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व्याकरण आचार्य जैनेन्द्र

व्याकरण आचार्य जैनेन्द्र

जैनेन्द्र व्याकरण: जैन संस्कृत व्याकरण परंपरा का अनमोल रत्न | आचार्य देवनन्दी (पूज्यपाद) की कालजयी कृति

प्रस्तावना: संस्कृत व्याकरण और जैन परंपरा

भारतीय ज्ञान परंपरा में व्याकरण को 'वेदांग' और 'शब्द-अनुशासन' के रूप में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। जहाँ महर्षि पाणिनी का 'अष्टाध्यायी' संस्कृत व्याकरण का मेरुदंड माना जाता है, वहीं जैन आचार्यों ने भी संस्कृत भाषा को परिष्कृत और सुव्यवस्थित करने में युगांतरकारी योगदान दिया है। इसी कड़ी में 'जैनेन्द्र व्याकरण' एक ऐसा मील का पत्थर है, जिसने छठी शताब्दी में व्याकरण शास्त्र को एक नई दिशा प्रदान की।

जैनेन्द्र व्याकरण न केवल दिगम्बर जैन संप्रदाय का गौरव है, बल्कि यह सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य की एक अमूल्य निधि है। इस लेख में हम जैनेन्द्र व्याकरण की बारीकियों, इसके रचयिता आचार्य देवनन्दी, इसकी संरचना और इसके ऐतिहासिक महत्व पर विस्तार से चर्चा करेंगे।


मंगलचरण और श्लोक

किसी भी शुभ कार्य या शास्त्र की व्याख्या से पूर्व मंगलाचरण की परंपरा रही है। आचार्य देवनन्दी को नमन करते हुए:

"यस्य नि:श्वसितं वेदा यो वेदेभ्योऽखिलं जगत्।
निर्ममे तमहं वन्दे विद्यातीर्थं महेश्वरम्॥"

तथा जिनेन्द्र देव की स्तुति में:

"लक्ष्मीनिवासं जगतां निवासं, जिनेन्द्रमभ्यर्च्य जगत्प्रधानम्।
जैनेन्द्रशब्दागममल्पशब्दं, वक्ष्ये बुधानां प्रतिपत्तयेऽहम्॥"
(अर्थ: लक्ष्मी के निवास और जगत के प्रधान जिनेन्द्र देव की अर्चना कर, मैं विद्वानों के ज्ञान हेतु अल्प शब्दों में जैनेन्द्र व्याकरण की रचना करता हूँ।)


1. आचार्य देवनन्दी: जैनेन्द्र व्याकरण के प्रणेता

जैनेन्द्र व्याकरण के रचयिता आचार्य देवनन्दी हैं, जिन्हें इतिहास में 'पूज्यपाद' के नाम से अधिक ख्याति प्राप्त हुई। वे दिगम्बर जैन संप्रदाय के एक अत्यंत तेजस्वी और बहुमुखी प्रतिभा के धनी आचार्य थे।

जीवन और जन्म परिचय

आचार्य पूज्यपाद का जन्म कर्नाटक के 'कोले' ग्राम में हुआ था। उनके पारिवारिक परिवेश और माता-पिता के संबंध में ऐतिहासिक प्रमाण इस प्रकार हैं:

  • पिता: माधवभट्ट

  • माता: श्रीदेवी

उनका मूल नाम देवनन्दी था, लेकिन उनकी अद्भुत विद्वत्ता, तपस्या और उनके चरणों की पवित्रता के कारण उन्हें 'पूज्यपाद' की उपाधि दी गई। कन्नड़ साहित्य के प्रसिद्ध कवि चन्द्रय्य ने कन्नड़ भाषा में पूज्यपाद का विस्तृत जीवनचरित लिखा है, जो उनके प्रति दक्षिण भारत की श्रद्धा को दर्शाता है।

विद्वत्ता और उपाधियाँ

गणरत्नमहोदधि के कर्ता वर्धमान ने आचार्य देवनन्दी को 'दिग्वस्त्र' के नाम से स्मरण किया है, जो उनके दिगम्बर (दिग्+अम्बर) मुनि होने का प्रमाण है। वे केवल व्याकरण के ही नहीं, बल्कि आयुर्वेद, दर्शन और अध्यात्म के भी प्रकांड पंडित थे।


2. जैनेन्द्र व्याकरण का परिचय और नामकरण

'जिनेन्द्रेण प्रोक्तं जैनेन्द्रम्' – अर्थात जो जिनेन्द्र (जितेन्द्रिय) द्वारा कहा गया या उनके शासन के अनुकूल है, वही जैनेन्द्र है।

जैनेन्द्र व्याकरण जैन परंपरा के उपलब्ध समस्त व्याकरणों में सबसे प्राचीन माना जाता है। इसकी रचना छठी शताब्दी (6th Century AD) में हुई थी। इस व्याकरण का मुख्य उद्देश्य जैन मुनियों और विद्वानों के लिए एक ऐसा शब्द-शास्त्र उपलब्ध कराना था जो संक्षिप्त हो, स्पष्ट हो और जैन सिद्धांतों के अनुकूल हो।

व्याकरण का आधार

आचार्य देवनन्दी ने इस व्याकरण की रचना करते समय दो प्रमुख स्तंभों को आधार बनाया:

  1. पाणिनी व्याकरण (अष्टाध्यायी): सूत्र शैली और वैज्ञानिकता के लिए।

  2. चान्द्र व्याकरण: संक्षिप्तता और कुछ विशिष्ट प्रयोगों के लिए।


3. जैनेन्द्र व्याकरण की संरचना: 'पञ्चाध्यायी'

जैनेन्द्र व्याकरण को 'पञ्चाध्यायी' भी कहा जाता है क्योंकि यह पाँच अध्यायों में विभक्त है। पाणिनी की अष्टाध्यायी में जहाँ आठ अध्याय हैं, पूज्यपाद ने इसे पाँच अध्यायों में समेटकर अधिक संक्षिप्त और सारगर्भित बना दिया।

प्रमुख विशेषताएं:

  • संक्षिप्तता: इसमें पाणिनी की तुलना में कम सूत्र हैं, लेकिन विषय-वस्तु में कोई कमी नहीं की गई है।

  • जैन पारिभाषिक शब्द: इसके उदाहरणों में जैन संप्रदाय के विशिष्ट शब्दों (जैसे- तीर्थंकर, गणधर, श्रावक, निर्जरा) का प्रचुर मात्रा में प्रयोग मिलता है।

  • प्राचीन आचार्यों का उल्लेख: इस ग्रंथ में अपने समय के और स्वयं से पूर्ववर्ती प्राचीन आचार्यों का सादर उल्लेख किया गया है, जो ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।


4. एक अनूठी विशेषता: 'देवोपग्यमेकशेषव्याकरणम्'

जैनेन्द्र व्याकरण की सबसे क्रांतिकारी विशेषता इसका 'एकशेषप्रकरणरहित' होना है। संस्कृत व्याकरण में 'एकशेष' वह प्रक्रिया है जहाँ दो या दो से अधिक शब्दों में से केवल एक शेष बचता है (जैसे 'माता च पिता च' के स्थान पर 'पितरौ')।

आचार्य देवनन्दी ने सर्वप्रथम 'एकशेषरहित' व्याकरण की रचना की। इसी कारण इसे 'देवोपग्यमेकशेषव्याकरणम्' कहा जाता है। उन्होंने भाषा की स्पष्टता के लिए एकशेष वृत्ति का त्याग किया, जो उनकी मौलिक सोच का परिचायक है।


5. टीकाएँ और व्याख्या: अभयनन्दी की वृत्ति

किसी भी व्याकरण ग्रंथ की सार्थकता उसकी टीकाओं से सिद्ध होती है। जैनेन्द्र व्याकरण अत्यंत गूढ़ और संक्षिप्त सूत्रों में निबद्ध है, जिसे समझने के लिए टीकाओं का सहारा लिया जाता है।

  • अभयनन्दी की वृत्ति: जैनेन्द्र व्याकरण पर आचार्य अभयनन्दी द्वारा लिखी गई वृत्ति सबसे अधिक प्रसिद्ध और प्रामाणिक मानी जाती है। इसके बिना जैनेन्द्र सूत्रों के वास्तविक अर्थ को समझना कठिन है।

  • अन्य टीकाकार: इसके अतिरिक्त प्रभाचन्द्र, और अन्य जैन विद्वानों ने भी इस पर अपनी व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं।


6. शिष्य परंपरा: राजा दुर्विनीत का संबंध

आचार्य पूज्यपाद की विद्वत्ता से प्रभावित होकर तत्कालीन राजाओं ने भी उनसे शिक्षा ग्रहण की। उनके प्रमुख शिष्यों में 'दुर्विनीत' का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। राजा दुर्विनीत पश्चिमी गंग राजवंश के शासक थे और स्वयं एक महान विद्वान थे। उन्होंने पूज्यपाद के सानिध्य में रहकर न केवल व्याकरण बल्कि आध्यात्मिक विद्या भी सीखी।


7. जैनेन्द्र व्याकरण का दार्शनिक महत्व

जैन दर्शन में शब्द को 'पुद्गल' (Matter) माना गया है। शब्द-ब्रह्म की साधना ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है। पूज्यपाद ने व्याकरण को केवल भाषा सीखने का साधन नहीं माना, बल्कि इसे आत्म-शुद्धि का एक मार्ग बताया।

श्लोक:
"शब्दादर्थप्रतिपत्ति:, अर्थात्तत्त्वनिर्णय:, तत्त्वनिर्णयान्मोक्ष:।"
(अर्थ: शब्दों से अर्थ का बोध होता है, अर्थ से तत्व का निर्णय होता है और तत्व के सही निर्णय से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।)

इसीलिए, जैनेन्द्र व्याकरण का अध्ययन एक जैन अनुयायी के लिए धार्मिक अनुष्ठान के समान है।


8. ऐतिहासिक और भौगोलिक संदर्भ

  • छठी शताब्दी का कालखण्ड: यह वह समय था जब भारत में ज्ञान-विज्ञान अपने चरम पर था। गुप्तोत्तर काल में दक्षिण भारत विद्या का केंद्र बन रहा था।

  • कर्नाटक का योगदान: आचार्य पूज्यपाद का कर्नाटक से होना यह दर्शाता है कि दक्षिण भारत में संस्कृत और प्राकृत का संगम किस प्रकार जैन आचार्यों द्वारा संरक्षित किया गया।


9. जैनेन्द्र व्याकरण बनाम अन्य व्याकरण

विशेषतापाणिनी (अष्टाध्यायी)जैनेन्द्र (पञ्चाध्यायी)
अध्याय85
दृष्टिकोणसार्वभौमिक/वैदिकजैन धर्म प्रधान
एकशेषसम्मिलित हैपूर्णतः रहित
मुख्य टीकामहाभाष्य (पतंजलि)जैनेन्द्र वृत्ति (अभयनन्दी)

10. आधुनिक युग में प्रासंगिकता और निष्कर्ष

आज के डिजिटल युग में, जहाँ हम भाषा विज्ञान (Linguistics) की बात करते हैं, जैनेन्द्र व्याकरण जैसे प्राचीन ग्रंथ हमें 'Computational Linguistics' के शुरुआती सूत्र प्रदान करते हैं। इसकी संक्षिप्तता और गणितीय शुद्धता अद्भुत है।

जैनेन्द्र व्याकरण केवल जैन समुदाय की थाती नहीं है, बल्कि यह भारत की उस महान परंपरा का हिस्सा है जहाँ व्याकरण को 'वेदास्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्' (व्याकरण को वेद का मुख कहा गया है) मानकर पूजा जाता था। आचार्य देवनन्दी (पूज्यपाद) का यह कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव मार्गदर्शक रहेगा।


अंतिम मंत्र (कल्याण मंत्र)

"सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद दुःखभाग्भवेत्॥"

उपसंहार:
जैनेन्द्र व्याकरण छठी शताब्दी की वह अमर रचना है जिसने संस्कृत व्याकरण को एक नया कलेवर दिया। आचार्य देवनन्दी की 'पञ्चाध्यायी' आज भी भाषाविदों के लिए शोध का विषय है। यदि आप भारतीय संस्कृति, जैन इतिहास और संस्कृत के विकास को समझना चाहते हैं, तो जैनेन्द्र व्याकरण का अध्ययन अपरिहार्य है।


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यह लेख ऐतिहासिक तथ्यों और साहित्यिक साक्ष्यों पर आधारित है। जैनेन्द्र व्याकरण की महानता का वर्णन शब्दों में करना कठिन है, यह तो केवल एक संक्षिप्त प्रयास है। 

व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।

  • महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।

मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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