संस्कृत व्याकरण विमर्श: कारक प्रकरण – सप्तमी विभक्ति एवं क्रिया पद विचार (विस्तृत व्याख्या)
प्रस्तावना: व्याकरण का महत्व
संस्कृत साहित्य में व्याकरण को 'वेदाङ्ग' माना गया है। मुखं व्याकरणं स्मृतम् – अर्थात् व्याकरण वेद रूपी पुरुष का मुख है। महर्षि पाणिनी द्वारा रचित 'अष्टाध्यायी' संस्कृत भाषा को अनुशासित करने वाला सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है। इसी ग्रंथ के 'कारक प्रकरण' में विभक्तियों के प्रयोग का वैज्ञानिक विवेचन मिलता है। आज के इस विशेष लेख में हम सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक) के सूत्रों, वार्तिकों और उनके व्यावहारिक उदाहरणों का गहन अध्ययन करेंगे। साथ ही, परस्मैपद और आत्मनेपद के विशिष्ट नियमों को भी समझेंगे।
भाग 1: अधिकरण कारक और सप्तमी विभक्ति
कारक का अर्थ है – 'क्रियान्वयित्वं कारकत्वम्' (जिसका क्रिया के साथ सीधा संबंध हो)। सप्तमी विभक्ति मुख्य रूप से 'आधार' को प्रकट करती है।
1. आधार की परिभाषा: सूत्र - आधारोऽधिकरणम् (1/4/45)
वृत्ति: कर्तृकर्मद्वारा तन्निष्ठक्रियाया आधारः कारकम अधिकरणमज्ञ स्यात्।
हिन्दी व्याख्या: कर्ता या कर्म के माध्यम से क्रिया जिसमें रहती है, उस 'आधार' की 'अधिकरण' संज्ञा होती है। सरल शब्दों में, क्रिया के होने के स्थान या समय को आधार कहते हैं।
आधार के तीन प्रकार (आधारस्त्रिधा):
व्याकरण शास्त्र में आधार को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है:
औपश्लेषिक आधार (Physical Attachment): जहाँ आधार और आधेय (वस्तु) का भौतिक जुड़ाव हो।
उदाहरण: कटे आस्ते (चटाई पर बैठता है)। यहाँ बैठने की क्रिया का आधार चटाई है और शरीर का चटाई से भौतिक स्पर्श है।
उदाहरण: स्थाल्या पचति (बटलोई/पतीली में पकाता है)। यहाँ पकाने की क्रिया का आधार पात्र है।
वैषयिक आधार (Subjective/Abstract Basis): जहाँ भौतिक जुड़ाव न होकर विषयगत संबंध हो।
उदाहरण: मोक्षे इच्छास्ति (मोक्ष में इच्छा है)। यहाँ इच्छा का विषय 'मोक्ष' है, यह कोई भौतिक स्थान नहीं है।
अभिव्यापक आधार (All-pervasive Basis): जहाँ आधेय अपने आधार के कण-कण में व्याप्त हो।
उदाहरण: सर्वस्मिन्नात्मास्ति (सब में आत्मा है)। आत्मा शरीर के किसी एक हिस्से में नहीं, बल्कि सर्वत्र व्याप्त है।
उदाहरण: तिलेषु तैलम् (तिलों में तेल है)।
2. सप्तमी विभक्ति का विधान: सूत्र - सप्तम्यधिकरणे च (2/3/36)
वृत्ति: अधिकरणे सप्तमी स्यात्। चकाराद्दूरान्तिकार्थेभ्यः।
हिन्दी व्याख्या: जिसकी अधिकरण संज्ञा हुई है, उसमें सप्तमी विभक्ति होती है। सूत्र में 'च' शब्द के प्रयोग से यह भी स्पष्ट होता है कि 'दूर' और 'अन्तिक' (पास) अर्थ वाले शब्दों में भी सप्तमी का प्रयोग होता है।
विशेष तथ्य: दूर और अन्तिक शब्दों के योग में द्वितीय, तृतीय, पंचमी और सप्तमी – ये चार विभक्तियाँ होती हैं।
उदाहरण: वनस्य दूरे अन्तिके वा (वन के दूर या पास)।
3. विशेष वार्तिक एवं प्रयोग
क. क्तस्येन्विषयस्य कर्मण्युपसङ्ख्यानम्
व्याख्या: यदि किसी 'क्त' प्रत्ययान्त शब्द में 'इनि' प्रत्यय लगा हो, तो उसके कर्म में सप्तमी विभक्ति होती है।
उदाहरण: अधीती व्याकरणे (जिसने व्याकरण पढ़ लिया है)।
यहाँ 'अधीत' (क्त) + 'इनि' = अधीती बना है, अतः इसके कर्म 'व्याकरण' में सप्तमी हुई।
ख. साध्वसाधुप्रयोगे च
व्याख्या: 'साधु' (अच्छा) और 'असाधु' (बुरा) शब्दों के प्रयोग में जिसके प्रति अच्छा या बुरा व्यवहार किया जाए, उसमें सप्तमी होती है।
उदाहरण (साधु): साधुः कृष्णो मातरि (कृष्ण अपनी माता के लिए अच्छे हैं)।
उदाहरण (असाधु): असाधुर्मातुले (कृष्ण अपने मामा कंस के लिए बुरे हैं)।
ग. निमित्तात्कर्मयोगे
वृत्ति: निमित्तमिह फलम्। योगः संयोगसमवायात्मक।
व्याख्या: जिस फल (प्रयोजन) के लिए कोई क्रिया की जा रही हो, यदि वह फल उस क्रिया के कर्म के साथ भौतिक रूप से (संयोग या समवाय संबंध से) जुड़ा हो, तो उस फलवाचक शब्द में सप्तमी होती है।
इस संदर्भ में यह प्रसिद्ध श्लोक स्मरणीय है:
चर्मणि द्वीपिनं हन्ति दन्तयोर्हन्ति कुञ्जरम् ।
केशेषु चमरी हन्ति सीनि पुष्कलको हतः ॥
अर्थ:
चर्मणि द्वीपिनं हन्ति: खाल के लिए चीते को मारता है। (खाल चीते के शरीर से जुड़ी है)।
दन्तयोर्हन्ति कुञ्जरम्: दाँतों के लिए हाथी को मारता है।
केशेषु चमरी हन्ति: बालों (पूँछ के बाल) के लिए चमरी गाय को मारता है।
सीनि पुष्कलको हतः: कस्तूरी के लिए मृग (पुष्कलक) मारा जाता है।
भाग 2: भावलक्षण और अनादर के नियम
1. क्रिया से क्रिया का ज्ञान: सूत्र - यस्य च भावेन भावलक्षणम् (2/3/37)
वृत्ति: यस्य क्रियया क्रियान्तर लक्ष्यते तत् सप्तमी स्यात्।
हिन्दी व्याख्या: जब एक क्रिया के होने से दूसरी क्रिया के होने का पता चलता है, तो पहले समाप्त होने वाली क्रिया और उसके कर्ता में सप्तमी विभक्ति होती है। इसे 'सति सप्तमी' भी कहा जाता है।
उदाहरण: गोषु दुह्यमानासु गतः (जब गाएँ दुही जा रही थीं, तब वह गया)। यहाँ जाने की क्रिया का ज्ञान दोहन क्रिया से हो रहा है।
वार्तिक: अर्हाणां कर्तृत्वेऽनर्हाणामकर्तृत्वे तद्वैपरीत्ये च
यह वार्तिक योग्य (सज्जन) और अयोग्य (दुर्जन) की क्रियाओं के परस्पर संबंधों को दर्शाता है।
सत्सु तरत्सु असन्त आसते (सज्जनों के तैर जाने पर दुर्जन बैठे रहते हैं)।
असत्सु तिष्ठत्सु सन्तस्तरन्ति (दुर्जनों के बैठे रहने पर सज्जन तैर जाते हैं)।
2. अनादर अर्थ में विभक्ति: सूत्र - षष्ठी चानादरे (2/3/38)
वृत्ति: अनादराधिको भावलक्षणे षष्ठीसप्तम्यौ स्तः।
हिन्दी व्याख्या: जिसका अनादर करके कोई कार्य किया जाता है, उसमें षष्ठी और सप्तमी दोनों विभक्तियाँ होती हैं।
उदाहरण: रुदति रुदतो वा प्राब्राजीत् (रोते हुए पुत्र आदि का अनादर करके वह संन्यासी हो गया)। यहाँ 'रुदति' (सप्तमी) और 'रुदतः' (षष्ठी) दोनों सही हैं।
भाग 3: स्वामित्व, निपुणता और निर्धारण
1. स्वामित्व बोधक शब्द: सूत्र - स्वामीश्वराधिपतिदायादसाक्षिप्रतिभूप्रसूतैश्च (2/3/39)
व्याख्या: स्वामी, ईश्वर, अधिपति, दायाद (उत्तराधिकारी), साक्षी, प्रतिभू (जमानती) और प्रसूत (उत्पन्न) शब्दों के योग में षष्ठी और सप्तमी दोनों विभक्तियाँ होती हैं।
उदाहरण: गवां गोषु वा स्वामी (गायों का स्वामी)।
2. चतुरता और निपुणता: सूत्र - आयुक्तकुशलाभ्यां चासेवायाम् (2/3/40)
व्याख्या: 'आयुक्त' (लगा हुआ) और 'कुशल' (निपुण) शब्दों के योग में यदि तात्पर्य 'तत्परता' से हो, तो षष्ठी और सप्तमी होती है।
उदाहरण: आयुक्तः कुशलो वा हरिपूजने हरिपूजनस्य वा (हरि की पूजा में लगा हुआ या निपुण)।
3. निर्धारण (Selection): सूत्र - यतश्च निर्धारणम् (2/3/41)
हिन्दी व्याख्या: जब किसी समुदाय (Group) में से किसी एक को उसकी जाति, गुण, क्रिया या संज्ञा के आधार पर श्रेष्ठ या अलग बताया जाए, तो उस समुदायवाचक शब्द में षष्ठी या सप्तमी होती है।
जाति: नृणां नृषु वा ब्राह्मणः श्रेष्ठः। (मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है)।
गुण: गवां गोषु वा कृष्णा बहुक्षीरा। (गायों में काली गाय अधिक दूध देने वाली है)।
क्रिया: गच्छतां गच्छत्सु वा धावन शीघ्रः। (जाते हुओं में दौड़ने वाला तेज है)।
संज्ञा: छात्राणां छात्रेषु वा मैत्रः पटुः। (छात्रों में मैत्र चतुर है)।
विशेष सूत्र - पञ्चमी विभक्ते (2/3/42): जब केवल दो के बीच भेद दिखाया जाए (विभाजन), तब पंचमी होती है।
उदाहरण: माथुराः पाटलिपुत्रकेभ्यः आढ्यतराः (मथुरा के लोग पाटलिपुत्र के लोगों से अधिक धनवान हैं)।
4. साधु और निपुण के विशेष नियम: सूत्र - साधुनिपुणाभ्यामर्चायां सप्तम्यप्रतेः (2/3/43)
व्याख्या: 'साधु' और 'निपुण' शब्दों के योग में सप्तमी होती है यदि 'अर्चा' (आदर) प्रकट करना हो। लेकिन यदि 'प्रति' शब्द का प्रयोग हो, तो सप्तमी नहीं होती।
उदाहरण: मातरि साधुर्निपुणो वा (माता के प्रति अच्छा या निपुण)।
यदि आदर न हो: निपुणो राज्ञो भृत्यः (राजा का चतुर नौकर)। यहाँ केवल कार्यकुशलता की बात है, पूज्यता की नहीं।
भाग 4: अन्य विशेष सूत्र
प्रसितोत्सुकाभ्यां तृतीया च (2/3/44): 'प्रसित' (संलग्न) और 'उत्सुक' शब्दों के साथ तृतीया और सप्तमी होती है।
उदाहरण: हरिणा हरौ वा प्रसितः/उत्सुकः।
नक्षत्रे च लुपि (2/3/45): नक्षत्र वाचक शब्दों में जहाँ प्रत्यय का लोप (लुप्) हुआ हो, वहाँ तृतीया और सप्तमी होती है।
उदाहरण: मूलेनावाहयेद्देवीं श्रवणेन विसर्जयेत् (मूल नक्षत्र में आवाहन और श्रवण में विसर्जन)।
सप्तमीपञ्चम्यौ कारकमध्ये (2/3/7): दो कार्यों या दो स्थानों के बीच की दूरी या समय बताने के लिए सप्तमी और पंचमी होती है।
उदाहरण: अद्य भुक्त्वाऽयं व्यहे व्यहाद्वा भोक्ता (आज खाकर यह दो दिन बाद खाएगा)।
भाग 5: परस्मैपद एवं आत्मनेपद प्रक्रिया
धातुओं के साथ लगने वाले प्रत्यय दो प्रकार के होते हैं: परस्मैपद (तिप्, तस्, झि...) और आत्मनेपद (त, आताम्, झ...).
प्रमुख सूत्र एवं उदाहरण:
अनुपराभ्यां कृञः: 'कृ' धातु से पहले 'अनु' या 'परा' उपसर्ग हो, तो परस्मैपद होता है।
उदाहरण: अनुकरोति (नकल करता है), पराकरोति।
अभिप्रत्यतिभ्यः क्षिपः: 'क्षिप्' धातु से पहले अभि, प्रति, अति हो, तो परस्मैपद।
प्राद्वहः: 'वह' धातु से पहले 'प्र' हो, तो परस्मैपद।
व्याङ्परिभ्यो रमः: वि, आङ्, परि उपसर्गों के बाद 'रम्' धातु परस्मैपद में होती है।
उदाहरण: विरमति, आरमति, परिरमति।
विभाषाऽकर्मकात्: अकर्मक धातुओं के साथ विकल्प से आत्मनेपद होता है।
उदाहरण: उपरमति या उपरमते।
ण्यन्त (Causal) प्रक्रिया में प्रयोग:
जब कर्ता स्वयं कार्य न करके किसी से करवाता है (णिच् प्रत्यय), तो वहां भी पद परिवर्तन होता है।
उदाहरण: बोधयति पद्मम् (सूरज कमल को खिलाता है)।
उदाहरण: जनयति सुखम् (सुख उत्पन्न करता है)।
उदाहरण: शाययति (सोने के लिए प्रेरित करता है)।
निष्कर्ष
कारक प्रकरण का 'सप्तमी विभक्ति' खंड अत्यंत व्यापक है। यह न केवल स्थान और काल का बोध कराता है, बल्कि अनादर, तुलना, श्रेष्ठता और विशेषणों के आधार पर भाषा को सजीव बनाता है। पाणिनी के ये सूत्र गणितीय सटीकता के साथ संस्कृत भाषा की संरचना को स्पष्ट करते हैं।
मन्त्र एवं कल्याण वाक्य:
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।