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भ्वादिगण (प्रथम गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग - lakar

भ्वादिगण (प्रथम गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग

संस्कृत व्याकरण का महासमुद्र: भ्वादिगण, तिङन्त प्रक्रिया और दशलकार विवेचन

मंगलाचरण

"मुखं व्याकरणं स्मृतम्"
वेदपुरुष के अंगों में व्याकरण को 'मुख' माना गया है। जिस प्रकार बिना मुख के शरीर की शोभा और क्रिया संभव नहीं, उसी प्रकार बिना व्याकरण के भाषा का ज्ञान अपूर्ण है। पाणिनि की अष्टाध्यायी के सूत्रों के आलोक में क्रिया पदों की सिद्धि ही व्याकरण का मुख्य प्रयोजन है।


विषय प्रवेश: धातु और तिङन्त का स्वरूप

संस्कृत भाषा की आत्मा उसकी क्रियाओं (Verbs) में बसती है। क्रिया के मूल रूप को 'धातु' कहते हैं। आचार्य पाणिनि ने 'भू' आदि लगभग 2000 धातुओं का निर्देश किया है। इन धातुओं से जब 'तिप्, तस्, झि...' आदि 18 प्रत्यय जुड़ते हैं, तब वे 'तिङन्त' कहलाते हैं।

परिभाषा: "धातु से तिङ् प्रत्यय लगाकर जो क्रिया रूप बनते हैं, उन्हें तिङन्त कहते हैं।"

रूपों की रचना और अर्थ की दृष्टि से इन धातुओं को दस वर्गों में विभाजित किया गया है, जिन्हें 'गण' कहा जाता है। इन दस गणों में प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण गण है— 'भ्वादिगण'। इसका नाम 'भू' (होना) धातु से प्रारंभ होने के कारण 'भ्वादि' (भू+आदि) पड़ा है।


लकारों का वर्गीकरण और सूक्ष्म अर्थ बोध

संस्कृत व्याकरण में काल और अवस्था को सूचित करने के लिए 10 लकारों का विधान है। इन्हें मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है:

  1. टित् लकार (जिनमें 'ट' की इत्संज्ञा होती है): लट्, लिट्, लुट्, लृट्, लेट्, लोट्।

  2. ङित् लकार (जिनमें 'ङ' की इत्संज्ञा होती है): लङ्, लिङ्, लुङ्, लृङ्।

इनके प्रयोग के विषय में प्रसिद्ध श्लोक है:
"लट्-लिट्-लुट्-लेट्-लोट्-लङ्-लिङ् (वि. आ.)-लुङ्-लृङ्-एषु पंचमो लकारश्छन्दोमात्रगोचरः"

इसका अर्थ है कि इनमें से पांचवां 'लेट् लकार' केवल वेदों में प्रयुक्त होता है, लौकिक संस्कृत में नहीं।

लकारों का विस्तृत विवेचन:

  1. लट् (वर्तमान काल): जो क्रिया वर्तमान में हो रही है। जैसे: सः पठति (वह पढ़ता है)।

  2. लिट् (परोक्ष अनद्यतन भूतकाल): वह भूतकाल जो हमारी आँखों के सामने न हुआ हो और बहुत पुराना हो। जैसे: बभूव (प्राचीन काल में हुआ)।

  3. लुट् (अनद्यतन भविष्यत् काल): वह भविष्य जो आज का न हो (कल या उसके बाद)। जैसे: भविता (कल होगा)।

  4. लृट् (सामान्य भविष्यत्): जो भविष्य में कभी भी होगा। जैसे: भविष्यति (होगा)।

  5. लेट् (शंका/शर्त): केवल वेद हेतु।

  6. लोट् (आज्ञा/प्रार्थना): विधि, प्रेरणा, आज्ञा के अर्थ में। जैसे: भवतु (हो)।

  7. लङ् (अनद्यतन भूतकाल): वह भूत जो आज का न हो। जैसे: अभवत् (कल हुआ था)।

  8. लिङ् (विधिलिङ् और आशीर्लिङ्): चाहिए के अर्थ में या आशीर्वाद के अर्थ में।

  9. लुङ् (सामान्य भूत): जो अभी-अभी समाप्त हुआ हो। जैसे: अभूत्

  10. लृङ् (हेतुहेतुमद्भाव): जहाँ एक क्रिया दूसरी पर निर्भर हो (यदि ऐसा होता तो वैसा होता)।


व्याकरणिक आधार: कर्ता, कर्म और भाव

किसी भी क्रिया को समझने के लिए 'वाच्य' और 'धातु के प्रकार' को जानना अनिवार्य है।

१. धातु के दो मुख्य अर्थ:

प्रत्येक धातु के दो पक्ष होते हैं— 'फल' और 'व्यापार'

  • व्यापार: क्रिया को करने की प्रक्रिया। इसका आश्रय 'कर्ता' होता है।

  • फल: क्रिया का परिणाम। इसका आश्रय 'कर्म' होता है।

२. सकर्मक और अकर्मक धातु:

  • सकर्मक: जहाँ फल और व्यापार अलग-अलग स्थानों (अधिकरणों) में रहें। जैसे: 'पच्' (पकाना)। फल 'चावल का गलना' है और व्यापार 'देवदत्त का प्रयास' है।

  • अकर्मक: जहाँ फल और व्यापार एक ही आश्रय (कर्ता) में रहें। जैसे: 'शीङ्' (सोना)।

३. वाच्य का स्वरूप:

  • कर्तृवाच्य: जहाँ लकार कर्ता के अनुसार हो।

  • कर्मवाच्य: जहाँ लकार कर्म के अनुसार हो।

  • भाववाच्य: जहाँ लकार केवल क्रिया (भाव) के अनुसार हो।


भ्वादिगण: 'भू' (सत्तायाम्) धातु की रूप-सिद्धि

'भू' धातु का अर्थ है 'होना'। इसके रूपों की सिद्धि संस्कृत व्याकरण की आधारशिला है।

१. लट् लकार (वर्तमान काल) - परस्मैपद

सूत्र: "वर्तमाने लट्" (वर्तमान काल की विवक्षा में लट् लकार हो)।

रूप संरचना:

  • प्रथम पुरुष: भवति, भवतः, भवन्ति

  • मध्यम पुरुष: भवसि, भवथः, भवथ

  • उत्तम पुरुष: भवामि, भवावः, भवामः

सिद्धि प्रक्रिया (भवति):

  1. भू + लट् (सूत्र: वर्तमाने लट्)

  2. भू + तिप् (सूत्र: तिप्तस्झि...)

  3. भू + शप् + ति (सूत्र: कर्तरि शप्) - शप् विकरण का आगमन।

  4. भो + अ + ति (सूत्र: सार्वधातुकार्धधातुकयोः) - गुण 'ओ'।

  5. भवति (सूत्र: एचोऽयवायावः) - 'ओ' को 'अव्' आदेश।

विशिष्ट नियम:

  • "अतो दीर्घो यञि" सूत्र से उत्तम पुरुष (भवामि, भवावः, भवामः) में 'अ' को दीर्घ 'आ' हो जाता है।

२. लिट् लकार (परोक्ष भूत)

सूत्र: "परोक्षे लिट्"

यहाँ धातु को 'द्वित्व' (दो बार लिखना) होता है।

  • प्रथम पुरुष: बभूव, बभूवतुः, बभूवुः

  • सिद्धि सूत्र: 'भुवो बुग् लुङ्-लिटोः' के द्वारा 'बुक्' (व्) का आगम होता है।

३. लुट् लकार (अनद्यतन भविष्य)

यहाँ 'तास्' प्रत्यय जुड़ता है।

  • रूप: भविता, भवितारौ, भवितारः।

  • नियम: 'लुटः प्रथमस्य डारौरसः' सूत्र से तिप् को डा, तस् को रौ और झि को रस् आदेश होता है।

४. लृट् लकार (सामान्य भविष्य)

यहाँ 'स्य' प्रत्यय का प्रयोग होता है।

  • रूप: भविष्यति, भविष्यतः, भविष्यन्ति।

५. लोट् लकार (आज्ञा)

  • रूप: भवतु, भवताम्, भवन्तु।

  • विशेष सूत्र: 'एरुः' से इकार को उकार होता है (भवति -> भवतु)।


आत्मनेपदी 'एध' (वृद्धौ) धातु की सिद्धि

'एध' धातु का अर्थ है 'बढ़ना'। यह आत्मनेपदी धातु है, जिसके प्रत्यय 'त, आताम्, झ...' होते हैं।

१. लट् लकार (आत्मनेपद)

सूत्र: "टित आत्मनेपदानां टेरे" (टित लकारों के आत्मनेपद प्रत्ययों की 'टि' को 'ए' हो जाए)।

  • प्रथम पुरुष: एधते, एधेते, एधन्ते

  • मध्यम पुरुष: एधसे, एधेथे, एधध्वे

  • उत्तम पुरुष: एधे, एधावहे, एधामहे

एधते की सिद्धि:

  1. एध + लट्

  2. एध + त

  3. एध + शप् + त

  4. एध + अ + ते ('त' की टि 'अ' को 'ए' होकर) = एधते

२. लिट् लकार (एध धातु)

एध धातु 'इजादि' और 'गुरुमान्' है, इसलिए यहाँ 'आम' प्रत्यय लगता है।

  • रूप: एधाञ्चक्रे, एधाञ्चक्राते, एधाञ्चक्रिरे।

३. लोट् लकार (आत्मनेपद)

  • सूत्र: 'आमेतः' (लोट् के 'ए' को 'आम्' हो जाए)।

  • रूप: एधताम्, एधेताम्, एधन्ताम्।


लकारों में आगम और आदेश के विशेष नियम

संस्कृत व्याकरण केवल प्रत्यय जोड़ना नहीं, बल्कि शब्दों का परिष्कार है। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण सूत्र इस प्रकार हैं:

  1. अडागम (लुङ्, लङ्, लृङ्): 'लुङ्-लङ्-लृङ्क्ष्वडुदात्तः' सूत्र से धातु के पूर्व 'अ' जुड़ता है। जैसे: अभवत्

  2. गुण संधि: 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः' सूत्र इगन्त अंग को गुण करता है।

  3. वृद्धि संधि (आटश्च): लङ् लकार में जहाँ 'आ' का आगम होता है, वहाँ वृद्धि होती है। जैसे: ऐधत

  4. णत्व विधान: 'आनि लोट्' और उपसर्गों के योग में 'न' को 'ण' होता है। जैसे: प्रभवाणि


क्रिया रूपों के प्रयोग का व्यापक उदाहरण चक्र

लकारपुरुषएकवचन (भू धातु)अर्थ
लट्प्रथमभवतिवह होता है
लृट्प्रथमभविष्यतिवह होगा
लङ्प्रथमअभवत्वह हुआ था
लोट्प्रथमभवतुवह हो (आज्ञा)
विधिलिङ्प्रथमभवेत्उसे होना चाहिए
लिट्प्रथमबभूववह हुआ (प्राचीन काल)
लुङ्प्रथमअभूत्वह हुआ (सामान्य भूत)

व्याकरण शास्त्र की महत्ता: एक दार्शनिक दृष्टिकोण

"शब्दब्रह्म यदेकं तद् विवर्ततेऽर्थभावेन"
व्याकरण शास्त्र केवल भाषा का नियम नहीं है, यह 'शब्दब्रह्म' की साधना है। जब हम 'भवति' कहते हैं, तो हम केवल एक क्रिया नहीं बोल रहे होते, बल्कि पाणिनि के अष्टाध्यायी की पूरी तर्क-परम्परा को जीवंत कर रहे होते हैं।

भ्वादिगण की धातुएँ संसार की क्रियाशीलता का आधार हैं। चाहे वह 'भू' (अस्तित्व) हो या 'एध' (प्रगति), ये धातुएँ मानव जीवन के विकास के चरणों को दर्शाती हैं।

उपसंहार

तिङन्त प्रक्रिया का ज्ञान प्राप्त करना संस्कृत साहित्य के प्रवेश द्वार को खोलने के समान है। सूत्रों की जटिलता के भीतर जो तर्क और विज्ञान छिपा है, वह विश्व की किसी भी अन्य भाषा में दुर्लभ है। 'भू' से लेकर 'लृङ्' लकार के 'अभविष्यत्' तक की यात्रा हमें समय (काल) के सूक्ष्म विभाजन और क्रिया की पूर्णता का बोध कराती है।

जो विद्यार्थी इन दसों लकारों और भ्वादिगण की प्रक्रियाओं को कंठस्थ कर लेता है, उसके लिए संस्कृत का विशाल वाङ्मय करतलगत हो जाता है।

संस्कृत भाषा में धातुरूप का विशेष महत्व है। यह धातु (मूल क्रिया) किसी भी शब्द और वाक्य का आधार होती है। पाणिनि के अष्टाध्यायी में कुल 10 गणों में विभाजित धातुओं का वर्णन है, जिनमें पहला और सबसे प्राचीन गण है भ्वादिगण। यह गण संस्कृत व्याकरण का मूल स्तंभ है, क्योंकि अधिकांश सामान्य धातुएं इसी गण में आती हैं।


भ्वादिगण का परिचय

"भ्वादिगण" नाम की उत्पत्ति इसकी पहली धातु भू (अर्थ: होना या अस्तित्व में आना) से हुई है। इस गण में कुल 219 धातुएं शामिल हैं, जिनसे असंख्य शब्द और भाव व्यक्त किए जा सकते हैं। भ्वादिगण की धातुएं मुख्यतः परस्मैपदी होती हैं, लेकिन कुछ आत्मनेपदी या उभयपदी भी होती हैं।


भ्वादिगण का महत्व

भ्वादिगण धातुओं से संस्कृत के मौलिक शब्द और वाक्य बनते हैं। इन धातुओं का उपयोग करके वर्तमान काल, भूतकाल, और भविष्यकाल के क्रियापद बनाए जाते हैं। साथ ही, भ्वादिगण की धातुएं संज्ञा और विशेषण के रूप में भी परिवर्तित होती हैं।

उदाहरण:

  • भू (होना) से "भविष्यति" (वह होगा), "भूत" (जो हो चुका है)।
  • गम् (जाना) से "गच्छति" (वह जाता है), "गमन" (जाना)।

भ्वादिगण की धातु सूची

भ्वादिगण की प्रमुख धातुओं की सूची और उनके अर्थ नीचे दी गई है:

भ्वादिगण (प्रथम गण) में वे धातुएं आती हैं जो सामान्यतः अकर्तरि कारके में प्रयोग होती हैं। ये धातुएँ तीनों लकारों में साधारण रूप से प्रयुक्त होती हैं। भ्वादिगण की धातुओं को समझने के लिए हमने उनकी हिंदी में व्याख्या और उदाहरण दिए हैं।

संस्कृत धातुहिंदी अर्थउदाहरण
भुहोनासः भवति (वह होता है)।
खन्खोदनासः खनति (वह खोदता है)।
गम्जानासः गच्छति (वह जाता है)।
स्थाखड़ा होनासः तिष्ठति (वह खड़ा होता है)।
पत्गिरनापर्णं पतति (पत्ता गिरता है)।
जल्जलनादीपः ज्वलति (दीप जलता है)।
सृबहनानदी स्रवति (नदी बहती है)।
हस्हँसनाबालः हसति (बालक हँसता है)।
द्रुदौड़नाअश्वः धावति (घोड़ा दौड़ता है)।
वद्बोलनासः वदति (वह बोलता है)।
कृकरनासः करोति (वह करता है)।
पच्पकानासः पचति (वह पकाता है)।
लिख्लिखनाछात्रः लिखति (छात्र लिखता है)।
स्मृस्मरण करनासः स्मरति (वह स्मरण करता है)।
धृधारण करनासः धारयति (वह धारण करता है)।
हृलेनासः हरति (वह लेता है)।
दह्जलानाअग्निः दहति (अग्नि जलाती है)।
विश्प्रवेश करनासः विशति (वह प्रवेश करता है)।
पिब्पीनासः पिबति (वह पीता है)।
मृमरनासः म्रियते (वह मरता है)।




व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।


मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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