संस्कृत व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन: संज्ञा प्रकरण और वैज्ञानिक विश्लेषण
प्रस्तावना: व्याकरण का महत्त्व
संस्कृत भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक पूर्णतः वैज्ञानिक संरचना है। भारतीय मनीषा में व्याकरण को 'वेदांग' माना गया है। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष—इन छह वेदांगों में व्याकरण का स्थान सर्वोपरि है। व्याकरण के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए कहा गया है:
मुखं व्याकरणं स्मृतम्।
अर्थात्, व्याकरण वेद पुरुष का मुख है। जिस प्रकार मुख के बिना वाणी का प्रकटीकरण और आहार का ग्रहण संभव नहीं है, उसी प्रकार व्याकरण के बिना वेदों और शास्त्रों के वास्तविक अर्थ को समझना असंभव है। व्याकरण केवल शब्दों की व्युत्पत्ति नहीं सिखाता, बल्कि यह बुद्धि को परिष्कृत करने का एक "योग" है। महाभाष्यकार महर्षि पतंजलि कहते हैं— "लक्ष्यलक्षणे व्याकरणम्"।
आज के इस विशेष लेख में हम 'संस्कृतप्रति' के अंतर्गत व्याकरण के उन विशिष्ट संज्ञा सूत्रों का गहराई से अध्ययन करेंगे, जो न केवल अकादमिक परीक्षाओं (जैसे UGC NET, JRF, MA, BA) के लिए अनिवार्य हैं, बल्कि संस्कृत की सूक्ष्म संरचना को समझने की कुंजी भी हैं।
1. संहिता संज्ञा (Samhita Sanjna)
संस्कृत व्याकरण में 'संहिता' का अर्थ अत्यंत व्यापक है। जब हम संधि करते हैं, तो वह संहिता के कारण ही संभव होती है।
सूत्रम्: परः सन्निकर्षः संहिता (1/1/109)
वृत्ति: वर्णानामतिशयितः सन्निधिः संहिता संज्ञा स्यात्।
हिन्दी अर्थ: वर्णों की अत्यंत समीपता या सन्निकटता को 'संहिता' कहते हैं।
विस्तृत व्याख्या:
जब दो वर्णों के बीच में कोई भी व्यवधान (जैसे समय का अंतराल या अन्य वर्ण का हस्तक्षेप) न हो और वे इतनी तेजी से बोले जाएं कि उनकी ध्वनियाँ आपस में मिल सकें, तो उस स्थिति को 'संहिता' कहते हैं। संहिता के होने पर ही संधि के नियम लागू होते हैं।
उदाहरण:
सुधी + उपास्यः: यहाँ 'ई' और 'उ' के बीच में कोई अन्य वर्ण नहीं है, अतः यहाँ संहिता है। इसी संहिता के कारण यहाँ 'इको यणचि' सूत्र से संधि होकर 'सुध्युपास्यः' बनता है।
मघु + अरिः: यहाँ 'उ' और 'अ' की संहिता होने पर 'मध्वरिः' बनता है।
2. संयोग संज्ञा (Samyoga Sanjna)
संयोग संज्ञा का संबंध केवल व्यंजनों (हलों) से है।
सूत्रम्: हलोऽनन्तराः संयोगः (1/1/7)
वृत्ति: अज्भिरव्यवहिता हलः संयोगसंज्ञाः स्युः।
हिन्दी अर्थ: जब दो या दो से अधिक 'हल' (व्यंजन) वर्णों के बीच में किसी भी 'अच्' (स्वर) का व्यवधान नहीं होता, तो उन व्यंजनों के समूह को 'संयोग' कहा जाता है।
उदाहरण:
इन्द्र (Indra): इसमें 'न्', 'द्' और 'र्' के बीच कोई स्वर नहीं है। अतः 'न्-द्-र्' का यह समूह संयोग संज्ञक है।
अग्नि (Agni): यहाँ 'ग्' और 'न्' के बीच कोई स्वर नहीं है, अतः यहाँ संयोग है।
महत्त्व: छन्द शास्त्र में संयोग से पूर्व वाला लघु वर्ण भी 'गुरु' माना जाता है।
संयोगे गुरु।
3. गुण संज्ञा (Guna Sanjna)
संस्कृत व्याकरण में 'गुण' एक विशिष्ट संज्ञा है, जो संधि और प्रत्यय विधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
सूत्रम्: अदेङ् गुणः (1/1/2)
वृत्ति: अत् एङ् च गुणसंज्ञः स्यात्।
हिन्दी अर्थ: 'अत्' (ह्रस्व अ) और 'एङ्' प्रत्याहार (ए, ओ) की गुण संज्ञा होती है।
विश्लेषण:
गुण संज्ञा के अंतर्गत कुल तीन वर्ण आते हैं:
अ (ह्रस्व)
ए
ओ
उदाहरण:
'उप + इन्द्रः' में 'अ' और 'इ' के स्थान पर 'ए' आदेश होता है (उपेन्द्रः)। यहाँ 'ए' की गुण संज्ञा है।
'गंगा + उदकम्' में 'आ' और 'उ' के स्थान पर 'ओ' आदेश होता है (गंगोदकम्)।
4. वृद्धि संज्ञा (Vriddhi Sanjna)
वृद्धि, गुण का ही एक विस्तारित रूप है।
सूत्रम्: वृद्धिरादैच् (1/1/1)
वृत्ति: आदैच्च वृद्धिसंज्ञः स्यात्।
हिन्दी अर्थ: 'आत्' (दीर्घ आ) और 'ऐच्' प्रत्याहार (ऐ, औ) की वृद्धि संज्ञा होती है।
विश्लेषण:
पाणिनी ने अपनी अष्टाध्यायी का प्रारंभ इसी 'वृद्धि' शब्द से किया है, जिसे मंगलसूचक माना जाता है। वृद्धि संज्ञक वर्ण हैं:
आ
ऐ
औ
उदाहरण:
तत्र + एव = तत्रैव (यहाँ 'ऐ' की वृद्धि संज्ञा है)।
महा + औषधि = महौषधि (यहाँ 'औ' की वृद्धि संज्ञा है)।
5. प्रातिपदिक संज्ञा (Pratipadika Sanjna)
यह संज्ञा अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बिना किसी भी शब्द के रूप (सुबन्त) नहीं चलाए जा सकते।
प्रथम सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् (1/2/45)
वृत्ति: धातुं प्रत्ययं प्रत्ययान्तं च वर्जयित्वा अर्थवच्छब्दस्वरूपं प्रातिपदिकसंज्ञं स्यात्।
अर्थ: धातु, प्रत्यय और प्रत्ययान्त शब्दों को छोड़कर जो भी 'अर्थवान' (Meaningful) शब्द स्वरूप हैं, उनकी प्रातिपदिक संज्ञा होती है। जैसे— 'राम', 'कृष्ण', 'लता'।
द्वितीय सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च (1/2/46)
वृत्ति: कृत्तद्धितान्तौ समासाश्च तथा स्युः।
अर्थ: कृदन्त (Krit), तद्धितान्त (Taddhita) और समास (Samasa) युक्त शब्दों की भी प्रातिपदिक संज्ञा होती है।
उदाहरण:
'दशरथपुत्र' एक सामासिक शब्द है, अतः इसकी प्रातिपदिक संज्ञा होगी और फिर इसमें 'सु' आदि प्रत्यय लगेंगे।
6. नदी संज्ञा (Nadi Sanjna)
सूत्रम्: यू ख्याख्यौ नदी (1/4/3)
वृत्ति: ईदृदन्तौ नित्यस्त्रीलिङ्गो नदीसंज्ञौ स्तः।
हिन्दी अर्थ: दीर्घ ईकारान्त (ई) और दीर्घ ऊकारान्त (ऊ) शब्द, जो नित्य स्त्रीलिंग हों, उनकी 'नदी' संज्ञा होती है।
उदाहरण:
गौरी, लक्ष्मी, नदी: ये शब्द ईकारान्त और स्त्रीलिंग हैं, अतः नदी संज्ञक हैं।
वधू: यह ऊकारान्त और स्त्रीलिंग है, अतः नदी संज्ञक है।
7. घि संज्ञा (Ghi Sanjna)
सूत्रम्: शेषो घ्यसखि (1/4/7)
वृत्ति: ह्रस्वो याविदुतौ तदन्त सखिवर्ज घिसंज्ञम्।
हिन्दी अर्थ: सखि शब्द को छोड़कर शेष सभी ह्रस्व इकारान्त और ह्रस्व उकारान्त शब्दों की 'घि' संज्ञा होती है।
उदाहरण:
हरि, कवि, भानु, गुरु: ये सभी घि संज्ञक हैं।
अपवाद: 'सखि' शब्द की घि संज्ञा नहीं होती (विशेष स्थितियों को छोड़कर)।
8. उपधा संज्ञा (Upadha Sanjna)
यह संज्ञा व्याकरण की प्रक्रिया में वर्णों की स्थिति बताने के लिए प्रयुक्त होती है।
सूत्रम्: अलोऽन्त्यात्पूर्व उपधा (1/1/65)
वृत्ति: अन्त्यादलः पूर्वो वर्ण उपधासंज्ञः।
हिन्दी अर्थ: किसी शब्द के अंतिम वर्ण (चाहे वह स्वर हो या व्यंजन) से ठीक पहले वाले वर्ण को 'उपधा' कहते हैं।
उदाहरण:
राजन (Rājan): यहाँ अंतिम वर्ण 'न्' है। 'न्' से पूर्व 'अ' (ज् + अ) है। अतः 'अ' की उपधा संज्ञा है।
पठ् (Path): अंतिम 'ठ्' से पूर्व 'अ' उपधा है।
9. अपृक्त संज्ञा (Aprukta Sanjna)
सूत्रम्: अपृक्त एकाल् प्रत्ययः (1/2/41)
वृत्ति: एका प्रत्ययो यः सोऽपृक्तसंज्ञः स्यात्।
हिन्दी अर्थ: ऐसा प्रत्यय जिसमें केवल एक ही 'अल्' (वर्ण) शेष बचता हो, उसे 'अपृक्त' कहते हैं।
उदाहरण:
जब हम 'हल्' शब्दों से परे 'सु' प्रत्यय लगाते हैं और 'उ' का लोप हो जाता है, तो बचा हुआ 'स्' अपृक्त कहलाता है।
10. गति संज्ञा (Gati Sanjna)
सूत्रम्: गतिश्च (1/4/60)
वृत्ति: प्रादयः क्रियायोगे गतिसंज्ञाः स्युः।
हिन्दी अर्थ: 'प्र' आदि उपसर्गों की जब क्रिया के साथ योग (सम्बन्ध) होता है, तब उनकी 'गति' संज्ञा होती है।
महत्त्व: गति संज्ञा होने पर ही 'ल्यप्' प्रत्यय आदि का प्रयोग संभव होता है। जैसे— 'प्र + नमति = प्रणमति'।
11. पद संज्ञा (Pada Sanjna)
संस्कृत व्याकरण का सुप्रसिद्ध सिद्धांत है— "नापदं शास्त्रे प्रयुञ्जीत" (बिना पद बनाए शब्द का प्रयोग शास्त्र में न करें)।
सूत्रम्: सुप्तिङन्तं पदम् (1/4/14)
वृत्ति: सुबन्तं तिङन्तं च पदसंज्ञं स्यात्।
हिन्दी अर्थ: सुप् (शब्द रूप के 21 प्रत्यय) और तिङ् (धातु रूप के 18 प्रत्यय) जिसके अंत में हों, उसे 'पद' कहते हैं।
उदाहरण:
'राम' केवल प्रातिपदिक है, लेकिन जब इसमें 'सु' जुड़कर 'रामः' बनता है, तब वह पद है।
'पठ्' धातु है, लेकिन 'पठति' पद है।
12. विभाषा संज्ञा (Vibhasha Sanjna)
विभाषा का अर्थ है— विकल्प (Choice)।
सूत्रम्: न वेति विभाषा (1/1/43)
हिन्दी अर्थ: 'न' (निषेध) और 'वा' (विकल्प) की 'विभाषा' संज्ञा होती है। अर्थात् जहाँ किसी कार्य का होना या न होना दोनों ही व्याकरण सम्मत हों।
13. सवर्ण संज्ञा (Savarna Sanjna)
यह सूत्र ध्वनिविज्ञान (Phonetics) की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सूत्रम्: तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् (1/1/8)
वृत्ति: ताल्वादिस्थानमाभ्यन्तरप्रयत्नश्चेत्येतद्वयं यस्य येन तुल्यं तन्मिथः सवर्णसंज्ञं स्यात्।
हिन्दी अर्थ: जिन वर्णों का उच्चारण स्थान (जैसे कण्ठ, तालु आदि) और आभ्यन्तर प्रयत्न—ये दोनों समान हों, उनकी आपस में 'सवर्ण' संज्ञा होती है।
उदाहरण:
'अ' और 'आ' दोनों का स्थान कण्ठ है और प्रयत्न समान है, अतः ये सवर्ण हैं।
वार्तिक: 'ऋऌवर्णयोर्मिथः सावर्ण्यं वाच्यम्'— ऋ और ऌ की भी परस्पर सवर्ण संज्ञा मानी जाती है।
14. टि संज्ञा (Ti Sanjna)
सूत्रम्: अचोऽन्त्यादि टि (1/1/64)
वृत्ति: अचा मध्ये योऽन्त्यः स आदिर्यस्य तत् टिसंज्ञं स्यात्।
हिन्दी अर्थ: किसी शब्द के स्वरों (अचों) में जो अंतिम स्वर होता है, वह और उसके बाद के सभी व्यंजन 'टि' कहलाते हैं।
उदाहरण:
मनस् (Manas): यहाँ 'म-अ-न्-अ-स्' में अंतिम स्वर 'अ' है। 'अ' के बाद 'स्' है। अतः 'अस्' की टि संज्ञा होगी।
आत्मन्: यहाँ 'अन्' की टि संज्ञा होगी।
15. प्रगृह्य संज्ञा (Pragruhya Sanjna)
प्रगृह्य संज्ञा का अर्थ है— वह वर्ण जहाँ संधि कार्य नहीं होता (प्रकृतिभाव)।
सूत्रम्: ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् (1/1/11)
वृत्ति: ईदूदेदन्तं द्विवचनं प्रगृह्यं स्यात्।
हिन्दी अर्थ: द्विवचन के अंत में आने वाले दीर्घ ईकार (ई), दीर्घ ऊकार (ऊ) और एकार (ए) की प्रगृह्य संज्ञा होती है।
उदाहरण:
हरी एतौ: यहाँ 'हरी' द्विवचन है और अंत में 'ई' है। अतः संधि नहीं होगी। 'हरी एतौ' ही रहेगा।
गंगे अमू: यहाँ भी संधि का अभाव रहेगा।
16. सर्वनामस्थान संज्ञा (Sarvanamasthana Sanjna)
सूत्रम् 1: सुडनपुंसकस्य (1/1/43)
वृत्ति: स्वादिपञ्चवचनानि सर्वनामस्थानसंज्ञानि स्युरक्लीवस्य।
अर्थ: पुल्लिंग और स्त्रीलिंग शब्दों में सु, औ, जस्, अम्, औट्—इन पाँच प्रत्ययों की 'सर्वनामस्थान' संज्ञा होती है।
सूत्रम् 2: शि सर्वनामस्थानम् (1/1/42)
अर्थ: नपुंसक लिंग में 'शि' प्रत्यय की सर्वनामस्थान संज्ञा होती है। जैसे— 'ज्ञान + इ (शि)' में 'इ' सर्वनामस्थान है।
17. भ संज्ञा (Bha Sanjna)
सूत्रम्: यचि भम् (1/4/18)
वृत्ति: यादिष्वजादिषु च... पूर्वं भसंज्ञं स्यात्।
हिन्दी अर्थ: जब 'सु' आदि प्रत्ययों में से 'य' से शुरू होने वाले या स्वर (अच्) से शुरू होने वाले प्रत्यय (सर्वनामस्थान को छोड़कर) पीछे हों, तो पूर्व शब्द की 'भ' संज्ञा होती है।
18. सर्वनाम संज्ञा (Sarvanama Sanjna)
सूत्रम्: सर्वादीनि सर्वनामानि (1/1/27)
हिन्दी अर्थ: 'सर्व', 'विश्व', 'उभ', 'उभय' आदि 35 शब्दों के समूह (सर्वादिगण) की सर्वनाम संज्ञा होती है।
19. निष्ठा संज्ञा (Nishtha Sanjna)
यह संज्ञा भूतकाल की क्रियाओं के निर्माण में सहायक है।
सूत्रम्: क्तक्तवतू निष्ठा (1/1/26)
वृत्ति: एतौ निष्ठासंज्ञौ स्तः।
हिन्दी अर्थ: 'क्त' और 'क्तवतु' इन दो प्रत्ययों की 'निष्ठा' संज्ञा होती है।
उदाहरण:
गतः (गम् + क्त)
गतवान् (गम् + क्तवतु)
व्याकरण का दार्शनिक और आध्यात्मिक पक्ष
संस्कृत व्याकरण केवल रटने का विषय नहीं है। भर्तृहरि ने 'वाक्यपदीय' में इसे "मोक्ष का द्वार" कहा है:
तद् द्वारमपवर्गस्य वाङ्मलानां चिकित्सितम्।
पवित्रं सर्वविद्यानामधिविद्यं प्रकाशते॥
अर्थात् व्याकरण मोक्ष का द्वार है, वाणी के दोषों की चिकित्सा है और समस्त विद्याओं में सबसे पवित्र प्रकाश है। जब एक साधक शुद्ध व्याकरण सम्मत वाणी का प्रयोग करता है, तो उसके भीतर 'शब्द-ब्रह्म' की जागृति होती है।
निष्कर्ष:
पाणिनीय व्याकरण के ये संज्ञा सूत्र किसी सॉफ्टवेयर के 'कोड' की तरह हैं। जैसे एक छोटा सा कोड पूरे प्रोग्राम को नियंत्रित करता है, वैसे ही ये संज्ञाएं संपूर्ण संस्कृत साहित्य और भाषा को अनुशासित करती हैं। संहिता, संयोग, गुण और वृद्धि जैसे सूत्र हमें सिखाते हैं कि कैसे वर्णों का अनुशासन शब्दों को अर्थपूर्ण बनाता है।
यदि आप संस्कृत के विद्यार्थी हैं या प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा में रुचि रखते हैं, तो इन संज्ञाओं का ज्ञान आपके लिए अनिवार्य है। व्याकरण का यह विशिष्ट अध्ययन हमें उस महान भारतीय मेधा से जोड़ता है जिसने हज़ारों साल पहले भाषा का इतना सटीक और वैज्ञानिक विश्लेषण कर दिया था।
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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।