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स्वादिगण (पञ्चम् गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग

स्वादिगण (पञ्चम् गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग

संस्कृत व्याकरण का गहन विश्लेषण: स्वादिगण (पंचम गण) - स्वरूप, सूत्र और व्यावहारिक प्रयोग

प्रस्तावना: संस्कृत व्याकरण की महिमा

संस्कृत भाषा केवल एक संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक पूर्णतः वैज्ञानिक संरचना है। महर्षि पाणिनि ने अपनी कालजयी कृति 'अष्टाध्यायी' में भाषा के प्रत्येक सूक्ष्म अंश को अनुशासित किया है। संस्कृत वाङ्मय में 'क्रिया' को अभिव्यक्त करने वाले मूल शब्द को 'धातु' कहा जाता है। 'धातुपाठा' के अनुसार, सभी धातुओं को उनकी प्रकृति और विकरण (प्रत्यय जोड़ने की प्रक्रिया) के आधार पर १० गणों (समूहों) में विभाजित किया गया है।

इन १० गणों में 'स्वादिगण' (Svādigaṇa) अपना एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान रखता है। स्वादिगण को सामान्यतः पंचम गण के रूप में जाना जाता है। इस गण का नाम इसकी प्रथम धातु 'सु' (अभिषवे - रस निकालना) और कुछ संदर्भो में 'स्वद्' (आस्वादने - स्वाद लेना) के आधार पर पड़ा है।

इस विस्तृत लेख में हम स्वादिगण की संरचना, उसके प्रमुख सूत्र, धातुओं के विभिन्न लकारों में रूप और उनके दार्शनिक व साहित्यिक महत्व पर विस्तार से चर्चा करेंगे।


१. स्वादिगण का परिचय और व्युत्पत्ति

संस्कृत व्याकरण में 'गण' व्यवस्था क्रियाओं के वर्गीकरण की एक अद्भुत पद्धति है। 'स्वादिगण' शब्द की व्युत्पत्ति 'सु + आदि = स्वादि' से हुई है, जिसका अर्थ है "वे धातुएं जिनके आदि (प्रारंभ) में 'सु' धातु है।"

स्वादिगण की मुख्य पहचान:
इस गण की सबसे बड़ी विशेषता इसका 'विकरण' है। पाणिनि सूत्र "स्वादिभ्यः श्रुः" (३/१/७३) के अनुसार, स्वादिगण की धातुओं और तिङ् प्रत्ययों के बीच 'श्रु' (nu) प्रत्यय जोड़ा जाता है। यही 'श्रु' इस गण की धातुओं को भ्वादि या अदादि गण से अलग करता है।


२. स्वादिगण के प्रमुख व्याकरणिक सूत्र और प्रक्रिया

स्वादिगण को समझने के लिए हमें अष्टाध्यायी के कुछ महत्वपूर्ण सूत्रों की व्याख्या समझनी होगी:

(क) सूत्र: स्वादिभ्यः श्रुः (३/१/७३)

वृत्ति: शपापवादः। सुनोति, सुनुतः, सुन्वन्ति।
व्याख्या: यह सूत्र कहता है कि स्वादिगण की धातुओं से परे 'श्रु' प्रत्यय होता है। सामान्यतः धातुओं में 'शप' (अ) प्रत्यय लगता है, लेकिन यह सूत्र 'शप' का बाध (निरस्त) कर 'श्रु' का विधान करता है। 'श्रु' में से 'श्' और 'उ' की इत्संज्ञा होकर 'नु' शेष बचता है।

(ख) सूत्र: श्नुप्रत्ययस्य अकारलोपः और अन्य प्रक्रियाएं

जब हम 'सु + नु + ति' करते हैं, तो 'नु' का उकार बना रहता है, लेकिन जब पीछे स्वर वाला प्रत्यय आता है, तो यण संधि या अन्य नियमों से रूप परिवर्तन होता है।

  • सुनोति: यहाँ 'नु' के 'उ' को गुण होकर 'ओ' हो जाता है।

  • सुन्वन्ति: यहाँ 'उ' को 'व्' (यण सन्धि) हो जाता है।

(ग) सूत्र: स्तु-सु-धूञ्भ्यः परस्मैपदेषु (७/२/७२)

वृत्ति: एभ्यः सिच इट् स्यात् परस्मैपदेषु। असावीत, अमोष्ट।
हिन्दी अर्थ: स्तु, सु और धू धातुओं से परे 'सिच' को 'इट्' आगम होता है, यदि परस्मैपद के प्रत्यय पीछे हों। यह सूत्र विशेष रूप से 'लुङ् लकार' (भूतकाल) में प्रयुक्त होता है।


३. स्वादिगण की धातु सूची और उनके अर्थ

स्वादिगण में धातुओं की संख्या अन्य गणों की तुलना में सीमित है, परंतु इनका प्रभाव व्यापक है। नीचे दी गई तालिका में प्रमुख धातुओं, उनके अर्थ और लट् लकार के उदाहरण दिए गए हैं:

संस्कृत धातुमूल अर्थहिन्दी व्याख्याउदाहरण (लट् लकार)
सु (षु)अभिषवेरस निकालना/स्नान करनासः सोमं सुनोति (वह सोम रस निकालता है)।
स्वद्आस्वादनेस्वाद लेना, आनंद लेनासः भोजनं स्वादते (वह भोजन का स्वाद लेता है)।
खिद्दैन्ये/परितापेथकना या दुखी होनासः खिद्यते (वह थकता है)।
बुधअवगमनेजानना या बोध होनासः तत्त्वं बुध्यते (वह सत्य को जानता है)।
पचपाकेपकाना (आत्मनेपद में)सः ओदनं पच्यते (वह भात पकाता है/पकता है)।
रुचदीप्तौ/प्रीतौअच्छा लगना/रुचि होनासः कार्ये रुच्यते (वह कार्य में रुचि लेता है)।
मुचमोक्षणेछोड़ना या मुक्त होनासः बन्धनात् मुच्यते (वह बंधन से मुक्त होता है)।
लिंपउपदेहेलेपना या लिपटनासः चन्दनेन लिप्यते (वह चंदन से लिपटता है)।
स्निहप्रीतौस्नेह करनासः मित्रे स्नेह्यते (वह मित्र से स्नेह करता है)।
कुपक्रोधेक्रोधित होनासः शिष्याय कुप्यते (वह शिष्य पर क्रोध करता है)।
तुषतुष्टौसंतुष्ट होनासः ज्ञानेन तुष्यते (वह ज्ञान से संतुष्ट होता है)।
शुचशोकेशोक करनासः दुःखेन शुच्यते (वह दुःख से शोक करता है)।
क्षमसहनेक्षमा करनासः अपराधं क्षम्यते (वह अपराध क्षमा करता है)।
श्रुश्रवणेसुननासः कथां शृणोति (वह कथा सुनता है)।
शक्शक्तौसमर्थ होनासः पठितुं शक्नोति (वह पढ़ने में समर्थ है)।
आप्व्याप्तौप्राप्त करनासः फलं आप्नोति (वह फल प्राप्त करता है)।

४. धातु "सु" (अभिषवे) के विस्तृत रूप (लकार अनुसार)

'सु' धातु स्वादिगण की प्रतिनिधि धातु है। इसके रूपों को समझना संपूर्ण गण को समझने जैसा है।

लट् लकार (वर्तमान काल)

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषसुनोतिसुनुतःसुन्वन्ति
मध्यम पुरुषसुनोषिसुनुथःसुनुथ
उत्तम पुरुषसुनोमिसुनुवःसुनुमः

लङ् लकार (अनद्यतन भूतकाल)

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषअसुनोत्असुनुताम्असुन्वन्
मध्यम पुरुषअसुनोःअसुनुतम्असुनुत
उत्तम पुरुषअसुनवम्असुनुवअसुनुम

लृट् लकार (भविष्यत् काल)

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषसोष्यतिसोष्यतःसोष्यन्ति
मध्यम पुरुषसोष्यसिसोष्यथःसोष्यथ
उत्तम पुरुषसोष्यामिसोष्यावःसोष्यामः

५. "स्वद्" धातु: स्वाद और आनंद का व्याकरण

'स्वद्' धातु का अर्थ है स्वाद लेना या सुख प्राप्त करना। यह धातु आत्मनेपदी रूपों में विशेष रूप से प्रयुक्त होती है।

लट् लकार (आत्मनेपद)

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषस्वादतेस्वादेतेस्वादन्ते
मध्यम पुरुषस्वादसेस्वादेथेस्वादध्वे
उत्तम पुरुषस्वादेस्वादावहेस्वादामहे

व्यावहारिक उदाहरण:

  1. भोजनं स्वादते बालकः। (बालक भोजन का स्वाद लेता है।)

  2. वयं जीवनस्य आनन्दं स्वादावहे। (हम सब जीवन के आनंद का अनुभव करते हैं।)


६. वैदिक और दार्शनिक संदर्भ में स्वादिगण

स्वादिगण की धातुएं केवल व्याकरणिक अभ्यास नहीं हैं, बल्कि वे वेदों के प्राण हैं।

मंत्र उदाहरण (ऋग्वेद):

सोम यज्ञ में 'सु' धातु का अत्यधिक प्रयोग होता है।
"सुन्वन्ति सोमं देवतातये..."
अर्थात्: "देवताओं की प्रसन्नता के लिए वे सोम का अभिषेक (रस निष्कर्षण) करते हैं।"

यहाँ 'सुन्वन्ति' स्वादिगण का लट् लकार बहुवचन रूप है। यह क्रिया केवल रस निकालने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अंतरात्मा के शुद्धिकरण का प्रतीक है।

श्रीमद्भगवद्गीता में प्रयोग:

भगवान कृष्ण जब ज्ञान की बात करते हैं, तो वे 'बुध' या 'शक्' जैसी धातुओं का प्रयोग करते हैं जो स्वादिगण के समान तंत्र का पालन करती हैं।
"शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्..." (गीता ५.२३)
यहाँ 'शक्नोति' (समर्थ होना) स्वादिगण की धातु 'शक्' का रूप है।


७. स्वादिगण की विशेष प्रक्रियाएँ और अपवाद

स्वादिगण में कुछ धातुएं 'उभयपदी' होती हैं, अर्थात उनके रूप परस्मैपद और आत्मनेपद दोनों में चलते हैं।

पुत्र अभिषवे (सु धातु):
यह धातु उभयपदी है। 'अभिषव' का अर्थ है स्नान करना या निचोड़ना।

  • परस्मैपद: सुनोति

  • आत्मनेपद: सुनुते

सूत्र व्याख्या: "असावीत" (लुङ् लकार)
'सु' धातु का लुङ् लकार (भूतकाल) अत्यंत जटिल है।
प्रक्रिया: अ + सु + सिच् + ईट् + त
यहाँ 'सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु' सूत्र से उकार को वृद्धि (औ) होकर 'असावीत' रूप बनता है। यह रूप वैदिक कर्मकांडों के वर्णन में बार-बार आता है।


८. तुलनात्मक विश्लेषण: स्वादिगण बनाम अन्य गण

गणविकरणउदाहरणपहचान
भ्वादिगणशप (अ)पठतिसबसे सरल और बड़ा गण।
अदादिगण(लुक् - लोप)अत्तिइसमें कोई विकरण नहीं जुड़ता।
दिवादिगणश्यन् (य)दिव्यतिइसमें 'य' जुड़ता है।
स्वादिगणश्नु (नु)सुनोतिइसमें 'नु' जुड़ता है।

स्वादिगण की विशेषता यह है कि 'नु' के कारण क्रिया में एक निरंतरता और तीव्रता का बोध होता है।


९. स्वादिगण की धातुओं का व्यावहारिक वाक्य प्रयोग

व्याकरण को आत्मसात करने का सबसे अच्छा तरीका उसका वाक्यों में प्रयोग है।

  1. श्रु (सुनना):

    • शिष्यः गुरुमुखात् विद्यां शृणोति। (शिष्य गुरु के मुख से विद्या सुनता है।)

  2. आप् (प्राप्त करना):

    • परिश्रमी जनः सफलतां आप्नोति। (परिश्रमी व्यक्ति सफलता प्राप्त करता है।)

  3. शक् (समर्थ होना):

    • सः संस्कृतं वक्तुं शक्नोति। (वह संस्कृत बोलने में समर्थ है।)

  4. तुष (संतुष्ट होना):

    • अहं तव कार्येण तुष्ये। (मैं तुम्हारे कार्य से संतुष्ट हूँ।)

  5. कुप (क्रोध करना):

    • माता पुत्राय कुप्यते। (माता पुत्र पर क्रोध करती है।)


१०. स्वादिगण की वैज्ञानिकता और स्मृति सूत्र

स्वादिगण की धातुओं को याद रखने के लिए प्राचीन आचार्यों ने कुछ 'कारिकाएं' बनाई थीं। 'श्नु' प्रत्यय का प्रभाव स्वर के साथ संधि नियमों को स्पष्ट करता है।

श्लोक:
"स्वादिभ्यः श्नुर्विधेयः स्यात् सुप्रभृतिभ्यः सदैव हि।

अर्थात् स्वादिगण की सु आदि धातुओं से सदैव 'श्नु' प्रत्यय करना चाहिए, जिसके कारण परस्मैपद और आत्मनेपद में विविध रूप सिद्ध होते हैं।


११. स्वादिगण का साहित्य पर प्रभाव

कालिदास से लेकर भारवि तक, संस्कृत के महाकवियों ने स्वादिगण की धातुओं का प्रयोग अपनी रचनाओं में सौंदर्य भरने के लिए किया है।

उदाहरण (रघुवंशम्):
जब राजा दिलीप गौ-सेवा करते हैं, तो वहाँ 'स्निह' (स्नेह करना) और 'शुच' (शोक करना) जैसी धातुओं का प्रयोग उनके भावों को व्यक्त करने के लिए किया गया है। स्वादिगण की धातुएं 'संवेदना' को व्यक्त करने में अग्रणी हैं। 'स्वद्' धातु केवल जीभ के स्वाद के लिए नहीं, बल्कि काव्यामृत के आस्वादन के लिए भी प्रयुक्त होती है।


१२. विद्यार्थियों के लिए सुझाव: स्वादिगण कैसे सीखें?

  1. नु (nu) की पहचान करें: यदि किसी क्रिया के बीच में 'नो' या 'नु' सुनाई दे (जैसे सुनोति, शक्नोति, शृणोति), तो समझ लें कि वह स्वादिगण है।

  2. सूत्र स्मरण: "स्वादिभ्यः श्रुः" को कंठस्थ करें।

  3. रूपों का अभ्यास: कम से कम एक धातु (जैसे 'सु') के पाँचों लकारों के रूप लिख-लिख कर याद करें।

  4. संधि नियमों पर ध्यान दें: विशेषकर 'उ' का 'व्' (यण) होना।


१३. निष्कर्ष: भाषा की समृद्धि का आधार

स्वादिगण संस्कृत के व्याकरणिक और साहित्यिक ढांचे की एक अनिवार्य कड़ी है। यह गण हमें सिखाता है कि कैसे एक छोटा सा प्रत्यय 'श्नु' धातु के अर्थ को क्रियान्वित कर उसे जीवंत बना देता है। स्वादिगण की धातुएं—चाहे वह 'सु' हो जो यज्ञ की पवित्रता दर्शाती है, या 'स्वद्' जो जीवन के आनंद का प्रतीक है—संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता और सूक्ष्मता का जीवंत प्रमाण हैं।

संस्कृत का अध्ययन केवल शब्दों का रटना नहीं है, बल्कि उसके पीछे छिपे तर्क और दर्शन को समझना है। स्वादिगण के माध्यम से हम न केवल शुद्ध बोलना सीखते हैं, बल्कि वैदिक परंपराओं और शास्त्रीय संस्कृत की गहराई में उतरने का मार्ग भी पाते हैं।

शुभमस्तु।


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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।


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ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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