महर्षि पतंजलि कृत व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निकम् की गहन विवेचना
प्रस्तावना: शब्द ब्रह्म की उपासना
भारतीय मनीषा में व्याकरण को केवल भाषा के नियमों का संकलन नहीं, बल्कि 'वेदांग' (वेदों का अंग) और 'मोक्ष का द्वार' माना गया है। संस्कृत व्याकरण की इस महान परंपरा में 'मुनित्रय' (पाणिनी, कात्यायन और पतंजलि) का स्थान सर्वोपरि है। भगवान पतंजलि द्वारा रचित 'महाभाष्य' व्याकरण शास्त्र का वह देदीप्यमान सूर्य है, जिसने पाणिनीय अष्टाध्यायी के गूढ़ अर्थों को प्रकाशित किया।
महाभाष्य का प्रथम आह्निक 'पस्पशाह्निकम्' कहलाता है। 'पस्पशा' का अर्थ है 'प्रस्तावना' या 'भूमिका'। यह केवल एक प्रस्तावना नहीं, बल्कि शब्द, अर्थ, व्याकरण के प्रयोजन और भाषा विज्ञान का दार्शनिक आधार है।
१. महाभाष्य और पतंजलि: ऐतिहासिक एवं शास्त्रीय परिचय
महाभाष्य का शाब्दिक अर्थ है— "महच्च तद् भाष्यं महाभाष्यम्" अर्थात् वह महान भाष्य जो आकार और गाम्भीर्य दोनों में विशाल है।
रचनाकार और समय
महाभाष्य के रचयिता महर्षि पतंजलि हैं, जिन्हें शेषनाग का अवतार माना जाता है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, पतंजलि शुंग वंश के संस्थापक पुष्यमित्र शुंग के समकालीन थे। महाभाष्य में एक उदाहरण मिलता है:
"इह पुष्यमित्रं याजयामः" (यहाँ हम पुष्यमित्र के लिए यज्ञ करा रहे हैं)
इससे यह सिद्ध होता है कि पतंजलि द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व (लगभग 150-180 ई.पू.) में विद्यमान थे। उन्होंने साकेत और माध्यमिका पर यवनों (यूनानियों) के आक्रमण का भी उल्लेख किया है:
"अरुणद्यवनः साकेतम्, अरुणद्यवनो माध्यमिकाम्"
महाभाष्य का स्वरूप
महाभाष्य अष्टाध्यायी के चुने हुए सूत्रों और कात्यायन के वार्तिकों पर लिखी गई एक समीक्षात्मक व्याख्या है। इसमें ८ अध्याय हैं, जो पुनः 'आह्निकों' में विभक्त हैं। एक दिन में समाप्त किए जाने वाले पाठ को 'आह्निक' कहा जाता है। महाभाष्य में कुल ८४ या ८५ आह्निक माने जाते हैं।
२. पस्पशाह्निकम्: 'अथ शब्दानुशासनम्'
पस्पशाह्निक का प्रारंभ महर्षि पतंजलि इस महान मंगलाचरण और अधिकार सूत्र से करते हैं:
॥ अथ शब्दानुशासनम् ॥
यहाँ 'अथ' शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। आचार्य पतंजलि के अनुसार, 'अथ' शब्द यहाँ 'अधिकार' (प्रारम्भ) के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। यद्यपि 'अथ' के पाँच अर्थ प्रसिद्ध हैं:
मंगल
अनन्तर (बाद में)
आरम्भ (अधिकार)
प्रश्न
कार्य (परिपूर्णता)
पतंजलि कहते हैं कि यहाँ 'अथ' का अर्थ है कि यहाँ से 'शब्दानुशासन' नामक शास्त्र प्रारम्भ होता है।
शब्दानुशासन क्या है?
शब्दानुशासन का अर्थ है—शब्दों का अनुशासन (नियमन) करने वाला शास्त्र। प्रश्न उठता है कि किन शब्दों का? पतंजलि उत्तर देते हैं:
"केषां शब्दानाम्? लौकिकानां वैदिकानां च।"
अर्थात् यह शास्त्र लौकिक (लोक में प्रचलित) और वैदिक (वेदों में प्रयुक्त) दोनों प्रकार के शब्दों का अनुशासन करता है।
उदाहरण:
लौकिक शब्द: गौ (गाय), अश्व (घोड़ा), पुरुष, हस्ती (हाथी), शकुनि (पक्षी), ब्राह्मण।
वैदिक शब्द:
शं नो देवीरभिष्टये (अथर्ववेद)
इषे त्वोर्जे त्वा (यजुर्वेद)
अग्निमीळे पुरोहितम् (ऋग्वेद)
अग्न आयाहि वीतये (सामवेद)
३. शब्द की परिभाषा: 'कः शब्दः?'
पतंजलि एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं— "अथ गौरित्यत्र कः शब्दः?" (यदि हम 'गौ' शब्द कहें, तो इसमें 'शब्द' क्या है?)
वे चार संभावनाओं का खंडन करते हैं:
द्रव्य (Substance): क्या वह जो गलकम्बल (सास्ना), पूँछ, खुर और सींग वाला पिंड है, वह शब्द है? उत्तर: नहीं, वह तो 'द्रव्य' है।
क्रिया (Action): क्या आँख झपकना या हिलना-डुलना शब्द है? उत्तर: नहीं, वह 'क्रिया' है।
गुण (Quality): क्या शुक्ल (सफेद), नील या कृष्ण वर्ण शब्द है? उत्तर: नहीं, वह 'गुण' है।
आकृति (Form/Genus): क्या वह जो भिन्न-भिन्न गायों में एक समान (सामान्य) है, वह शब्द है? उत्तर: नहीं, वह 'आकृति' (जाति) है।
अंतिम परिभाषा:
"येन उच्चारितेन सास्नालाङ्गूलककुदखुरविषाणिनां सम्प्रत्ययः भवति स शब्दः।"
अर्थात्: जिसके उच्चारण मात्र से गलकम्बल, पूँछ, ककुद, खुर और सींग वाले प्राणी (गाय) का ज्ञान (बोध) हो जाए, वही 'शब्द' है। सरल शब्दों में— "प्रतीतपदार्थकः लोके ध्वनिः शब्दः" (लोक में जिससे अर्थ की प्रतीति हो, वह ध्वनि शब्द है)।
४. व्याकरण अध्ययन के मुख्य प्रयोजन (रक्षोहागमलघ्वसन्देहाः)
पतंजलि ने व्याकरण पढ़ने के ५ मुख्य और १३ गौण प्रयोजन बताए हैं। यह भाग पस्पशाह्निक का हृदय है।
५ मुख्य प्रयोजन:
रक्षा (Protection): वेदों की रक्षा के लिए व्याकरण अनिवार्य है। जिसे लोप, आगम और वर्ण-विकार का ज्ञान नहीं, वह वेदों की रक्षा नहीं कर सकता।
ऊह (Adjustment): वेदों के मंत्र सभी लिंगों और विभक्तियों में नहीं दिए गए हैं। यज्ञ के समय लिंग और विभक्ति बदलने के लिए व्याकरण का ज्ञान आवश्यक है।
आगम (Tradition): ब्राह्मण को निष्काम भाव से छह अंगों वाले वेद का अध्ययन करना चाहिए। व्याकरण इनमें 'प्रधान' अंग है। "प्रधाने च कृतो यत्नः फलवान् भवति।"
लघु (Simplicity): शब्दों के अथाह सागर को जानने का सबसे छोटा और सरल मार्ग व्याकरण है।
असन्देह (Removal of Doubt): शब्दों के अर्थ में संदेह दूर करने के लिए व्याकरण चाहिए।
उदाहरण: 'स्थूलपृषती' शब्द में संदेह हो सकता है कि यह तत्पुरुष समास है या बहुव्रीहि। स्वर के ज्ञान से ही इसका निर्णय संभव है।
५. व्याकरण के १३ गौण (आनुषङ्गिक) प्रयोजन
पतंजलि ने १३ अन्य कारणों का भी उल्लेख किया है जो व्याकरण की महत्ता दर्शाते हैं:
तेऽसुराः: असुरों ने 'हेलयः हेलयः' (अपशब्द) का प्रयोग किया और पराजित हुए। अतः ब्राह्मण को म्लेच्छ (अपशब्द) नहीं बोलना चाहिए।
दुष्टः शब्दः: गलत स्वर या वर्ण से प्रयुक्त शब्द 'वाग्वज्र' बनकर यजमान का ही नाश कर देता है, जैसे 'इन्द्रशत्रुः' शब्द के गलत स्वर प्रयोग से हुआ।
यदधीतम्: बिना समझे पढ़ा गया ज्ञान सूखी लकड़ी के समान है जो कभी प्रज्वलित नहीं होता।
यस्तु प्रयुङ्क्ते: जो शब्दों का सही प्रयोग जानता है, वह परलोक में विजय प्राप्त करता है।
अविद्वांसः: जो अभिवादन के समय प्लुति स्वर का ज्ञान नहीं रखते, उनके सामने अभिवादन करना स्त्री के सामने अभिवादन करने जैसा है।
विभक्तिं कुर्वन्ति: यज्ञ में विभक्ति परिवर्तन के लिए व्याकरण अनिवार्य है।
यो वा इमाम्: जो वाणी को पद, स्वर और अक्षर के अनुसार जानता है, वही वास्तविक ऋत्विज है।
चत्वारि: वाणी के चार प्रकार हैं— परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी। मनुष्य केवल 'वैखरी' (चौथी वाणी) बोलता है।
"चत्वारि वाक्परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः।"
उत त्वः: अज्ञानी व्यक्ति वाणी को देखते हुए भी नहीं देखता, सुनते हुए भी नहीं सुनता। पर विद्वान के सामने वाणी अपना स्वरूप वैसे ही प्रकट करती है जैसे सुसज्जित पत्नी पति के सामने।
सक्तुमिव: जैसे छलनी (तितउ) से सत्तू को शुद्ध किया जाता है, वैसे ही विद्वान मन से वाणी को शुद्ध करते हैं।
सारस्वतीम्: अपशब्द के प्रयोग पर सरस्वती इष्टि (प्रायश्चित) करनी पड़ती है। इससे बचने के लिए व्याकरण पढ़ें।
दशम्यां पुत्रस्य: पुत्र के नामकरण के नियम (घोषवदादि, चतुरक्षर आदि) जानने के लिए व्याकरण चाहिए।
सुदेवोऽअसि वरुण: वरुण के समान 'सुदेव' बनने के लिए सात सिन्धुओं (सात विभक्तियों) का ज्ञान आवश्यक है।
६. शब्दोपदेश की पद्धति: 'लघुत्वात् शब्दोपदेशः'
पतंजलि एक तार्किक प्रश्न करते हैं— "क्या हमें साधु (सही) शब्दों का उपदेश देना चाहिए या अपशब्दों का?"
उनका निष्कर्ष है कि साधु शब्दों का उपदेश ही श्रेष्ठ है क्योंकि:
साधु शब्द कम हैं और अपशब्द अनंत हैं।
एक शब्द 'गौ' के अनेक अपभ्रंश हैं— गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका आदि।
अतः साधु शब्दों को बताना 'लाघव' (छोटा मार्ग) है।
७. शब्द, अर्थ और संबंध की नित्यता
कात्यायन के प्रथम वार्तिक पर चर्चा करते हुए पतंजलि कहते हैं:
॥ सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे ॥
यहाँ 'सिद्ध' का अर्थ 'नित्य' है।
शब्द नित्य है।
अर्थ नित्य है।
उनका संबंध भी नित्य है।
पतंजलि स्पष्ट करते हैं कि व्याकरण शब्दों को 'बनाता' नहीं है, बल्कि 'अनुशासित' करता है। जैसे घड़े के लिए कुम्हार के पास जाते हैं, वैसे ही शब्दों के लिए व्याकरणकार के पास नहीं जाते; शब्द तो लोक में पहले से ही सिद्ध (विद्यमान) हैं। व्याकरण केवल धर्म-नियम करता है कि इस अर्थ के लिए यही शब्द साधु है।
८. व्याकरण की परिभाषा और स्वरूप
व्याकरण क्या है?
पतंजलि कहते हैं— "लक्ष्यलक्षणे व्याकरणम्"।
लक्ष्य: वे शब्द जिनका विवेचन करना है (साधु शब्द)।
लक्षण: वे सूत्र (नियम) जिनसे शब्दों की सिद्धि होती है।
इन दोनों का समुदाय ही 'व्याकरण' है। केवल सूत्रों को व्याकरण कहना 'शब्दाप्रतिपत्ति' (शब्दों का ज्ञान न होना) का दोष उत्पन्न करेगा। अतः व्याख्यान सहित सूत्र ही व्याकरण है।
व्याख्यान क्या है?
"उदाहरणं प्रत्युदाहरणं वाक्याध्याहार इत्येतत्समुदितं व्याख्यानं भवति।"
अर्थात् उदाहरण, प्रत्युदाहरण और वाक्यों की पूर्ति के साथ की गई व्याख्या ही वास्तविक व्याकरण है।
९. वर्णोपदेश और शिव सूत्र (माहेश्वर सूत्र)
महाभाष्य में वर्णों के उपदेश के तीन मुख्य कारण बताए गए हैं:
वृत्तिसमवायार्थ: शास्त्र की प्रवृत्ति के लिए वर्णों का क्रम निश्चित करना।
अनुबन्धकरणार्थ: प्रत्याहार (अण्, अच्, हल् आदि) बनाने के लिए।
इष्टबुद्ध्यर्थ: सही वर्णों के ज्ञान के लिए।
पतंजलि यहाँ उच्चारण के दोषों का भी उल्लेख करते हैं जिन्हें 'संवृतादि दोष' कहा जाता है। इनमें १२ प्रमुख दोष हैं: ग्रस्त, निरस्त, कल, अम्बूकृत, ध्यात, रोमश आदि। एक वैयाकरण को इन दोषों से बचकर शुद्ध उच्चारण करना चाहिए।
१०. महाभाष्य की दार्शनिक और साहित्यिक महत्ता
महाभाष्य केवल व्याकरण का ग्रंथ नहीं है, यह एक साहित्यिक उत्कृष्ट कृति भी है। पतंजलि की शैली 'संवादात्मक' है। वे पहले 'पूर्वपक्ष' (शंका) प्रस्तुत करते हैं और फिर 'उत्तरपक्ष' (समाधान) देते हैं।
स्फोटवाद और शब्दब्रह्म
पतंजलि ने व्याकरण को दर्शन से जोड़ा। उन्होंने 'स्फोट' का संकेत दिया, जिसे बाद में भर्तृहरि ने 'वाक्यपदीय' में विस्तार दिया। उनके अनुसार शब्द नित्य है और ब्रह्म स्वरूप है।
प्रमुख टीकाएँ
महाभाष्य की जटिलता और गहराई को समझने के लिए अनेक विद्वानों ने टीकाएँ लिखीं:
भर्तृहरि: महाभाष्य दीपिका (अपूर्ण)।
कैय्यट: प्रदीप (सर्वाधिक प्रसिद्ध)।
नागेश भट्ट: उद्योत (प्रदीप पर टीका)।
वैद्यनाथ पायगुण्ड: छाया (उद्योत पर व्याख्या)।
११. व्यावहारिक व्याकरण के कुछ उदाहरण (प्रसंगवश)
महाभाष्य में भाषा के प्रयोग पर विशेष बल दिया गया है। जैसे:
विप्रवदन्ते वैद्याः: यहाँ 'वि' उपसर्ग के कारण क्रिया के आत्मनेपद और परस्मैपद के विशिष्ट प्रयोगों की चर्चा है।
भोज्य नियम: जैसे लोक में 'पाँच नख वाले प्राणी भक्ष्य हैं' कहने से शेष का निषेध हो जाता है, वैसे ही व्याकरण साधु शब्दों को बताकर असाधु शब्दों का निषेध कर देता है।
व्रत और यूप: जैसे ब्राह्मण के लिए पयोव्रत (दूध) और क्षत्रिय के लिए यवागू (जौ की लपसी) का नियम है, वैसे ही भाषा में भी साधु शब्दों का नियम है।
१२. निष्कर्ष: व्याकरण का फल
पतंजलि के अनुसार, व्याकरण का अध्ययन केवल विद्वत्ता के लिए नहीं, बल्कि 'अभ्युदय' (लौकिक उन्नति) और 'निःश्रेयस' (मोक्ष) के लिए है।
"शास्त्रपूर्वकं प्रयोगेऽभ्युदयस्तत्तुल्यं वेदशब्देन।"
जो व्यक्ति शास्त्र के नियमों को जानकर शब्दों का सही प्रयोग करता है, वह वाग्योगविद् (वाणी का ज्ञाता) होकर परम पद को प्राप्त करता है।
महाभाष्य - पस्पशाह्निकम् का सार यही है कि वाणी ईश्वरीय वरदान है और व्याकरण उस वाणी की शुद्धता का प्रहरी। बिना व्याकरण के मनुष्य शब्दों के जाल में भटक सकता है, किंतु व्याकरण के प्रकाश में वह शब्द-ब्रह्म का साक्षात्कार कर सकता है।
मुख्य बिंदु जो याद रखने योग्य हैं:
मुनित्रय: पाणिनी (सूत्रकार), कात्यायन (वार्तिककार), पतंजलि (भाष्यकार)।
पस्पशा: महाभाष्य का प्रथम आह्निक (प्रस्तावना)।
प्रयोजन: रक्षा, ऊह, आगम, लघु और असंदेह।
शब्द: वह ध्वनि जिससे अर्थ का बोध हो।
नित्यता: शब्द, अर्थ और संबंध तीनों नित्य हैं।
आशा है कि 'महाभाष्य - पस्पशाह्निकम्' पर आधारित यह विस्तृत लेख आपके ज्ञानवर्धन में सहायक सिद्ध होगा। शब्द-साधना ही वास्तविक ब्रह्म-साधना है।
लेखन में प्रयुक्त संदर्भ: व्याकरण महाभाष्य (पतंजलि), वाक्यपदीय (भर्तृहरि), और संस्कृत व्याकरण का इतिहास।
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।