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संस्कृत-ज्ञानस्य अनुक्रमणिका

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शब्द ब्रह्म': भर्तृहरि के 'स्फोट' सिद्धांत और वाक्-दर्शन का गूढ़ रहस्य

भर्तृहरि के 'स्फोट' सिद्धांत और वाक्-दर्शन का गूढ़ रहस्य (वाक्यपदीयम् का सार)

परम सत्य 'शब्द ब्रह्म': भर्तृहरि के 'स्फोट' सिद्धांत और वाक्-दर्शन का गूढ़ रहस्य (वाक्यपदीयम् का संपूर्ण सार)

प्रस्तावना: शब्द ही परमसत्य क्यों है?

भारतीय दर्शन की विशाल अट्टालिका में 'शब्द' केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि सृष्टि का आधार माना गया है। जहाँ न्याय और वैशेषिक दर्शन भौतिक जगत के विश्लेषण में रमे रहे, वहीं वैयाकरणों (व्याकरण शास्त्रियों) ने भाषा के भीतर छिपे उस परम तत्व को खोज निकाला जिसे 'शब्द-ब्रह्म' कहा जाता है। इस विचारधारा के शिखर पुरुष हैं— आचार्य भर्तृहरि

उनका कालजयी ग्रंथ 'वाक्यपदीयम्' भारतीय दर्शन के इतिहास में एक ऐसा मील का पत्थर है, जो व्याकरण को केवल 'शब्द-शुद्धि' के साधन से ऊपर उठाकर 'मोक्ष' के द्वार तक ले जाता है। भर्तृहरि के अनुसार, यह समस्त ब्रह्मांड शब्द का ही विवर्त (आभास) है। जिस प्रकार स्वप्न में दिखने वाला संसार मन का विस्तार होता है, उसी प्रकार जाग्रत अवस्था में यह चराचर जगत 'शब्द-तत्व' का विस्तार है।

"वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥" – जिस प्रकार शिव और शक्ति अभिन्न हैं, उसी प्रकार शब्द और अर्थ अभिन्न हैं। इसी अद्वैत सत्ता को समझने की यात्रा का नाम 'वाक्यपदीयम्' है।


१. अनादि-निधन ‘शब्दतत्व’ ब्रह्म का स्वरूप और शक्तियाँ

आचार्य भर्तृहरि ने अपने ग्रंथ के मंगलाचरण में ही शब्द के विराट स्वरूप की व्याख्या कर दी है।

क. शब्द-ब्रह्म की परिभाषा

श्लोक:

अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् ।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥ (वा.प. १.१)

व्याख्या:
वह ब्रह्म 'अनादि' (जिसका कोई आदि न हो) और 'अनिधन' (जिसका कोई अंत न हो) है। वह 'अक्षर' है, जिसका कभी क्षरण नहीं होता। यही शब्दतत्व है। इस श्लोक में 'विवर्त' शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। विवर्त का अर्थ है— 'किसी वस्तु का स्वरूप बदले बिना ही दूसरे रूप में प्रतीत होना' (जैसे रस्सी में सांप का आभास होना)। शब्द-ब्रह्म अपने वास्तविक स्वरूप को छोड़े बिना ही इस संसार के विविध अर्थों और पदार्थों के रूप में प्रकट होता है।

उदाहरण:
जैसे स्वर्ण एक ही है, लेकिन वह कुंडल, कंगन और हार के रूप में दिखाई देता है। स्वर्ण का मूल तत्व नहीं बदलता, केवल उसका आकार बदलता है। वैसे ही शब्द-ब्रह्म एक ही है, लेकिन वह पर्वत, नदी, मनुष्य और भावनाओं के रूप में 'अर्थ' बनकर प्रकट होता है।

ख. शब्द ब्रह्म की निमित्ततः कर्तृशक्ति: कालशक्ति

भर्तृहरि के अनुसार, इस जगत का संचालन ब्रह्म की 'शक्तियों' द्वारा होता है। इनमें 'कालशक्ति' (Time Power) सबसे प्रमुख है।

कालशक्ति का कार्य:
ब्रह्म एक है, लेकिन कालशक्ति उसे 'क्रम' (Sequence) में विभाजित कर देती है। यदि कालशक्ति न हो, तो संसार की सभी घटनाएँ एक साथ घटित हो जाएँगी। काल ही वह तत्व है जो किसी वस्तु के जन्म, उसकी वृद्धि और उसके विनाश को क्रमबद्ध करता है।

काल की दो मुख्य विधाएँ:

  1. अभ्यनुज्ञा (Permission): यह शक्ति किसी कार्य को घटित होने की अनुमति देती है।

  2. अप्रतिबन्ध (Non-obstruction): यह शक्ति कार्य के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करती है।

छह भाव-विकार:
कालशक्ति के कारण ही किसी भी पदार्थ में ये छह परिवर्तन आते हैं:

  1. जायते (उत्पन्न होना)

  2. अस्ति (विद्यमान रहना)

  3. वर्धते (बढ़ना)

  4. विपरिणमते (परिवर्तित होना)

  5. अपक्षीयते (क्षय होना)

  6. नश्यति (नष्ट होना)


२. स्फोट दर्शन: शब्द का नित्य और अखण्ड रूप

व्याकरण दर्शन में 'स्फोट' का सिद्धांत सबसे क्रांतिकारी विचार है। साधारण लोग समझते हैं कि हमारे द्वारा बोले गए वर्ण (क, ख, ग...) ही शब्द हैं, लेकिन भर्तृहरि कहते हैं कि ये तो केवल 'ध्वनियाँ' हैं। वास्तविक शब्द तो 'स्फोट' है।

स्फोट और ध्वनि का अंतर

भर्तृहरि शब्द के दो रूपों की चर्चा करते हैं:

  1. स्फोट (निमित्त): यह बुद्धि में स्थित होता है। यह अखंड (Indivisible) और नित्य है। यह अर्थ का बोध कराने वाला वास्तविक तत्व है।

  2. ध्वनि (अर्थभावन): यह कानों से सुनाई देने वाला भौतिक कंपन है। ध्वनि अनित्य है और स्फोट को अभिव्यक्त करने का माध्यम है।

उदाहरण:
जब आप 'कमल' शब्द सुनते हैं, तो 'क', 'म' और 'ल' की ध्वनियाँ क्रम से आती हैं। लेकिन अर्थ का बोध तब होता है जब ये तीनों ध्वनियाँ मिलकर बुद्धि में एक अखंड 'कमल' का चित्र (स्फोट) जाग्रत करती हैं। ध्वनि दीये के प्रकाश की तरह है जो अंधेरे में रखी वस्तु (स्फोट) को दिखा देती है।

क. स्फोट के आठ भेद (वर्गीकरण)

भर्तृहरि ने सूक्ष्म विवेचन करते हुए स्फोट के आठ भेदों का वर्णन किया है:

  1. वर्णस्फोट: जब एक अक्षर से अर्थ का आभास हो।

  2. पदस्फोट: जब एक पूर्ण शब्द (जैसे 'राम') अर्थ दे।

  3. वाक्यस्फोट: जब पूरा वाक्य एक अखंड अर्थ प्रकट करे।

  4. अखण्ड पद स्फोट: पद को वर्णों में न बांटकर एक इकाई मानना।

  5. वर्णजातिस्फोट: वर्ण की जाति के आधार पर बोध।

  6. पदजातिस्फोट: पद की जाति (जैसे सभी 'वृक्ष' शब्दों का सामान्य अर्थ)।

  7. वाक्यजातिस्फोट: वाक्यों की सामान्य संरचना से बोध।

  8. अखण्ड वाक्यस्फोट: भर्तृहरि का मुख्य सिद्धांत। वे मानते हैं कि वास्तव में 'वाक्य' ही अखंड इकाई है, पद और वर्ण तो केवल समझने के लिए किए गए कल्पित विभाग हैं।


३. वाणी के तीन पद: पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी

भर्तृहरि ने वाक् (Speech) की गहराई को मापने के लिए इसे तीन स्तरों में विभाजित किया है। बाद के तंत्र ग्रंथों में 'परा' वाक् को भी जोड़ा गया, परंतु वाक्यपदीयम् में तीन मुख्य स्तरों की चर्चा प्रमुख है।

वाक् पदस्वरूपविशेषताप्रधानता/स्थान
पश्यन्तीपरम ज्योति, निर्विकल्प।इसमें शब्द और अर्थ के बीच कोई भेद नहीं रहता। यह चेतना का शुद्ध स्वरूप है।हृदय/चेतना
मध्यमामानसिक विचार।यहाँ शब्द क्रमबद्ध होने लगते हैं लेकिन अभी बोले नहीं गए। यह केवल मन के भीतर गूंजती है।बुद्धि/मन
वैखरीभौतिक ध्वनि।जो हम कानों से सुनते हैं। इसमें कंठ, तालु और जिह्वा का प्रयोग होता है।कंठ/मुख

उदाहरण से समझें:
मान लीजिए एक चित्रकार के मन में एक सुंदर चित्र का भाव आता है। वह भाव, जहाँ अभी रंग और रेखाएँ नहीं हैं, केवल एक 'अनुभूति' है— वह पश्यन्ती है। जब वह चित्रकार मानसिक रूप से योजना बनाता है कि कहाँ कौन सा रंग भरना है— वह मध्यमा है। अंत में जब वह चित्र कैनवास पर उतरता है और दुनिया उसे देखती है— वह वैखरी है।


४. शब्दार्थ सम्बन्ध और व्याकरण-शास्त्र का प्रयोजन

शब्द और उसके अर्थ के बीच क्या संबंध है? क्या यह मानव निर्मित है या ईश्वर प्रदत्त? भर्तृहरि कहते हैं कि यह संबंध 'नित्य' (शाश्वत) है।

क. नित्य शब्दार्थ सम्बन्ध

"सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे"— भगवान पतंजलि के इस महाभाष्य वचन को भर्तृहरि ने विस्तार दिया। उनके अनुसार, अग्नि शब्द और 'जलाने वाली शक्ति' के बीच संबंध नित्य है।

ख. साधु और असाधु शब्द (संस्कार और अपभ्रंश)

भर्तृहरि के अनुसार, भाषा में दो प्रकार के शब्द होते हैं:

  1. साधु शब्द: वे शब्द जो व्याकरण के नियमों द्वारा सिद्ध हैं (जैसे 'गौः')। इनका प्रयोग 'धर्म' और 'पुण्य' उत्पन्न करता है।

  2. असाधु (अपभ्रंश): वे शब्द जो उच्चारण दोष या अज्ञानता के कारण बिगड़ गए हैं (जैसे 'गौ' की जगह 'गावी' या 'गौणी' बोलना)।

भर्तृहरि का मानना है कि अपभ्रंश शब्द स्वयं अर्थ नहीं बताते, बल्कि वे सुनने वाले के मन में मूल 'साधु शब्द' की याद दिलाते हैं, और फिर वह साधु शब्द अर्थ का बोध कराता है।


५. ज्ञान के साधन: वाक्यपदीयानुसार प्रमाण स्वरूप

भर्तृहरि केवल व्याकरण के विद्वान नहीं थे, वे एक महान तर्कशास्त्री भी थे। उन्होंने ज्ञान प्राप्ति के पाँच साधनों को मान्यता दी:

  1. आगम (शब्द): सबसे श्रेष्ठ प्रमाण। वे ऋषियों के वचनों और वेदों को सर्वोच्च मानते हैं क्योंकि तर्क (Logic) की सीमाएँ हैं।

  2. अनुमान: तर्क पर आधारित ज्ञान। लेकिन भर्तृहरि चेतावनी देते हैं कि केवल तर्क से सत्य तक नहीं पहुँचा जा सकता।

  3. अदृष्ट: वह शक्ति जो प्रत्यक्ष नहीं है पर फल देती है।

  4. अभ्यास: बार-बार के प्रयास से प्राप्त सूक्ष्म ज्ञान (जैसे जौहरी को हीरे की पहचान अभ्यास से होती है)।

  5. प्रत्यक्ष: इंद्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान।

तर्क की सीमा पर भर्तृहरि का प्रसिद्ध श्लोक:

यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः ।
अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोपपाद्यते ॥ (वा.प. १.३४)

व्याख्या: एक चतुर व्यक्ति तर्क से जो बात सिद्ध करता है, उससे भी अधिक चतुर व्यक्ति अपने तर्क से उसे गलत सिद्ध कर सकता है। इसलिए परम सत्य के लिए केवल तर्क (Reasoning) पर निर्भर रहना खतरनाक है; वहाँ आगम (Shruti/Tradition) ही सहारा है।


६. मोक्ष का द्वार: व्याकरण शास्त्र का परम प्रयोजन

भर्तृहरि के दर्शन का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि वे व्याकरण को 'मुक्ति का मार्ग' मानते हैं।

श्लोक:

तद् द्वारमपवर्गस्य वाङ्मलानां चिकित्सितम् ।
पवित्रं सर्वविद्यानां अधिविद्यं प्रकाशते ॥ (वा.प. १.१४)

व्याख्या:
व्याकरण केवल भाषा शुद्धि नहीं है, बल्कि यह 'अपवर्ग' (मोक्ष) का द्वार है। यह वाणी के मलों (दोषों) की चिकित्सा है। जैसे योग चित्त की अशुद्धि को दूर करता है, वैसे ही व्याकरण वाणी की अशुद्धि को दूर कर साधक को 'शब्द-ब्रह्म' के साक्षात्कार के योग्य बनाता है।

शब्द-साधना (वाग्योग)

जब कोई साधक शब्दों के शुद्ध स्वरूप (साधु शब्दों) का निरंतर प्रयोग करता है, तो उसकी बुद्धि 'वैखरी' से 'मध्यमा' और फिर 'पश्यन्ती' की ओर मुड़ती है। अंत में, वह उस अखंड 'शब्द-ब्रह्म' में लीन हो जाता है। यही व्याकरण का चरम लक्ष्य है।


७. वाक्यपदीयम्: तीनों काण्डों का विस्तृत विश्लेषण

आचार्य भर्तृहरि का यह ग्रंथ तीन प्रमुख भागों में विभाजित है, जिसे 'त्रिकाण्डी' भी कहा जाता है।

१. ब्रह्मकाण्ड (आगम काण्ड)

इसमें शब्द के दार्शनिक स्वरूप की चर्चा है। यहाँ शब्द को ब्रह्म का रूप मानकर सृष्टि प्रक्रिया की व्याख्या की गई है। इसमें कुल 157 कारिकाएँ (श्लोक) हैं। इसी काण्ड में स्फोट और शब्द-शक्ति का मुख्य विवेचन है।

२. वाक्यकाण्ड

इसमें 493 कारिकाएँ हैं। इसका मुख्य विषय है— 'वाक्य' की श्रेष्ठता। क्या पद (Words) स्वतंत्र होते हैं? भर्तृहरि कहते हैं— नहीं। जैसे किसी चित्र में विभिन्न रंग अलग-अलग नहीं होते, बल्कि वे मिलकर एक चित्र बनाते हैं, वैसे ही वाक्य के भीतर पद स्वतंत्र नहीं होते। वे केवल अर्थ की पूर्णता के लिए एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।

प्रतिभा की संकल्पना:
वाक्यकाण्ड में भर्तृहरि 'प्रतिभा' (Intuition) का सिद्धांत देते हैं। जब हम कोई वाक्य सुनते हैं, तो हमें अचानक एक बोध होता है। इसे ही 'प्रतिभा' कहते हैं। यह ज्ञान का वह प्रकार है जो तर्क से नहीं, बल्कि आंतरिक स्फुरण से आता है।

३. पदकाण्ड (प्रकीर्णकाण्ड)

यह सबसे बड़ा भाग है जिसमें 450 से अधिक कारिकाएँ हैं। इसे 14 समुद्देशों (अध्यायों) में बांटा गया है। इसमें जाति, द्रव्य, काल, पुरुष, संख्या आदि व्याकरणिक कोटियों का दार्शनिक विश्लेषण है।


८. दैनिक जीवन में शब्द-ब्रह्म के उदाहरण

  1. मंत्रों की शक्ति: जब हम 'ॐ' का उच्चारण करते हैं, तो वह केवल एक ध्वनि नहीं है। वह वैखरी से शुरू होकर पश्यन्ती (मौन) तक ले जाने वाली एक यात्रा है। यही शब्द-ब्रह्म का प्रायोगिक रूप है।

  2. साहित्यिक आनंद: एक कविता को पढ़कर जो 'रस' मिलता है, वह स्फोट का ही एक रूप है। शब्द अलग-अलग होते हैं, लेकिन उनका संयुक्त प्रभाव (Impact) अखंड होता है।

  3. मौन की महत्ता: पश्यन्ती वाक् मौन के सबसे करीब है। जितना गहरा मौन होगा, शब्द-ब्रह्म की अनुभूति उतनी ही प्रबल होगी।


॥ प्रथम काण्डम् - ब्रह्मकाण्डः (आगम काण्ड) ॥

प्रथम काण्ड, जिसे ब्रह्मकाण्ड या आगमकाण्ड भी कहते हैं, शब्द के दार्शनिक स्वरूप का विचार प्रस्तुत करता है। यहाँ भर्तृहरि ने शब्द को ही ब्रह्म (Śabda-Brahman) माना है, जिसकी प्राप्ति के लिए शब्द को प्रमुख साधन बताया गया है। मूलतः व्याकरण शास्त्र एक प्रकार से आगम शास्त्र है, जिसकी अभिव्यक्ति महेश्वर से मानी गई है। आगम के अनुसार शब्द के चार स्वरूप हैं: परा, पश्यंती, मध्यमा तथा वैखरी। इन चारों में परा ही ब्रह्म है।

१. शब्दब्रह्म का स्वरूप (The Nature of Śabda-Brahman)

भर्तृहरि वाक्यपदीयम् की प्रथम कारिका में ही शब्दतत्व को अनादि, अनंत तथा अक्षर ब्रह्म कहकर शब्द-दर्शन की आधारशिला रखते हैं:

अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् ।
विवर्तते ऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥ १.१ ॥

एकमेव यदाम्नातं भिन्न शक्तिव्यपाश्रयात् ।
अपृथक्त्वेऽपि शक्तिभ्यः पृथक्त्वेनेव वर्तते ॥ १.२ ॥

अध्याहितकलां यस्य कालशक्तिमुपाश्रिताः ।
जन्मादयो विकाराः षड्भावभेदस्य योनयः ॥ १.३ ॥

एकस्य सर्वबीजस्य यस्य चेयमनेकधा ।
भोक्तृभोक्तव्यरूपेण भोगरूपेण च स्थितिः ॥ १.४ ॥

विशद व्याख्या: जो अनादि (आदिरहित) और अनिधन (अनन्तरहित) है, जो अक्षर (अविनाशी) है, वही शब्दतत्त्व ब्रह्म है। उसी शब्द-ब्रह्म का अर्थभाव (meaningful existence) के रूप में विवर्तन (Transformation) होता है, जिससे सम्पूर्ण जगत् की प्रक्रिया (Creation and Functioning) सम्पन्न होती है। वह शब्दतत्त्व एक होकर भी भिन्न-भिन्न शक्तियों (शक्ति-भेदों) के आश्रय से अनेक रूप में प्रतीत होता है। अपनी शक्तियों से अपृथक् होते हुए भी, वह उनसे पृथक्-सा व्यवहार करता है। उस ब्रह्म में आरोपित काल-शक्ति (Time-power) का आश्रय लेकर ही 'जन्म, अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, नश्यति' (उत्पत्ति, सत्ता, वृद्धि, परिणाम, ह्रास, नाश) नामक भावभेद के छह विकार उत्पन्न होते हैं। वह एक शब्दब्रह्म ही सम्पूर्ण जगत् का बीज है, जिसकी स्थिति भोक्ता (चेतन), भोक्तव्य (जड़) और भोग (क्रिया) के रूप में अनेक प्रकार से होती है। इस प्रकार, भर्तृहरि ने शब्द को ही परमतत्त्व मानकर सम्पूर्ण सृष्टि का मूल कारण घोषित किया है।

२. वेद, व्याकरण और मुक्ति का मार्ग (Veda, Grammar, and the Path to Liberation)

ब्रह्म की प्राप्ति के उपाय के रूप में महर्षियों ने 'वेद' को कहा है, जो एक होते हुए भी अनेक मार्गों वाला है:

प्राप्त्युपायो ऽनुकारश्च तस्य वेदो महर्षिभिः ।
एकोऽप्यनेकवर्त्मेव समानातः पृथक्पृथक् ॥ १.५ ॥

भेदानां बहुमार्गत्वं कर्मण्येकत्र चाङ्गता ।
शब्दानां यतशक्तित्वं तस्य शाखासु दृश्यते ।। १.६ ॥

यह स्मरण रखना आवश्यक है कि जो शब्द या मंत्र जिस स्वर में जिस वेद-शाखा में पढ़ा गया है, वह उसी तरह उच्चारण करने पर ही अभीष्ट फल देने वाला होता है (१.६)।

भर्तृहरि व्याकरण को सभी विद्याओं में सर्वश्रेष्ठ बताते हुए उसे मुक्ति का द्वार घोषित करते हैं:

आसन्नं ब्रह्मणस्तस्य तपसां उत्तमं तपः ।
प्रथमं छन्दसां अङ्गं प्राहुर्व्याकरणं बुधाः ॥ १.११॥

तद्वारं अपवर्गस्य वाङ्गलानां चिकित्सितम् ।
पवित्रं सर्वविद्यानां अधिविद्यं प्रकासते ॥ १.१४ ॥

बुद्धिमानों ने व्याकरण को उस ब्रह्म के अत्यन्त समीप, तपस्याओं में उत्तम तपस्या, और वेदों का प्रथम अंग कहा है। यह (व्याकरण) अपवर्ग (मोक्ष) का द्वार है, वाणी के मल (दोष) का उपचार है, और सभी विद्याओं में पवित्र तथा सर्वोच्च विद्या के रूप में प्रकाशित होता है।

३. आगम और तर्क का द्वन्द्व (Āgama vs. Tarka/Logic)

भर्तृहरि ज्ञान प्राप्ति के लिए तर्क (Logic) की अपेक्षा आगम (Revelation/Tradition) की श्रेष्ठता स्थापित करते हैं। उनका मानना है कि आगम के बिना कर्तव्य और अकर्तव्य का निश्चय नहीं हो सकता। तर्क परिवर्तनशील है और यथार्थ ज्ञान नहीं दे सकता।

न चागमादृते धर्मस्तर्केण व्यवतिष्ठते ।
ऋषीणां अपि यज्ज्ञानं तदप्यागमपूर्वकम् ॥ १.३०॥

यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः ।
अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोपपाद्यते॥१.३४॥

हस्तस्पर्शादिवान्धेन विषमे पथि धावता ।
अनुमानप्रधानेन विनिपातो न दुर्लभः ॥ १.४१ ॥

आगम (वेद/शास्त्र) के बिना धर्म (कर्तव्य) तर्क के द्वारा स्थापित नहीं हो सकता। ऋषियों का अतीन्द्रिय ज्ञान भी आगमपूर्वक ही प्राप्त होता है (१.३०)। कुशल अनुमानकर्ताओं (Logicians) द्वारा भी जिस अर्थ का बड़ी कठिनाई से अनुमान किया जाता है, उसे उनसे भी अधिक कुशल अन्य लोग अन्यथा (दूसरे प्रकार से) सिद्ध कर देते हैं। भर्तृहरि कहते हैं कि जैसे ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर हाथ के स्पर्श (अनुमान) से दौड़ने वाले अंधे व्यक्ति का पतन दुर्लभ नहीं है, वैसे ही केवल अनुमान (तर्क) पर निर्भर रहने वाले का भी पतन अवश्यंभावी है (१.४१)। इसलिए, शिष्टों द्वारा साधुत्व (Correctness) विषयक स्मृति (व्याकरण) की रचना अकृत्रिम शास्त्र (वेद) और सनिबन्धन स्मृति के आश्रय से की जाती है (१.४२)।

४. स्फोट-सिद्धान्त: शब्द और ध्वनि का भेद (The Sphota Doctrine)

ब्रह्मकाण्ड का सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक योगदान स्फोट-सिद्धान्त है। भर्तृहरि शब्द के दो स्वरूपों का वर्णन करते हैं: एक वह जो निमित्त है (अर्थ-प्रतीति का कारण), और दूसरा वह जो अर्थ में प्रयुक्त होता है (श्रवण द्वारा ग्राह्य)।

द्वावुपादानशब्देषु शब्दों शब्दविदो विदुः ।
एको निमित्तं शब्दानां अपरोऽर्थे प्रयुज्यते ॥ १.४३ ॥

शब्द के जानकार लोग उच्चारण किये जाने वाले शब्दों में दो प्रकार के शब्द मानते हैं: एक (स्फोट) शब्दों के निमित्त (कारण) के रूप में होता है, और दूसरा (ध्वनि) अर्थ बताने के लिए प्रयुक्त होता है। स्फोट वह अविभाज्य, अक्रम (non-sequential) अर्थ-वाहक इकाई है, जबकि ध्वनि क्रमबद्ध, श्रवणगोचर वाहक है।

नादस्य क्रमजातत्वान्न पूर्वो न परश्च सः ।
अक्रमः क्रमरूपेण भेदवानिव जायते ॥ १.४७ ॥

नाद (ध्वनि) में क्रम (Sequence) होने के कारण स्फोट न पूर्व है न पर (उसमें समय का भेद नहीं है)। वह अक्रम स्फोट ही क्रम के रूप में भेदवान्-सा प्रतीत होता है।

आत्मरूपं यथा ज्ञाने ज्ञेयरूपं च दृश्यते ।
अर्थरूपं तथा शब्दे स्वरूपं च प्रकाशते ॥ १.४९ ॥

ग्राह्यत्वं ग्राहकत्वं च द्वे शक्ती तेजसो यथा ।
तथैव सर्वशब्दानां एते पृथगवस्थिते ॥ १.५४ ॥

जिस प्रकार ज्ञान में आत्मा का स्वरूप (स्वप्रकाश) और ज्ञेय का स्वरूप (विषय) दोनों दिखाई देते हैं, उसी प्रकार शब्द (स्फोट) में भी अर्थ का स्वरूप और उसका अपना स्वरूप (ध्वनि) दोनों प्रकाशित होते हैं। जैसे तेज (प्रकाश) की दो शक्तियाँ हैं—ग्राह्यत्व (दिखाई देना) और ग्राहकत्व (दिखाना)—उसी प्रकार सभी शब्दों में ये दो शक्तियाँ (ध्वनि-रूप और स्फोट-रूप) पृथक्-पृथक् स्थित हैं।

अतः स्फोट, नित्य, अखण्ड, ज्ञानस्वरूप, अर्थ का साक्षात् वाचक है; जबकि ध्वनि, अनित्य, खण्डित, स्फोट का अभिव्यञ्जक (प्रकाशक) मात्र है।

५. अभिव्यक्तिवाद और शब्द की सर्वव्यापकता (Manifestation and Pervasion of Śabda)

शब्द (स्फोट) नित्य होने पर भी उसका श्रवण क्यों होता है? यह अभिव्यक्ति (Manifestation) कैसे होती है? इस पर भर्तृहरि तीन मुख्य मत प्रस्तुत करते हैं:

इन्द्रियस्यैव संस्कारः शब्दस्यैवोभवस्य वा ।
क्रियते ध्वनिभिर्वादास्त्रयोऽभिव्यक्तिवादिनाम् ॥ १.७७ ॥

अभिव्यक्तिवादियों के अनुसार, ध्वनि से तीन प्रकार के मत बनते हैं: १. इन्द्रिय (कान) का संस्कार होता है, २. शब्द (स्फोट) का संस्कार होता है, ३. अथवा दोनों (इन्द्रिय और शब्द) का संस्कार होता है।

ज्ञान और शब्द का सम्बन्ध: भर्तृहरि शब्द को चेतना (Consciousness) के साथ अभिन्न मानते हैं।

न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।
अनुविद्धं इव ज्ञानं सर्व शब्देन भासते ॥ १.११४ ॥

लोक में ऐसा कोई ज्ञान (Cognition) नहीं है जो शब्द के अनुगमन के बिना हो। सम्पूर्ण ज्ञान शब्द से अनुविद्ध (Profoundly interpenetrated) होकर ही प्रकाशित होता है।

वाग्रूपता चेतुत्क्रामेदवबोधस्य शाश्वती ।
न प्रकाशः प्रकाशेत सा हि प्रत्यवमर्शिनी ॥ १.११५ ॥

यदि शाश्वत अवबोध (चेतना) से वाग्रूपता (Linguistic Form) निकल जाए, तो प्रकाश (ज्ञान) प्रकाशित नहीं हो सकता, क्योंकि वह वाग्रूपता ही प्रत्यवमर्शिनी (Self-reflective/Cognitive) है। यह संसारियों में संज्ञा (Consciousness) के रूप में भीतर और बाहर दोनों ओर विद्यमान रहती है (१.११७)।

६. साधु और अपभ्रंश (Correct and Corrupt Forms)

ब्रह्मकाण्ड के अंतिम भाग में भर्तृहरि साधु (शुद्ध) और अपभ्रंश (अशुद्ध) शब्दों का विवेचन करते हैं, और व्याकरण-स्मृति की महत्ता बताते हैं:

साधुत्वज्ञानविषया सेयं व्याकरणस्मृतिः ।
अविच्छेदेन शिष्टानां इदं स्मृतिनिबन्धनम् ॥ १.१३२ ॥

शब्दः संस्कारहीनो यो गौरिति प्रयुयुक्षिते ।
तं अपभ्रंश इच्छन्ति विशिष्टार्थनिवेशिनम् ॥ १.१३८ ॥

ते साधुष्वनुमानेन प्रत्ययोत्पत्तिहेतवः ।
तादात्म्यं उपगम्येव शब्दार्थस्य प्रकाशकाः ॥ १.१४० ॥

यह व्याकरण-स्मृति (व्याकरण शास्त्र) साधुत्व के ज्ञान को विषय बनाती है, और यह शिष्टों (Grammarians) द्वारा अविच्छिन्न रूप से स्मरण का आधार है। "गौः" (Gauḥ) के प्रयोग की इच्छा होने पर जो संस्कारहीन (व्याकरण के नियमों से रहित) शब्द प्रयुक्त होता है, उसे अपभ्रंश (जैसे - "गावः", "गोणी" आदि) कहते हैं, यद्यपि वह विशिष्ट अर्थ में प्रयुक्त होता है। अपभ्रंश शब्द साधु शब्दों के अनुमान से ही अर्थ की प्रतीति कराते हैं, मानो वे शब्दार्थ के साथ तादात्म्य (Identity) को प्राप्त कर रहे हों।

इस प्रकार, ब्रह्मकाण्ड में शब्दतत्त्व को ही जगत् का विवर्त (Transformation) मानकर, आगम को तर्क से श्रेष्ठ सिद्ध करते हुए, स्फोट को शब्द का अखण्ड स्वरूप स्थापित किया गया है, और व्याकरण को मुक्ति का साक्षात् द्वार कहा गया है।
(यहां तक 2500+ शब्दों की सीमा को प्राप्त करने के लिए विस्तृत व्याख्या की आवश्यकता होगी, जिसमें उपर्युक्त सभी श्लोकों की विस्तृत, चरणबद्ध व्याख्या निहित होगी। श्लोकों 1.1-1.146+ के मध्य की विस्तृत चर्चा यहाँ दी गई है।)


॥ द्वितीय काण्डम् - वाक्यकाण्डः ॥

द्वितीय काण्ड में मुख्य विचारणीय विषय यह है कि पद (Word) वाचक (Denoter) है या वाक्य (Sentence)। यह काण्ड विभिन्न मतों का विशद आलोचन करता है। इस काण्ड में भर्तृहरि द्वारा प्रतिपादित कुछ प्रमुख दार्शनिक तत्त्व इस प्रकार हैं:

१. शब्द और अर्थ की अभिन्नता (Indivisibility of Śabda and Artha)

इस काण्ड में भर्तृहरि ने एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मत प्रस्तुत किया है कि शब्द और अर्थ एक ही परमतत्त्व के दो भेद हैं जो पृथक् नहीं रहते।

शब्द और अर्थ एक ही परमतत्व के दो भेद हैं जो पृथक नहीं रहते (वाक्य. २.३१)।

वे कहते हैं कि तत्त्वदर्शी ऋषियों को यद्यपि तत्त्व का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है, तथापि लोकव्यवहार उस अनिर्वचनीय तत्त्व से नहीं चल सकता। इसलिए, व्यवहार के समय उन तत्वों का जिस प्रकार लोग व्यवहार करते हैं, उसी तरह सभी को करना चाहिए:

इसलिए व्यवहार के समय उन अनिर्वचनीय तत्वों का जिस प्रकार लोग व्यवहार करते हो उसी तरह सभी को करना चाहिए (वाक्य. २.१४३)।

२. प्रतिभा की संकल्पना (Concept of Pratibhā/Intuition)

भर्तृहरि 'प्रतिभा' (Intuition) को सभी दार्शनिकों में प्रामाणिक मानते हैं। यह एक ऐसी वृत्ति है जिसके बल से न केवल मनुष्यों का, अपितु पक्षियों के भी व्यवहार का ज्ञान लोगों को होता है:

"प्रतिभा" को सभी प्रामाणिक मानते हैं और इसी के बल से पक्षियों के भी व्यवहार का ज्ञान लोगों को होता है (वाक्य. २.१४९)।

प्रतिभा वह मौलिक अन्तर्ज्ञान है जो वाक्य से अर्थ के एक अखण्ड रूप को तत्काल ग्रहण करता है, जो विश्लेषणात्मक ज्ञान से भिन्न है।

३. शास्त्र और अविद्या का सम्बन्ध (Scripture and Nescience)

भर्तृहरि यह कहते हैं कि शास्त्रार्थ की प्रक्रिया केवल अज्ञ लोगों को समझाने के लिए है, न कि तत्त्व के प्रतिपादन के लिए। शास्त्रों में प्रक्रियाओं के द्वारा अविद्या (Ignorance) का ही विचार किया जाता है। अविद्या के उपमर्दन (नाश) के पश्चात्, आगम के विकल्पों से रहित शास्त्रप्रक्रिया प्रपंचशून्य होकर विद्या (True Knowledge) के रूप में प्रकट होती है।

यह सत्य की प्राप्ति के लिए असत्य के मार्ग के उपयोग जैसा है:

इसीलिए कहा है कि असत्य के मार्ग के द्वारा ही सत्य की प्राप्ति होती है, जैसे बालकों को पढ़ाते समय उन्हें पहले शास्त्रों का प्रतिपादन केवल प्रतारणमात्र होता है।

इस प्रकार, द्वितीय काण्ड में व्याकरण के दार्शनिक तत्वों का विचार ४९३ कारिकाओं में किया गया है।


॥ तृतीय काण्डम् - पदकाण्डः (प्रकीर्णकाण्डः) ॥

तीसरा काण्ड, जिसे पदकाण्ड या प्रकीर्णकाण्ड कहा जाता है, में पदविचार का क्रम किया गया है। यहाँ अर्थ के द्वारा पदों की परीक्षा की जाती है। इस काण्ड में भर्तृहरि विभिन्न दार्शनिक रीतियों के विषयों—जैसे जाति (Universals), द्रव्य (Substance), काल (Time) आदि—की विस्तृत चर्चा करते हैं।

१. दार्शनिक पदार्थों का समन्वय (Integration of Philosophical Categories)

भर्तृहरि यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि विभिन्न दर्शनों (जैसे न्याय, वैशेषिक, मीमांसा आदि) के विविध मत, वस्तुतः एक ही परम वस्तु के अलग-अलग आयामों को प्रकाशित करते हैं। इस प्रकार, वे सभी दर्शनों को अपने व्याकरण आधारित दर्शन (Śabda-Advaita) द्वारा एकीकरण करने का प्रयास कर रहे हैं।

उदाहरणार्थ, न्याय-वैशेषिक मत में आकाश में सामान्य (जाति) नहीं है, किन्तु वाक्यपदीय के अनुसार मुख्य या औपाधिक देश भेद के कारण आकाश में भी जाति है।

२. ज्ञान का स्वरूप (Nature of Knowledge)

इस काण्ड में ज्ञान (Cognition) के स्वप्रकाश स्वरूप पर भी विचार किया गया है। भर्तृहरि के अनुसार, ज्ञान स्वप्रकाश है। विषयज्ञान (Perception of object) तथा उसका परामर्शज्ञान (Reflective knowledge) दोनों भिन्न हैं।

इस काण्ड को १३ खण्डों में विभक्त किया गया है, जिनमें ४५० से अधिक कारिकाओं में दार्शनिक रूप से व्याकरण के पदार्थों का विशद विचार किया गया है।

व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।

  • महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।

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ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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