संस्कृत व्याकरण का गहन विश्लेषण: अदादिगण (द्वितीय गण) – नियम, धातु रूप और भाषाई महत्व
प्रस्तावना: संस्कृत व्याकरण और धातुओं का संसार
"क्रियापदं विना वाक्यं पूर्णं नैव प्रजायते। धातुमूलं तु तद् विद्धि व्याकरणस्य भूषणम्॥" (अर्थ: क्रिया पद के बिना वाक्य कभी पूर्ण नहीं होता। धातुओं को ही व्याकरण का मूल और आभूषण समझना चाहिए।)
अदादिगण का परिचय (Introduction to Adadigaṇa)
अदादिगण की मुख्य विशेषताएँ:
शप-लुक्: इसमें कर्तरि शप का लोप हो जाता है, जिससे धातु सीधे प्रत्यय से जुड़ती है।
सीमित धातुएँ: इस गण में मुख्य रूप से 13-14 मौलिक धातुएँ मानी गई हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से कई अन्य धातुएँ भी इसमें समाहित हैं।
पद भेद: इसमें परस्मैपदी और आत्मनेपदी दोनों प्रकार की धातुएँ पाई जाती हैं।
स्वर परिवर्तन (गुण): इन धातुओं के रूपों में 'गुण' और 'वृद्धि' के विशेष नियम लागू होते हैं।
अदादिगण की प्रमुख धातु सूची और उनके अर्थ
अदादिगण के प्रमुख सूत्र और व्याकरण प्रक्रिया (Sutras & Grammar Process)
1. अदिप्रभृतिभ्यः शपः (2.4.72)
उदाहरण: अद् + तिप् = अत्ति (यहाँ शप का लोप हो गया, और 'द्' को 'त' हो गया)।
2. लिट्यन्यतरस्याम् (2.4.40)
जब 'घस्' आदेश होता है, तो रूप 'जघास' बनता है। जब आदेश नहीं होता, तो रूप 'आद' बनता है।
3. शासि-वसि-घसीनां च (8.3.60)
उदाहरण: जघास + तुस् = जक्षतुः (यहाँ सकार को षकार और फिर प्रक्रिया से क्ष बना)।
4. इडत्त्यर्तिव्ययतीनाम् (7.2.66)
उदाहरण: अद् + थल = आदिथ।
5. हु-झल्भ्यो हेर्धि (6.4.101)
उदाहरण: अद् + हि = अद्धि।
6. अदः सर्वेषाम् (7.3.100)
उदाहरण: अद + त् = आदत।
अद् धातु के विभिन्न लकारों में रूप (Conjugation of 'Ad' Root)
1. लट् लकार (वर्तमान काल - Present Tense)
2. लङ् लकार (अनद्यतन भूतकाल - Past Tense)
3. लोट् लकार (आज्ञार्थक - Imperative Mood)
4. लृट् लकार (भविष्यत् काल - Future Tense)
अदादिगण का आध्यात्मिक और साहित्यिक महत्व
1. अद् धातु और अन्न का महत्व
"अद्यतेऽत्ति च भूतानि। तस्मादन्नं तदुच्यत इति॥" (अर्थ: जो भूतों (जीवों) द्वारा खाया जाता है और जो स्वयं भूतों को खाता है, वही अन्न है।) यहाँ 'अद्' धातु जीवन और मृत्यु के चक्र को दर्शाती है।
2. अस् धातु और अस्तित्व (The Reality of Being)
"नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।" यहाँ 'विद्यते' (विद् धातु) और अस्तित्व का बोध अदादिगण की महत्ता को दर्शाता है।
व्यावहारिक उदाहरण और वाक्य रचना (Practical Examples)
अस् (होना): "सत्यं शिवं सुन्दरं अस्ति।" (सत्य, शिव और सुंदर है।) ब्रू (बोलना): "सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्।" (सत्य बोलना चाहिए, प्रिय बोलना चाहिए।) हन (मारना): "नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।" (यहाँ दह् धातु भ्वादिगण की है, लेकिन हन् धातु का प्रयोग गीता में "न हन्यते हन्यमाने शरीरे" के रूप में हुआ है जो अदादिगण की महत्ता बताती है।)
अदादिगण की धातु प्रक्रिया का विस्तृत विश्लेषण (Detailed Analysis)
अद् + लुङ् अद् -> घस्लृ (सूत्र: लुङ्खनोर्घस्लृ) अ + घस् + अ + त् (अट् आगम और च्लि के स्थान पर अङ् आदेश) रूप बना: अघसत्।
अदादिगण और अन्य गणों में अंतर
भ्वादिगण: भव + अ + ति = भवति। (यहाँ 'अ' विकरण है) अदादिगण: अद् + ति = अत्ति। (यहाँ 'अ' का लोप हो गया है)
निष्कर्ष (Conclusion)
"यथा एकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्। एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति॥" (अर्थ: जैसे एक पहिये से रथ नहीं चलता, वैसे ही बिना कठिन परिश्रम (व्याकरण अभ्यास) के विद्या सिद्ध नहीं होती।)
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- संज्ञाप्रकरणम् - लघुसिद्धान्तकौमुदी
- सन्धि - अच सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - हल सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - विसर्ग सन्धि (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तद्धित :- अपत्यार्थक एवं मत्वर्थीय (सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार)
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- स्त्री प्रत्यय :- लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रकरण :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रथमा विभक्ति
- कारक द्वितीया विभक्ति
- कारक तृतीया विभक्ति
- कारक चतुर्थी विभक्ति
- कारक पञ्चमी विभक्ति
- कारक षष्ठी विभक्ति
- कारक सप्तमी विभक्ति
- कारक सम्बोधन विभक्ति
- परस्मैपद एवं आत्मनेपद विधान :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- संस्कृत धातुरूप: अर्थ, महत्व, प्रकार, आधार और उपयोग
- भ्वादिगण (प्रथम गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग
- अदादिगण (द्वितीय गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग
- ह्वादिगण (जुहोत्यादि) (तृतीय गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग
- दिवादिगण (चतुर्थ गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग
- स्वादिगण (पञ्चम् गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग
- तुदादिगण (षष्ठं गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग
- तनादिगण (सप्तम गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग
- रूधादिगण (अष्टं गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग
- क्रयादिगण (नवम गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग
- चुरादिगण (दशम गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग