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लघुसिद्धान्तकौमुदी: संज्ञाप्रकरणम् - संस्कृत व्याकरण का प्रवेश द्वार

संज्ञाप्रकरणम् - लघुसिद्धान्तकौमुदी

लघुसिद्धान्तकौमुदी: संज्ञाप्रकरणम् - संस्कृत व्याकरण का प्रवेश द्वार (विस्तृत व्याख्या)

संस्कृत भाषा केवल एक भाषा नहीं, बल्कि एक विज्ञान है। इस विज्ञान को समझने के लिए जिस चाबी की आवश्यकता होती है, उसे 'व्याकरण' कहते हैं। महर्षि पाणिनि के अष्टाध्यायी के ज्ञान को सुलभ बनाने के लिए आचार्य वरदराज ने 'लघुसिद्धान्तकौमुदी' की रचना की। आज के इस विशेष लेख में हम 'संज्ञाप्रकरणम्' का सविस्तार अध्ययन करेंगे, जो संस्कृत व्याकरण की नींव है।

१. मंगलाचरणम्: विद्या की देवी की वंदना

किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में मंगलाचरण करने की भारतीय परंपरा है। आचार्य वरदराज अपनी रचना की निर्विघ्न समाप्ति और शिष्यों के कल्याण के लिए माँ सरस्वती की वंदना करते हैं:

नत्वा सरस्वतीं देवीं शुद्धां गुण्यां करोम्यहम्।
पाणिनीयप्रवेशाय लघुसिद्धान्तकौमुदीम्॥

अन्वय: अहम् (वरदराजः) शुद्धां गुण्यां सरस्वतीं देवीं नत्वा पाणिनीय-प्रवेशाय लघुसिद्धान्तकौमुदीं करोमि।

हिन्दी व्याख्या:
मैं (वरदराज) शुद्ध (निर्मल स्वरूप वाली) तथा श्रेष्ठ गुणों से युक्त सरस्वती देवी को श्रद्धापूर्वक नमस्कार करके, महर्षि पाणिनि द्वारा रचित व्याकरण शास्त्र (अष्टाध्यायी) में बालकों और जिज्ञासुओं के प्रवेश के लिए 'लघुसिद्धान्तकौमुदी' नामक ग्रंथ की रचना करता हूँ।

महत्व: यहाँ 'शुद्धां' शब्द देवी की पवित्रता और 'गुण्यां' शब्द उनकी अनंत विद्या का प्रतीक है। 'पाणिनीयप्रवेशाय' का अर्थ है कि यह ग्रंथ व्याकरण के कठिन सागर को पार करने के लिए एक छोटी नौका के समान है।


२. चतुर्दश माहेश्वर सूत्र: वर्णमाला का दिव्य उद्भव

संस्कृत व्याकरण का आधार भगवान शिव के डमरू से निकले १४ सूत्र हैं। इन्हें 'प्रत्याहार सूत्र' भी कहा जाता है।

  1. अइउण्

  2. ऋऌक्

  3. एओङ्

  4. ऐऔच्

  5. हयवरट्

  6. लण्

  7. ञमङणनम्

  8. झभञ्

  9. घढधष्

  10. जबगडदश्

  11. खफछठथचटतव्

  12. कपय्

  13. शषसर्

  14. हल

इति माहेश्वराणि सूत्राण्यणादिसञ्ज्ञार्थानि। एषामन्त्या इतः। हकारादिष्वकारः उच्चारणार्थः। लणमध्ये त्वित्सञ्ज्ञकः।

हिन्दी अर्थ:
ये चौदह सूत्र 'माहेश्वर' कहे जाते हैं क्योंकि इनकी उत्पत्ति महादेव के डमरू वादन से हुई है। इनका मुख्य प्रयोजन 'अण्' आदि प्रत्याहार (संज्ञा) बनाना है। इन सूत्रों के अंत में आने वाले वर्ण (जैसे ण्, क्, ङ्) 'इत्' संज्ञक होते हैं। 'ह' आदि व्यंजनों में लगा 'अ' केवल उच्चारण की सुविधा के लिए है, लेकिन 'लण्' सूत्र के 'ल' में जो 'अ' है, वह 'इत्' संज्ञक है।

उदाहरण: यदि हमें 'अच्' कहना है, तो हम सूत्र १ से ४ तक के वर्णों को लेंगे, जो सभी स्वर हैं।


३. प्रमुख संज्ञा सूत्र और उनकी व्याख्या

व्याकरण में किसी वस्तु या नियम को पहचानने के लिए 'संज्ञा' (नाम) दी जाती है। यहाँ प्रमुख संज्ञा सूत्रों का विवरण है:

(क) हलन्त्यम् (१/३/३)

वृत्ति: उपदेशेऽन्त्यं हलित्स्यात्। उपदेश आद्योच्चारणम्। सूत्रेष्वदृष्टं पदं सूत्रान्तरादनुवर्तनीयं सर्वत्र।

व्याख्या:
उपदेश (पाणिनी, कात्यायन और पतंजलि के प्रथम उच्चारण) की अवस्था में जो अंतिम व्यंजन (हल्) होता है, उसकी 'इत्' संज्ञा होती है।

  • उपदेश क्या है? 'धातुसूत्रगणोणादिवाक्यलिङ्गानुशासनम्। आगमप्रत्ययादेशा उपदेशाः प्रकीर्तिताः॥' अर्थात् धातु, सूत्र, गण, उणादि सूत्र, वाक्य, लिंगानुशासन, आगम, प्रत्यय और आदेश - ये 'उपदेश' कहलाते हैं।

(ख) अदर्शनं लोपः (१/१/६०)

वृत्ति: प्रसक्तस्यादर्शनं लोपसंज्ञं स्यात्।

व्याख्या:
जो वर्ण सुनाई दे रहा हो या विद्यमान हो, उसका दिखाई न देना या सुनाई न देना 'लोप' कहलाता है। लोप का अर्थ वर्ण का विनाश नहीं, बल्कि उसकी अदृश्यता है।

(ग) तस्य लोपः (१/३/९)

वृत्ति: तस्येतो लोपः स्यात्। णादयोऽणाद्यर्थाः।

व्याख्या:
जिस वर्ण की 'इत्' संज्ञा हुई है (जैसे हलन्त्यम् सूत्र से), उस वर्ण का लोप हो जाता है। माहेश्वर सूत्रों के अंत में आने वाले 'ण्' आदि वर्ण केवल प्रत्याहार बनाने के लिए हैं, शब्दों की सिद्धि में इनका लोप हो जाता है।


४. प्रत्याहार निर्माण की विधि

सूत्र: आदिरन्त्येन सहेता (१/१/७१)

वृत्ति: अन्त्येनेता सहित आदिर्मध्यगानां स्वस्य च संज्ञा स्यात्।

व्याख्या:
अंतिम 'इत्' वर्ण के साथ आने वाला आदि वर्ण (पहला वर्ण) अपने बीच के सभी वर्णों और स्वयं का बोध कराता है।

  • उदाहरण १ (अण्): 'अइउण्' में 'अ' आदि वर्ण है और 'ण्' इत् वर्ण। अतः 'अण्' कहने से अ, इ, उ - इन तीन वर्णों का बोध होगा।

  • उदाहरण २ (अच्): यह सभी स्वरों (अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ) का बोध कराता है।

  • उदाहरण ३ (हल्): यह सभी व्यंजनों का बोध कराता है।


५. स्वरों का वर्गीकरण (ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत)

सूत्र: ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः (१/२/२७)

वृत्ति: उश्च ऊश्च ऊ३श्च वः। वां काल इव कालो यस्य सोऽच् क्रमाद्ध्रस्वदीर्घप्लुतसंज्ञः स्यात्।

व्याख्या:
जिस अच् (स्वर) के उच्चारण में एक मात्रिक 'उ', द्विमात्रिक 'ऊ' या त्रिमात्रिक 'ऊ३' के समान समय लगे, उसे क्रमशः ह्रस्वदीर्घ और प्लुत कहते हैं।

  • ह्रस्व: १ मात्रा (अ, इ, उ)

  • दीर्घ: २ मात्रा (आ, ई, ऊ)

  • प्लुत: ३ मात्रा (हे कृष्ण३!)

प्रत्येक स्वर के पुनः तीन भेद होते हैं:

  1. उच्चैरुदात्तः (१/२/२९): कंठ-तालु आदि के ऊपरी भाग से बोला जाने वाला स्वर 'उदात्त' है।

  2. नीचैरनुदात्तः (१/२/३०): नीचे के भाग से बोला जाने वाला स्वर 'अनुदात्त' है।

  3. समाहारः स्वरितः (१/२/३१): जहाँ उदात्त और अनुदात्त दोनों का मेल हो, वह 'स्वरित' है।


६. अनुनासिक और वर्णों के भेद

सूत्र: मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः (१/२/८)

वृत्ति: मुखसहितनासिकयोच्चार्यमाणो वर्णोऽनुनासिकसंज्ञः स्यात्।

व्याख्या:
जो वर्ण मुख और नासिका (नाक) दोनों की सहायता से बोला जाता है, उसे 'अनुनासिक' कहते हैं।

  • जैसे: अूँ, इूँ।

वर्णों की कुल संख्या और भेद:

  • अ, इ, उ, ऋ: प्रत्येक के १८ भेद होते हैं (३ काल × ३ स्वर × २ अनुनासिक/अननुनासिक)।

  • ऌ: इसके १२ भेद होते हैं (इसमें 'दीर्घ' नहीं होता)।

  • ए, ओ, ऐ, औ (एच्): इनके १२ भेद होते हैं (इनमें 'ह्रस्व' नहीं होता)।

  • ऋ + ऌ: वार्तिक 'ऋऌवर्णयोर्मिथः सावर्ण्यं वाच्यम्' के अनुसार इनकी सवर्ण संज्ञा होती है, अतः इनके कुल ३० भेद माने जाते हैं।


७. उच्चारण स्थान और प्रयत्न (Phonetics)

संस्कृत व्याकरण का सबसे वैज्ञानिक हिस्सा उसका उच्चारण विज्ञान है।

(अ) उच्चारण स्थान (Sthana)

  1. अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः: अ, कवर्ग (क, ख, ग, घ, ङ), ह और विसर्ग का स्थान 'कण्ठ' है।

  2. इचुयशानां तालु: इ, चवर्ग, य और श का स्थान 'तालु' है।

  3. ऋटुरषाणां मूर्धा: ऋ, टवर्ग, र और ष का स्थान 'मूर्धा' है।

  4. लृतुलसानां दन्ताः: ऌ, तवर्ग, ल और स का स्थान 'दन्त' है।

  5. उपूपध्मानीयानामोष्ठौ: उ, पवर्ग और उपध्मानीय का स्थान 'ओष्ठ' है।

  6. ञमङणनानां नासिका च: ञ, म, ङ, ण, न का स्थान नासिका भी है।

  7. एदैतोः कण्ठतालु: ए और ऐ का स्थान कण्ठ और तालु है।

  8. ओदौतोः कण्ठौष्ठम्: ओ और औ का स्थान कण्ठ और ओष्ठ है।

  9. वकारस्य दन्तोष्ठम्: 'व' का स्थान दन्त और ओष्ठ है।

  10. जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम्: जिह्वामूलीय वर्णों का स्थान जिह्वा का मूल है।

(ब) प्रयत्न (Effort)

यत्न दो प्रकार का होता है: आभ्यन्तर और बाह्य

१. आभ्यन्तर प्रयत्न (५ प्रकार):

  • स्पृष्ट: स्पर्श वर्णों (क से म) का।

  • ईषत्स्पृष्ट: अन्तःस्थ वर्णों (य, र, ल, व) का।

  • ईषद्विवृत: ऊष्म वर्णों (श, ष, स, ह) का।

  • विवृत: सभी स्वरों (अच्) का।

  • संवृत: प्रयोग की अवस्था में ह्रस्व 'अ' का।

२. बाह्य प्रयत्न (११ प्रकार):

विवार, संवार, श्वास, नाद, घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण, उदात्त, अनुदात्त, स्वरित।

  • खरो विवाराः श्वासा अघोषाश्च: खर् प्रत्याहार के वर्ण विवार, श्वास और अघोष होते हैं।

  • हशः संवारा नादा घोषाश्च: हश् प्रत्याहार के वर्ण संवार, नाद और घोष होते हैं।

  • अल्पप्राण: वर्गों के १, ३, ५ वर्ण और यण्।

  • महाप्राण: वर्गों के २, ४ वर्ण और शल्।


८. सवर्ण संज्ञा और अणुदित् सूत्र

सूत्र: तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् (१/१/९)

व्याख्या: जिन वर्णों का 'उच्चारण स्थान' और 'आभ्यन्तर प्रयत्न' दोनों समान होते हैं, वे आपस में 'सवर्ण' कहलाते हैं।

सूत्र: अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्ययः (१/१/६९)

व्याख्या: जिसका विधान न किया जाए ऐसा 'अण्' (अ से लण् के ण तक) और 'उदित्' (कु, चु, टु, तु, पु) अपने सवर्णों का बोध कराते हैं।

  • जैसे: 'कु' कहने से क, ख, ग, घ, ङ - इन पाँचों का बोध होता है।


९. संहिता, संयोग और पद संज्ञा

संज्ञाप्रकरण के अंतिम सूत्र भाषा की संरचना को स्पष्ट करते हैं:

१. परः संनिकर्षः संहिता (१/१/१०९)

वृत्ति: वर्णानामतिशयितः संनिधिः संहितासंज्ञः स्यात्।
व्याख्या: वर्णों की अत्यंत निकटता (आधी मात्रा से कम का व्यवधान) को 'संहिता' कहते हैं। इसी संहिता की स्थिति में 'संधि' कार्य होते हैं।

२. हलोऽनन्तराः संयोगः (१/१/७)

वृत्ति: अज्भिरव्यवहिता हलः संयोगसंज्ञाः स्युः।
व्याख्या: जब दो या दो से अधिक व्यंजनों (हल्) के बीच में कोई स्वर (अच्) न आए, तो उन व्यंजनों के समूह को 'संयोग' कहते हैं।

  • उदाहरण: 'अग्नि' में 'ग्' और 'न्' के बीच कोई स्वर नहीं है, अतः यहाँ संयोग संज्ञा है।

३. सुप्तिङन्तं पदम् (१/१/१४)

वृत्ति: सुबन्तं तिङन्तं च पदसंज्ञं स्यात्।
व्याख्या: संस्कृत में नियम है - 'अपदं न प्रयुञ्जीत' (बिना पद बनाए शब्द का प्रयोग न करें)।

  • शब्दों में लगने वाले २१ प्रत्यय (सु, औ, जस्...) 'सुप्' कहलाते हैं।

  • धातुओं में लगने वाले १८ प्रत्यय (तिप्, तस्, झि...) 'तिङ्' कहलाते हैं।
    जिनके अंत में सुप् या तिङ् हो, वही 'पद' कहलाते हैं और भाषा में प्रयोग के योग्य होते हैं।


निष्कर्ष

॥इति संज्ञाप्रकरणम्॥

लघुसिद्धान्तकौमुदी का यह संज्ञाप्रकरण केवल परिभाषाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह संस्कृत बोलने, लिखने और समझने का वैज्ञानिक आधार है। माहेश्वर सूत्रों के दिव्य नाद से लेकर 'पद' बनने की प्रक्रिया तक, प्रत्येक सूत्र का अपना महत्व है।

यदि आप संस्कृत के विद्यार्थी हैं या प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा में रुचि रखते हैं, तो इन सूत्रों का कंठस्थीकरण और अर्थ बोध आपके बौद्धिक विकास के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा। व्याकरण के बिना भाषा वैसी ही है जैसे बिना प्राण का शरीर। अतः इस ज्ञान को आत्मसात करें।

"व्याकरणं मुखं स्मृतम्"
(वेदांगों में व्याकरण को वेद पुरुष का मुख माना गया है।)


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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।

  • महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।

मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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