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कारक प्रकरण – तृतीया विभक्ति का सम्पूर्ण विवेचन

तृतीया विभक्ति

कारक प्रकरण – तृतीया विभक्ति का सम्पूर्ण विवेचन

प्रस्तावना: कारक का महत्व
संस्कृत वाङ्मय में व्याकरण को 'वेदाङ्ग' माना गया है। महर्षि पाणिनि की 'अष्टाध्यायी' के आधार पर कारक प्रकरण वाक्यों की संरचना का आधार स्तंभ है। 'कारक' शब्द का अर्थ है— 'करोति इति कारकम्' अर्थात् जो क्रिया को करने वाला या क्रिया से साक्षात् सम्बन्ध रखने वाला हो। कारक के बिना वाक्य का अर्थ स्पष्ट नहीं हो सकता। आज के इस विस्तृत लेख में हम तृतीया विभक्ति (Instrumental Case) के उन सभी सूत्रों और रहस्यों को समझेंगे जो लघुकौमुदी और सिद्धान्तकौमुदी में वर्णित हैं।


1. कर्ता का स्वरूप: स्वतन्त्रः कर्ता (1/4/54)

तृतीया विभक्ति को समझने से पहले 'कर्ता' को समझना अनिवार्य है, क्योंकि तृतीया का सम्बन्ध कर्ता और करण दोनों से है।

सूत्रम्: स्वतन्त्रः कर्ता ।
वृत्ति: क्रियाया स्वातंत्र्येण विवक्षितोऽर्थः कर्ता स्यात् ॥

व्याख्या:
क्रिया के संपादन में जिसकी स्वतंत्रता विवक्षित (कहने की इच्छा) हो, उसे 'कर्ता' कहते हैं। सरल शब्दों में, जो क्रिया को करने में मुख्य भूमिका निभाता है और अन्य कारकों (कर्म, करण आदि) को अपने अधीन रखता है, वही कर्ता है।

उदाहरण:

  • रामः पठति (राम पढ़ता है): यहाँ पढ़ने की क्रिया में राम स्वतंत्र है, इसलिए राम कर्ता है।

  • शशिवदना लिखति: लिखने की क्रिया शशि के अधीन है।


2. करण का लक्षण: साधकतमं करणम् (1/4/42)

तृतीया विभक्ति का मुख्य आधार 'करण' है।

सूत्रम्: साधकतमं करणम् ।
वृत्ति: क्रियासिद्धौ प्रकृष्टोपकारकं करणसञ्ज्ञं स्यात् ।

व्याख्या:
क्रिया की सिद्धि में जो पदार्थ 'अत्यन्त सहायक' (Most effective means) होता है, उसकी 'करण' संज्ञा होती है। सूत्र में 'तमप्' प्रत्यय का प्रयोग यह दर्शाने के लिए किया गया है कि सहायक तो कई हो सकते हैं, लेकिन जो सबसे अधिक उपकारक हो, वही करण है।

तमप् ग्रहण का प्रयोजन (तमप् ग्रहणं किम्?):
यदि सूत्र में 'साधकम्' मात्र कहा जाता, तो 'गङ्गाया घोषः' (गंगा पर झोपड़ी) जैसे प्रयोगों में गंगा को भी करण मान लिया जाता। 'तमप्' कहने से यह स्पष्ट होता है कि जो क्रिया की पूर्णता में सबसे निकटतम और आवश्यक साधन है, वही करण है।


3. विभक्ति का विधान: कर्तृकरणयोस्तृतीया (2/3/18)

यह सूत्र बताता है कि तृतीया विभक्ति कहाँ प्रयुक्त होती है।

सूत्रम्: कर्तृकरणयोस्तृतीया ।
वृत्ति: अनभिहित कर्तरि करणे च तृतीया स्यात् ।

व्याख्या:
'अनभिहित' (अनुक्त) कर्ता और करण में तृतीया विभक्ति होती है। यहाँ 'अनभिहित' का अर्थ है जिसे तिङ्, कृत्, तद्धित या समास द्वारा न कहा गया हो।

प्रसिद्ध उदाहरण:

  • रामेण बाणेन हतो वाली ।

    • इस वाक्य में 'हतो' (हन् + क्त) प्रत्यय कर्म (वाली) को कह रहा है।

    • अतः कर्ता 'राम' अनुक्त है, इसलिए रामेण (तृतीया) हुई।

    • बाण क्रिया का सबसे बड़ा साधन है, अतः बाणेन (करण में तृतीया) हुई।


4. विशेष प्रयोग: "प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम्" (वार्तिक)

व्याकरण में कुछ शब्द स्वभावतः तृतीया विभक्ति ग्रहण करते हैं।

हिन्दी व्याख्या:
प्रकृति (स्वभाव) आदि क्रिया-विशेषण शब्दों में तृतीया विभक्ति का प्रयोग किया जाता है।

अनेक उदाहरण:

  1. प्रकृत्या चारु: स्वभाव से सुंदर।

  2. प्रायेण याज्ञिकः: प्रायः यज्ञ करने वाला।

  3. गोत्रेण गार्ग्यः: गोत्र से गार्ग्य।

  4. समेन एति: समतल मार्ग से जाता है।

  5. विषमेण एति: ऊबड़-खाबड़ मार्ग से जाता है।

  6. द्विद्रोणेन धान्यं क्रीणाति: दो द्रोण (माप) से अनाज खरीदता है।

  7. सुखेन याति / दुःखेन याति: सुख या दुःख के साथ जाता है।


5. दिव् धातु का विशेष नियम: दिवः कर्म च (1/4/43)

सूत्रम्: दिवः कर्म च ।
वृत्ति: दिवः साधकतमं कारकं कर्मसंज्ञं स्याच्चात्करणसंज्ञम् ।

व्याख्या:
'दिव्' (जुआ खेलना) धातु के प्रयोग में जो सबसे प्रधान साधन (साधकतम) होता है, उसकी 'कर्म' संज्ञा भी होती है और विकल्प से 'करण' संज्ञा भी होती है।

उदाहरण:

  • अक्षान दीव्यति (कर्म संज्ञा - द्वितीया): पाँसों से खेलता है।

  • अक्षैः दीव्यति (करण संज्ञा - तृतीया): पाँसों के द्वारा खेलता है।


6. फल प्राप्ति और समय: अपवर्गे तृतीया (2/3/6)

सूत्रम्: अपवर्गे तृतीया ।
वृत्ति: अपवर्गः फलप्राप्तिस्तस्यां द्योत्यायां कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे तृतीया स्यात् ।

व्याख्या:
'अपवर्ग' का अर्थ है 'फल की प्राप्ति'। जब कार्य पूर्ण हो जाए और फल मिल जाए, तो समय (काल) और मार्ग (अध्वन) वाची शब्दों में तृतीया विभक्ति होती है।

उदाहरण:

  • अह्ना अनुवाकोऽधीतः: दिन भर में अनुवाक (अध्याय) पढ़ लिया (और याद हो गया)।

  • क्रोशेन अनुवाकोऽधीतः: कोस भर चलते-चलते अनुवाक पढ़ लिया।

विपरीत उदाहरण (अपवर्गे किम्?):

  • मासमधीतो नायातः: महीने भर पढ़ा लेकिन समझ में नहीं आया। (यहाँ फल प्राप्ति नहीं हुई, इसलिए 'मासम्' में द्वितीया ही रही)।


7. साथ का बोध: सहयुक्तेऽप्रधाने (2/3/19)

सूत्रम्: सहयुक्तेऽप्रधाने ।
वृत्ति: सहार्थेन युक्ते अप्रधाने तृतीया स्यात् ।

व्याख्या:
'सह' (साथ) अर्थ वाले शब्दों (सह, साकम्, सार्धम्, समम्) के योग में जो 'अप्रधान' (Secondary) होता है, उसमें तृतीया विभक्ति होती है।

उदाहरण और विस्तार:

  1. सह: पुत्रेण सहागतः पिता। (पिता मुख्य है, पुत्र साथ आ रहा है, अतः पुत्र में तृतीया)।

  2. सार्धम्: हनुमान् वानरैः सार्धं जानकीं मार्गयामास।

  3. साकम्: रामः सीतया साकं गच्छति।

  4. समम्: गुरुः शिष्येण समं पठति।

विशेष: कभी-कभी 'सह' शब्द के बिना भी तृतीय विभक्ति देखी जाती है, जैसा कि महाभाष्य में "वृद्धो यूना..." निर्देश दिया गया है।


8. शरीर के विकार में: येनाङ्गविकारः (2/3/20)

सूत्रम्: येनाङ्गविकारः ।
वृत्ति: येनाङ्गेन विकृतेनाङ्गिनो विकारो लक्ष्यते ततः तृतीया स्यात् ।

व्याख्या:
जिस विकृत अंग के कारण 'अंगी' (पूरे शरीर या व्यक्ति) का विकार दिखाई दे, उस अंगवाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है।

उदाहरण:

  • अक्ष्णा काणः: आँख से काना। (आँख में खराबी होने से व्यक्ति काना कहलाता है)।

  • कर्णेन बधिरः: कान से बहरा।

  • पादेन खञ्जः: पैर से लंगड़ा।

सावधानी (अङ्गविकारः किम्?):
यदि केवल अंग की खराबी बतानी हो, व्यक्ति का विकार नहीं, तो तृतीया नहीं होगी। जैसे— 'अक्षि काणमस्य' (इसकी आँख कानी है)।


9. पहचान का चिह्न: इत्थंभूतलक्षणे (2/3/21)

सूत्रम्: इत्थंभूतलक्षणे ।
वृत्ति: कश्चित्प्रकारं प्राप्तस्य लक्षणे तृतीया स्यात् ।

व्याख्या:
जिस लक्षण या चिह्न (Identity mark) से किसी व्यक्ति या वस्तु की पहचान होती है, उस लक्षणवाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है।

उदाहरण:

  • जटाभिस्तापसः: जटाओं से वह तपस्वी प्रतीत होता है। (जटाएँ उसकी तपस्वी होने की पहचान हैं)।

  • पुस्तकेन छात्रः: पुस्तक से छात्र मालूम पड़ता है।


10. सम्-ज्ञा धातु का प्रयोग: संज्ञोऽन्यतरस्यां कर्मणि (2/3/22)

सूत्रम्: संज्ञोऽन्यतरस्यां कर्मणि ।
वृत्ति: संपूर्वस्य जानातेः कर्मणि तृतीया वा स्यात् ।

व्याख्या:
जब 'ज्ञा' धातु से पहले 'सम्' उपसर्ग लगा हो (सञ्ज्ञानीते), तो उसके कर्म में विकल्प से तृतीया विभक्ति होती है। विकल्प का अर्थ है कि द्वितीया भी हो सकती है।

उदाहरण:

  • पित्रा संजानीते (तृतीया) या पितरं संजानीते (द्वितीया)। अर्थ: पिता को पहचानता है।


11. कारण का बोध: हेतौ (2/3/23)

सूत्रम्: हेतौ ।
वृत्ति: हेत्वर्थे तृतीया स्यात् ।

व्याख्या:
हेतु (कारण) बोधक शब्दों में तृतीया विभक्ति होती है।

हेतु और करण में अंतर:

  • करण: केवल क्रिया की सिद्धि में व्यापारशील होता है।

  • हेतु: द्रव्य, गुण और क्रिया तीनों का कारण हो सकता है।

उदाहरण:

  1. द्रव्य हेतु: दण्डेन घटः (घड़े का कारण दण्ड है)।

  2. गुण हेतु: पुण्येन दृष्टो हरिः (पुण्य के कारण हरि के दर्शन हुए)।

  3. फल भी हेतु: अध्ययनेन वसति (अध्ययन के लिए रहता है—यहाँ फल ही कारण है)।


12. वार्तिक: गम्यमानापि क्रिया कारकविभक्तौ प्रयोजिका

इसका अर्थ है कि यदि वाक्य में क्रिया छिपी हुई (अनुक्त) हो, तो भी वह विभक्ति का कारण बनती है।

उदाहरण:

  • अलं श्रमेण (परिश्रम बस करो/व्यर्थ है): यहाँ 'साध्यं नास्ति' (सिद्ध करने योग्य नहीं है) क्रिया छिपी है। श्रम यहाँ साधन है, अतः तृतीया हुई।

  • शतेन शतेन वत्सान् पाययति पयः: सौ-सौ करके बछड़ों को दूध पिलाता है।


13. अशिष्ट व्यवहार में विशेष नियम (वार्तिक)

वार्तिक: "अशिष्टव्यवहारे दाणः प्रयोगे चतुर्थ्यर्थे तृतीया" ।

व्याख्या:
यदि 'दा' (यच्छ) धातु का प्रयोग 'अशिष्ट' (अनैतिक/अनुचित) व्यवहार के संदर्भ में हो, तो जिसे दान दिया जा रहा है (सम्प्रदान), उसमें चतुर्थी के स्थान पर तृतीया होती है।

उदाहरण:

  • दास्या संयच्छते कामुकः: कामुक व्यक्ति दासी को (अनैतिक उद्देश्य से) धन आदि देता है। (यहाँ दासी के लिए तृतीया हुई)।

  • शिष्ट व्यवहार (तुलना): भार्यायै संयच्छति (अपनी पत्नी को धर्मपूर्वक देता है)। यहाँ शिष्ट व्यवहार होने के कारण चतुर्थी विभक्ति ही प्रयुक्त हुई है।


श्लोक एवं मंत्रों के माध्यम से करण कारक का दर्शन

संस्कृत साहित्य में तृतीया विभक्ति का सौंदर्य इन श्लोकों में देखा जा सकता है:

1. परिश्रम का महत्व:

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥
(यहाँ 'उद्यमेन' में तृतीया है, जो सिद्ध करती है कि परिश्रम ही सफलता का 'करण' है।)

2. सत्संगति का प्रभाव:

सत्सङ्गत्या भवेन्मुक्तिः असत-सङ्गत्या च बन्धनम् ।
(सत्संगति के द्वारा मुक्ति और कुसंगति के द्वारा बंधन होता है।)

3. विद्या का लक्षण:

विद्या विनयेन शोभते ।
(विद्या विनय के द्वारा ही सुशोभित होती है।)


निष्कर्ष

कारक प्रकरण की 'तृतीया विभक्ति' केवल व्याकरण का एक नियम नहीं है, बल्कि यह भाषा की सूक्ष्मता और अभिव्यक्ति की गहराई को प्रकट करती है। जहाँ 'साधकतमं करणम्' क्रिया की पूर्णता को दर्शाता है, वहीं 'सहयुक्तेऽप्रधाने' सामाजिक संबंधों और साथ चलने की भावना को व्याकरणबद्ध करता है। 'हेतौ' सूत्र हमें संसार के कार्य-कारण संबंध (Cause and Effect) को समझने की दृष्टि प्रदान करता है।

चाहे वह 'रामेण बाणेन हतो वाली' जैसा ऐतिहासिक उदाहरण हो या 'अलं श्रमेण' जैसा व्यावहारिक निर्देश, तृतीया विभक्ति संस्कृत भाषा को वैज्ञानिक और सटीक बनाती है। विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए इन सूत्रों का कंठस्थीकरण और उनके पीछे के तर्क को समझना अत्यंत आवश्यक है।


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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।

  • महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।

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ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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