संस्कृत व्याकरण का रहस्य: परस्मैपद एवं आत्मनेपद (विस्तृत मार्गदर्शिका)
प्रस्तावना
संस्कृत भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक पूर्णतः वैज्ञानिक और आध्यात्मिक संरचना है। महर्षि पाणिनि ने अपनी 'अष्टाध्यायी' में शब्दों की व्युत्पत्ति और धातुओं के प्रयोग को अत्यंत सूक्ष्मता से परिभाषित किया है। संस्कृत व्याकरण में 'तिङ्' प्रत्ययों को दो मुख्य भागों में विभाजित किया गया है: परस्मैपद और आत्मनेपद।
"परस्मैपद" का अर्थ है— 'परस्मै पदम्' (दूसरे के लिए पद), अर्थात जहाँ क्रिया का फल कर्ता को न मिलकर किसी अन्य को मिलता है।
"आत्मनेपद" का अर्थ है— 'आत्मने पदम्' (स्वयं के लिए पद), अर्थात जहाँ क्रिया का मुख्य फल कर्ता को प्राप्त होता है।
आज के इस विशाल लेख में हम आपके द्वारा दिए गए विशिष्ट सूत्रों के माध्यम से यह समझेंगे कि कब धातु परस्मैपद में प्रयुक्त होती है और कब आत्मनेपद में।
मंगलाचरण
येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात्।
कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः॥
(जिन्होंने भगवान शिव से अक्षरों की वर्णमाला प्राप्त कर संपूर्ण व्याकरण शास्त्र का निर्माण किया, उन महर्षि पाणिनि को नमस्कार है।)
भाग 1: परस्मैपद प्रकरण (सूत्र एवं व्याख्या)
परस्मैपद का प्रयोग प्रायः तब होता है जब क्रिया का फल परगामी (दूसरों की ओर जाने वाला) हो। आपके द्वारा दिए गए सूत्रों की व्याख्या निम्नलिखित है:
1. अनुपराभ्यां कृञः (सूत्र 1.3.79)
यह सूत्र स्पष्ट करता है कि जब 'कृ' (करना) धातु से पहले 'अनु' या 'पारा' उपसर्ग जुड़ता है, तब वह धातु परस्मैपद में प्रयुक्त होती है।
उदाहरण:
अनुकरोति: वह अनुकरण करता है।
पराकरोति: वह तिरस्कार करता है या दूर करता है।
2. अभिप्रत्यतिभ्यः क्षिपः (सूत्र 1.3.72)
जब 'क्षिप्' (फेंकना) धातु के पूर्व 'अभि', 'प्रति', या 'अति' उपसर्ग लगे हों, तो वह परस्मैपद में होती है।
उदाहरण:
अभिक्षिपति: आरोप लगाता है या निंदा करता है।
3. प्राद्वह:
जब 'वह' (ले जाना) धातु से पहले 'प्र' उपसर्ग आता है, तो वह परस्मैपद में रहती है।
उदाहरण:
प्रवहति: नदी बहती है या वह ले जाता है।
4. परेर्मृषः
'मृष्' (सहना/क्षमा करना) धातु से पहले 'परि' उपसर्ग होने पर परस्मैपद का प्रयोग होता है।
उदाहरण:
परिमृष्यति: वह विचार करता है या सहन करता है।
5. व्याङ्गरिभ्यो रमः
जब 'रम्' (क्रीड़ा करना/रमण करना) धातु के पूर्व 'वि', 'आङ्' (आ), या 'परि' उपसर्ग हों, तो वह परस्मैपद में होती है।
उदाहरण:
विरमति: वह रुकता है।
आरमति: वह विश्राम करता है।
6. उपाच
'रम्' धातु के पूर्व 'उप' उपसर्ग आने पर भी परस्मैपद का विधान है।
7. विभाषाऽकर्मकात्
यदि 'रम्' धातु अकर्मक (बिना कर्म के) हो और 'उप' उपसर्ग लगा हो, तो विकल्प से परस्मैपद होता है।
उदाहरण:
उपरमयति: (प्रेरणार्थक)
उपरमति या उपरमते: वह उपराम होता है।
8. बुधयुधनशजनेङ्गुद्रुस्रुभ्यो णेः
यह सूत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें कई धातुओं (बुध, युध, नश, जन, इङ्ग्, द्रु, स्रु) के प्रेरणार्थक (णिच्) रूप में परस्मैपद का विधान बताया गया है।
उदाहरण:
बोधयति पद्मम्: सूर्य कमल को खिलाता है (बोध कराता है)।
योधयति: वह युद्ध करवाता है।
नाशयति दुःखम्: वह दुःख का नाश करता है।
जनयति सुखम्: वह सुख उत्पन्न करता है।
अध्यापयति वेदम्: वह वेद पढ़ाता है।
प्रावयति / द्रावयति / स्रावयति: बहता है या पिघलाता है।
भाग 2: अकर्मक और विशिष्ट क्रियाओं का परस्मैपद प्रयोग
9. निगरणचलनार्थेभ्यश्च
निगरण (निकलना/खाना) और चलन (चलना) अर्थ वाली धातुओं के प्रेरणार्थक रूप परस्मैपद में होते हैं।
उदाहरण:
निगारयति: वह निगलता है।
आशयति: वह खिलाता है।
भाजयति: वह हिस्सा दिलाता है।
चलयति / कम्पयति: वह चलाता है या हिलाता है।
10. अणावकर्मकाञ्चित्तवत्कर्तृकात्
जब धातु अकर्मक हो और उसका कर्ता चेतन (चित्तवान) हो, तो उसके णिच् (प्रेरणार्थक) रूप में परस्मैपद होता है।
उदाहरण:
शेते कृष्णः तं गोपी शाययति: कृष्ण सोता है, गोपी उन्हें सुलाती है।
11. न पादम्याड्यमाङ्यसपरिमुह रुचिनृतिवदवसः
यह निषेध सूत्र है। यह बताता है कि पा, दम्, आयाम् आदि धातुओं के प्रेरणार्थक रूप परस्मैपद में नहीं, बल्कि आत्मनेपद में होते हैं।
उदाहरण:
पाययते: वह पिलाता है।
दमयते: वह दमन करता है।
आयामयते / आयासयते: विस्तार करता है या थकाता है।
परिमोहयते: मोह में डालता है।
रोचयते: अच्छा लगता है।
नर्तयते: नचाता है।
वादयते: बजाता है।
वासयते: निवास कराता है।
भाग 3: आत्मनेपद प्रकरण (विस्तृत व्याख्या)
अब हम उन सूत्रों की चर्चा करेंगे जहाँ धातु का प्रयोग अनिवार्यतः या विकल्प से आत्मनेपद में होता है।
15. उपान्मत्रकरणे बा. "बालिप्सायामिति- वक्तव्यम्"
यदि 'स्था' धातु के पूर्व 'उप' उपसर्ग हो और उसका अर्थ 'मंत्रोच्चार द्वारा पूजा' या 'पाने की इच्छा' हो, तो आत्मनेपद होता है।
उदाहरण: ऐन्द्र्या गार्हपत्यमुपतिष्ठते। (इन्द्र संबंधी ऋचा से गार्हपत्य अग्नि की उपासना करता है)।
16. अकर्मकाञ्च
जब 'उप' उपसर्ग पूर्वक 'स्था' धातु अकर्मक हो, तब भी आत्मनेपद होता है।
उदाहरण: भिक्षुकः प्रभुमुपतिष्ठते: भिक्षुक प्रभु के पास खड़ा रहता है। (यहाँ 'उपतिष्ठति' भी विकल्प से लोक व्यवहार में देखा जाता है)।
17. उद्विभ्यां तपः (सूत्र 1.3.27)
'तप्' धातु के पूर्व 'उत्' या 'वि' उपसर्ग हो, तो आत्मनेपद होता है।
वार्तिक: "स्वाङ्गकर्मकाच्चेति वक्तव्यम्" - यदि शरीर का अपना अंग कर्म हो।
उदाहरण: उत्तपते / वितपते वा पाणिम्: वह अपने हाथ को तपता है (सेंकता है)।
18. आडो यमहनः
'यम्' और 'हन्' धातु के पूर्व 'आ' उपसर्ग होने पर आत्मनेपद होता है।
उदाहरण: आयच्छते (विस्तार करता है), आहते (अपने को चोट मारता है)।
21. यमो गन्धने
जब 'यम्' धातु का अर्थ 'गन्धन' (सूचना देना या हिंसा) हो, तब आत्मनेपद होता है।
उदाहरण: उदायत: वह प्रकट हुआ।
22. समो गम्यच्छिभ्याम्
'गम्' और 'ऋच्छ' (जाना) धातु के पूर्व 'सम्' उपसर्ग होने पर आत्मनेपद होता है।
उदाहरण: संगच्छते: वह अच्छी तरह मिलता है। समृच्छते: वह प्राप्त होता है।
24-25. विदिप्रच्छिस्वरतीनामुपसंख्यानम्
विद्, प्रच्छ् और स्वृ धातुओं के साथ भी विशिष्ट परिस्थितियों में आत्मनेपद जुड़ता है।
उदाहरण: संविते (वह जानता है), संविदाते (वे दो जानते हैं)।
26. निसमुपविभ्यो ह्वः
'ह्वे' (बुलाना) धातु के पूर्व 'नि', 'सम्', 'उप' या 'वि' उपसर्ग हों, तो आत्मनेपद होता है।
उदाहरण: निह्वयते, विह्वयते।
विशिष्ट उदाहरण: कृष्णश्चाणूरमाह्वयते: कृष्ण चाणूर (मल्ल) को युद्ध के लिए ललकारते हैं।
28. गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक्यप्रतियत्नप्रकथनोपयोगेषुकृञः
'कृ' धातु का प्रयोग जब गन्धन (हिंसा), अवक्षेपण (निंदा), सेवन, साहस, प्रतियत्न (गुणाधान), प्रकथन (प्रशंसा) या उपयोग के अर्थ में हो, तो आत्मनेपद होता है।
उदाहरण: उतुकुरुते: वह साहस का कार्य करता है।
29. अधेः प्रसहने
'कृ' धातु से पूर्व 'अधि' उपसर्ग हो और अर्थ 'अभिभूत करना' या 'जीतना' हो।
उदाहरण: शत्रुमधिकुरुते: वह शत्रु को वश में करता है।
भाग 4: गति, ज्ञान और व्यवहार के नियम
32. संमाननोत्सर्जनार्चायकरणज्ञानभृतिविगणनव्ययेषु नियः
'नी' (ले जाना) धातु के साथ यदि सम्मान, दान, पूजा, ज्ञान, मजदूरी देना आदि अर्थ जुड़े हों, तो आत्मनेपद होता है।
उदाहरण:
शास्त्रे नयते: शास्त्र में बुद्धि लगाता है।
क्रोधं विनयते: क्रोध को शांत करता है।
34. वृत्तिसर्गतायनेषु क्रमः
'क्रमु' (पैर रखना/चलना) धातु के अर्थ में यदि निरंतरता या शक्ति का प्रयोग हो।
उदाहरण: अध्ययनाय क्रमते: वह अध्ययन के लिए उत्साह दिखाता है।
37. वेः पादविहरणे
जब 'वि' उपसर्ग पूर्वक 'क्रम्' धातु का अर्थ 'पैर फैलाकर चलना' हो।
उदाहरण: साधु विक्रमते वाजी: घोड़ा अच्छी तरह कदम बढ़ाता है।
40-41. अपह्नवे ज्ञः / अकर्मकाञ्च
'ज्ञा' (जानना) धातु के पूर्व 'अप' उपसर्ग हो और अर्थ 'छिपाना' (Denial) हो।
उदाहरण: शतमपजानीते: वह सौ रुपये (देने) से मुकरता है।
43. भासनोपसंभाषाज्ञानयत्नविमत्युपमन्त्रणेषु वदः
'वद्' (बोलना) धातु के साथ चमकना, मीठी बातें करना, ज्ञान, प्रयत्न आदि अर्थ होने पर आत्मनेपद होता है।
उदाहरण: शास्त्रे वदते: वह शास्त्र पर चर्चा करता है। संप्रवदन्ते ब्राह्मणाः: ब्राह्मण मिलकर मंत्रणा करते हैं।
भाग 5: विशेष संधियाँ और क्रिया रूप
49. उदश्वरः सकर्मकात्
'चर्' धातु के पूर्व 'उत्' उपसर्ग हो और वह सकर्मक हो।
उदाहरण: धर्ममुच्चरते: वह धर्म का उल्लंघन करता है।
51. दाणश्च सा चेच्चतुर्थ्यर्थे
'दा' (देना) धातु के साथ यदि तृतीया विभक्ति का प्रयोग 'चतुर्थी' (संप्रदान) के अर्थ में हो (विशेषकर कामुकता या गुप्त दान के अर्थ में)।
उदाहरण: दास्या संयच्छते: वह दासी को (कुछ) देता है।
52. उपाद्यमः स्वकरणे
'यम्' धातु के पूर्व 'उप' उपसर्ग हो और उसका अर्थ 'स्वीकार करना' या 'विवाह करना' हो।
उदाहरण: भार्यामुपयच्छते: वह विवाह करता है। रामः सीतामुपायत: राम ने सीता का पाणिग्रहण किया।
54. ज्ञाश्रुस्मृदृशां सनः
इच्छावाचक 'सन्' प्रत्यय लगने पर 'ज्ञा', 'श्रु', 'स्मृ' और 'दृश्' धातुएँ आत्मनेपद में होती हैं।
उदाहरण:
जिज्ञासते: वह जानने की इच्छा करता है।
शुश्रूषते: वह सेवा करना चाहता है।
दिदृक्षते: वह देखना चाहता है।
भाग 6: क्रिया फल और कर्ता (महत्वपूर्ण सिद्धांत)
64. स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले
यह पाणिनि का सबसे मौलिक सूत्र है। यदि धातु 'स्वरित' स्वर वाली हो या 'ञ' इत्संज्ञक हो, तो आत्मनेपद तभी होता है जब क्रिया का फल सीधे कर्ता को मिले।
उदाहरण:
यजते: वह स्वयं के पुण्य के लिए यज्ञ करता है।
यजति: वह पुरोहित के रूप में दूसरों के लिए यज्ञ करता है।
कुरुते: वह अपने लिए काम करता है।
69. विभाषा... स्वां गां जानाति जानीते वा
जब क्रिया का फल स्वयं के अंगों या अपनी वस्तुओं से जुड़ा हो, तो विकल्प से आत्मनेपद और परस्मैपद का प्रयोग होता है।
उदाहरण:
स्वं पुत्रमपवदति / अपवदते वा।
स्वं यज्ञं यजति / यजते वा।
श्लोक एवं शिक्षा
संस्कृत के इन नियमों का उद्देश्य केवल व्याकरण सिखाना नहीं, बल्कि यह समझाना है कि हमारे कार्यों का उद्देश्य क्या है। शास्त्र कहता है:
"यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥"
(हे अर्जुन! तुम जो कुछ भी करते हो, जो खाते हो, जो हवन करते हो, जो दान देते हो और जो तपस्या करते हो, वह सब मुझे अर्पित कर दो।)
व्याकरण की दृष्टि से, जब हम ईश्वर के लिए कार्य करते हैं, तो वह 'परस्मैपद' की निस्वार्थ भावना को दर्शाता है, और जब हम आत्म-कल्याण के लिए शास्त्र पढ़ते हैं, तो वह 'आत्मनेपद' की सार्थकता है।
निष्कर्ष
पाणिनीय व्याकरण के ये सूत्र—जैसे "अनुपराभ्यां कृञः" से लेकर "भुजोऽनवने" तक—संस्कृत भाषा की नींव हैं। परस्मैपद और आत्मनेपद का सही ज्ञान न केवल शुद्ध लेखन के लिए आवश्यक है, बल्कि वेदों और काव्यों के गूढ़ अर्थ समझने के लिए भी अनिवार्य है।
इस लेख में हमने देखा कि कैसे उपसर्गों के जुड़ने से (जैसे 'उप' + 'स्था') धातु का पद बदल जाता है और उसका अर्थ भी परिवर्तित हो जाता है। चाहे वह "बोधयति पद्मम्" में सूर्य का प्रभाव हो या "जिज्ञासते" में शिष्य की जिज्ञासा, हर पद एक निश्चित वैज्ञानिक नियम से बंधा है।
आशा है कि यह विस्तृत चर्चा आपके संस्कृत अध्ययन में सहायक सिद्ध होगी।
॥ इति तिङन्तपरस्मैपद-आत्मनेपदप्रकरणम् समाप्तम् ॥
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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।