🙏 संस्कृतज्ञानपरिवारे🙏 भवतां सर्वेषां स्वगतम् 🙏

Multi-Site Label Widget

संस्कृत-ज्ञानस्य अनुक्रमणिका

Click here to explore labels from all associated sites.

संस्कृत-ज्ञानस्य अनुक्रमणिका

×

Loading labels from all sites…

तुदादिगण (षष्ठं गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग

तुदादिगण (षष्ठं गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग

संस्कृत व्याकरण का क्रियात्मक स्तंभ: तुदादिगण (Tudadigana) - एक विस्तृत विश्लेषण

प्रस्तावना: संस्कृत और धातुओं का महत्त्व

संस्कृत भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण विज्ञान है। संस्कृत की वैज्ञानिकता का सबसे बड़ा प्रमाण इसका 'धातु-रूप' विधान है। महर्षि पाणिनि ने अपनी कालजयी रचना 'अष्टाध्यायी' में क्रियाओं के मूल रूप को 'धातु' कहा है।

संस्कृत वाङ्मय में एक प्रसिद्ध श्लोक है:

"क्रियावाचको धातुः।"
(अर्थात: जो क्रिया को व्यक्त करे, वही धातु है।)

संस्कृत की लगभग 2000 धातुओं को उनकी प्रकृति, प्रत्यय और व्यवहार के आधार पर 10 समूहों में बाँटा गया है, जिन्हें 'दशगण' कहा जाता है। इन 10 गणों में 'तुदादिगण' छठे (6th) स्थान पर आता है, जो अपनी विशेष ध्वन्यात्मकता और क्रियात्मकता के लिए प्रसिद्ध है।


1. तुदादिगण का परिचय (Introduction to Tudadigana)

तुदादिगण का नाम इसकी पहली धातु 'तुद्' (Tud) के नाम पर रखा गया है। 'तुद्' का अर्थ होता है - प्रहार करना, दुःख देना या व्यथित करना। व्याकरणिक क्रम में इसे 'षष्ठं गण' (छठा गण) कहा जाता है।

नामकरण और आधार

जैसा कि सूत्र कहता है— "तुदादिभ्यः शः" (3/1/77)। इस गण की धातुओं के साथ 'श' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। तुदादिगण की धातुएँ जीवन के संघर्ष, गति, और बाह्य क्रियाओं को दर्शाती हैं।

श्लोक के माध्यम से महत्त्व:

तुदादिगणो धातूनां षष्ठो भागः प्रकीर्तितः।
श-प्रत्ययेन युक्ताश्च क्रियारूपप्रदर्शकाः॥
(अर्थ: तुदादिगण धातुओं का छठा भाग है, जो 'श' प्रत्यय से युक्त होकर क्रिया के स्वरूप को प्रकट करता है।)


2. तुदादिगण की प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)

तुदादिगण अन्य गणों (जैसे भ्वादि या अदादि) से भिन्न है। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

क) 'श' विकरण प्रत्यय (The 'Sha' Suffix)

भ्वादिगण में 'शप्' प्रत्यय लगता है, लेकिन तुदादिगण का विशेष सूत्र है— "तुदादिभ्यः शः"

  • यहाँ 'श' प्रत्यय में 'श' की 'लशक्वतद्धिते' सूत्र से इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है और केवल 'अ' शेष रहता है।

  • यह 'श' प्रत्यय 'शप्' का अपवाद है।

ख) गुण का निषेध (No Guna Change)

तुदादिगण की सबसे बड़ी पहचान यह है कि इसके लट् लकार आदि रूपों में धातु की उपधा (Penultimate letter) को 'गुण' नहीं होता।

  • उदाहरण के लिए: 'बुध्' (भ्वादि) का 'बोधति' बनता है (गुण होकर), लेकिन 'तुद्' (तुदादि) का 'तुदति' ही रहता है, 'तोदति' नहीं।

  • इसका कारण यह है कि 'श' प्रत्यय 'ङिद्वत्' (Ngidvat) व्यवहार करता है, जिससे 'क्ङिति च' सूत्र द्वारा गुण का निषेध हो जाता है।

ग) परस्मैपदी और उभयपदी प्रकृति

इस गण की अधिकांश धातुएँ परस्मैपदी हैं (जहाँ क्रिया का फल कर्ता को न मिलकर दूसरे को मिलता है), लेकिन कुछ धातुएँ आत्मनेपदी और उभयपदी भी होती हैं।


3. पाणिनि सूत्र और व्याकरणिक प्रक्रिया (Technical Analysis)

तुदादिगण को समझने के लिए कुछ शास्त्रीय सूत्रों का ज्ञान आवश्यक है:

  1. तुदादिभ्यः शः (3.1.77): तुदादिगण की धातुओं से सार्वधातुक प्रत्यय परे होने पर 'श' विकरण होता है।

  2. पाघ्राध्माधेट्दृशः... (7.3.78): यह सूत्र कुछ विशिष्ट धातुओं के रूपांतरण को नियंत्रित करता है।

  3. असंयोगाल्लिट् कित् (1.2.5): लिट् लकार में कुछ विशेष स्थितियों में गुण का निषेध करता है।

तुदति रूप की सिद्धि (Process):

  • धातु: तुद् (तुद व्यथने)

  • प्रत्यय: लट् (तिप्)

  • सूत्र 'तुदादिभ्यः शः' से 'श' (अ) का आगम।

  • स्थिति: तुद् + अ + ति = तुदति

  • यहाँ 'श' के ङिद्वत् होने के कारण 'उ' को 'ओ' (गुण) नहीं हुआ।


4. तुदादिगण की विस्तृत धातु सूची (Detailed Verb List)

नीचे इस गण की प्रमुख धातुओं की सूची, उनके अर्थ और उदाहरण दिए गए हैं:

संस्कृत धातुहिंदी अर्थउदाहरण (लट् लकार)वाक्य प्रयोग
तुद् (Tud)मारना, प्रहार करनातुदतिसैनिकः शत्रुं तुदति। (सैनिक शत्रु पर प्रहार करता है।)
स्पृश् (Sprish)स्पर्श करनास्पृशतिबालकः पुष्पं स्पृशति। (बालक फूल छूता है।)
मुच् (Much)छोड़ना, मुक्त करनामुञ्चतिसः बन्धनं मुञ्चति। (वह बंधन छोड़ता है।)
विष् (Vish)प्रवेश करनाविशतिछात्रः पाठशालां विशति। (छात्र पाठशाला में प्रवेश करता है।)
लुप् (Lup)लुप्त करना, छिपानालुपतिचोरः धनं लुपति। (चोर धन छिपाता है।)
रुज् (Ruj)कष्ट देना, तोड़नारुजतिरोगः शरीरं रुजति। (रोग शरीर को कष्ट देता है।)
क्षुभ् (Kshubh)उत्तेजित होनाक्षुभतिसागरः वातेन क्षुभति। (समुद्र हवा से क्षुब्ध होता है।)
रुह् (Ruh)उगना, चढ़नारोहतिपादपः वसुधायां रोहति। (पौधा धरती पर उगता है।)
मृज् (Mrj)शुद्ध करनामृजतिसा वस्त्रं मृजति। (वह वस्त्र साफ करती है।)
गुह् (Guh)छिपानागुहतिसः रहस्यं गुहति। (वह रहस्य छिपाता है।)
धु (Dhu)हिलाना, काँपनाधुनोति/धुवतिपवनः वृक्षं धुवति। (हवा पेड़ को हिलाती है।)
इष् (Ish)चाहनाइच्छतिशिष्यः ज्ञानम् इच्छति। (शिष्य ज्ञान चाहता है।)

5. तुदादिगण की प्रतिनिधि धातु: "तुद्" (व्यथने) के रूप

तुद् धातु का अर्थ है 'व्यथा पहुँचाना' या 'प्रहार करना'। इसके दसों लकारों में रूप महत्वपूर्ण हैं, यहाँ मुख्य लकारों का विवरण दिया जा रहा है:

क) लट् लकार (वर्तमान काल - Present Tense)

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषतुदतितुदतःतुदन्ति
मध्यम पुरुषतुदसितुदथःतुदथ
उत्तम पुरुषतुदामितुदावःतुदामः

ख) लङ् लकार (अनद्यतन भूतकाल - Past Tense)

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषअतुदत्अतुदताम्अतुदन्
मध्यम पुरुषअतुदःअतुदतम्अतुदत
उत्तम पुरुषअतुदम्अतुदावअतुदाम

ग) लृट् लकार (भविष्यत् काल - Future Tense)

यहाँ गुण संधि कार्य करती है क्योंकि 'लृट्' में विकरण 'श' नहीं होता।

  • तुद् + स्यति = तोत्स्यति (दकार को तकार और उ को ओ गुण)।
    | पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
    | :--- | :--- | :--- | :--- |
    प्रथम पुरुष | तोत्स्यति | तोत्स्यतः | तोत्स्यन्ति |
    मध्यम पुरुष | तोत्स्यसि | तोत्स्यथः | तोत्स्यथ |
    उत्तम पुरुष | तोत्स्यामि | तोत्स्यावः | तोत्स्यामः |

घ) लोट् लकार (आज्ञा/अनुज्ञा - Imperative Mood)

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषतुदतुतुदताम्तुदन्तु
मध्यम पुरुषतुदतुदतम्तुदत
उत्तम पुरुषतुदानितुदावतुदाम

ङ) विधिलिङ् लकार (चाहिए/संभावना - Potential Mood)

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषतुदेत्तुदेताम्तुदेयुः
मध्यम पुरुषतुदेःतुदेतम्तुदेत
उत्तम पुरुषतुदेयम्तुदेवतुदेम

6. तुदादिगण का आध्यात्मिक और साहित्यिक संदर्भ

संस्कृत व्याकरण केवल शुष्क नियमों का समूह नहीं है, बल्कि यह जीवन दर्शन से जुड़ा है।

मन्त्र और श्लोक प्रयोग:

  1. स्पृश् (स्पर्श करना):
    वैदिक सन्ध्या में अंग-स्पर्श के समय मन्त्र आता है:

    "ॐ वाङ् मे आस्येऽस्तु... अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु...।"
    यहाँ प्रत्यक्ष रूप से नहीं तो भाव रूप में 'स्पृशामि' का भाव निहित है। जब हम कहते हैं— "सः ईश्वरं स्पृशति", तो इसका अर्थ केवल भौतिक स्पर्श नहीं, बल्कि भक्ति की पराकाष्ठा है।

  2. इष् (इच्छति - चाहना):
    उपनिषदों का प्रसिद्ध शांति पाठ:

    "सर्वे भवन्तु सुखिनः...।"
    यहाँ 'भवन्तु' लोट् लकार है, लेकिन इसके मूल में ऋषि की 'इच्छा' (इच्छति) काम कर रही है।

  3. रुह् (उगना/चढ़ना):
    ऋग्वेद में प्रगति के लिए 'रुह्' धातु का प्रयोग मिलता है:

    "आरोहणम् क्रमणम्..." (निरंतर ऊपर चढ़ना)।
    यह धातु जीवन में उन्नति और विकास का प्रतीक है।


7. विशेष धातु प्रक्रियाएँ और अपवाद (Deep Technical Dive)

जैसा कि आपके द्वारा दिए गए अंश में उल्लेख है, तुदादिगण की कुछ प्रक्रियाएँ अत्यंत सूक्ष्म हैं:

लिट् लकार (Perfect Tense)

तुद् धातु का लिट् लकार में रूप 'तुतोद' बनता है।

  • यहाँ प्रक्रिया इस प्रकार है: तुद् + तुद् + अ (लिट् का णल् प्रत्यय)।

  • अभ्यास कार्य (Doubling) के बाद 'तुतोद' सिद्ध होता है।

  • यहाँ 'तुतोदिथ' (मध्यम पुरुष) और 'तुतुदे' (आत्मनेपद) जैसे रूप भी बनते हैं।

  • विशेष नियम: 'असंयोगाद् लिट् कित्' सूत्र से गुण का निषेध केवल वहाँ होता है जहाँ प्रत्यय 'कित्' हो।

लुङ् लकार (Aorist Tense)

'अतौत्सीत्' रूप की सिद्धि:

  • यह रूप 'अतुद् + स + ईत्' की स्थिति में बनता है।

  • यहाँ 'हलन्तलक्षणा वृद्धि' के कारण 'उ' को 'औ' वृद्धि हो जाती है।

  • दकार को तकार (चर्त्व संधि) होकर 'अतौत्सीत्' बनता है। यह रूप क्रिया की पूर्णता को दर्शाता है।


8. व्यावहारिक उदाहरण और वाक्य निर्माण (Practical Application)

संस्कृत सीखने के लिए तुदादिगण की धातुओं का वाक्यों में प्रयोग करना आवश्यक है।

उदाहरण 1: मुच् (छोड़ना)

  • रामः बाणं मुञ्चति। (राम बाण छोड़ते हैं।)

  • यहाँ 'मुच्' धातु तुदादिगण की है, जिसमें 'नुम्' आगम (मुञ्च्) होता है।

उदाहरण 2: विष् (प्रवेश करना)

  • ज्ञानं हृदयं विशति। (ज्ञान हृदय में प्रवेश करता है।)

  • आध्यात्मिक अर्थ में, जब सत्य का अनुभव होता है, तो वह चित्त में 'विशति' (प्रवेश) करता है।

उदाहरण 3: मृज् (साफ करना)

  • सा मलं मृजति। (वह गंदगी साफ करती है।)

  • योग शास्त्र में 'चित्त-मृज्' (चित्त की शुद्धि) का बड़ा महत्त्व है।


9. तुदादिगण और भ्वादिगण में अंतर (Comparison)

अक्सर विद्यार्थी भ्वादिगण (1st Group) और तुदादिगण (6th Group) में भ्रमित हो जाते हैं।

आधारभ्वादिगण (Bhvadigana)तुदादिगण (Tudadigana)
प्रत्ययशप् (अ)श (अ)
गुण कार्यउपधा को गुण होता है (उदा. भवति)उपधा को गुण नहीं होता (उदा. तुदति)
प्रमुख धातुभू, पठ्, गम्तुद्, विष्, स्पृश्
स्वरयह प्रायः 'उदात्त' प्रधान हैयह प्रायः 'अनुदात्त' प्रधान है

10. साहित्य में तुदादिगण का प्रभाव

महाकवि कालिदास और भारवि के काव्यों में तुदादिगण की धातुओं का ओजपूर्ण प्रयोग मिलता है।

किरातार्जुनीयम् (भारवि):
जब अर्जुन और किरात रूपी शिव का युद्ध होता है, तो वहाँ 'तुद्' और 'रुज्' धातुओं के अनेक रूप प्रयुक्त हुए हैं जो युद्ध की भीषणता और शस्त्रों के प्रहार को चित्रित करते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता:

"नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।"
यहाँ 'छिन्दन्ति' (छिद् धातु) हालाँकि रुधादिगण की है, लेकिन तुदादिगण की 'लुप्' और 'रुज्' जैसी धातुएँ भी गीता के कई श्लोकों में शरीर की नश्वरता और कष्टों को बताने के लिए उपयोग की गई हैं।


11. सारांश और निष्कर्ष (Conclusion)

तुदादिगण संस्कृत व्याकरण का वह जीवंत हिस्सा है जो हमें क्रियाओं की सूक्ष्मता सिखाता है।

  • यह गण हमें बताता है कि कैसे एक छोटा सा 'श' प्रत्यय पूरी धातु के व्यवहार को बदल देता है और गुण का निषेध कर देता है।

  • तुद्, स्पृश्, मुच्, और विष् जैसी धातुएँ हमारे दैनिक जीवन, विज्ञान और अध्यात्म से सीधे जुड़ी हैं।

निष्कर्ष के रूप में:
तुदादिगण का अध्ययन केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि संस्कृत की आत्मा को समझने के लिए अनिवार्य है। यह गण संघर्ष (तुद्), स्पर्श (स्पृश्) और मुक्ति (मुच्) का व्याकरणिक संगम है। महर्षि पाणिनि की यह व्यवस्था आज भी हज़ारों वर्षों बाद उतनी ही सटीक और वैज्ञानिक है।

"व्याकरणं स्मृतं वक्त्रं तस्मात् तत् प्रधानम्।"
(अर्थात: व्याकरण को वेद का मुख माना गया है, अतः इसका अध्ययन ही भाषा की पूर्णता है।)


SEO के लिए महत्वपूर्ण कीवर्ड्स:

  • संस्कृत तुदादिगण (Sanskrit Tudadigana)

  • तुदति रूप सिद्धि (Tudati Roop Siddhi)

  • संस्कृत व्याकरण धातु रूप (Sanskrit Dhaturup)

  • पाणिनि अष्टाध्यायी तुदादिगण (Panini Ashtadhyayi 6th Gana)

  • तुदादिभ्यः शः सूत्र व्याख्या (Tudadibhyah Shah Sutra)

  • संस्कृत क्रिया सूची (List of Sanskrit Verbs)


अभ्यास के लिए प्रश्न:

  1. 'तुदादिगण' में कौन सा विकरण प्रत्यय लगता है?

  2. 'तुद्' धातु के लट् लकार उत्तम पुरुष बहुवचन का रूप क्या होगा?

  3. 'तुदादिभ्यः शः' सूत्र का अर्थ उदाहरण सहित स्पष्ट करें।

  4. 'अतौत्सीत्' में कौन सी धातु और लकार है?


संस्कृतं जीवतु, संस्कृतं वर्धताम्! (संस्कृत जीवित रहे, संस्कृत बढ़ती रहे!)

व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।


मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

एक टिप्पणी भेजें

आपके महत्वपूर्ण सुझाव के लिए धन्यवाद |
(SHERE करे )