीयता, मनोवैज्ञानिक गहराई और सामाजिक नैतिकता के प्रतिपादन के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यह सूक्त भाई-बहन के पवित्र संबंध की मर्यादा को स्थापित करने वाला एक कालजयी संवाद है। इसमें यमी (बहन) की कामेच्छा और यम (भाई) के धर्मनिष्ठ आचरण के बीच का द्वंद्व चित्रित है।


सूक्त का विवरणात्मक परिचय (Technical Details)

किसी भी प्रतियोगी परीक्षा (जैसे UGC-NET) के लिए इन विवरणों को कंठस्थ करना अनिवार्य है:

  • वेद: ऋग्वेद

  • मण्डल: दशम (१०वाँ)

  • सूक्त संख्या: १०

  • कुल मंत्र: १४

  • ऋषि: यम वैवस्वत और यमी वैवस्वती (जो मंत्र बोल रहा है, वही उसका ऋषि है)

  • देवता: यम और यमी

  • छन्द: त्रिष्टुप् (वैदिक छन्दों में त्रिष्टुप् का प्रयोग गम्भीर विषयों के लिए किया जाता है)

  • स्वर: धैवत

  • मुख्य विषय: सगोत्र विवाह का निषेध और सामाजिक मर्यादा की स्थापना।


यम और यमी की उत्पत्ति का पौराणिक संदर्भ

संवाद को समझने से पहले पात्रों की पृष्ठभूमि जानना आवश्यक है। यम और यमी भगवान सूर्य (विवस्वान) और उनकी पत्नी सरण्यू (त्वष्टा की पुत्री) की संतानें हैं। ये जुड़वाँ (Twins) भाई-बहन हैं। भारतीय दर्शन में यम को मृत्यु का देवता और धर्मराज माना गया है, जो सत्य और न्याय के प्रतीक हैं।

यम-यमी संवाद


मंत्रों की विस्तृत व्याख्या और दार्शनिक विश्लेषण

यहाँ हम प्रत्येक मंत्र का संस्कृत पाठ, उसका अर्थ और उसकी विस्तृत व्याख्या करेंगे।

मंत्र - १

ओ चित् सखायं सख्या ववृत्यां तिरः पुरू विदर्णवं जगन्वान्।
पितुर्नपातमा दधीत वेधा अधि क्षमि प्रतरं दीध्यानः ॥१॥

शब्दार्थ:

  • ववृत्यां: प्राप्त करना चाहती हूँ।

  • विदर्णवं: विस्तृत समुद्र।

  • पितुर्नपातमा: पिता का श्रेष्ठ नाती।

विस्तृत व्याख्या:
यमी अपने भाई यम से एकांत में अपनी इच्छा प्रकट करती है। वह कहती है कि हम गर्भावस्था से ही साथ रहे हैं। वह यम को एक 'सखा' के रूप में संबोधित करती है और चाहती है कि इस निर्जन समुद्र के मध्य स्थित द्वीप पर वे एक-दूसरे के निकट आएं। यमी का तर्क है कि सृष्टि की निरंतरता के लिए यम को उसके गर्भ से संतान उत्पन्न करनी चाहिए, जो उनके पिता का वंश आगे बढ़ा सके। यहाँ यमी का स्वर 'प्रजनन' और 'वंश वृद्धि' पर आधारित है।

मंत्र - २

न ते सखा सख्यं वष्टयेतत् सलक्ष्मा यद्विपुरुषा भवाति।
महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परिख्यन् ॥२॥

शब्दार्थ:

  • सलक्ष्मा: समान लक्षणों वाली (सहोदरा)।

  • असुरस्य वीरा: महान् प्राणशक्ति वाले देवताओं के पुत्र (गुप्तचर)।

विस्तृत व्याख्या:
यम यमी के प्रस्ताव को तत्काल अस्वीकार कर देते हैं। यम यहाँ 'धर्म' का पक्ष रखते हैं। वे कहते हैं कि "तुम्हारा यह सखा (यम) ऐसा संबंध नहीं चाहता जहाँ बहन के साथ समागम हो।" यम तर्क देते हैं कि वे अकेले नहीं हैं। आकाश में स्थित महान प्रजापति के पुत्र (देवताओं के चर/गुप्तचर) सब कुछ देख रहे हैं। यम का यह उत्तर दर्शाता है कि कोई भी अनैतिक कार्य 'एकांत' में नहीं होता; ईश्वरीय शक्तियां सदैव साक्षी होती हैं।

मंत्र - ३

उशन्ति घा ते अमृतास एतदेकस्य चित् त्यजसं मर्त्यस्य।
नि ते मनो मनसि धाय्यस्मे जन्युः पतिस्तन्वमा विविश्याः ॥३॥

शब्दार्थ:

  • अमृतास: अमर देवता।

  • विविश्याः: प्रवेश करो/लिंगन करो।

विस्तृत व्याख्या:
यमी हार नहीं मानती। वह एक कुतर्क (Fallacy) देती है कि "देवता भी ऐसा करते हैं।" वह कहती है कि यद्यपि मनुष्यों के लिए यह वर्जित हो सकता है, परंतु देवताओं की इच्छा भी यही है कि मानव जाति की वृद्धि हो। वह यम से आग्रह करती है कि वह एक पति के समान उसके शरीर में प्रविष्ट हो। यहाँ यमी की कामुकता और व्याकुलता चरम पर है।

मंत्र - ४

न यत्पुरा चकृमा कद्ध नूनमृता वदन्तो अनृतं रपेम।
गन्धर्वो अप्स्वप्या च योषा सा नो नाभिः परमं जामि तन्नौ ॥४॥

शब्दार्थ:

  • ऋता वदन्तो: सत्य बोलने वाले।

  • अनृतं: झूठ/पाप।

  • जामि: सहोदर संबंध।

विस्तृत व्याख्या:
यम अपनी सत्यनिष्ठा पर बल देते हैं। वे कहते हैं, "हमने आज तक ऐसा कोई निंदित कार्य नहीं किया है। हम सत्य के मार्ग पर चलने वाले हैं, फिर आज इस असत्य (पाप) को कैसे स्वीकार कर लें?" वे अपने माता-पिता (गन्धर्व और जल की स्त्री) का स्मरण कराते हुए कहते हैं कि हमारा रक्त एक है, हमारी 'नाभि' एक है। अतः हमारे बीच काम-संबंध असंभव और अधार्मिक है।

मंत्र - ५

गर्भे नु नौ जनिता दम्पती कर्देवस्त्वष्टा सविता विश्वरूपः।
नकिरस्य प्र मिनन्ति व्रतानि वेद नावस्य पृथ्वी उत द्यौः ॥५॥

विस्तृत व्याख्या:
यमी अब भाग्य और विधाता का सहारा लेती है। वह कहती है कि "स्रष्टा त्वष्टा ने हमें माता के गर्भ में ही 'दम्पति' (पति-पत्नी) के रूप में बनाया था।" वह तर्क देती है कि उनका जन्म ही साथ-साथ इसीलिए हुआ है ताकि वे सृष्टि का विस्तार कर सकें। उसके अनुसार, उनके इस संबंध को पृथ्वी और आकाश भी जानते हैं और यह प्रकृति का नियम है।

मंत्र - ६

को अस्य वेद प्रथमस्याह्नः क ई ददर्श क इह प्रवोचत्।
बृहन्मित्रस्य वरुणस्य धाम कदु ब्रव आह्वो वीच्या नृन् ॥६॥

विस्तृत व्याख्या:
यमी यम की नैतिकता को चुनौती देती है। वह पूछती है, "उस प्रथम दिन की व्यवस्था को किसने देखा है? मित्र और वरुण के नियमों की दुहाई देने वाले यम, तुम वास्तव में क्या जानते हो?" वह यम के ज्ञान और उनके द्वारा माने जाने वाले नियमों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

मंत्र - ७

यमस्य मा यम्यं काम आगन्त्समाने योनौ सहशेय्याय।
जायेव पत्ये तन्वं रिरिच्यां वि चिहेव रथ्येव चक्रा ॥७॥

विस्तृत व्याख्या:
यमी अपनी काम-पीड़ा को स्पष्ट रूप से व्यक्त करती है। वह कहती है कि "यम के प्रति मेरी कामेच्छा तीव्र हो गई है।" वह उपमा (Metaphor) का प्रयोग करती है: "जैसे रथ के दो पहिये एक साथ चलते हैं, वैसे ही हम भी एक साथ रहें। जैसे पत्नी अपने पति के सामने देह का अनावरण करती है, वैसे ही मैं तुम्हारे सम्मुख हूँ।"

मंत्र - ८

न तिष्ठन्ति न नि मिषन्त्येते देवानां स्पश इह ये चरन्ति।
अन्येन मदाहनो याहि तूयं तेन वि वृह रथ्येव चक्रा ॥८॥

विस्तृत व्याख्या:
यम पुनः सचेत करते हैं कि देवताओं के गुप्तचर कभी सोते नहीं हैं, उनकी पलकें नहीं झपकतीं। वे यमी को 'मदाहनो' (दुखदायिनी/मदहोश) कहकर संबोधित करते हैं और उसे परामर्श देते हैं कि वह किसी अन्य पुरुष के पास जाए और उसके साथ जीवन का रथ चलाए।

मंत्र - ९

रात्रीभिरस्मा अहभिर्दशस्येत् सूर्यस्यचक्षुर्मुहुरुन्मिमीयात्।
दिवा पृथिव्या मिथुना सबन्धू यमीर्यमस्य बिभृयादजामि ॥९॥

विस्तृत व्याख्या:
यम स्पष्ट करते हैं कि दिन और रात, सूर्य का प्रकाश—ये सब मर्यादा के साक्षी हैं। वे यमी को निर्देश देते हैं कि वह यम के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष का वरण करे। यहाँ 'अजामि' शब्द महत्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है जो 'जामि' (सहोदर) न हो।

मंत्र - १०

आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृणवन्नजामि।
उप बर्वृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत् ॥१०॥

विस्तृत व्याख्या:
यम एक भविष्यवक्ता की भाँति कहते हैं कि "भविष्य में ऐसे युग (कलियुग का संकेत) आएंगे जहाँ भाई-बहन अपनी मर्यादा भूल जाएंगे।" परंतु वे वर्तमान में अपने धर्म पर अडिग हैं। वे यमी को सलाह देते हैं कि वह किसी 'वृषभ' (बलशाली पुरुष) को अपना पति चुने और उसे गले लगाए।

मंत्र - ११

किं भ्रातासद्यदनाथं भवाति किमु स्वसा यत्रिऋतिर्निगच्छात्।
काममूता वह्वेतद्रापामि तन्वा मे तन्वं सं पिपृग्धि ॥११॥

विस्तृत व्याख्या:
यमी अब भावुकता का सहारा लेती है (Emotional Blackmail)। वह कहती है, "वह भाई ही क्या जो अपनी बहन के कष्ट को दूर न कर सके? वह बहन ही क्या जिसे भाई अनाथ छोड़ दे?" वह स्वीकार करती है कि वह काम के वशीभूत होकर यह सब कह रही है और यम से अपनी प्यास बुझाने की प्रार्थना करती है।

मंत्र - १२

न वा उ ते तन्वा तन्वं सं पपृच्यां पापमाहुर्यः स्वसारं निगच्छात्।
अन्येन मत् प्रमुदः कल्पयस्व न ते भ्राता सुभगे वष्ट्येतत् ॥१२॥

विस्तृत व्याख्या:
यम का यह उत्तर अत्यंत महत्वपूर्ण है: "पापमाहुर्यः स्वसारं निगच्छात्" अर्थात् "जो अपनी बहन के साथ गमन करता है, उसे समाज पापी कहता है।" यम यहाँ व्यक्तिगत इच्छा से ऊपर सामाजिक और नैतिक विधान को रखते हैं। वे दृढ़ता से मना कर देते हैं।

मंत्र - १३

बतो बतासि यम नैव ते मनो हृदयं चाविदाम।
अन्या किल त्वां कक्ष्येव युक्तं परिष्वजाते लिबुजेव वृक्षम् ॥१३॥

विस्तृत व्याख्या:
तिरस्कृत होकर यमी क्रोध और उपालम्भ (ताने) पर उतर आती है। वह यम को 'दुर्बल' कहती है। वह कहती है कि तुम्हारा हृदय पत्थर का है। वह व्यंग्य करती है कि "कोई दूसरी स्त्री तुम्हें वैसे ही लपेट लेगी जैसे लता वृक्ष को लपेटती है, लेकिन तुम मेरे प्रेम को नहीं समझ सके।"

मंत्र - १४

अन्यमू षु त्वं यम्यन्य उ त्वां परिष्वजाते लिबुजेव वृक्षम्।
तस्य वा त्वं मन इच्छा स वा तवाऽधा कृणुष्व संविदं सुभद्राम् ॥१४॥

विस्तृत व्याख्या:
सूक्त का समापन यम के शांत और गरिमामय उत्तर से होता है। यम कहते हैं, "हाँ यमी, तुम भी किसी अन्य पुरुष का आलिंगन करो, जैसे लता वृक्ष को घेरती है। तुम उसका मन जीतो और वह तुम्हारा। उसी के साथ अपना सुखी जीवन बसाओ।" इसी में तुम्हारा मंगल (सुभद्राम्) है।


यम-यमी संवाद का दार्शनिक और सामाजिक महत्व

इस संवाद सूक्त के कई आयाम हैं जो इसे आज भी प्रासंगिक बनाते हैं:

  1. सगोत्र विवाह का निषेध: यह सूक्त स्पष्ट रूप से सगोत्र और सहोदर विवाह को 'अनैसर्गिक' और 'पाप' घोषित करता है। भारतीय समाज में आज भी भाई-बहन के संबंध की जो पवित्रता है, उसकी जड़ें इस सूक्त में देखी जा सकती हैं।

  2. धर्म बनाम काम: यमी 'काम' (Desire) का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि यम 'धर्म' (Ethics) का। अंततः धर्म की विजय होती है। यह संदेश देता है कि व्यक्तिगत इच्छाएं सामाजिक व्यवस्था और नैतिक मूल्यों से बड़ी नहीं हो सकतीं।

  3. ईश्वर की सर्वव्यापकता: यम का यह कहना कि "देवताओं के गुप्तचर सब देख रहे हैं", इस दार्शनिक सत्य को उजागर करता है कि मनुष्य कभी भी अकेला नहीं होता; उसके कर्मों का साक्षी ब्रह्मांड का कण-कण है।

  4. मनोवैज्ञानिक चित्रण: ऋग्वेद के ऋषियों ने यमी की व्याकुलता और यम की दृढ़ता का जो चित्रण किया है, वह आधुनिक मनोविज्ञान की दृष्टि से भी अद्भुत है। इसमें मानवीय भावनाओं के द्वंद्व को बहुत बारीकी से उकेरा गया है।


UGC-NET संस्कृत (कोड २५) हेतु महत्वपूर्ण स्मरणीय तथ्य

परीक्षा की दृष्टि से निम्नलिखित बिंदुओं को विशेष रूप से नोट करें:

  • सूक्त संख्या: १०.१० (ऋग्वेद)

  • ऋषि और देवता: यम और यमी।

  • छन्द: त्रिष्टुप् (११ अक्षरों वाले चार चरण)।

  • संवाद का सारांश: यमी का विवाह प्रस्ताव और यम का धर्मपूर्वक निषेध।

  • प्रमुख सूक्तियाँ (Quotes):

    • पापमाहुर्यः स्वसारं निगच्छात् (बहन के साथ गमन पाप है)।

    • न ते सखा सख्यं वष्टयेतत् (तुम्हारा सखा ऐसा संबंध नहीं चाहता)।

    • लिबुजेव वृक्षम् (लता जैसे वृक्ष को लपेटती है - यह उपमा दो बार आई है)।

  • पारिवारिक परिचय: विवस्वान् (पिता), सरण्यू (माता), त्वष्टा (नाना)।


तुलनात्मक अध्ययन: अन्य संवाद सूक्तों के साथ

ऋग्वेद में यम-यमी संवाद के अतिरिक्त अन्य कई प्रसिद्ध संवाद सूक्त हैं:

  1. पुरूरवा-उर्वशी संवाद (१०.९५): यहाँ प्रेम और विरह का चित्रण है।

  2. शर्मा-पणि संवाद (१०.१०८): यहाँ कूटनीति और कर्तव्य का चित्रण है।

  3. विश्वामित्र-नदी संवाद (३.३३): यहाँ ऋषि और प्रकृति के बीच का सामंजस्य है।

इन सभी में यम-यमी संवाद अपनी 'नैतिक कठोरता' (Moral Rigidity) के लिए जाना जाता है।


निष्कर्ष

यम-यमी संवाद मात्र एक पुरातन कथा नहीं है, बल्कि यह सभ्यता के विकास का एक मील का पत्थर है। यह उस संक्रमण काल को दर्शाता है जहाँ मानव जाति आदिम प्रवृत्तियों (Innate Instincts) को छोड़कर एक सुसंस्कृत सामाजिक ढांचे (Social Structure) की ओर बढ़ रही थी। यम का निर्णय ही आगे चलकर 'स्मृतियों' और 'धर्मशास्त्रों' का आधार बना।

यह सूक्त हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों और प्रबल प्रलोभनों के बीच भी अपने 'धर्म' और 'मर्यादा' पर अडिग रहना ही मनुष्य को 'देवत्व' की ओर ले जाता है।


लेखक का सुझाव: यदि आप UGC-NET की तैयारी कर रहे हैं, तो इन १४ मंत्रों के मुख्य शब्दों (Key Words) को एक डायरी में नोट करें और यम तथा यमी के तर्कों का अंतर स्पष्ट रूप से समझें। यह न केवल परीक्षा में सहायक होगा बल्कि वैदिक दर्शन की आपकी समझ को भी गहरा करेगा।


शुभमस्तु।

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वैदिक-साहित्य भाग - १

वैदिक साहित्य का सामान्य परिचय - 

सहिता साहित्य

संवाद सूक्त :

ब्राह्मण साहित्य

मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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