संस्कृत व्याकरण का गहन विश्लेषण: तनादिगण (Tanadigana) – अर्थ, विशेषताएँ, धातु रूप और व्यावहारिक प्रयोग
प्रस्तावना: संस्कृत और धातुओं का महत्व
संस्कृत भाषा, जिसे 'देववाणी' कहा जाता है, विश्व की सबसे प्राचीन और वैज्ञानिक भाषाओं में से एक है। इसकी वैज्ञानिकता का मुख्य आधार इसका व्याकरण है, जिसे महर्षि पाणिनि ने अपनी अमर कृति 'अष्टाध्यायी' में सूत्रबद्ध किया है। संस्कृत भाषा की संरचना में 'धातु' (Root Words) का स्थान वही है, जो मानव शरीर में आत्मा का होता है। धातुएँ वे मूल तत्व हैं जिनसे क्रियाओं (Verbs) और शब्दों (Nouns) का निर्माण होता है।
पाणिनि ने क्रियाओं की प्रकृति और उनके पद (परस्मैपदी, आत्मनेपदी, उभयपदी) के आधार पर धातुओं को 10 प्रमुख समूहों में विभाजित किया है, जिन्हें 'दशगण' कहा जाता है। ये गण इस प्रकार हैं:
भ्वादिगण
अदादिगण
जुहोत्यादिगण
दिवादिगण
स्वादिगण
तुदादिगण
रुधादिगण
तनादिगण
क्र्यादिगण
चुरादिगण
आज के इस विस्तृत लेख में हम 'तनादिगण' (अष्टम गण) के विषय में विस्तार से चर्चा करेंगे। यह गण छोटा होते हुए भी संस्कृत साहित्य और दैनिक व्यवहार में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
तनादिगण का परिचय: अर्थ और अवधारणा
'तनु विस्तारे' – इस गण की प्रथम धातु 'तनु' (तन्) है, जिसका अर्थ है 'विस्तार करना' या 'फैलाना'। इसी प्रथम धातु के नाम पर इस समूह का नाम 'तनादिगण' (तन् + आदि = तनादि) पड़ा।
इस गण की धातुएँ मुख्य रूप से निम्नलिखित भावों को व्यक्त करती हैं:
विस्तार (Expansion): किसी वस्तु या विचार को फैलाना।
संकोचन (Contraction): किसी चीज़ को सिकोड़ना।
तनाव (Tension): मानसिक या शारीरिक खिंचाव।
आवरण (Covering): ढंकना या छिपाना।
गतिशीलता (Mobility): सूक्ष्म गति या प्रवाह।
तनादिगण की व्याकरणिक विशेषताएँ
तनादिगण को अन्य गणों से अलग करने वाली कुछ विशिष्ट व्याकरणिक विशेषताएँ हैं:
विकरण प्रत्यय 'उ' (u):
पाणिनीय सूत्र "तनादिकृञ्भ्य उः" (3.1.79) के अनुसार, तनादिगण की धातुओं और 'कृ' धातु के बाद 'उ' विकरण प्रत्यय लगाया जाता है। यह 'शप्' (अ) प्रत्यय का अपवाद है।
उदाहरण: तन् + उ + ति = तनोति।
उभयपदी प्रकृति:
इस गण की अधिकांश धातुएँ उभयपदी होती हैं, अर्थात इनके रूप परस्मैपदी और आत्मनेपदी दोनों में चलते हैं।
परस्मैपदी: जब क्रिया का फल कर्ता को न मिलकर किसी अन्य को मिले।
आत्मनेपदी: जब क्रिया का फल स्वयं कर्ता को प्राप्त हो।
सीमित संख्या:
दशगणों में तनादिगण अपेक्षाकृत छोटा गण है। इसमें लगभग 10 मुख्य धातुएँ गिनी जाती हैं, लेकिन 'कृ' (करना) धातु के जुड़ जाने से इसका महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है।
गुण कार्य:
जब 'उ' प्रत्यय के बाद सार्वधातुक प्रत्यय आते हैं, तो 'उ' को 'ओ' (गुण) हो जाता है। जैसे: तन् + उ + ति → तनोति।
तनादिगण की प्रमुख धातुएँ और उनके अर्थ
नीचे तनादिगण की उन धातुओं की सूची दी गई है जिनका प्रयोग संस्कृत वाङ्मय में सर्वाधिक होता है:
| 1 | तनु (तन्) | तानना, विस्तार करना | सः जालं तनोति (वह जाल फैलाता है)। |
| 2 | क्षणु (क्षण्) | मारना, हिंसा करना | सः शत्रुं क्षणोति (वह शत्रु को मारता है)। |
| 3 | क्षिणु (क्षिण्) | नष्ट करना, दुखी करना | दुःखं मनः क्षणोति। |
| 4 | ऋणु (ऋण्) | गति करना, प्राप्त करना | सः गच्छति/ऋणोति। |
| 5 | तृणु (तृण्) | तिनके खाना, चरना | गौः तृणोति (गाय चरती है)। |
| 6 | घृणु (घृण्) | चमकना, प्रकाश करना | सूर्यः घृणोति (सूर्य चमकता है)। |
| 7 | वनु (वन्) | माँगना, सेवा करना | भक्तः वरं वनुते (भक्त वर माँगता है)। |
| 8 | मनु (मन्) | समझना, विचार करना | सः साधु मनुते (वह भला समझता है)। |
| 9 | कृ (डुकृञ्) | करना | सः कार्यं करोति (वह कार्य करता है)। |
| 10 | सन् (सतु) | दान देना, भजन करना | सः दानं सनोति (वह दान देता है)। |
गहन व्याकरणिक विवेचन: सूत्र और प्रक्रिया
तनादिगण को समझने के लिए महर्षि पाणिनि के सूत्रों को समझना अनिवार्य है।
सूत्र: "तनादिकृञ्भ्य उः" (Ashtadhyayi 3.1.79)
वृत्ति: शपोऽपवादः। तनोति, तनुते।
व्याख्या: यह सूत्र कहता है कि तनादिगण की धातुओं और 'कृ' धातु से परे 'उ' प्रत्यय होता है। सामान्यतः धातुओं में 'शप्' (अ) लगता है, लेकिन यह सूत्र उसका निषेध करके 'उ' का विधान करता है।
प्रमुख धातु: 'तन्' (तनु विस्तारे)
'तन्' धातु तनादिगण की प्रतिनिधि धातु है। इसके रूप उभयपदी होते हैं।
1. लट् लकार (वर्तमान काल) - परस्मैपदी
अर्थ: वह फैलाता है, वे दो फैलाते हैं...
| प्रथम पुरुष | तनोति | तनुतः | तन्वन्ति |
| मध्यम पुरुष | तनोषि | तनुथः | तनुथ |
| उत्तम पुरुष | तनोमि | तन्वः | तन्मः |
2. लट् लकार (वर्तमान काल) - आत्मनेपदी
अर्थ: वह अपने लिए फैलाता है...
| प्रथम पुरुष | तनुते | तन्वाते | तन्वते |
| मध्यम पुरुष | तनुषे | तन्वाथे | तनुध्वे |
| उत्तम पुरुष | तन्वे | तन्वहे | तन्महे |
(नोट: उत्तम पुरुष में 'तनोऽहम्' जैसे शब्द संधि के कारण बनते हैं, मूल रूप 'तन्वे' या 'तनोमि' होते हैं।)
तनादिगण के अन्य लकारों में रूप
संस्कृत में काल और अवस्था को व्यक्त करने के लिए 10 लकार होते हैं। यहाँ 'तन्' धातु के मुख्य लकारों के रूप दिए जा रहे हैं:
लङ्ग् लकार (भूतकाल)
अतीत की क्रिया को व्यक्त करने के लिए:
परस्मैपदी: अतनोत्, अतनुताम्, अतनुवन्।
आत्मनेपदी: अतनुत, अतन्वाताम्, अतन्वत।
उदाहरण: "सः वस्त्रम् अतनोत्" (उसने वस्त्र फैलाया)।
लोट् लकार (आज्ञा/अनुज्ञा)
आदेश या प्रार्थना के लिए:
परस्मैपदी: तनोतु, तनुताम्, तन्वन्तु।
आत्मनेपदी: तनुताम्, तन्वाताम्, तन्वताम्।
उदाहरण: "त्वं ज्ञानं तनु" (तुम ज्ञान का विस्तार करो)।
लृट् लकार (भविष्यत काल)
आने वाले समय के लिए:
परस्मैपदी: तनिष्यति, तनिष्यतः, तनिष्यन्ति।
आत्मनेपदी: तनिष्यते, तनिष्येते, तनिष्यन्ते।
उदाहरण: "ईश्वरः सृष्टिं तनिष्यति" (ईश्वर सृष्टि का विस्तार करेगा)।
विधिलिङ् लकार (चाहिए/संभावना)
परस्मैपदी: तनुयात्, तनुयाताम्, तनुयुः।
आत्मनेपदी: तन्वीत, तन्वीयाताम्, तन्वीरन्।
तनादिगण और 'कृ' (करना) धातु का विशेष संबंध
यद्यपि 'कृ' धातु को कुछ विद्वान अलग से भी पढ़ते हैं, परंतु व्याकरणिक प्रक्रिया की दृष्टि से इसे तनादिगण में ही रखा गया है क्योंकि इसमें भी 'उ' प्रत्यय लगता है। 'कृ' धातु के बिना संस्कृत भाषा की कल्पना असंभव है।
कृ (To do) - लट् लकार:
करोति, कुरुतः, कुर्वन्ति (परस्मैपदी)
कुरुते, कुर्वाते, कुर्वते (आत्मनेपदी)
श्लोक के माध्यम से महत्व:
यत्किञ्चित् कुरुते लोकः तत्तद् तनादिना विना न सिध्यति।
(संसार में जो कुछ भी किया जाता है, वह तनादिगण की क्रियाओं के बिना सिद्ध नहीं होता।)
मंत्र और श्लोकों में तनादिगण का प्रयोग
संस्कृत साहित्य और वेदों में तनादिगण की धातुओं का प्रचुर प्रयोग मिलता है। विशेषकर 'तन्' और 'कृ' धातुओं का।
1. ऋग्वेद का एक मंत्र (विस्तार के अर्थ में):
"यज्ञं तन्वाते कवयः मनीषीणः..."
अर्थ: बुद्धिमान कवि (ऋषि) यज्ञ का विस्तार करते हैं। यहाँ 'तन्वाते' रूप तनादिगण के आत्मनेपदी लट् लकार का द्विवचन है।
2. श्रीमद्भगवद्गीता से उदाहरण:
"तद् यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।"
भगवान कृष्ण जब अपनी विभूतियों और योगमाया के विस्तार की बात करते हैं, तो 'तन्' धातु के भाव अंतर्निहित होते हैं।
3. शांति मंत्र:
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते..."
यहाँ पूर्णता का विस्तार भी तनादिगण के 'तनु विस्तारे' के भाव को पुष्ट करता है।
व्यावहारिक उदाहरण और वाक्य प्रयोग
तनादिगण की धातुओं को दैनिक जीवन में कैसे प्रयोग करें, इसके कुछ उदाहरण यहाँ दिए गए हैं:
तन् (विस्तार):
वाक्य: "सूर्यः प्रकाशं तनोति।" (सूर्य प्रकाश फैलाता है।)
भाव: यहाँ सूर्य की किरणों के प्रसार को व्यक्त किया गया है।
मनु (सोचना/मानना):
वाक्य: "अहं त्वां मित्रं मन्वे।" (मैं तुम्हें मित्र मानता हूँ।)
व्याकरण: मन् + उ + ए = मन्वे (उत्तम पुरुष, आत्मनेपदी)।
क्षणु (हिंसा/चोट):
वाक्य: "दुर्वचनं हृदयं क्षणोति।" (कठोर वचन हृदय को चोट पहुँचाते हैं।)
वन् (याचना/सेवा):
वाक्य: "शिष्यः गुरुं वनुते।" (शिष्य गुरु की सेवा/प्रार्थना करता है।)
स्तम्भ् (रोकना/स्थिर करना):
वाक्य: "सः योगेन चित्तं स्तम्भ्नोति।" (वह योग से चित्त को रोकता है।)
तनादिगण का दार्शनिक पक्ष
संस्कृत व्याकरण केवल शब्दों का खेल नहीं है, इसमें गहरा दर्शन छिपा है। तनादिगण की प्रमुख धातु 'तन्' से ही 'तन्त्र' (Tantra) शब्द बना है।
तनोति त्रायति इति तन्त्रम्।
(जो विस्तार करता है और रक्षा करता है, वही तंत्र है।)
यह गण सिखाता है कि जीवन संकुचन का नाम नहीं, बल्कि विस्तार का नाम है। जब हम अपने ज्ञान, प्रेम और करुणा का विस्तार करते हैं, तो हम तनादिगण की मूल भावना 'तनु विस्तारे' को जी रहे होते हैं।
तनादिगण की धातुओं की विस्तृत रूपरेखा (Table)
विद्यार्थियों की सुविधा के लिए यहाँ कुछ कम प्रचलित परंतु महत्वपूर्ण धातुओं के लट् लकार के रूप दिए जा रहे हैं:
| क्षणु (मारना) | क्षणोति, क्षणुतः, क्षण्वन्ति | क्षणोषि, क्षणुथः, क्षणुथ | क्षणोमि, क्षण्वः, क्षण्मः |
| ऋणु (जाना) | ऋणोति, ऋणुतः, ऋण्वन्ति | ऋणोषि, ऋणुथः, ऋणुथ | ऋणोमि, ऋण्वः, ऋण्मः |
| मनु (मानना) | मनुते, मन्वाते, मन्वते | मनुषे, मन्वाथे, मनुध्वे | मन्वे, मन्वहे, मन्महे |
तनादिगण का अध्ययन क्यों आवश्यक है?
शुद्ध उच्चारण और लेखन: 'उ' विकरण के कारण इसके रूप भ्वादिगण (अ विकरण) से भिन्न होते हैं। इन्हें जानकर ही आप 'तनोति' और 'भवति' के अंतर को समझ सकते हैं।
साहित्यिक समझ: रामायण, महाभारत और कालिदास की रचनाओं में 'तन्' और 'कृ' धातुओं के हज़ारों प्रयोग हैं। बिना तनादिगण के ज्ञान के इनका अर्थ समझना कठिन है।
प्रतियोगी परीक्षाएँ: टीजीटी (TGT), पीजीटी (PGT), नेट (NET) और यूपीएससी (UPSC) संस्कृत जैसी परीक्षाओं में 'तनादिकृञ्भ्य उः' सूत्र और तनादिगण के रूपों पर अक्सर प्रश्न पूछे जाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: तनादिगण का विकरण प्रत्यय क्या है?
उत्तर: तनादिगण का विकरण प्रत्यय 'उ' है।
प्रश्न 2: क्या 'कृ' धातु तनादिगण की है?
उत्तर: हाँ, पाणिनि के सूत्रों के अनुसार 'कृ' धातु को तनादिगण की प्रक्रिया के समान ही 'उ' प्रत्यय प्राप्त होता है, इसलिए इसे इसी गण में गिना जाता है।
प्रश्न 3: तनादिगण में कितनी धातुएँ हैं?
उत्तर: मुख्य रूप से इसमें 10 धातुएँ मानी गई हैं (तनु, क्षणु, क्षिणु, ऋणु, तृणु, घृणु, वनु, मनु, डुकृञ्, सतु)।
प्रश्न 4: 'तनोति' और 'तनुते' में क्या अंतर है?
उत्तर: 'तनोति' परस्मैपदी रूप है (कार्य दूसरों के लिए) और 'तनुते' आत्मनेपदी रूप है (कार्य स्वयं के लिए)।
निष्कर्ष
तनादिगण संस्कृत व्याकरण का वह सूक्ष्म सेतु है जो भौतिक क्रियाओं (जैसे फैलाना, काटना, ढंकना) को मानसिक अवस्थाओं (जैसे मानना, विचार करना) से जोड़ता है। इसकी उभयपदी प्रकृति हमें यह सिखाती है कि क्रिया का प्रभाव केवल कर्म पर ही नहीं, बल्कि कर्ता पर भी पड़ता है।
महर्षि पाणिनि की यह व्यवस्था हमें भाषा की गहराई और सटीकता का बोध कराती है। चाहे आप एक विद्यार्थी हों, शोधकर्ता हों या संस्कृत प्रेमी, तनादिगण का ज्ञान आपकी भाषाई क्षमता को एक नई ऊँचाई प्रदान करेगा।
संस्कृत की इस अनमोल विरासत को सहेजने के लिए इसका निरंतर अभ्यास अनिवार्य है। जैसा कि कहा गया है:
"अभ्याससारो हि व्याकरणविद्।"
(निरंतर अभ्यास ही व्याकरण के ज्ञाता का सार है।)
॥ इति तनादिगण प्रकरणम् समाप्तम् ॥
लेखक का सुझाव: इस लेख को अपनी डायरी में नोट करें और प्रतिदिन कम से कम एक धातु के 10 लकारों में रूप लिखने का अभ्यास करें। यह आपकी संस्कृत यात्रा को सुगम बनाएगा।
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
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