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कारक प्रकरण: चतुर्थी विभक्ति (सम्प्रदान कारक) का सम्पूर्ण विवेचन

चतुर्थी विभक्ति

कारक प्रकरण: चतुर्थी विभक्ति (सम्प्रदान कारक) का सम्पूर्ण विवेचन

प्रस्तावना:
संस्कृत व्याकरण संसार की सबसे वैज्ञानिक और व्यवस्थित भाषा प्रणाली है। महर्षि पाणिनि ने 'अष्टाध्यायी' के माध्यम से शब्दों की व्युत्पत्ति और वाक्यों की संरचना के जो नियम दिए हैं, उनमें 'कारक' (Karaka) का स्थान सर्वोपरि है। 'कारक' वह तत्व है जो क्रिया के साथ सीधा अन्वय (सम्बन्ध) रखता है— 'साक्षात् क्रियान्वयित्वं कारकत्वम्'। आज के इस विशेष लेख में हम चतुर्थी विभक्ति और सम्प्रदान कारक के रहस्यों को समझेंगे। यह लेख न केवल छात्रों के लिए, बल्कि संस्कृत के विद्वानों और शोधार्थियों के लिए भी एक संदर्भ ग्रंथ की भांति सहायक होगा।


1. सम्प्रदान कारक की परिभाषा और मूल सूत्र

सम्प्रदान का अर्थ है— 'सम्यक् प्रदीयते यस्मै तत् सम्प्रदानम्' अर्थात् जिसे भली-भांति दान दिया जाए।

सूत्र: कर्मणा यमभिप्रैति स संप्रदानम् । (1/4/32)

वृत्ति: दानस्य कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानसंज्ञः स्यात् ॥
हिन्दी व्याख्या: दान क्रिया के कर्म (जिस वस्तु का दान दिया जा रहा है) के द्वारा कर्ता जिसे संतुष्ट करना चाहता है या जिसे कुछ देना चाहता है, उसकी 'सम्प्रदान' संज्ञा होती है।

विस्तृत उदाहरण:

  • विप्राय गां ददाति। (ब्राह्मण को गाय देता है।)
    यहाँ 'दान' क्रिया है, 'गाय' कर्म है। इस गाय के दान के माध्यम से कर्ता 'ब्राह्मण' को प्रसन्न कर रहा है, अतः 'विप्र' (ब्राह्मण) की सम्प्रदान संज्ञा हुई।

सूत्र: चतुर्थी संप्रदाने (2/3/13)

हिन्दी व्याख्या: जिसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है, उसमें चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।
नियम: यह नियम 'अनभिहित' (जहाँ सम्प्रदान पहले न कहा गया हो) की स्थिति में लागू होता है।

  • उदाहरण: दानीयो विप्रः (यहाँ कृत्य प्रत्यय द्वारा सम्प्रदान उक्त हो गया है, अतः चतुर्थी नहीं हुई)।


2. सम्प्रदान के विशेष वार्तिक (Special Contexts)

महर्षि कात्यायन ने कुछ विशेष परिस्थितियों के लिए वार्तिक दिए हैं जो सम्प्रदान के क्षेत्र को विस्तृत करते हैं।

वार्तिक: "क्रियया यमभिप्रेति सोऽपि संप्रदानम्"

हिन्दी व्याख्या: केवल दान कर्म ही नहीं, बल्कि किसी विशिष्ट क्रिया के माध्यम से कर्ता जिसे अपनी ओर आकर्षित या अभिप्रेत करना चाहता है, वह भी सम्प्रदान कहलाता है।

  • उदाहरण: पत्ये शेते। (पति के लिए सोती है।)
    यहाँ 'सोना' दान क्रिया नहीं है, लेकिन इस क्रिया का उद्देश्य 'पति' को प्रसन्न करना या उसके प्रति समर्पण है, अतः 'पति' में चतुर्थी हुई।

वार्तिक: "यजेः कर्मणः करणसंज्ञा संप्रदानस्य च कर्मसंज्ञा"

हिन्दी व्याख्या: यज् (यज्ञ करना) धातु के प्रयोग में, जो वस्तु पहले 'कर्म' थी उसे 'करण' बना दिया जाता है और जो 'सम्प्रदान' था उसे 'कर्म' बना दिया जाता है।

  • उदाहरण: पशुना रुद्रं यजते।
    इसका वास्तविक अर्थ है— 'पशुं रुद्राय ददाति' (पशु को रुद्र के लिए देता है)। लेकिन इस वार्तिक से 'रुद्र' (सम्प्रदान) कर्म बन गया और 'पशु' (कर्म) करण बन गया।


3. रुचि और मानसिक व्यापार (Psychological Aspects)

संस्कृत व्याकरण मानवीय संवेदनाओं को भी स्थान देता है।

सूत्र: रुच्यर्थानां प्रीयमाणः । (1/4/33)

वृत्ति: रुच्यर्थानां धातूनां प्रयोगे प्रीयमाणो ऽर्थ सम्प्रदान स्यात् ।
हिन्दी व्याख्या: 'रुच्' (अच्छा लगना) तथा इसके समान अर्थ वाली धातुओं के योग में, जो व्यक्ति प्रसन्न होता है (प्रीयमाण), उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है।

  • उदाहरण: हरये रोचते भक्तिः। (हरि को भक्ति अच्छी लगती है।)
    यहाँ भक्ति किसे अच्छी लग रही है? हरि को। अतः 'हरि' सम्प्रदान है।

  • अन्य उदाहरण: बालकाय मोदकं रोचते। (बालक को लड्डू अच्छा लगता है।)

  • विशेष: 'प्रीयमाण' क्यों कहा? यदि रास्ते में लड्डू अच्छा लगे तो 'पथि' में चतुर्थी नहीं होगी— देवदत्ताय रोचते मोदकः पथि। (यहाँ देवदत्त प्रसन्न हो रहा है, मार्ग नहीं)।


4. प्रशंसा, ईर्ष्या और क्रोध के नियम

सूत्र: श्लाघहुङ्स्थाशपां ज्ञीप्स्यमानः । (1/4/34)

वृत्ति: एषां प्रयोगे बोधयितुमिष्टं संप्रदानं स्यात् ।
हिन्दी व्याख्या: श्लाघ् (प्रशंसा करना), हुङ् (छिपना/संकेत देना), स्था (ठहरना/प्रतीक्षा करना) और शप् (शाप देना/सौगंध खाना) धातुओं के प्रयोग में जिसे कुछ बोध कराया जाए, वह सम्प्रदान होता है।

  • उदाहरण: गोपी स्मरात् कृष्णाय श्लाघते/हुनुते/तिष्ठते/शपते वा।
    गोपी कामदेव के कारण कृष्ण की प्रशंसा करती है, उनसे छिपती है, उनके लिए ठहरती है या उनकी सौगंध खाती है।

सूत्र: धारेरुत्तमर्ण: (1/4/35)

हिन्दी व्याख्या: 'धृ' (कर्ज लेना/धारण करना) धातु के प्रयोग में 'उत्तमर्ण' (ऋण देने वाला/Creditor) की सम्प्रदान संज्ञा होती है।

  • उदाहरण: भक्ताय धारयति मोक्षं हरिः। (हरि भक्त के लिए मोक्ष के ऋणी हैं / भक्त को मोक्ष देते हैं)।

  • व्यावहारिक उदाहरण: देवदत्ताय शतं धारयति। (देवदत्त का सौ रुपया कर्जदार है)। यहाँ देवदत्त ने पैसा दिया है, अतः वह उत्तमर्ण है।

सूत्र: स्पृहेरीप्सितः । (1/4/36)

हिन्दी व्याख्या: 'स्पृह' (चाहना/इच्छा करना) धातु के योग में जिस वस्तु की चाहत हो, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है।

  • उदाहरण: पुष्पेभ्यः स्पृहयति। (फूलों को चाहता है)।

  • विशेष: यदि अत्यधिक चाहत (प्रकर्ष) हो तो कर्म संज्ञा होकर द्वितीया भी हो सकती है— पुष्पाणि स्पृहयति।


5. क्रोध, द्रोह और ईर्ष्या (Negative Emotions)

सूत्र: क्रुधद्रुहेर्ष्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः । (1/4/37)

हिन्दी व्याख्या: क्रुध् (क्रोध), द्रुह (द्रोह/अपकार), ईर्ष्या (जलन) और असूया (गुणों में दोष निकालना) धातुओं के योग में जिसके प्रति क्रोध प्रकट किया जाए, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है।

  1. क्रोध: पिता पुत्राय क्रुध्यति।

  2. द्रोह: दुष्टः सज्जनाय द्रुह्यति।

  3. ईर्ष्या: सीता रावणाय ईर्ष्यति।

  4. असूया: खलः सज्जनाय असूयति।

विशेष परिभाषाएँ:

  • क्रोध: अमर्ष (गुस्सा)।

  • द्रोह: अपकार (बुरा करना)।

  • ईर्ष्या: अक्षमा (दूसरे की उन्नति न सहना)।

  • असूया: गुणों में भी दोष देखना।

सूत्र: क्रुधद्रुहोरुपसृष्टयोः कर्म । (1/4/38)

नियम: यदि 'क्रुध्' और 'द्रुह्' धातुओं के पहले उपसर्ग (जैसे अभि, प्रति) लगा हो, तो जिसके प्रति क्रोध किया जाए, वह सम्प्रदान न होकर 'कर्म' हो जाता है (द्वितीया विभक्ति)।

  • उदाहरण: क्रूरम् अभिक्रुध्यति। (क्रूर पर क्रोध करता है)।


6. भविष्यवाणी और परामर्श

सूत्र: राधीक्ष्योर्यस्य विप्रश्नः । (1/4/39)

हिन्दी व्याख्या: राध् (सिद्ध करना/शुभ सोचना) और ईक्ष् (देखना/विचारना) धातुओं के प्रयोग में, जिसके शुभाशुभ (भविष्य) के बारे में प्रश्न किया जाता है, वह सम्प्रदान होता है।

  • उदाहरण: कृष्णाय राध्यति ईक्षते वा। (कृष्ण के भविष्य के बारे में गर्ग ऋषि विचार करते हैं)।


7. प्रतिज्ञा और प्रोत्साहन

सूत्र: प्रत्यायां श्रुवः पूर्वस्य कर्ता । (1/4/40)

हिन्दी व्याख्या: प्रति-श्रु और आ-श्रु (प्रतिज्ञा करना) के योग में, जो व्यक्ति पहले प्रेरणा देता है, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है।

  • उदाहरण: विप्राय गां प्रतिशृणोति। (ब्राह्मण के माँगने पर उसे गाय देने की प्रतिज्ञा करता है)।

सूत्र: अनुप्रतिगृणश्च । (1/4/41)

हिन्दी व्याख्या: अनु-गृ और प्रति-गृ (उत्साह बढ़ाना) धातुओं के योग में पूर्व व्यापार के कर्ता की सम्प्रदान संज्ञा होती है।

  • उदाहरण: होत्रेऽनुगृणाति। (होता जब मंत्र पढ़ता है, तो अध्वर्यु उसका उत्साह बढ़ाता है)।


8. विकल्प और प्रयोजन (Conditional Dative)

सूत्र: परिक्रयणे संप्रदानमन्यतरस्याम् । (1/4/44)

हिन्दी व्याख्या: जब किसी को निश्चित समय के लिए मजदूरी (परिक्रयण) पर रखा जाए, तो जिस धन से खरीदा गया, वह विकल्प से सम्प्रदान या करण होता है।

  • उदाहरण: शतेन/शताय वा परिक्रीतः। (सौ रुपये में खरीदा गया)।

वार्तिक: "तादर्थ्ये चतुर्थी वाच्या"

हिन्दी व्याख्या: जिस प्रयोजन (Purpose) के लिए कोई कार्य किया जाता है, उसमें चतुर्थी होती है।

  • उदाहरण: मुक्तये हरिं भजति। (मुक्ति के लिए हरि को भजता है)। यहाँ भजन का उद्देश्य मुक्ति है।

वार्तिक: "कॢपि सम्पद्यमाने च"

हिन्दी व्याख्या: जब कोई वस्तु किसी दूसरी अवस्था में बदल जाती है (Transformation), तो उस फल में चतुर्थी होती है।

  • उदाहरण: भक्तिः ज्ञानाय कल्पते/सम्पद्यते/जायते। (भक्ति से ज्ञान उत्पन्न होता है)।

वार्तिक: "उत्पातेन ज्ञापिते च"

हिन्दी व्याख्या: जब कोई प्राकृतिक उत्पात (Natural Phenomenon) किसी अशुभ घटना का संकेत दे।

  • उदाहरण: वाताय कपिला विद्युत्। (लाल रंग की बिजली आंधी का संकेत है)।

वार्तिक: "हितयोगे च"

हिन्दी व्याख्या: 'हित' और 'सुख' शब्दों के योग में चतुर्थी होती है।

  • उदाहरण: ब्राह्मणाय हितम्। गौभ्यः सुखम्।


9. लुप्त क्रिया और भाववाचक प्रयोग

सूत्र: क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः । (2/3/14)

हिन्दी व्याख्या: यदि वाक्य में 'तुमुन्' प्रत्यय वाली क्रिया छिपी (अप्रत्युज्यमान) हो, तो उसके कर्म में चतुर्थी होती है।

  • उदाहरण: फलेभ्यो याति। (फलों के लिए जाता है)।
    इसका विस्तृत अर्थ है— फलानि आहर्तुं याति (फल लाने के लिए जाता है)। यहाँ 'आहर्तुम्' क्रिया लुप्त है।

  • नमस्कुर्मो नृसिंहाय। (नृसिंह भगवान को प्रसन्न करने के लिए नमस्कार करते हैं)।

सूत्र: तुमर्थाच्च भाववचनात् । (2/3/15)

हिन्दी व्याख्या: तुमुन् प्रत्यय के अर्थ को बताने वाले भाववाचक शब्दों में चतुर्थी होती है।

  • उदाहरण: यागाय याति। (यज्ञ के लिए जाता है)। अर्थात्— यष्टुं याति (यज्ञ करने के लिए जाता है)।


10. नमः, स्वस्ति और स्वाहा (The Ritualistic Dative)

यह सबसे लोकप्रिय और महत्वपूर्ण सूत्र है।

सूत्र: नमःस्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषड्योगाच्च । (2/3/16)

हिन्दी व्याख्या: नमः (नमस्कार), स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा (देवताओं को आहुति), स्वधा (पितरों को आहुति), अलम् (पर्याप्त/शक्तिशाली) और वषट् (यज्ञीय आह्वान) शब्दों के योग में चतुर्थी होती है।

प्रमुख मंत्र एवं उदाहरण:

  1. हरये नमः। (विष्णु को नमस्कार)।

  2. प्रजाभ्यः स्वस्ति। (प्रजा का कल्याण हो)।

  3. अग्नये स्वाहा। (अग्नि के लिए स्वाहा)।

  4. पितृभ्यः स्वधा। (पितरों के लिए आहुति)।

  5. दैत्येभ्यो हरिरलम्। (दैत्यों के लिए हरि पर्याप्त/भारी हैं)।

  6. वषडिन्द्राय। (इन्द्र के लिए वषट्)।

वार्तिक: "उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिर्बलीयसी"

अत्यंत महत्वपूर्ण नियम: शब्द (उपपद) के कारण लगने वाली विभक्ति से क्रिया (कारक) के कारण लगने वाली विभक्ति अधिक बलवान होती है।

  • उदाहरण: नमस्करोति देवान्।
    यहाँ 'नमः' शब्द है, लेकिन 'नमस्करोति' एक क्रिया है। नियम कहता है कि जहाँ क्रिया आ जाए, वहाँ द्वितीया होगी, चतुर्थी नहीं। इसलिए 'नमस्करोति' के साथ 'देवान्' (द्वितीया) आता है, 'देवेभ्यः' नहीं।


11. अनादर और गति (Special Rules)

सूत्र: मन्यकर्मण्यनादरे विभाषाऽप्राणिषु । (2/3/17)

हिन्दी व्याख्या: 'मन्' (मानना/समझना) धातु के योग में जब अनादर (तिरस्कार) दिखाया जाए, तो निर्जीव (अप्राणि) कर्म में विकल्प से चतुर्थी होती है।

  • उदाहरण: न त्वां तृणं मन्ये / तृणाय वा। (मैं तुम्हें तिनके के बराबर भी नहीं समझता)।

अपवाद (वार्तिक): यदि कर्म 'नाव' (नौका), 'अन्न', 'शुक' (तोता) या 'शृगाल' (सियार) हो, तो चतुर्थी नहीं होगी।

  • उदाहरण: न त्वां नावम् मन्ये। (यहाँ चतुर्थी नहीं होगी)।

सूत्र: गत्यर्थकर्मणि-द्वितीयाचतुर्थ्यो- चेष्टायामनध्वनि। (2/3/12)

हिन्दी व्याख्या: जाने के अर्थ वाली (गत्यर्थक) धातुओं के कर्म में यदि 'शारीरिक चेष्टा' हो और वह 'रास्ता' (अध्वन्) न हो, तो द्वितीया और चतुर्थी दोनों होती हैं।

  • उदाहरण: ग्रामं गच्छति / ग्रामाय गच्छति। (गाँव को जाता है)।

  • शर्त 1 (चेष्टा): यदि केवल मन से जा रहा हो, तो चतुर्थी नहीं होगी— मनसा हरिं व्रजति (यहाँ केवल द्वितीया होगी)।

  • शर्त 2 (अनध्वनि): यदि मार्ग पर चल रहा हो, तो चतुर्थी नहीं होगी— पन्थानं गच्छति


निष्कर्ष: चतुर्थी विभक्ति का आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व

चतुर्थी विभक्ति केवल व्याकरण का एक नियम नहीं है, बल्कि यह 'समर्पण' और 'उद्देश्य' की विभक्ति है। जब हम कहते हैं 'श्री गणेशाय नमः', तो हम अपना अहंकार छोड़कर उस परम सत्ता के प्रति सम्प्रदान भाव (पूर्ण समर्पण) व्यक्त करते हैं।

महत्वपूर्ण बिन्दु:

  1. दान कर्म में जिसे वस्तु मिलती है, वह सम्प्रदान है।

  2. पसंद (रुचि) आने पर प्रसन्न होने वाला सम्प्रदान है।

  3. गुस्सा (क्रोध) जिस पर किया जाए, वह सम्प्रदान है।

  4. लक्ष्य (प्रयोजन) हमेशा चतुर्थी में होता है।

  5. पूजा-पाठ और आहुति (स्वाहा, स्वधा) के शब्दों में चतुर्थी अनिवार्य है।

आशा है कि कारक प्रकरण का यह 'चतुर्थी विभक्ति' विश्लेषण आपके ज्ञानवर्धन में सहायक सिद्ध होगा। संस्कृत व्याकरण के ऐसे ही गूढ़ विषयों को समझने के लिए निरंतर अध्ययन आवश्यक है।

॥ जयतु संस्कृतम् ॥ जयतु भारतम् ॥


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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।

  • महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।

मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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