संस्कृत व्याकरण की गहराई: दिवादिगण (चतुर्थ गण) - नियम, धातु रूप और आध्यात्मिक महत्व
प्रस्तावना: संस्कृत और व्याकरण का अंतर्संबंध
संस्कृत भाषा को 'देववाणी' कहा जाता है। इसकी संरचना इतनी वैज्ञानिक और व्यवस्थित है कि इसे विश्व की सबसे सटीक भाषा माना जाता है। इस शुद्धता का आधार है— व्याकरण। महर्षि पाणिनि ने अपने ग्रंथ 'अष्टाध्यायी' में भाषा के सूक्ष्म अंशों को सूत्रों में पिरोया है।
संस्कृत साहित्य में कहा गया है:
"मुखं व्याकरणं स्मृतम्।"
(अर्थात्, वेदांगों में व्याकरण को मुख का स्थान दिया गया है।)
संस्कृत में किसी भी क्रिया के मूल रूप को 'धातु' कहते हैं। इन्हीं धातुओं से शब्द और वाक्य का निर्माण होता है। पाणिनि ने सभी धातुओं को उनकी प्रकृति और प्रत्ययों के आधार पर 10 समूहों में बाँटा है, जिन्हें 'दशगण' कहा जाता है। इन दस गणों में 'दिवादिगण' (चतुर्थ गण) अपनी अद्वितीय विशेषताओं, ध्वनि सौंदर्य और भावप्रधान क्रियाओं के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस विस्तृत लेख में हम दिवादिगण की प्रकृति, उसके प्रमुख सूत्र, धातु रूपों की सिद्धि और व्यावहारिक प्रयोगों का सूक्ष्म विश्लेषण करेंगे।
1. दिवादिगण का परिचय (Introduction to Divadigaṇa)
दिवादिगण, पाणिनि की धातुपाठ सूची में चौथे स्थान पर आता है। इस गण का नाम इसकी पहली धातु 'दिव्' (Div) के नाम पर रखा गया है।
दिव् धातु का व्यापक अर्थ:
पाणिनीय धातुपाठ के अनुसार 'दिव्' धातु केवल एक अर्थ तक सीमित नहीं है:
"दिवु- क्रीडा-विजिगीषा-व्यवहार-द्युति-स्तुति-मोद-मद-स्वप्न-कान्ति-गतिषु।"
इसका अर्थ है कि 'दिव्' धातु निम्नलिखित 10 भावों को व्यक्त करती है:
क्रीडा: खेलना (Play)
विजिगीषा: जीतने की इच्छा (Desire to conquer)
व्यवहार: लेन-देन या आचरण (Transaction/Behavior)
द्युति: चमकना (Shine)
स्तुति: प्रशंसा करना (Praise)
मोद: प्रसन्न होना (Joy)
मद: नशा या अहंकार (Intoxication/Pride)
स्वप्न: सोना (Sleep)
कान्ति: सौंदर्य या इच्छा (Beauty/Desire)
गति: चलना या प्राप्त करना (Movement)
2. दिवादिगण की प्रमुख विशेषताएँ (Salient Features)
दिवादिगण को अन्य गणों (जैसे भ्वादि या अदादि) से अलग करने वाली कुछ प्रमुख विशेषताएँ हैं:
क. विकरण प्रत्यय 'श्यन्' (The 'Shyan' Affix)
प्रत्येक गण की अपनी एक पहचान होती है, जिसे 'विकरण' कहते हैं। दिवादिगण का मुख्य सूत्र है:
"दिवादिभ्यः श्यन्" (अष्टाध्यायी 3.1.69)
नियम: दिवादिगण की धातुओं के बाद और तिङ् प्रत्ययों से पहले 'श्यन्' (य) प्रत्यय लगाया जाता है।
श्यन् में 'श' और 'न्' की इत्-संज्ञा होकर लोप हो जाता है, केवल 'य' शेष बचता है।
उदाहरण: दिव् + श्यन् + ति = दीव्यति।
ख. आत्मनेपदी और परस्मैपदी प्रकृति
यद्यपि दिवादिगण की कई धातुएँ परस्मैपदी हैं (जैसे दिव्, नृत्, नश्), लेकिन इस गण में भाववाचक और आत्मनेपदी धातुओं की प्रधानता है। आत्मनेपदी धातुओं में क्रिया का फल स्वयं कर्ता को मिलता है।
जैसे: मुद् (मुद्यते - वह प्रसन्न होता है)।
ग. गुण का अभाव (Lack of Guna in some cases)
भ्वादिगण में धातुओं की उपधा (अंतिम वर्ण से पहले वाला स्वर) को 'गुण' होता है, लेकिन दिवादिगण में 'श्यन्' प्रत्यय होने के कारण गुण कार्य अक्सर रुक जाता है, जिससे धातु का मूल स्वरूप सुरक्षित रहता है।
3. दिवादिगण के तकनीकी सूत्र और व्याकरणिक प्रक्रिया
दिवादिगण के रूपों को समझने के लिए कुछ विशिष्ट सूत्रों का ज्ञान आवश्यक है:
1. दिवादिभ्यः श्यन् (3.1.69)
यह सूत्र 'शप' (जो भ्वादिगण में लगता है) का अपवाद है। यह अनिवार्य रूप से दिवादिगण की धातुओं के साथ 'य' जोड़ता है।
2. हलि च (8.2.77)
यह सूत्र 'दिव्' जैसी धातुओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
नियम: यदि धातु के अंत में 'व्' या 'र्' हो और उसके पहले उपधा में इ, उ, ऋ हो, तो उसे दीर्घ हो जाता है यदि बाद में हल् (व्यंजन) आदि वाला प्रत्यय हो।
इसी कारण 'दिव्' का 'दि' दीर्घ होकर 'दीव्यति' बनता है।
4. दिवादिगण की धातु सूची: अर्थ और उदाहरण
यहाँ दिवादिगण की प्रमुख धातुओं की सूची दी गई है, जो हमारे दैनिक जीवन और शास्त्रों में प्रयुक्त होती हैं:
| दिव् (Div) | चमकना, खेलना | दीव्यति / दिव्यते | सूर्यः नभे दिव्यते। (सूर्य आकाश में चमकता है) |
| नृत् (Nrit) | नृत्य करना | नृत्यति | नर्तकी मञ्चे नृत्यति। (नर्तकी मंच पर नाचती है) |
| नश् (Nash) | नष्ट होना | नश्यति | पापेन पुण्यं नश्यति। (पाप से पुण्य नष्ट होता है) |
| तुष् (Tush) | संतुष्ट होना | तुष्यति | संतोषेण जनः तुष्यति। (संतोष से मनुष्य संतुष्ट होता है) |
| मुद् (Mud) | प्रसन्न होना | मुद्यते | पुत्रं दृष्ट्वा माता मुद्यते। (पुत्र को देख माता प्रसन्न होती है) |
| श्रि (Shri) | सेवा करना/शरण | श्रियते | सः गुरुं श्रियते। (वह गुरु की शरण लेता है) |
| सिध् (Sidh) | सफल होना | सिध्यति | उद्यमेन कार्याणि सिध्यन्ति। (परिश्रम से कार्य सिद्ध होते हैं) |
| पुष् (Push) | पोषण करना | पुष्यति | उद्यानपालः वृक्षान् पुष्यति। (माली वृक्षों को पोषित करता है) |
| शुष् (Shush) | सूखना | शुष्यति | आतपेन जलं शुष्यति। (धूप से जल सूख जाता है) |
| भ्रम् (Bhram) | घूमना | भ्रम्यति | सः नगरे भ्रम्यति। (वह नगर में घूमता है) |
| क्रुध् (Krudh) | क्रोध करना | क्रुध्यति | पिता पुत्राय क्रुध्यति। (पिता पुत्र पर क्रोध करता है) |
5. 'दिव्' धातु के रूप: पाँचों लकारों में विस्तृत विश्लेषण
'दिव्' धातु दिवादिगण की प्रतिनिधि धातु है। आइए इसके रूपों को विस्तार से देखते हैं:
१. लट् लकार (वर्तमान काल - Present Tense)
इसका प्रयोग वर्तमान की क्रिया बताने के लिए होता है।
| प्रथम पुरुष | दिव्यते / दीव्यति | दिव्येते / दीव्यतः | दिव्यन्ते / दीव्यन्ति |
| मध्यम पुरुष | दिव्यसे / दीव्यसि | दिव्येथे / दीव्यथः | दिव्यध्वे / दीव्यथ |
| उत्तम पुरुष | दिव्ये / दीव्यामि | दिव्यावहे / दीव्यावः | दिव्यामहे / दीव्यामः |
(नोट: दिव् धातु उभयपदी व्यवहार करती है, यहाँ आत्मनेपद और परस्मैपद दोनों का मिश्रण देखा जा सकता है।)
२. लङ् लकार (अनद्यतन भूतकाल - Past Tense)
बीते हुए समय के लिए।
| प्रथम पुरुष | अदीव्यत | अदीव्यताम् | अदीव्यन् |
| मध्यम पुरुष | अदीव्यः | अदीव्यतम् | अदीव्यत |
| उत्तम पुरुष | अदीव्यम् | अदीव्याव | अदीव्याम |
३. लृट् लकार (भविष्यत् काल - Future Tense)
आने वाले समय के लिए। यहाँ 'श्यन्' प्रत्यय नहीं लगता, इसलिए रूप बदल जाते हैं।
| प्रथम पुरुष | देविष्यति | देविष्यतः | देविष्यन्ति |
| मध्यम पुरुष | देविष्यसि | देविष्यथः | देविष्यथ |
| उत्तम पुरुष | देविष्यामि | देविष्यावः | देविष्यामः |
6. दिवादिगण का साहित्यिक और वैदिक महत्व
संस्कृत साहित्य के महान कवियों—कालिदास, भारवि और माघ—ने दिवादिगण की धातुओं का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है।
वेदों में प्रयोग:
ऋग्वेद के 'अक्ष सूक्त' में दिव् धातु का प्रयोग 'जुआ खेलने' के संदर्भ में हुआ है:
"अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित्कृषस्व..."
(अर्थात्: जुआ मत खेलो, खेती करो।)
यहाँ 'दीव्यः' पद दिवादिगण की क्रियात्मक शक्ति को दर्शाता है।
आध्यात्मिक संदर्भ:
'तुष्' (संतुष्ट होना) और 'मुद्' (प्रसन्न होना) धातुएँ भक्ति साहित्य के आधार हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं:
"तुष्यन्ति च रमन्ति च" (10.9)
(भक्त मुझमें ही संतुष्ट रहते हैं और मुझमें ही रमण करते हैं।)
यहाँ 'तुष्यन्ति' दिवादिगण की धातु 'तुष्' का लट् लकार बहुवचन रूप है।
7. अन्य महत्वपूर्ण धातुओं के उदाहरण और सिद्धि
नृत् (नृत्य करना) - (To Dance)
यह धातु कला और सौंदर्य का प्रतीक है।
प्रक्रिया: नृत् + श्यन् + ति = नृत्यति।
प्रयोग: "शिखी नृत्यति प्रावृषि" (वर्षा ऋतु में मोर नाचता है)।
सिध् (सफल होना) - (To Succeed)
सफलता का मूल मंत्र इसी धातु में छिपा है।
श्लोक:
"उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।"
(कार्य उद्यम/परिश्रम से ही सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं।)
यहाँ 'सिध्यन्ति' पद दिवादिगण की 'सिध्' धातु का फल है।
8. दिवादिगण बनाम अन्य गण: एक तुलनात्मक अध्ययन
अक्सर छात्र भ्वादिगण और दिवादिगण में भ्रमित हो जाते हैं। आइए अंतर समझते हैं:
विकरण का अंतर: भ्वादिगण में 'अ' (शप) जुड़ता है, जबकि दिवादिगण में 'य' (श्यन्) जुड़ता है।
भ्वादि: पठ् + अ + ति = पठति।
दिवादि: नृत् + य + ति = नृत्यति।
अर्थ की प्रकृति: भ्वादिगण की धातुएँ सामान्य क्रियाएँ (पढ़ना, जाना, खाना) व्यक्त करती हैं। दिवादिगण की धातुएँ 'मानसिक अवस्थाओं' और 'स्वभाव' (क्रोध, संतोष, प्रसन्नता, चमक) को अधिक व्यक्त करती हैं।
9. दिवादिगण सीखने के लिए उपयोगी टिप्स (SEO Tips for Students)
यदि आप संस्कृत व्याकरण में महारत हासिल करना चाहते हैं, तो दिवादिगण को याद रखने के लिए इन चरणों का पालन करें:
'य' की पहचान: जिस धातु रूप के बीच में 'य' सुनाई दे (जैसे- नश्यति, क्रुध्यति), समझ जाइये कि वह दिवादिगण है।
प्रमुख 10 धातुएँ रटें: दिव्, नृत्, नश्, तुष्, मुष्, सिध्, व्यध्, शुष्, भ्रम्, और शम्। ये धातुएँ संस्कृत साहित्य का 80% हिस्सा कवर करती हैं।
लकारों का अभ्यास: केवल लट् लकार न पढ़ें, बल्कि लृट् (भविष्य) और लोट् (आज्ञा) का भी अभ्यास करें।
10. विस्तृत उदाहरण और अभ्यास (Practical Examples)
संस्कृत सीखने का सबसे अच्छा तरीका वाक्यों में प्रयोग है।
पुष् (पोषण): "धर्मो रक्षति रक्षितः" की तरह ही "ज्ञानं बुद्धिं पुष्यति" (ज्ञान बुद्धि को पोषित करता है)।
शुष् (सूखना): "शोकेन हृदयं शुष्यति" (शोक से हृदय सूख जाता है)।
हृष् (हर्षित होना): "सज्जनं दृष्ट्वा साधुः हृष्यति" (सज्जन को देखकर साधु हर्षित होता है)।
11. निष्कर्ष: दिवादिगण का सार
दिवादिगण केवल व्याकरण का एक अध्याय नहीं है, बल्कि यह भावनाओं और मानवीय संवेदनाओं को व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है। 'दिव्' की चमक से लेकर 'सिध्' की सफलता तक, इस गण की हर धातु जीवन के एक विशेष आयाम को स्पर्श करती है।
पाणिनि के सूत्रों (दिवादिभ्यः श्यन्) का अनुशासन और शब्दों का माधुर्य इसे विद्यार्थियों के लिए पठनीय और विद्वानों के लिए चिंतनीय बनाता है। यदि आप संस्कृत की आत्मा को समझना चाहते हैं, तो धातुओं के इन 'गणों' की गहराई में उतरना अनिवार्य है।
॥ इति दिवादिगण विवेचनम् ॥
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
1. दिवादिगण का मुख्य विकरण क्या है?
उत्तर: दिवादिगण का मुख्य विकरण 'श्यन्' (य) है।
2. 'दीव्यति' में दीर्घ 'ई' क्यों होता है?
उत्तर: 'हलि च' सूत्र के कारण उपधा के इकार को दीर्घ हो जाता है।
3. क्या दिवादिगण की सभी धातुएँ आत्मनेपदी हैं?
उत्तर: नहीं, इस गण में परस्मैपदी, आत्मनेपदी और उभयपदी—तीनों प्रकार की धातुएँ पाई जाती हैं।
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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
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- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
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- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
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