कारक प्रकरण – तृतीया विभक्ति का सम्पूर्ण विवेचन

कारक प्रकरण – तृतीया विभक्ति
1. कर्ता का स्वरूप: स्वतन्त्रः कर्ता (1/4/54)
रामः पठति (राम पढ़ता है): यहाँ पढ़ने की क्रिया में राम स्वतंत्र है, इसलिए राम कर्ता है। शशिवदना लिखति: लिखने की क्रिया शशि के अधीन है।
2. करण का लक्षण: साधकतमं करणम् (1/4/42)
3. विभक्ति का विधान: कर्तृकरणयोस्तृतीया (2/3/18)
रामेण बाणेन हतो वाली । इस वाक्य में 'हतो' (हन् + क्त) प्रत्यय कर्म (वाली) को कह रहा है। अतः कर्ता 'राम' अनुक्त है, इसलिए रामेण (तृतीया) हुई। बाण क्रिया का सबसे बड़ा साधन है, अतः बाणेन (करण में तृतीया) हुई।
4. विशेष प्रयोग: "प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम्" (वार्तिक)
प्रकृत्या चारु: स्वभाव से सुंदर। प्रायेण याज्ञिकः: प्रायः यज्ञ करने वाला। गोत्रेण गार्ग्यः: गोत्र से गार्ग्य। समेन एति: समतल मार्ग से जाता है। विषमेण एति: ऊबड़-खाबड़ मार्ग से जाता है। द्विद्रोणेन धान्यं क्रीणाति: दो द्रोण (माप) से अनाज खरीदता है। सुखेन याति / दुःखेन याति: सुख या दुःख के साथ जाता है।
5. दिव् धातु का विशेष नियम: दिवः कर्म च (1/4/43)
अक्षान दीव्यति (कर्म संज्ञा - द्वितीया): पाँसों से खेलता है। अक्षैः दीव्यति (करण संज्ञा - तृतीया): पाँसों के द्वारा खेलता है।
6. फल प्राप्ति और समय: अपवर्गे तृतीया (2/3/6)
अह्ना अनुवाकोऽधीतः: दिन भर में अनुवाक (अध्याय) पढ़ लिया (और याद हो गया)। क्रोशेन अनुवाकोऽधीतः: कोस भर चलते-चलते अनुवाक पढ़ लिया।
मासमधीतो नायातः: महीने भर पढ़ा लेकिन समझ में नहीं आया। (यहाँ फल प्राप्ति नहीं हुई, इसलिए 'मासम्' में द्वितीया ही रही)।
7. साथ का बोध: सहयुक्तेऽप्रधाने (2/3/19)
सह: पुत्रेण सहागतः पिता। (पिता मुख्य है, पुत्र साथ आ रहा है, अतः पुत्र में तृतीया)। सार्धम्: हनुमान् वानरैः सार्धं जानकीं मार्गयामास। साकम्: रामः सीतया साकं गच्छति। समम्: गुरुः शिष्येण समं पठति।
8. शरीर के विकार में: येनाङ्गविकारः (2/3/20)
अक्ष्णा काणः: आँख से काना। (आँख में खराबी होने से व्यक्ति काना कहलाता है)। कर्णेन बधिरः: कान से बहरा। पादेन खञ्जः: पैर से लंगड़ा।
9. पहचान का चिह्न: इत्थंभूतलक्षणे (2/3/21)
जटाभिस्तापसः: जटाओं से वह तपस्वी प्रतीत होता है। (जटाएँ उसकी तपस्वी होने की पहचान हैं)। पुस्तकेन छात्रः: पुस्तक से छात्र मालूम पड़ता है।
10. सम्-ज्ञा धातु का प्रयोग: संज्ञोऽन्यतरस्यां कर्मणि (2/3/22)
पित्रा संजानीते (तृतीया) या पितरं संजानीते (द्वितीया)। अर्थ: पिता को पहचानता है।
11. कारण का बोध: हेतौ (2/3/23)
करण: केवल क्रिया की सिद्धि में व्यापारशील होता है। हेतु: द्रव्य, गुण और क्रिया तीनों का कारण हो सकता है।
द्रव्य हेतु: दण्डेन घटः (घड़े का कारण दण्ड है)। गुण हेतु: पुण्येन दृष्टो हरिः (पुण्य के कारण हरि के दर्शन हुए)। फल भी हेतु: अध्ययनेन वसति (अध्ययन के लिए रहता है—यहाँ फल ही कारण है)।
12. वार्तिक: गम्यमानापि क्रिया कारकविभक्तौ प्रयोजिका
अलं श्रमेण (परिश्रम बस करो/व्यर्थ है): यहाँ 'साध्यं नास्ति' (सिद्ध करने योग्य नहीं है) क्रिया छिपी है। श्रम यहाँ साधन है, अतः तृतीया हुई। शतेन शतेन वत्सान् पाययति पयः: सौ-सौ करके बछड़ों को दूध पिलाता है।
13. अशिष्ट व्यवहार में विशेष नियम (वार्तिक)
दास्या संयच्छते कामुकः: कामुक व्यक्ति दासी को (अनैतिक उद्देश्य से) धन आदि देता है। (यहाँ दासी के लिए तृतीया हुई)। शिष्ट व्यवहार (तुलना): भार्यायै संयच्छति (अपनी पत्नी को धर्मपूर्वक देता है)। यहाँ शिष्ट व्यवहार होने के कारण चतुर्थी विभक्ति ही प्रयुक्त हुई है।
श्लोक एवं मंत्रों के माध्यम से करण कारक का दर्शन
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः । न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥ (यहाँ 'उद्यमेन' में तृतीया है, जो सिद्ध करती है कि परिश्रम ही सफलता का 'करण' है।)
सत्सङ्गत्या भवेन्मुक्तिः असत-सङ्गत्या च बन्धनम् । (सत्संगति के द्वारा मुक्ति और कुसंगति के द्वारा बंधन होता है।)
विद्या विनयेन शोभते । (विद्या विनय के द्वारा ही सुशोभित होती है।)
निष्कर्ष
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- संज्ञाप्रकरणम् - लघुसिद्धान्तकौमुदी
- सन्धि - अच सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - हल सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - विसर्ग सन्धि (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तद्धित :- अपत्यार्थक एवं मत्वर्थीय (सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार)
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- स्त्री प्रत्यय :- लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रकरण :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रथमा विभक्ति
- कारक द्वितीया विभक्ति
- कारक तृतीया विभक्ति
- कारक चतुर्थी विभक्ति
- कारक पञ्चमी विभक्ति
- कारक षष्ठी विभक्ति
- कारक सप्तमी विभक्ति
- कारक सम्बोधन विभक्ति
- परस्मैपद एवं आत्मनेपद विधान :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।