संस्कृत व्याकरण का महासमुद्र: भ्वादिगण, तिङन्त प्रक्रिया और दशलकार विवेचन
मंगलाचरण
विषय प्रवेश: धातु और तिङन्त का स्वरूप
लकारों का वर्गीकरण और सूक्ष्म अर्थ बोध
टित् लकार (जिनमें 'ट' की इत्संज्ञा होती है): लट्, लिट्, लुट्, लृट्, लेट्, लोट्। ङित् लकार (जिनमें 'ङ' की इत्संज्ञा होती है): लङ्, लिङ्, लुङ्, लृङ्।
लकारों का विस्तृत विवेचन:
लट् (वर्तमान काल): जो क्रिया वर्तमान में हो रही है। जैसे: सः पठति (वह पढ़ता है)। लिट् (परोक्ष अनद्यतन भूतकाल): वह भूतकाल जो हमारी आँखों के सामने न हुआ हो और बहुत पुराना हो। जैसे: बभूव (प्राचीन काल में हुआ)। लुट् (अनद्यतन भविष्यत् काल): वह भविष्य जो आज का न हो (कल या उसके बाद)। जैसे: भविता (कल होगा)। लृट् (सामान्य भविष्यत्): जो भविष्य में कभी भी होगा। जैसे: भविष्यति (होगा)। लेट् (शंका/शर्त): केवल वेद हेतु। लोट् (आज्ञा/प्रार्थना): विधि, प्रेरणा, आज्ञा के अर्थ में। जैसे: भवतु (हो)। लङ् (अनद्यतन भूतकाल): वह भूत जो आज का न हो। जैसे: अभवत् (कल हुआ था)। लिङ् (विधिलिङ् और आशीर्लिङ्): चाहिए के अर्थ में या आशीर्वाद के अर्थ में। लुङ् (सामान्य भूत): जो अभी-अभी समाप्त हुआ हो। जैसे: अभूत्। लृङ् (हेतुहेतुमद्भाव): जहाँ एक क्रिया दूसरी पर निर्भर हो (यदि ऐसा होता तो वैसा होता)।
व्याकरणिक आधार: कर्ता, कर्म और भाव
१. धातु के दो मुख्य अर्थ:
व्यापार: क्रिया को करने की प्रक्रिया। इसका आश्रय 'कर्ता' होता है। फल: क्रिया का परिणाम। इसका आश्रय 'कर्म' होता है।
२. सकर्मक और अकर्मक धातु:
सकर्मक: जहाँ फल और व्यापार अलग-अलग स्थानों (अधिकरणों) में रहें। जैसे: 'पच्' (पकाना)। फल 'चावल का गलना' है और व्यापार 'देवदत्त का प्रयास' है। अकर्मक: जहाँ फल और व्यापार एक ही आश्रय (कर्ता) में रहें। जैसे: 'शीङ्' (सोना)।
३. वाच्य का स्वरूप:
कर्तृवाच्य: जहाँ लकार कर्ता के अनुसार हो। कर्मवाच्य: जहाँ लकार कर्म के अनुसार हो। भाववाच्य: जहाँ लकार केवल क्रिया (भाव) के अनुसार हो।
भ्वादिगण: 'भू' (सत्तायाम्) धातु की रूप-सिद्धि
१. लट् लकार (वर्तमान काल) - परस्मैपद
प्रथम पुरुष: भवति, भवतः, भवन्ति मध्यम पुरुष: भवसि, भवथः, भवथ उत्तम पुरुष: भवामि, भवावः, भवामः
भू + लट् (सूत्र: वर्तमाने लट्) भू + तिप् (सूत्र: तिप्तस्झि...) भू + शप् + ति (सूत्र: कर्तरि शप्) - शप् विकरण का आगमन। भो + अ + ति (सूत्र: सार्वधातुकार्धधातुकयोः) - गुण 'ओ'। भवति (सूत्र: एचोऽयवायावः) - 'ओ' को 'अव्' आदेश।
"अतो दीर्घो यञि" सूत्र से उत्तम पुरुष (भवामि, भवावः, भवामः) में 'अ' को दीर्घ 'आ' हो जाता है।
२. लिट् लकार (परोक्ष भूत)
प्रथम पुरुष: बभूव, बभूवतुः, बभूवुः सिद्धि सूत्र: 'भुवो बुग् लुङ्-लिटोः' के द्वारा 'बुक्' (व्) का आगम होता है।
३. लुट् लकार (अनद्यतन भविष्य)
रूप: भविता, भवितारौ, भवितारः। नियम: 'लुटः प्रथमस्य डारौरसः' सूत्र से तिप् को डा, तस् को रौ और झि को रस् आदेश होता है।
४. लृट् लकार (सामान्य भविष्य)
रूप: भविष्यति, भविष्यतः, भविष्यन्ति।
५. लोट् लकार (आज्ञा)
रूप: भवतु, भवताम्, भवन्तु। विशेष सूत्र: 'एरुः' से इकार को उकार होता है (भवति -> भवतु)।
आत्मनेपदी 'एध' (वृद्धौ) धातु की सिद्धि
१. लट् लकार (आत्मनेपद)
प्रथम पुरुष: एधते, एधेते, एधन्ते मध्यम पुरुष: एधसे, एधेथे, एधध्वे उत्तम पुरुष: एधे, एधावहे, एधामहे
एध + लट् एध + त एध + शप् + त एध + अ + ते ('त' की टि 'अ' को 'ए' होकर) = एधते।
२. लिट् लकार (एध धातु)
रूप: एधाञ्चक्रे, एधाञ्चक्राते, एधाञ्चक्रिरे।
३. लोट् लकार (आत्मनेपद)
सूत्र: 'आमेतः' (लोट् के 'ए' को 'आम्' हो जाए)। रूप: एधताम्, एधेताम्, एधन्ताम्।
लकारों में आगम और आदेश के विशेष नियम
अडागम (लुङ्, लङ्, लृङ्): 'लुङ्-लङ्-लृङ्क्ष्वडुदात्तः' सूत्र से धातु के पूर्व 'अ' जुड़ता है। जैसे: अभवत्। गुण संधि: 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः' सूत्र इगन्त अंग को गुण करता है। वृद्धि संधि (आटश्च): लङ् लकार में जहाँ 'आ' का आगम होता है, वहाँ वृद्धि होती है। जैसे: ऐधत। णत्व विधान: 'आनि लोट्' और उपसर्गों के योग में 'न' को 'ण' होता है। जैसे: प्रभवाणि।
क्रिया रूपों के प्रयोग का व्यापक उदाहरण चक्र
व्याकरण शास्त्र की महत्ता: एक दार्शनिक दृष्टिकोण
उपसंहार
संस्कृत भाषा में धातुरूप का विशेष महत्व है। यह धातु (मूल क्रिया) किसी भी शब्द और वाक्य का आधार होती है। पाणिनि के अष्टाध्यायी में कुल 10 गणों में विभाजित धातुओं का वर्णन है, जिनमें पहला और सबसे प्राचीन गण है भ्वादिगण। यह गण संस्कृत व्याकरण का मूल स्तंभ है, क्योंकि अधिकांश सामान्य धातुएं इसी गण में आती हैं।
भ्वादिगण का परिचय
"भ्वादिगण" नाम की उत्पत्ति इसकी पहली धातु भू (अर्थ: होना या अस्तित्व में आना) से हुई है। इस गण में कुल 219 धातुएं शामिल हैं, जिनसे असंख्य शब्द और भाव व्यक्त किए जा सकते हैं। भ्वादिगण की धातुएं मुख्यतः परस्मैपदी होती हैं, लेकिन कुछ आत्मनेपदी या उभयपदी भी होती हैं।
भ्वादिगण का महत्व
भ्वादिगण धातुओं से संस्कृत के मौलिक शब्द और वाक्य बनते हैं। इन धातुओं का उपयोग करके वर्तमान काल, भूतकाल, और भविष्यकाल के क्रियापद बनाए जाते हैं। साथ ही, भ्वादिगण की धातुएं संज्ञा और विशेषण के रूप में भी परिवर्तित होती हैं।
उदाहरण:
- भू (होना) से "भविष्यति" (वह होगा), "भूत" (जो हो चुका है)।
- गम् (जाना) से "गच्छति" (वह जाता है), "गमन" (जाना)।
भ्वादिगण की धातु सूची
भ्वादिगण की प्रमुख धातुओं की सूची और उनके अर्थ नीचे दी गई है:
भ्वादिगण (प्रथम गण) में वे धातुएं आती हैं जो सामान्यतः अकर्तरि कारके में प्रयोग होती हैं। ये धातुएँ तीनों लकारों में साधारण रूप से प्रयुक्त होती हैं। भ्वादिगण की धातुओं को समझने के लिए हमने उनकी हिंदी में व्याख्या और उदाहरण दिए हैं।
| संस्कृत धातु | हिंदी अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| भु | होना | सः भवति (वह होता है)। |
| खन् | खोदना | सः खनति (वह खोदता है)। |
| गम् | जाना | सः गच्छति (वह जाता है)। |
| स्था | खड़ा होना | सः तिष्ठति (वह खड़ा होता है)। |
| पत् | गिरना | पर्णं पतति (पत्ता गिरता है)। |
| जल् | जलना | दीपः ज्वलति (दीप जलता है)। |
| सृ | बहना | नदी स्रवति (नदी बहती है)। |
| हस् | हँसना | बालः हसति (बालक हँसता है)। |
| द्रु | दौड़ना | अश्वः धावति (घोड़ा दौड़ता है)। |
| वद् | बोलना | सः वदति (वह बोलता है)। |
| कृ | करना | सः करोति (वह करता है)। |
| पच् | पकाना | सः पचति (वह पकाता है)। |
| लिख् | लिखना | छात्रः लिखति (छात्र लिखता है)। |
| स्मृ | स्मरण करना | सः स्मरति (वह स्मरण करता है)। |
| धृ | धारण करना | सः धारयति (वह धारण करता है)। |
| हृ | लेना | सः हरति (वह लेता है)। |
| दह् | जलाना | अग्निः दहति (अग्नि जलाती है)। |
| विश् | प्रवेश करना | सः विशति (वह प्रवेश करता है)। |
| पिब् | पीना | सः पिबति (वह पीता है)। |
| मृ | मरना | सः म्रियते (वह मरता है)। |
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- संज्ञाप्रकरणम् - लघुसिद्धान्तकौमुदी
- सन्धि - अच सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - हल सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - विसर्ग सन्धि (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तद्धित :- अपत्यार्थक एवं मत्वर्थीय (सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार)
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- स्त्री प्रत्यय :- लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रकरण :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रथमा विभक्ति
- कारक द्वितीया विभक्ति
- कारक तृतीया विभक्ति
- कारक चतुर्थी विभक्ति
- कारक पञ्चमी विभक्ति
- कारक षष्ठी विभक्ति
- कारक सप्तमी विभक्ति
- कारक सम्बोधन विभक्ति
- परस्मैपद एवं आत्मनेपद विधान :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- संस्कृत धातुरूप: अर्थ, महत्व, प्रकार, आधार और उपयोग
- भ्वादिगण (प्रथम गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग
- अदादिगण (द्वितीय गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग
- ह्वादिगण (जुहोत्यादि) (तृतीय गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग
- दिवादिगण (चतुर्थ गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग
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