संस्कृत व्याकरण का अनमोल रत्न: स्त्रीप्रत्यय प्रकरण (विस्तृत मार्गदर्शिका)

स्त्रीप्रत्यय प्रकरण
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता। या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥ या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता। सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥
1. अधिकार सूत्र: 'स्त्रियाम्' (4/1/3)
सूत्र: स्त्रियाम् (4/1/3) वृत्ति: अधिकारोऽयम्। समर्थानामिति यावत्। व्याख्या: यह एक 'अधिकार सूत्र' है। इसका अर्थ यह है कि अष्टाध्यायी के चौथे अध्याय के प्रथम पाद के तीसरे सूत्र से लेकर 'समर्थानां प्रथमाद्वा' (4/1/82) सूत्र से पहले तक जितने भी प्रत्यय कहे जाएंगे, वे 'स्त्रीत्व' (Feminine gender) की विवक्षा में ही होंगे। महत्व: यह सूत्र सीमा निर्धारित करता है कि स्त्रीलिंग बनाने वाले प्रत्ययों का साम्राज्य कहाँ तक फैला है।
2. टाप् प्रत्यय का विधान: 'अजाद्यतष्टाप्' (4/1/4)
सूत्र: अजाद्यतष्टाप् (4/1/4) वृत्ति: अजादीनामकारान्तस्य च वाच्यं यत् स्त्रीत्वं तत्र द्योत्ये टाप् स्यात्। हिन्दी अर्थ: 'अजा' आदि गण में पठित शब्दों और 'अदन्त' (जिनके अंत में 'अ' हो) प्रातिपदिकों से स्त्रीलिंग की विवक्षा में 'टाप्' प्रत्यय होता है। 'टाप्' में 'ट्' और 'प्' की इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है और केवल 'आ' शेष रहता है।
अजा: अज + टाप् = अजा (बकरी) एडका: एडक + टाप् = एडका (भेड़) अश्वा: अश्व + टाप् = अश्वा (घोड़ी) चटका: चटक + टाप् = चटका (चिड़िया) मूषिका: मूषिक + टाप् = मूषिका (चुहिया) बाला: बाल + टाप् = बाला (लड़की) वत्सा: वत्स + टाप् = वत्सा (पुत्री/बछिया) होडा: होड + टाप् = होडा (मुग्धा नायिका) मन्दा: मन्द + टाप् = मन्दा विलाता: विलात + टाप् = विलाता मेधा: मेध + टाप् = मेधा (बुद्धि) गङ्गा: गङ्ग + टाप् = गङ्गा सर्वा: सर्व + टाप् = सर्वा
3. ङीप् (Gneep) प्रत्यय: 'उगितश्च' (4/1/6)
सूत्र: उगितश्च (4/1/6) वृत्ति: उगिदन्तात्प्रातिपदिकात्त्रिया डीप्स्यात्। हिन्दी अर्थ: जिस प्रातिपदिक के अंत में 'उक्' (उ, ऋ, लृ) की इत्संज्ञा हुई हो, उसे 'उगित्' कहते हैं। ऐसे उगित् शब्दों से स्त्रीलिंग में 'ङीप्' प्रत्यय होता है।
भवती: भवत् + ङीप् = भवती (आप - स्त्री) भवन्ती: भू + शतृ (उगित्) + ङीप् = भवन्ती पचन्ती: पच् + शतृ + ङीप् = पचन्ती (पकाती हुई) दीव्यन्ती: दिव् + शतृ + ङीप् = दीव्यन्ती (खेलती हुई)
4. विस्तृत ङीप् विधान: 'टिड्ढाणञ्...' (4/1/15)
सूत्र: टिड्ढाणञ्द्वयसज्दघ्नञ्मात्रच्तयष्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः (4/1/15) वृत्ति: अनुपसर्जनं यट्टिदादि तदन्तं यददन्तं प्रातिपदिकं ततः स्त्रियां ङीप् स्यात्। हिन्दी अर्थ: यदि कोई शब्द 'अनुपसर्जन' (प्रधान) हो और वह अदन्त हो, तथा उसके अंत में टित्, ढ, अण्, अञ्, द्वयसच्, दघ्नच्, मात्रच्, तयप्, ठक्, ठञ्, कञ्, या क्वरप् प्रत्यय लगे हों, तो स्त्रीलिंग में 'ङीप्' प्रत्यय होगा।
5. विशेष वार्तिक और उनके प्रयोग
वार्तिक: नञ्स्रञीकक्ख्युंस्तरुणतलुनानामुपसंख्यानम्। अर्थ: नञ्, स्रञ्, ईकक्, ख्युन् प्रत्ययान्त शब्दों तथा 'तरुण' और 'तलुन' शब्दों से भी स्त्रीलिंग में ङीप् प्रत्यय जोड़ना चाहिए। उदाहरण: स्त्रैणी (स्त्री से संबंधित) पौत्री (पुत्र की पुत्री) शाक्तीकी, याष्टीकी आयङ्करणी तरुणी (युवती) तलुनी (युवती)
6. यञ् प्रत्यय और यकार लोप के नियम
सूत्र: यञश्च (4/1/16) वृत्ति: यञन्तात् स्त्रियां ङीप् स्यात्। अर्थ: 'यञ्' प्रत्ययान्त प्रातिपदिकों से स्त्रीलिंग में ङीप् प्रत्यय होता है।
सूत्र: हलस्तद्धितस्य (6/1/150) वृत्ति: हलः परस्य तद्धितयकारस्योपधाभूतस्य लोपः स्यात् ईति परे। अर्थ: यदि हल वर्ण के बाद तद्धित का 'य' उपधा में हो और बाद में 'ई' (ङीप् का) हो, तो उस 'य' का लोप हो जाता है। उदाहरण: गर्ग + यञ् = गार्ग्य। गार्ग्य + ङीप्। यहाँ 'य' का लोप होकर 'गार्गी' रूप बनता है।
7. ष्फ प्रत्यय का विकल्प: 'प्राचां ष्फ तद्धितः' (4/1/17)
सूत्र: प्राचां ष्फ तद्धितः (4/1/17) अर्थ: प्राचीन आचार्यों के मत में 'यञ्' प्रत्ययान्त शब्दों से विकल्प से 'ष्फ' प्रत्यय होता है, और यह तद्धित संज्ञक होता है। ष्फ में 'ष्' की इत्संज्ञा होने के कारण यहाँ 'षिद्गौरादिभ्यश्च' से ङीष् प्रत्यय भी आता है। उदाहरण: गार्ग्य + ष्फ + ङीष् = गार्ग्यायणी।
8. ङीष् (Gneesh) प्रत्यय के विशिष्ट नियम
सूत्र: षिद्गौरादिभ्यश्च (4/1/41) अर्थ: जिस शब्द में 'ष्' की इत्संज्ञा हुई हो (षित्) और 'गौरादि गण' में पठित शब्दों से स्त्रीलिंग में ङीष् प्रत्यय होता है। उदाहरण: नर्तकी (नर्तक + ङीष् - यहाँ 'ष्वुन्' प्रत्यय है जो षित् है) गौरी (गौर + ङीष्) अनुदुही अनाही
9. आयु और अवस्था का प्रभाव: 'वयसि प्रथमे' (4/1/20)
सूत्र: वयसि प्रथमे (4/1/20) वृत्ति: प्रथमवयोवाचिनोऽदन्तात् स्त्रियां ङीष् स्यात्। अर्थ: प्रथम अवस्था (बाल्यावस्था/युवावस्था की शुरुआत) को बताने वाले अदन्त शब्दों से स्त्रीलिंग में 'ङीष्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कुमार + ङीष् = कुमारी। श्लोक संदर्भ: "कुमारी च तथा कन्या किशोरी चेति विश्रुता।" अर्थात् अवस्था विशेष के आधार पर ही इन शब्दों की निष्पत्ति होती है।
10. द्विगु समास और स्त्रीलिंग: 'द्विगोः' (4/1/21)
सूत्र: द्विगोः (4/1/21) अर्थ: अदन्त द्विगु समास से स्त्रीलिंग में ङीप् प्रत्यय होता है। उदाहरण: त्रयाणां लोकानां समाहारः = त्रिलोकी। अपवाद: 'त्रिफला' (अजादित्वात् टाप्) और 'त्र्यनीका सेना'।
11. वर्णवाची शब्द और विकल्प: 'वर्णादनुदात्तात्...' (4/1/39)
सूत्र: वर्णादनुदात्तात्तोपधात्तो नः (4/1/39) अर्थ: ऐसे वर्ण (रंग) वाची शब्द जिनके अंत में अनुदात्त स्वर हो और उपधा में 'त' हो, उनसे स्त्रीलिंग में विकल्प से 'ङीप्' प्रत्यय होता है और 'त' को 'न' आदेश भी होता है। उदाहरण: एत (चितकबरा) -> एनी (ङीप् और त को न) या एता (टाप्)। रोहित -> रोहिणी या रोहिता।
12. गुणवाची और बहुवाची शब्दों के नियम
सूत्र: वोतो गुणवचनात् (4/1/44) अर्थ: हस्व उकारान्त गुणवाची शब्दों से विकल्प से 'ङीष्' होता है। उदाहरण: मृदु -> मृद्वी या मृदुः। सूत्र: बह्वादिभ्यश्च (4/1/45) अर्थ: 'बहु' आदि गण के शब्दों से विकल्प से 'ङीष्' होता है। उदाहरण: बह्वी या बहुः।
13. क्रिद्-प्रत्यय और 'रात्रि' शब्द का रहस्य
वार्तिक: कृदिकारादक्तिनः। अर्थ: ऐसे कृदन्त शब्द जिनके अंत में 'इ' हो (लेकिन 'क्तिन्' प्रत्यय न हो), उनसे विकल्प से 'ङीष्' होता है। उदाहरण: रात्री या रात्रिः। वार्तिक: सर्वतोऽक्तिन्नर्थादित्येके। उदाहरण: शकटी या शकटिः।
14. पुंयोग (पति-पत्नी संबंध) में प्रत्यय: 'पुंयोगादाख्यायाम्' (4/1/48)
सूत्र: पुंयोगादाख्यायाम् (4/1/48) वृत्ति: या पुमाख्या पुंयोगात् स्त्रियां वर्तते ततो ङीष्। अर्थ: यदि कोई शब्द मूलतः पुंवाचक (पुरुष का नाम) है, लेकिन पुरुष के साथ संबंध (जैसे पत्नी) के कारण वह स्त्रीलिंग में प्रयोग हो रहा है, तो वहाँ 'ङीष्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: गोप की पत्नी = गोपी।
वार्तिक: पालकान्तान्न। अर्थ: यदि शब्द के अंत में 'पालक' हो, तो विकल्प से प्रयोग होता है (जैसे- गोपालिका)।
15. ककार पूर्व इकार विधान: 'प्रत्ययस्थात्कात्...' (7/3/44)
सूत्र: प्रत्ययस्थात्कात्पूर्वस्यात इदाप्यसुपः (7/3/44) अर्थ: यदि 'आप्' (टाप्) प्रत्यय परे हो, तो प्रत्यय के 'क' से पहले वाले 'अ' को 'इ' हो जाता है। उदाहरण: गोपालक + टाप् = गोपालिका। अश्वपालक + टाप् = अश्वपालिका। सर्व + क + टाप् = सर्विका। कारिका।
निषेध (असुपः): बहुपरिव्राजका नगरी (यहाँ सुप् के कारण इत्व नहीं हुआ)।
16. देव पत्नियों के लिए 'आनुक्' आगम और ङीष् (4/1/49)
सूत्र: इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमारण्ययवयवनमातुलाचार्याणामानुक् (4/1/49) अर्थ: इन्द्र, वरुण, भव, शर्व, रुद्र, मृड, हिम, अरण्य, यव, यवन, मातुल और आचार्य—इन 12 शब्दों को स्त्रीलिंग में 'ङीष्' प्रत्यय और 'आनुक्' का आगम होता है। 'आनुक्' का 'आन' शेष रहता है।
इन्द्राणी: इन्द्र की पत्नी। वरुणानी: वरुण की पत्नी। भवानी: शिव की पत्नी। (भवस्य स्त्री) शर्वाणी: महादेव की पत्नी। रुद्राणी: रुद्र की पत्नी। मृडानी: कल्याणकारी शिव की पत्नी।
महत्ता अर्थ में: महद्धिम = हिमानी (बड़ी बर्फ/हिमराशि)। महदरण्यम् = अरण्यानी (बड़ा जंगल)। दोष अर्थ में: दुष्ट यव = यवानी। लिपि अर्थ में: यवनानां लिपिः = यवनानी (यवन लिपि)। विकल्प (मातुल/उपाध्याय): मातुलानी या मातुली (मामी)। उपाध्यायानी या उपाध्यायी। आचार्यानी: आचार्य की पत्नी। (यहाँ णत्व नहीं होता)।
17. स्वांगवाची शब्द (Body Parts) और स्त्रीलिंग
सूत्र: स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसंयोगोपधात् (4/1/54) अर्थ: यदि प्रातिपदिक स्वांगवाची (शरीर का अंग) हो और उसकी उपधा में संयोग (दो व्यंजन) न हो, तो विकल्प से 'ङीष्' होता है। उदाहरण: चन्द्रमुखी या चन्द्रमुखा। अतिकेशी या अतिकेशा।
अपवाद: सुगुल्फा (यहाँ 'ल्फ्' संयोग है, इसलिए ङीष् नहीं हुआ)। सूत्र: न क्रोडादिबह्वचः (4/1/56) - कल्याणक्रोडा, सुजघना।
सूत्र: नखमुखात्संज्ञायाम् (4/1/58) और पूर्वपदात्संज्ञायामगः (8/4/3)। सिद्धि: शूर्प इव नखानि यस्याः सा = शूर्पणखा। (संज्ञा होने के कारण यहाँ नकार को णकार हुआ है, लेकिन 'ग' का व्यवधान न होने पर)।
18. जातिवाचक शब्दों में ङीष्: 'जातेरस्त्रीविषयात्...' (4/1/63)
सूत्र: जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् (4/1/63) अर्थ: जो शब्द जातिवाचक हो, नित्य स्त्रीलिंग न हो और जिसकी उपधा में 'य' न हो, उससे 'ङीष्' होता है। उदाहरण: तटी, वृषली, कठी, बह्वची। अपवाद वार्तिक: हय, गवय, मुकय, मनुष्य और मत्स्य में 'य' होने पर भी प्रत्यय होगा। हयी, गवयी, मनुषी, मत्सी (यलोप के साथ)।
19. ऊङ् (Oong) प्रत्यय का विधान (4/1/66)
सूत्र: ऊङ्गतः (4/1/66) अर्थ: मनुष्य जातिवाचक अदन्त शब्द (जिसकी उपधा में 'य' न हो) से स्त्रीलिंग में 'ऊङ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कुरूः (कुरु वंश की स्त्री)। पङ्गोश्च (4/1/68): पङ्गु + ऊङ् = पङ्गूः (लंगड़ी स्त्री)।
वार्तिक: श्वशुरस्योकाराकारलोपश्च। व्याख्या: श्वशुर शब्द से स्त्रीलिंग में 'ऊङ्' प्रत्यय होता है और 'शुर' के उकार तथा अंत के अकार का लोप हो जाता है। सिद्धि: श्वशुर + ऊङ् = श्वश्रृः।
करभोरूः (हाथी के बच्चे की सूँड़ जैसी सुंदर जंघा वाली)। संहितोरूः, शफोरूः, वामोरूः।
20. ङीन् (Gneen) प्रत्यय और 'नारी' शब्द (4/1/73)
सूत्र: शार्ङ्गरवाद्यञो ङीन् (4/1/73) अर्थ: शार्ङ्गरव आदि गण में पठित शब्दों और 'अञ्' प्रत्ययान्त शब्दों से 'ङीन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शार्ङ्गरवी, वैदी, ब्राह्मणी।
वार्तिक: नृनरयोर्वृद्धिश्च। व्याख्या: 'नृ' और 'नर' शब्द से स्त्रीलिंग में 'ङीन्' प्रत्यय होता है और साथ ही वृद्धि भी होती है। सिद्धि: नृ/नर + ङीन् + वृद्धि = नारी।
"नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।" (मनुस्मृति) यह प्रसिद्ध श्लोक नारी की गरिमा को इसी व्याकरणिक शुद्धता के साथ प्रस्तुत करता है।
21. 'ति' (Ti) प्रत्यय: 'यूनस्तिः' (4/1/77)
सूत्र: यूनस्तिः (4/1/77) वृत्ति: युवञ्छब्दात् स्त्रियां तिः प्रत्ययः स्यात्। अर्थ: 'युवन्' (जवान) शब्द से स्त्रीलिंग की विवक्षा में 'ति' प्रत्यय होता है। उदाहरण: युवन् + ति = युवतिः।
निष्कर्ष: व्याकरण और जीवन
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- संज्ञाप्रकरणम् - लघुसिद्धान्तकौमुदी
- सन्धि - अच सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - हल सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - विसर्ग सन्धि (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तद्धित :- अपत्यार्थक एवं मत्वर्थीय (सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार)
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- स्त्री प्रत्यय :- लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रकरण :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रथमा विभक्ति
- कारक द्वितीया विभक्ति
- कारक तृतीया विभक्ति
- कारक चतुर्थी विभक्ति
- कारक पञ्चमी विभक्ति
- कारक षष्ठी विभक्ति
- कारक सप्तमी विभक्ति
- परस्मैपद एवं आत्मनेपद विधान :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।