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अदादिगण (द्वितीय गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग

अदादिगण (द्वितीय गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग

संस्कृत व्याकरण का गहन विश्लेषण: अदादिगण (द्वितीय गण) – नियम, धातु रूप और भाषाई महत्व

प्रस्तावना: संस्कृत व्याकरण और धातुओं का संसार

संस्कृत भाषा को 'देववाणी' कहा जाता है। इसकी संरचना इतनी वैज्ञानिक है कि आधुनिक कंप्यूटर विज्ञान में भी इसे सबसे सटीक भाषा माना गया है। संस्कृत व्याकरण का आधार महर्षि पाणिनि की 'अष्टाध्यायी' है। पाणिनि ने संस्कृत की हज़ारों धातुओं (Roots) को उनकी प्रकृति और पद-रचना के आधार पर 10 मुख्य समूहों में विभाजित किया है, जिन्हें 'दशगण' कहा जाता है।

इन दस गणों में 'अदादिगण' का स्थान द्वितीय है। यह गण अपनी जटिलता और संक्षिप्तता के लिए जाना जाता है। इस लेख में हम अदादिगण की गहराई में उतरेंगे, इसके सूत्रों को समझेंगे और विभिन्न लकारों में इसके रूपों का विश्लेषण करेंगे।

संस्कृत में धातुओं के महत्व पर एक श्लोक:

"क्रियापदं विना वाक्यं पूर्णं नैव प्रजायते।
धातुमूलं तु तद् विद्धि व्याकरणस्य भूषणम्॥"
(अर्थ: क्रिया पद के बिना वाक्य कभी पूर्ण नहीं होता। धातुओं को ही व्याकरण का मूल और आभूषण समझना चाहिए।)


अदादिगण का परिचय (Introduction to Adadigaṇa)

अदादिगण का नामकरण इसकी प्रथम धातु 'अद्' (खाना) के आधार पर हुआ है। पाणिनि के व्याकरण के अनुसार, इस गण की मुख्य पहचान 'शप' विकरण का लोप होना है।

अदादिगण की परिभाषा:
"अद् प्रभृतिभ्यः शपः" (अष्टाध्यायी 2.4.72) - इस सूत्र के अनुसार, अदादिगण की धातुओं के बाद आने वाले 'शप' (विकरण) का लुक (लोप) हो जाता है। यही कारण है कि इस गण की धातुओं के रूप अन्य गणों (जैसे भ्वादिगण) से भिन्न दिखाई देते हैं।

अदादिगण की मुख्य विशेषताएँ:

  1. शप-लुक्: इसमें कर्तरि शप का लोप हो जाता है, जिससे धातु सीधे प्रत्यय से जुड़ती है।

  2. सीमित धातुएँ: इस गण में मुख्य रूप से 13-14 मौलिक धातुएँ मानी गई हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से कई अन्य धातुएँ भी इसमें समाहित हैं।

  3. पद भेद: इसमें परस्मैपदी और आत्मनेपदी दोनों प्रकार की धातुएँ पाई जाती हैं।

  4. स्वर परिवर्तन (गुण): इन धातुओं के रूपों में 'गुण' और 'वृद्धि' के विशेष नियम लागू होते हैं।


अदादिगण की प्रमुख धातु सूची और उनके अर्थ

नीचे दी गई तालिका में अदादिगण की प्रमुख धातुओं, उनके हिंदी अर्थ और वर्तमान काल (लट् लकार) के उदाहरणों का विस्तार से वर्णन है:

क्रमसंस्कृत धातुहिंदी अर्थउदाहरण (लट् लकार - प्रथम पुरुष)वाक्य प्रयोग
1अद्खानाअत्ति / अदतेसः अन्नं अत्ति। (वह अन्न खाता है।)
2जन्उत्पन्न होनाजनतेपुत्रः जनते। (पुत्र उत्पन्न होता है।)
3मद्प्रसन्न होनामन्दतेसः कार्येण मन्दते। (वह कार्य से प्रसन्न होता है।)
4भिद्तोड़नाभिदतेसः काष्ठं भिदते। (वह लकड़ी तोड़ता है।)
5विद्जाननाविद्यतेसत्यं सर्वत्र विद्यते। (सत्य सब जगह विद्यमान है।)
6कृकरनाकृततेसः कार्यं कृतते। (वह कार्य करता है।)
7सृबहनास्रवतेनदी पर्वतात् स्रवते। (नदी पर्वत से बहती है।)
8दृश्देखनापश्यतिसः चित्रं पश्यति। (वह चित्र देखता है।)
9यज्यज्ञ करनायजतेब्राह्मणः यजते। (ब्राह्मण यज्ञ करता है।)
10हृहरनाहृततेसः दुःखं हृतते। (वह दुःख हरता है।)
11वृढकनावृणतेमेघः सूर्यम् वृणते। (बादल सूर्य को ढकता है।)
12क्षल्धोनाक्षलतेसः हस्तं क्षलते। (वह हाथ धोता है।)
13दिश्दिखानादिशतेगुरुः मार्गं दिशते। (गुरु मार्ग दिखाता है।)
14शुभ्चमकनाशुभतेचन्द्रः आकाशे शुभते। (चंद्रमा आकाश में चमकता है।)
15क्षिप्फेंकनाक्षिपतेसः कन्दुकं क्षिपते। (वह गेंद फेंकता है।)
16कुप्क्रोधित होनाकुप्यतेपिता पुत्राय कुप्यते। (पिता पुत्र पर क्रोधित होता है।)
17रुच्पसंद करनारुचतेबालकाय मोदकं रुचते। (बालक को लड्डू पसंद है।)
18क्षम्सहनाक्षमतेवीरः कष्टं क्षमते। (वीर कष्ट सहता है।)
19विश्निवास करनावसतिसः नगरे वसति। (वह नगर में रहता है।)
20नन्द्आनंदित होनानन्दतेशिष्यः पठनेन नन्दते। (शिष्य पढ़ने से आनंदित होता है।)

अदादिगण के प्रमुख सूत्र और व्याकरण प्रक्रिया (Sutras & Grammar Process)

अदादिगण की रूप सिद्धि के लिए पाणिनि ने विशिष्ट सूत्रों की रचना की है। आइए, इन सूत्रों को विस्तार से समझते हैं:

1. अदिप्रभृतिभ्यः शपः (2.4.72)

यह अदादिगण का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है। यह कहता है कि 'अद्' आदि धातुओं से परे जो 'शप' विकरण आता है, उसका लोप हो जाए।

  • उदाहरण: अद् + तिप् = अत्ति (यहाँ शप का लोप हो गया, और 'द्' को 'त' हो गया)।

2. लिट्यन्यतरस्याम् (2.4.40)

यह सूत्र बताता है कि 'अद्' धातु को 'लिट्' लकार (परोक्ष भूतकाल) में विकल्प से 'घस्लृ' आदेश होता है।

  • जब 'घस्' आदेश होता है, तो रूप 'जघास' बनता है।

  • जब आदेश नहीं होता, तो रूप 'आद' बनता है।

3. शासि-वसि-घसीनां च (8.3.60)

इण् प्रत्याहार और कवर्ग के बाद आने वाले 'शास्', 'वस्' और 'घस्' के सकार को षकार (ष) हो जाता है।

  • उदाहरण: जघास + तुस् = जक्षतुः (यहाँ सकार को षकार और फिर प्रक्रिया से क्ष बना)।

4. इडत्त्यर्तिव्ययतीनाम् (7.2.66)

यह सूत्र कहता है कि अद् (खाना), ऋ (जाना) और व्ये (ढकना) धातुओं से परे 'थल' प्रत्यय को नित्य 'इट्' आगम होता है।

  • उदाहरण: अद् + थल = आदिथ।

5. हु-झल्भ्यो हेर्धि (6.4.101)

हु धातु और झलन्त (जिनके अंत में झल् वर्ण हों) धातुओं के बाद आने वाले 'हि' प्रत्यय को 'धि' आदेश होता है।

  • उदाहरण: अद् + हि = अद्धि।

6. अदः सर्वेषाम् (7.3.100)

अद् धातु से परे अपृक्त (एकल वर्ण वाले) सार्वधातुक प्रत्यय को 'अट्' आगम होता है। यह लङ् लकार में विशेष रूप से प्रभावी है।

  • उदाहरण: अद + त् = आदत।


अद् धातु के विभिन्न लकारों में रूप (Conjugation of 'Ad' Root)

'अद्' धातु (अदादिगण, परस्मैपदी) के रूपों को समझना इस पूरे गण को समझने की कुंजी है।

1. लट् लकार (वर्तमान काल - Present Tense)

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषअत्ति (वह खाता है)अत्तःअदन्ति
मध्यम पुरुषअत्सि (तुम खाते हो)अत्थःअत्थ
उत्तम पुरुषअद्मि (मैं खाता हूँ)अद्वःअद्मः

2. लङ् लकार (अनद्यतन भूतकाल - Past Tense)

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषआदत (उसने खाया)आत्ताम्आदन
मध्यम पुरुषआदःआत्तम्आत्त
उत्तम पुरुषआदम्आद्वआद्य

3. लोट् लकार (आज्ञार्थक - Imperative Mood)

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषअत्तु / अत्तात्अत्ताम्अदन्तु
मध्यम पुरुषअद्धि / अत्तात्अत्तम्अत्त
उत्तम पुरुषअदानिअदावअदाम

4. लृट् लकार (भविष्यत् काल - Future Tense)

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषअत्स्यति (वह खाएगा)अत्स्यतःअत्स्यन्ति
मध्यम पुरुषअत्स्यसिअत्स्यथःअत्स्यथ
उत्तम पुरुषअत्स्यमिअत्स्यावःअत्स्यामः

अदादिगण का आध्यात्मिक और साहित्यिक महत्व

संस्कृत साहित्य में अदादिगण की धातुओं का प्रयोग केवल संवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दार्शनिक सत्यों को भी व्यक्त करता है।

1. अद् धातु और अन्न का महत्व

उपनिषदों में 'अद्' धातु का संबंध 'अन्न' से जोड़ा गया है। तैत्तिरीय उपनिषद में कहा गया है:

"अद्यतेऽत्ति च भूतानि। तस्मादन्नं तदुच्यत इति॥"
(अर्थ: जो भूतों (जीवों) द्वारा खाया जाता है और जो स्वयं भूतों को खाता है, वही अन्न है।)
यहाँ 'अद्' धातु जीवन और मृत्यु के चक्र को दर्शाती है।

2. अस् धातु और अस्तित्व (The Reality of Being)

'अस्' (होना) धातु भी अदादिगण की है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं:

"नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।"
यहाँ 'विद्यते' (विद् धातु) और अस्तित्व का बोध अदादिगण की महत्ता को दर्शाता है।


व्यावहारिक उदाहरण और वाक्य रचना (Practical Examples)

अदादिगण को और स्पष्ट करने के लिए यहाँ कुछ व्यावहारिक उदाहरण दिए गए हैं:

  1. अस् (होना): "सत्यं शिवं सुन्दरं अस्ति।" (सत्य, शिव और सुंदर है।)

  2. ब्रू (बोलना): "सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्।" (सत्य बोलना चाहिए, प्रिय बोलना चाहिए।)

  3. हन (मारना): "नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।" (यहाँ दह् धातु भ्वादिगण की है, लेकिन हन् धातु का प्रयोग गीता में "न हन्यते हन्यमाने शरीरे" के रूप में हुआ है जो अदादिगण की महत्ता बताती है।)


अदादिगण की धातु प्रक्रिया का विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis)

जब हम "अघसत्" (लुङ् लकार) जैसा रूप देखते हैं, तो यहाँ पाणिनि का सूत्र "लुङ्खनोर्घस्लृ" (2.4.37) कार्य करता है। यह सूत्र अद् धातु को लुङ् लकार और सन् प्रत्यय परे रहते 'घस्लृ' आदेश कर देता है।

अघसत् की सिद्धि:

  1. अद् + लुङ्

  2. अद् -> घस्लृ (सूत्र: लुङ्खनोर्घस्लृ)

  3. अ + घस् + अ + त् (अट् आगम और च्लि के स्थान पर अङ् आदेश)

  4. रूप बना: अघसत्

इसी प्रकार "आत्स्यत्" (लृङ् लकार) में अद् धातु के दकार को 'खरि च' सूत्र से तकार होकर रूप सिद्ध होता है।


अदादिगण और अन्य गणों में अंतर

विद्यार्थियों को अक्सर भ्रम होता है कि कोई धातु किस गण की है। अदादिगण की सबसे बड़ी पहचान यह है कि इसमें धातु और प्रत्यय के बीच में कोई 'स्वर' (जैसे भ्वादिगण में 'अ') नहीं जुड़ता।

  • भ्वादिगण: भव + अ + ति = भवति। (यहाँ 'अ' विकरण है)

  • अदादिगण: अद् + ति = अत्ति। (यहाँ 'अ' का लोप हो गया है)


निष्कर्ष (Conclusion)

अदादिगण संस्कृत व्याकरण का वह स्तंभ है जो भाषा की संक्षिप्तता और सटीकता को प्रमाणित करता है। 'अद्', 'अस्', 'ब्रू' और 'हन्' जैसी आधारभूत धातुएँ इसी गण का हिस्सा हैं, जिनके बिना संस्कृत साहित्य की कल्पना भी असंभव है।

इन धातुओं का अध्ययन न केवल परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हमें संस्कृत भाषा की उस वैज्ञानिक बुनावट से भी परिचित कराता है जिसे हज़ारों साल पहले महर्षि पाणिनि ने परिभाषित किया था। यदि आप संस्कृत में दक्षता प्राप्त करना चाहते हैं, तो अदादिगण की इन 13-20 धातुओं के रूपों का अभ्यास करना अनिवार्य है।

अंतिम मंत्र:

"यथा एकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति॥"
(अर्थ: जैसे एक पहिये से रथ नहीं चलता, वैसे ही बिना कठिन परिश्रम (व्याकरण अभ्यास) के विद्या सिद्ध नहीं होती।)


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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।


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ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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