कारक प्रकरण - पञ्चमी विभक्ति (अपादान कारक) की सम्पूर्ण व्याख्या
प्रस्तावना: संस्कृत व्याकरण में कारकों का महत्त्व
संस्कृत भाषा विश्व की सबसे वैज्ञानिक और समृद्ध भाषाओं में से एक है। इसकी वैज्ञानिकता का मुख्य आधार महर्षि पाणिनी द्वारा रचित 'अष्टाध्यायी' है। व्याकरण शास्त्र में 'कारक' वह धुरी है, जिसके चारों ओर वाक्य की संरचना घूमती है। संस्कृत में क्रिया के साथ जिसका सीधा संबंध होता है, उसे 'कारक' कहा जाता है— "क्रियान्वयित्वं कारकत्वम्"।
कारकों की श्रृंखला में 'पञ्चमी विभक्ति' का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसे मुख्य रूप से 'अपादान कारक' के रूप में जाना जाता है। अपादान का अर्थ है— 'अलग होना' (Separation)। जब कोई वस्तु किसी स्थिर या गतिशील आधार से अलग होती है, तो उस आधार को अपादान कहते हैं।
आज के इस वृहद लेख में हम पञ्चमी विभक्ति के समस्त सूत्रों, वार्तिकों और उनके गूढ़ अर्थों की विस्तार से चर्चा करेंगे।
1. ध्रुवमपायेऽपादानम् (अष्टाध्यायी 1/4/24)
वृत्ति: अपायो विश्लेषस्तस्मिन्साध्ये ध्रुवमवधिभूतं कारकं स्यात्।
हिन्दी व्याख्या:
'अपाय' का अर्थ है 'विश्लेष' या 'अलग होना'। किसी वस्तु के अलग होने की क्रिया में जो 'ध्रुव' (निश्चित या अवधिभूत आधार) होता है, उसकी 'अपादान' संज्ञा होती है।
गहन विश्लेषण:
यहाँ 'ध्रुव' शब्द का अर्थ केवल 'स्थिर' नहीं है, बल्कि वह 'अवधि' है जिससे कोई वस्तु अलग हो रही है। वह आधार स्थिर भी हो सकता है और गतिशील भी।
उदाहरण:
ग्रामादायाति (गाँव से आता है): यहाँ आने की क्रिया द्वारा व्यक्ति गाँव से अलग हो रहा है। गाँव यहाँ 'ध्रुव' या आधार है, अतः 'ग्राम' की अपादान संज्ञा हुई।
धावतोऽश्वात्पतति (दौड़ते हुए घोड़े से गिरता है): यहाँ घोड़ा गतिशील है, फिर भी वह गिरने की क्रिया का प्रारंभिक बिंदु (Point of departure) है। अतः दौड़ता हुआ घोड़ा भी 'ध्रुव' मानकर अपादान संज्ञा को प्राप्त होता है।
कारकं किम्? (कारक क्यों कहा गया?):
यदि क्रिया के साथ सीधा संबंध न हो, तो अपादान नहीं होगा। जैसे— 'वृक्षस्य पर्णं पतति' (वृक्ष का पत्ता गिरता है)। यहाँ 'वृक्ष' का संबंध 'पत्ते' से है (सम्बन्ध षष्ठी), क्रिया 'पतति' से सीधा संबंध पत्ते का है। अतः यहाँ वृक्ष की अपादान संज्ञा नहीं हुई।
2. अपादाने पञ्चमी (अष्टाध्यायी 2/3/28)
हिन्दी व्याख्या:
यह एक 'विधि सूत्र' है। जिसकी 'अपादान' संज्ञा (पिछले सूत्र से) हुई है, उसमें पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग होता है।
उदाहरण:
वृक्षात् पत्रं पतति (वृक्ष से पत्ता गिरता है)।
हिमाालयात् गङ्गा प्रभवति (हिमालय से गंगा निकलती है)।
3. वार्तिक: जुगुप्साविरामप्रमादार्थानामुपसङ्ख्यानम्
हिन्दी व्याख्या:
जुगुप्सा (घृणा), विराम (रुकना या हटना), और प्रमाद (भूल या असावधानी) अर्थ वाली धातुओं के प्रयोग में जिससे घृणा आदि की जाती है, उसकी भी अपादान संज्ञा होती है और उसमें पञ्चमी लगती है।
विस्तृत उदाहरण:
जुगुप्सा (घृणा): पापात् जुगुप्सते (वह पाप से घृणा करता है)।
नैतिक उदाहरण: "धर्मस्य ग्लानिं दृष्ट्वा सज्जनः पापात् जुगुप्सते।"
विराम (हटना/रुकना): पापात् विरमती (वह पाप से रुकता है)।
श्रीमद्भगवद्गीता का भाव: जब मनुष्य अपनी इंद्रियों को विषयों से हटाता है, तो वह 'विषयात् विरमति' कहलाता है।
प्रमाद (असावधानी): धर्मात् प्रमाद्यति (वह धर्म के कार्यों में असावधानी करता है)।
उपनिषद् वाक्य: "स्वाध्यायान्मा प्रमदः" (स्वाध्याय में प्रमाद मत करो)। यहाँ 'स्वाध्यायात्' में इसी वार्तिक से पञ्चमी हुई है।
4. भीत्रार्थानां भयहेतुः (अष्टाध्यायी 1/4/25)
वृत्ति: भयार्थानां त्राणार्थानां च प्रयोगे हेतुरपादानं स्यात्।
हिन्दी व्याख्या:
'भी' (डरना) और 'त्रा' (रक्षा करना) अर्थ वाली धातुओं के प्रयोग में जो 'भय का कारण' (Fear source) होता है, उसकी अपादान संज्ञा होती है।
उदाहरण:
चोराद् बिभेति (वह चोर से डरता है)। यहाँ डर का कारण 'चोर' है।
चोरात् त्रायते (वह चोर से रक्षा करता है)। यहाँ रक्षा का कारण (जिससे बचाना है) 'चोर' है।
भयहेतुः किम्? (भय का कारण ही क्यों?):
यदि स्थान का बोध कराना हो, न कि भय के कारण का, तो पञ्चमी नहीं होगी। जैसे— 'अरण्ये बिभेति' (जंगल में डरता है)। यहाँ 'जंगल' डर का कारण नहीं बल्कि आधार है, इसलिए यहाँ सप्तमी हुई है।
मंत्र संदर्भ:
"अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्... युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो..." यहाँ 'एनस्' (पाप) से दूर करने की प्रार्थना है, जहाँ पञ्चमी का भाव निहित है।
5. पराजेरसोढः (अष्टाध्यायी 1/4/26)
वृत्ति: पराजेः प्रयोगेऽसह्योऽर्थोऽपादानं स्यात्।
हिन्दी व्याख्या:
'परा' उपसर्ग पूर्वक 'जि' धातु (परा+जि = पराजयते) के प्रयोग में जो 'असह्य' (जो सहा न जा सके) होता है, उसकी अपादान संज्ञा होती है।
उदाहरण:
अध्ययनात् पराजयते: इसका अर्थ है— 'वह अध्ययन से भागता है' या 'अध्ययन उसे बोझ लगता है'। यहाँ अध्ययन उसके लिए 'असोढ' (असह्य) है।
सोढः किम्? (सहनीय होने पर क्या?):
यदि अर्थ 'हराना' (अभिभव) हो, तो द्वितीया होगी। जैसे— 'शत्रून पराजयते' (वह शत्रुओं को हराता है)। यहाँ शत्रु 'असह्य' नहीं बल्कि पराजित किए जाने वाले कर्म हैं।
6. वारणार्थानामीप्सितः (अष्टाध्यायी 1/4/27)
वृत्ति: प्रवृत्तिविघातो वारणम्। ईप्सितोऽपादानं स्यात्।
हिन्दी व्याख्या:
'वारण' का अर्थ है 'रोकना' या 'हटाना'। किसी को उसकी इच्छित वस्तु से दूर करने में, वह वस्तु 'अपादान' कहलाती है।
उदाहरण:
यवेभ्यो गां वारयति (जौ के खेत से गाय को हटाता है)। यहाँ गाय की प्रिय वस्तु 'यव' (जौ) है, जिससे उसे हटाया जा रहा है। अतः 'यव' में पञ्चमी हुई।
ईप्सितः किम्? (इच्छित ही क्यों?):
यदि स्थान गौण हो, तो वहाँ पञ्चमी नहीं होगी। जैसे— 'यवेभ्यो गां वारयति क्षेत्रे' (खेत में जौ से गाय को हटाता है)। यहाँ 'क्षेत्र' आधार है, ईप्सित नहीं।
7. अन्तर्धौ येनादर्शनमिच्छति (अष्टाध्यायी 1/4/28)
वृत्ति: व्यवधाने सति यत्कर्तृकस्यात्मनो दर्शनस्य अभावमिच्छति तदपादानं स्यात्।
हिन्दी व्याख्या:
जब कोई व्यक्ति स्वयं को छुपाता है, तो जिससे वह अपना 'अदर्शन' (छिपना) चाहता है, उस व्यक्ति की अपादान संज्ञा होती है।
उदाहरण:
मातुर्निलीयते कृष्णः (माता से कृष्ण छिपते हैं)। यहाँ कृष्ण अपनी माता से छिपना चाहते हैं, अतः 'मातृ' शब्द में पञ्चमी हुई।
अन्तर्धौ किम्? (छिपने का पर्दा होने पर ही क्यों?):
यदि व्यवधान या छिपने की इच्छा न हो, तो पञ्चमी नहीं होगी। जैसे— 'चौरान् दिदृक्षते' (चोरों को देखना चाहता है)। यहाँ इच्छा देखने की है, छिपने की नहीं।
8. आख्यातोपयोगे (अष्टाध्यायी 1/4/29)
वृत्ति: नियमपूर्वकविद्यास्वीकारे वक्ता प्राक्मज्ञः स्यात्।
हिन्दी व्याख्या:
जिससे 'नियमपूर्वक' विद्या ग्रहण की जाती है, उस वक्ता (गुरु/शिक्षक) की अपादान संज्ञा होती है।
उदाहरण:
उपाध्यायादधीते (उपाध्याय से पढ़ता है)। यहाँ शिक्षा एक व्यवस्थित ढंग से ली जा रही है।
उपयोगे किम्? (नियमपूर्वक न होने पर?):
यदि केवल कोई बात सुनी जाए बिना किसी नियम के, तो षष्ठी होगी। जैसे— 'नटस्य गाथां शृणोति' (नट की गाथा सुनता है)। यहाँ कोई व्यवस्थित विद्या ग्रहण नहीं हो रही है।
9. जनिकर्तुः प्रकृतिः (अष्टाध्यायी 1/4/30)
वृत्ति: जायमानस्य हेतुः अपादानं स्यात्।
हिन्दी व्याख्या:
'जन' (उत्पन्न होना) धातु के कर्ता का जो 'मूल कारण' (Progenitor/Source) होता है, उसे अपादान कहते हैं।
उदाहरण:
ब्रह्मणः प्रजाः प्रजायन्ते (ब्रह्मा से प्रजा उत्पन्न होती है)। यहाँ प्रजा के उत्पन्न होने का मूल कारण 'ब्रह्मा' हैं।
गोमयात् वृश्चिको जायते (गोबर से बिच्छू उत्पन्न होता है - प्राचीन मान्यतानुसार)।
10. भुवः प्रभवः (अष्टाध्यायी 1/4/31)
वृत्ति: भूकर्तुः प्रभवस्तथा।
हिन्दी व्याख्या:
'भू' धातु के कर्ता का जो 'प्रभव' (उत्पत्ति स्थान या जहाँ वह सबसे पहले दिखाई दे) होता है, उसकी अपादान संज्ञा होती है।
उदाहरण:
हिमवतो गङ्गा प्रभवति (हिमालय से गंगा निकलती है)। गंगा हिमालय में उत्पन्न नहीं होती (वह तो विष्णु पद से आती है), पर हिमालय वह स्थान है जहाँ वह सबसे पहले 'प्रकट' होती है।
11. ल्यब्लोपे कर्मण्यधिकरणे च (वार्तिक)
हिन्दी व्याख्या:
जहाँ 'ल्यप्' प्रत्ययान्त क्रिया (जैसे— आरुह्य, विलोक्य) छिपी हुई हो (लोप हो), वहाँ उसके 'कर्म' या 'अधिकरण' में पञ्चमी विभक्ति होती है।
उदाहरण:
प्रासादात् प्रेक्षते (महल से देखता है)। इसका वास्तविक अर्थ है— 'प्रासादम् आरुह्य प्रेक्षते' (महल पर चढ़कर देखता है)। यहाँ 'प्रासाद' जो कर्म था, ल्यप् के लोप होने पर पञ्चमी में बदल गया।
आसनात् प्रेक्षते (आसन से देखता है)। अर्थ— 'आसने उपविश्य प्रेक्षते' (आसन पर बैठकर देखता है)।
श्वशुरान्जिहेति (ससुर से शरमाती है)। अर्थ— 'श्वशुरं वीक्ष्य जिहेति' (ससुर को देखकर लजाती है)।
12. दिशा, काल और मार्ग वाचक विशेष नियम
वार्तिक: "यतश्चाध्वकालनिमानं तत्र पञ्चमी"
जहाँ से मार्ग (दूरी) या समय की गणना की जाए, उसमें पञ्चमी होती है।
वनाद् ग्रामो योजनम् (वन से गाँव एक योजन दूर है)।
वार्तिक: "तद्युक्तादध्वनः प्रथमासप्तम्यौ"
उस मार्गवाचक शब्द में प्रथमा या सप्तमी होती है।
वनाद् ग्रामो योजनं योजने वा।
वार्तिक: "कालात्सप्तमी च वक्तव्या"
समयवाचक शब्दों में सप्तमी भी होती है।
कार्तिक्या आग्रहायणी मासः (कार्तिक पूर्णिमा से मार्गशीर्ष मास एक महीने की दूरी पर है)।
13. अन्यारादितरर्ते दिक्शब्दाञ्चूत्तरपदाजाहियुक्ते (2/3/29)
हिन्दी व्याख्या:
निम्नलिखित शब्दों के योग में पञ्चमी विभक्ति होती है:
अन्य/इतर/भिन्न: (दूसरा/अलग) - कृष्णात् अन्यः।
आरात्: (निकट या दूर) - वनात् आरात्।
ऋते: (बिना) - ऋते कृष्णात् न मुक्तिः (कृष्ण के बिना मुक्ति नहीं)।
दिक्शब्द (दिशावाची): पूर्वा ग्रामात् (गाँव के पूर्व)।
अञ्चूत्तरपद: जहाँ 'अञ्चु' धातु अन्त में हो (जैसे— प्राक्, प्रत्यक्)।
आहि युक्त: (जैसे— दक्षिणाहि, उत्तराहि)।
विशेष: कालवाचक शब्दों में भी इसका प्रयोग होता है, जैसे— 'चैत्रात् पूर्वः फाल्गुनः'।
14. कर्मप्रवचनीय सम्बन्धी सूत्र
सूत्र: अपपरी वर्जने (1/4/88)
'अप' और 'परि' जब 'वर्जन' (छोड़ने) के अर्थ में हों, तो उनकी कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है।
सूत्र: आङ् मर्यादावचने (1/4/89)
'आ' (आङ्) की मर्यादा (तक) और अभिविधि (व्याप्ति) के अर्थ में कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है।
सूत्र: पञ्चम्यपाङ्गरिभिः (2/3/10)
अप, परि और आङ् के योग में पञ्चमी विभक्ति होती है।
अप हरेः / परि हरेः संसारः (हरि को छोड़कर संसार)।
आमुक्तेः संसारः (मुक्ति तक संसार है)।
आसकलात् ब्रह्म (ब्रह्म सब में व्याप्त है)।
15. प्रतिनिधि और प्रतिदान (2/3/11)
सूत्र: प्रतिः प्रतिनिधिप्रतिदानयोः
'प्रति' शब्द जब 'प्रतिनिधि' (Substitute) या 'प्रतिदान' (Exchange) के अर्थ में हो, तो कर्मप्रवचनीय कहलाता है।
सूत्र: प्रतिनिधिप्रतिदाने च यस्मात्
जिसके प्रतिनिधि या जिसके बदले में कुछ दिया जाए, उसमें पञ्चमी होती है।
प्रद्युम्नः कृष्णात् प्रति (प्रद्युम्न कृष्ण के प्रतिनिधि हैं)।
तिलेभ्यः प्रतियच्छति माषान् (तिल के बदले उड़द देता है)।
16. अकर्तर्पणे पञ्चमी (2/3/24)
हिन्दी व्याख्या:
यदि 'ऋण' (कर्ज) हेतु (कारण) हो, और वह कर्ता न हो, तो उसमें पञ्चमी होती है।
शताद् बद्धः (सौ रुपये के कर्ज के कारण बँधा हुआ है)।
यदि कर्ता हो तो: 'शतेन बन्धितः' (सौ रुपयों ने बँधवा दिया - यहाँ तृतीया होगी)।
17. विभाषा गुणेऽस्त्रियाम् (2/3/25)
हिन्दी व्याख्या:
हेतु (कारण) यदि 'गुणवाचक' हो और 'स्त्रीलिंग' न हो, तो विकल्प से पञ्चमी या तृतीया होती है।
जाड्याद् बद्धः / जाड्येन बद्धः (जड़ता या मूर्खता के कारण बँधा है)।
गुणे किम्? 'धनेन कुलम्' (यहाँ धन द्रव्य है, गुण नहीं, अतः केवल तृतीया)।
अस्त्रियां किम्? 'बुद्ध्या मुक्तः' (बुद्धि स्त्रीलिंग है, अतः केवल तृतीया)।
18. पृथग्विनानानाभिस्तृतीयाऽन्यतरस्याम् (2/3/32)
हिन्दी व्याख्या:
पृथक् (अलग), विना (बिना) और नाना (विविध/बिना) शब्दों के योग में विकल्प से द्वितीया, तृतीया या पञ्चमी विभक्ति होती है।
रामेण पृथक् / रामात् पृथक् / रामं पृथक्।
इसी प्रकार: विना रामम् / रामेण / रामात्।
प्रसिद्ध श्लोक सन्दर्भ:
"विना वेदं विना गीतां विना रामायणीं कथाम्। भारतं भारतं नाहि..." यहाँ द्वितीया का प्रयोग है, किन्तु पञ्चमी भी व्याकरण सम्मत है।
19. स्तोकाल्पकृच्छ्रकतिपयस्य (2/3/33)
हिन्दी व्याख्या:
'स्तोक' (थोड़ा), 'अल्प', 'कृच्छ्र' (कठिनाई) और 'कतिपय' शब्दों का प्रयोग यदि 'करण' कारक में हो (और वे द्रव्यवाचक न हों), तो पञ्चमी और तृतीया होती है।
स्तोकैन् मुक्तः / स्टोकाद्वा मुक्तः (थोड़े ही प्रयास से मुक्त हो गया)।
20. दूरान्तिकार्थेभ्यो द्वितीया च (2/3/35)
हिन्दी व्याख्या:
'दूर' और 'अन्तिक' (पास) अर्थ वाले शब्दों के योग में द्वितीया, तृतीया और पञ्चमी (तथा सप्तमी भी) विभक्तियाँ होती हैं।
ग्रामस्य दूरम् / दूरात् / दूरेण / दूरे।
अन्तिकम् / अन्तिकात् / अन्तिकेन / अन्तिके।
निष्कर्ष: पञ्चमी विभक्ति का आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक पक्ष
संस्कृत व्याकरण की पञ्चमी विभक्ति केवल नियमों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह अलगाव से लेकर उत्पत्ति तक के जीवन चक्र को दर्शाती है। उपनिषदों का प्रसिद्ध शांति मंत्र:
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।"
यहाँ 'पूर्णात्' में पञ्चमी विभक्ति है, जो यह दर्शाती है कि पूर्ण (परमात्मा) से पूर्ण (जगत) की उत्पत्ति होने पर भी मूल पूर्ण बना रहता है। यह 'भुवः प्रभवः' और 'जनिकर्तुः प्रकृतिः' के सिद्धांतों का ही आध्यात्मिक विस्तार है।
यह ब्लॉग पोस्ट पञ्चमी विभक्ति के समस्त आयामों को समाहित करती है। विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए यह 'कारक प्रकरण' का एक प्रामाणिक दस्तावेज सिद्ध होगा।
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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।