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चुरादिगण (दशम गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग

चुरादिगण (दशम गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग

चुरादिगण का संपूर्ण विवेचन: संस्कृत व्याकरण, णिच् प्रत्यय और धातुरूपों का गहन विश्लेषण

प्रस्तावना: संस्कृत व्याकरण की दिव्यता

संस्कृत भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड की ध्वनियों का वैज्ञानिक संकलन है। महर्षि पाणिनि ने अपनी कालजयी रचना 'अष्टाध्यायी' में भाषा को सूत्रों में पिरोकर उसे अमर बना दिया। संस्कृत व्याकरण में 'धातु' (Verb root) को क्रिया का मूल माना जाता है।

संस्कृत वाङ्मय में कहा गया है:

"किं विस्तीर्णैः शास्त्रैः किं बहुभिर्विविधैस्तर्कजालैः।
एक एव व्याकरणशास्त्रपरिश्रमो विधेयः॥"
(अर्थात्: विस्तृत शास्त्रों और तर्कजालों से क्या लाभ? केवल एक व्याकरण शास्त्र का परिश्रम ही मोक्ष और ज्ञान का द्वार खोल देता है।)

पाणिनि ने धातुओं को उनके स्वभाव और प्रत्ययों के आधार पर 10 गणों (Categories) में विभाजित किया है। इनमें 'चुरादिगण' (दशम गण) अपनी अद्वितीय संरचना और 'णिच्' प्रत्यय के प्रयोग के कारण विशेष महत्व रखता है।


चुरादिगण (दशम गण) का परिचय और महत्व

चुरादिगण का नाम इस गण की प्रमुख धातु 'चुर्' (चोरी करना) के नाम पर रखा गया है। यह अष्टाध्यायी के धातुपाठ का अंतिम और दसवां गण है।

चुरादिगण की दार्शनिक पृष्ठभूमि:
इस गण की धातुएं मुख्य रूप से चोरी, छल, अनुकरण, और प्रेरणा से संबंधित होती हैं। जहाँ भ्वादिगण सामान्य क्रियाओं को दर्शाता है, वहीं चुरादिगण मानसिक वृत्तियों और सामाजिक व्यवहारों (जैसे धोखा देना या किसी की नकल करना) को गहराई से व्यक्त करता है।

चुरादिगण की मुख्य विशेषताएँ:

  1. स्वार्थे णिच्: इस गण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ धातुओं से 'णिच्' (इ) प्रत्यय स्वार्थ (उसी अर्थ में) में लगता है। अन्य गणों में णिच् प्रत्यय प्रेरणार्थक (Causative) बनाने के लिए लगता है, लेकिन यहाँ यह धातु का अभिन्न हिस्सा है।

  2. उभयपदित्व: चुरादिगण की धातुएँ सामान्यतः उभयपदी होती हैं, अर्थात् इनके रूप परस्मैपदी और आत्मनेपदी दोनों में चलते हैं।

  3. प्रेरणात्मक भाव: इस गण की अधिकांश क्रियाओं में 'करवाना' या 'प्रेरित करना' का पुट समाहित होता है।


चुरादिगण के प्रमुख सूत्र और व्याकरणिक नियम

संस्कृत व्याकरण सूत्रों पर आधारित है। चुरादिगण को समझने के लिए निम्नलिखित सूत्रों का ज्ञान अनिवार्य है:

1. मुख्य विधायक सूत्र:

"सत्याप-पाश-रूप-वीणा-तूल-श्लोक-सेना-लोम-त्वच-वर्म-वर्ण-चूर्ण-चुरादिभ्यो णिच्।" (2/1/25)

वृत्ति: एभ्यो णिच् स्यात्।
व्याख्या: यह सूत्र बताता है कि सत्याप, पाश, रूप, वीणा, तूल, श्लोक, सेना, लोमन, त्वच, वर्मन, वर्ण, चूर्ण जैसे शब्दों और 'चुर्' आदि धातुओं से 'णिच्' प्रत्यय स्वार्थ में होता है।

  • णिच् का केवल 'इ' शेष रहता है (ण और च की इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है)।

  • यह 'इ' प्रत्यय धातु के उपधा (Second last letter) को गुण या वृद्धि करने का निमित्त बनता है।

2. आत्मनेपद विधायक सूत्र:

"णिचश्च।" (1/3/74)

वृत्ति: णिजन्ताद् आत्मनेपदं स्यात् कर्तृगामिनि क्रियाफले।
व्याख्या: यदि क्रिया का फल स्वयं कर्ता को प्राप्त हो रहा हो, तो णिजन्त (चुरादिगण) धातुओं से आत्मनेपद के प्रत्यय लगते हैं। अन्यथा परस्मैपदी प्रत्यय लगते हैं। इसी कारण इसे उभयपदी माना जाता है।

3. रूप सिद्धि का नियम:

"पुगन्तलघूपधस्य च।"
जब 'चुर्' धातु से णिच् (इ) जुड़ता है, तो उपधा में स्थित 'उ' को गुण होकर 'ओ' हो जाता है।
चुर् + इ = चोरि।
इसके बाद 'सनाद्यन्ता धातवः' सूत्र से इसकी पुनः धातु संज्ञा होती है और लट् लकार में 'चोरयति' रूप सिद्ध होता है।


चुरादिगण की धातु सूची: अर्थ और विस्तृत उदाहरण

नीचे चुरादिगण की महत्वपूर्ण धातुओं की विस्तृत सूची दी गई है। प्रत्येक धातु के साथ उनके व्यावहारिक प्रयोग (वाक्य) भी दिए गए हैं:

क्रमसंस्कृत धातुहिंदी अर्थलट् लकार उदाहरण (परस्मैपदी)वाक्य प्रयोग
1चुर्चोरी करनाचोरयतिसः धनं चोरयति। (वह धन चुराता है।)
2कथ्कहना/कथा सुनानाकथयतिमाता कथां कथयति। (माता कहानी कहती है।)
3पूज्पूजा करनापूजयतिभक्तः देवं पूजयति। (भक्त देव की पूजा करता है।)
4भञ्ज्तोड़नाभञ्जयतिसः काष्ठं भञ्जयति। (वह लकड़ी तोड़ता है।)
5भिक्ष्भिक्षा माँगनाभिक्षयतिभिक्षुकः अन्नं भिक्षयति। (भिक्षुक अन्न माँगता है।)
6शंस्प्रशंसा करनाशंसयतिआचार्यः छात्रं शंसयति। (आचार्य छात्र की प्रशंसा करते हैं।)
7स्पृह्चाहना/इच्छा करनास्पृहयतिबालकः पुष्पेभ्यः स्पृहयति। (बालक फूलों की चाह करता है।)
8लोभ्ललचानालोभयतिस्वर्णं जनं लोभयति। (सोना मनुष्य को ललचाता है।)
9स्मृयाद दिलाना (प्रेरणार्थक)स्मारयतिसः मां पाठं स्मारयति। (वह मुझे पाठ याद दिलाता है।)
10गण्गिननागणयतिसः रूप्यकाणि गणयति। (वह रुपये गिनता है।)
11ताड्पीटनाताडयतिसः कुक्कुरं ताडयति। (वह कुत्ते को पीटता है।)
12पालपालन करनापालयतिराजा प्रजां पालयति। (राजा प्रजा का पालन करता है।)

धातु "चुर्" के विस्तृत रूप (Conjugation Tables)

चुरादिगण की प्रतिनिधि धातु 'चुर्' के रूपों को समझना अनिवार्य है। यहाँ लट्, लङ्, और लृट् लकार के रूप दिए गए हैं:

1. लट् लकार (Present Tense - वर्तमान काल)

नियम: चोरि + अ + ति = चोरयति

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषचोरयति (वह चुराता है)चोरयतः (वे दो चुराते हैं)चोरयन्ति (वे सब चुराते हैं)
मध्यम पुरुषचोरयसि (तुम चुराते हो)चोरयथः (तुम दो चुराते हो)चोरयथ (तुम सब चुराते हो)
उत्तम पुरुषचोरयामि (मैं चुराता हूँ)चोरयावः (हम दो चुराते हैं)चोरयामहः (हम सब चुराते हैं)

2. लङ् लकार (Past Tense - भूतकाल)

नियम: अ + चोरि + अ + त् = अचोरयत्

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषअचोरयत्अचोरयताम्अचोरयन्
मध्यम पुरुषअचोरयःअचोरयतम्अचोरयत
उत्तम पुरुषअचोरयम्अचोरयावअचोरयाम

3. लृट् लकार (Future Tense - भविष्यकाल)

नियम: चोरि + इष्यति = चोरयिष्यति

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषचोरयिष्यतिचोरयिष्यतःचोरयिष्यन्ति
मध्यम पुरुषचोरयिष्यसिचोरयिष्यथःचोरयिष्यथ
उत्तम पुरुषचोरयिष्यामिचोरयिष्यावःचोरयिष्यामहः

चुरादिगण में आत्मनेपद के रूप

जैसा कि सूत्र 'णिचश्च' में बताया गया है, यदि क्रिया का फल कर्ता को मिले, तो रूप आत्मनेपद में चलते हैं।

धातु: चुर् (आत्मनेपद - लट् लकार)

  • प्रथम पुरुष: चोरयते, चोरयेते, चोरयन्ते

  • मध्यम पुरुष: चोरयसे, चोरयेथे, चोरयध्वे

  • उत्तम पुरुष: चोरये, चोरयावहे, चोरयामहे

उदाहरण:

  • सः धनं चोरयते। (वह अपने लिए धन चुराता है।)

  • सः धनं चोरयति। (वह किसी और के लिए/सामान्य रूप से चोरी करता है।)


श्लोक और नीति वचनों में चुरादिगण का प्रयोग

संस्कृत साहित्य में चुरादिगण की धातुओं का प्रयोग नैतिकता और अधर्म के चित्रण के लिए प्रचुरता से किया गया है।

1. चोरी के निषेध पर श्लोक:

"न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥"

इस श्लोक में 'चोरहार्यं' शब्द 'चुर्' धातु से संबंधित है। यहाँ बताया गया है कि विद्या रूपी धन को कोई 'चोरयितुम्' (चुरा) नहीं सकता।

2. ईश्वर की पूजा (पूज् धातु):

"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।"
(जहाँ नारियों की पूजा/सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं।)
यहाँ 'पूज्यन्ते' चुरादिगण की 'पूज्' धातु का कर्मवाच्य रूप है।

3. कथ् धातु का प्रयोग (श्रीमद्भागवतम्):

"सूत उवाच - इति ते कथयन्तीह पुरातन्यः कथाः शुभाः।"
(सूत जी बोले - इस प्रकार वे प्राचीन शुभ कथाएँ कहते हैं।)


चुरादिगण का व्यावहारिक और सामाजिक संदर्भ

चुरादिगण की धातुएँ केवल व्याकरण का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे मानव मनोविज्ञान को भी दर्शाती हैं:

  1. चुर् और द्रुह् (धोखा): समाज में 'स्तेय' (चोरी) और 'द्रोह' (विश्वासघात) को महापाप माना गया है। व्याकरण में इन क्रियाओं को एक विशिष्ट गण में रखना इनके महत्व को दर्शाता है।

  2. सृ (सृजन): कुछ विद्वान 'सृ' धातु को भी इस गण के संदर्भ में देखते हैं, जो निर्माण या उत्पत्ति का बोध कराती है।

  3. मिथ्याचार: चुरादिगण की धातुएँ अक्सर दिखावे या पाखंड (अनुकरण) के अर्थ में प्रयुक्त होती हैं।

उदाहरण:

  • "सः सज्जनताम् अनुचोरयति।" (वह सज्जनता का ढोंग/अनुकरण करता है।)

  • "दुष्टः मित्रं द्रुह्यति।" (दुष्ट मित्र को धोखा देता है।)


णिच् प्रत्यय की प्रक्रिया: एक तकनीकी विश्लेषण

चुरादिगण की सिद्धि में 'णिच्' प्रत्यय प्राणवायु के समान है। आइए इसे 'चोरयति' के उदाहरण से समझते हैं:

  1. धातु: चुर् (स्तेये)

  2. प्रत्यय: 'चुरादिभ्यो णिच्' सूत्र से 'णिच्' प्रत्यय लगा। (चुर् + इ)

  3. गुण कार्य: 'पुगन्तलघूपधस्य च' सूत्र से उपधा 'उ' को 'ओ' हुआ। (चोर + इ = चोरि)

  4. संज्ञा: 'सनाद्यन्ता धातवः' से 'चोरि' की धातु संज्ञा हुई।

  5. लकार: लट् लकार (तिप् प्रत्यय) आने पर 'कर्तरि शप्' से 'शप्' (अ) आया। (चोरि + अ + ति)

  6. सन्धि: 'सार्वधातुक-आर्धधातुकयोः' से इकार को एकार और 'एचोऽयवायावः' से 'ए' को 'अय्' आदेश हुआ।

  7. रूप: चोरयति


चुरादिगण से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

प्रश्न 1: चुरादिगण को 'दशम गण' क्यों कहा जाता है?
उत्तर: पाणिनि के धातुपाठ में धातुओं के दस विभाग हैं। चुरादिगण क्रम में दसवें स्थान पर आता है, इसलिए इसे दशम गण कहते हैं।

प्रश्न 2: क्या चुरादिगण की सभी धातुएँ केवल नकारात्मक अर्थ (चोरी, धोखा) देती हैं?
उत्तर: नहीं। यद्यपि इसका नाम 'चुर्' पर है, लेकिन इसमें 'पूज्' (पूजा करना), 'कथ्' (कहना), 'पाल' (पालन करना) और 'गण्' (गिनना) जैसी सकारात्मक और तटस्थ धातुएँ भी शामिल हैं।

प्रश्न 3: 'णिच्' प्रत्यय का स्वार्थ में प्रयोग होने का क्या अर्थ है?
उत्तर: सामान्यतः 'णिच्' प्रत्यय क्रिया को प्रेरणार्थक (Causative) बनाने के लिए लगता है (जैसे पढ़ना से पढ़वाना)। लेकिन चुरादिगण में यह धातु के मूल अर्थ को व्यक्त करने के लिए ही अनिवार्य रूप से लगता है।


निष्कर्ष: व्याकरण और नैतिकता का समन्वय

चुरादिगण का अध्ययन हमें न केवल संस्कृत व्याकरण की सूक्ष्मताओं से परिचित कराता है, बल्कि यह भाषा के नैतिक पक्ष को भी उजागर करता है। पाणिनि ने जिस तरह से क्रियाओं को वर्गीकृत किया, वह मनुष्य के कर्मों का वर्गीकरण भी है।

"चोरयति" का अर्थ केवल भौतिक वस्तु की चोरी नहीं है, बल्कि समय की चोरी, विचारों की चोरी और सत्य को छुपाना भी इसी श्रेणी में आता है। दूसरी ओर, इसी गण की "पूजयति" धातु हमें श्रद्धा और भक्ति की ओर ले जाती है।

अतः, चुरादिगण संस्कृत सीखने वाले विद्यार्थियों के लिए एक ऐसा सेतु है जो व्याकरण के नियमों को व्यावहारिक जीवन के दर्शन से जोड़ता है। इस गण की धातुओं, उनके लकारों और सूत्रों का सम्यक् ज्ञान प्राप्त करना संस्कृत के गंभीर अध्येता के लिए अनिवार्य है।

"व्याकरणं मुखं स्मृतम्।"
(व्याकरण को वेदों का मुख कहा गया है, और चुरादिगण उस मुख की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है।)


व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।


मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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