🙏 संस्कृतज्ञानपरिवारे🙏 भवतां सर्वेषां स्वगतम् 🙏

Multi-Site Label Widget

संस्कृत-ज्ञानस्य अनुक्रमणिका

Click here to explore labels from all associated sites.

संस्कृत-ज्ञानस्य अनुक्रमणिका

×

Loading labels from all sites…

क्रयादिगण (नवम गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग

क्रयादिगण (नवम् गण) परिचय, महत्व, धातु सूची, उपयोग

संस्कृत व्याकरण का गहन सागर: क्रयादिगण (Kryadigan) – नियम, धातु रूप और व्यावहारिक रहस्य

प्रस्तावना: संस्कृत व्याकरण और धातुओं का महत्व

संस्कृत भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड की ध्वनियों का एक व्यवस्थित विज्ञान है। महर्षि पाणिनि ने जब 'अष्टाध्यायी' की रचना की, तो उन्होंने भाषा को सूत्रों में पिरो दिया। संस्कृत व्याकरण में क्रिया के मूल रूप को 'धातु' कहा जाता है। जिस प्रकार एक बीज से विशाल वटवृक्ष की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार एक लघु धातु से हजारों शब्दों और क्रियाओं का निर्माण होता है।

संस्कृत की लगभग 2000 धातुओं को उनकी प्रकृति और पद-रचना के आधार पर 10 गणों (Groups) में विभाजित किया गया है:

  1. भ्वादिगण

  2. अदादिगण

  3. जुहोत्यादिगण

  4. दिवादिगण

  5. स्वादिगण

  6. तुदादिगण

  7. रुधादिगण

  8. तनादिगण

  9. क्रयादिगण (Kryadigan)

  10. चुरादिगण

आज के इस विशेष लेख में हम क्रयादिगण (9th Class of Verbs) पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह गण न केवल व्याकरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि हमारे सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक जीवन के आधार 'विनिमय' (Exchange) को भी परिभाषित करता है।


क्रयादिगण का परिचय: अर्थ और दर्शन

"डुक्रीञ् द्रव्यविनिमये"

क्रयादिगण का नाम इस गण की प्रतिनिधि धातु 'क्री' (खरीदना) से पड़ा है। 'क्री' के साथ 'आदि' शब्द जुड़कर 'क्रयादि' बनता है, जिसका अर्थ है – "क्री तथा इसी प्रकार की अन्य धातुएं।"

दार्शनिक महत्व:
भारतीय संस्कृति में 'क्रय-विक्रय' केवल धन का लेन-देन नहीं है। वेदों में कहा गया है कि यह संसार ही एक यज्ञ है जहाँ हम कर्मों का विनिमय करते हैं। क्रयादिगण की धातुएँ इसी आदान-प्रदान की प्रक्रिया को शब्द देती हैं। चाहे वह ज्ञान का ग्रहण करना हो (ग्रह् धातु) या किसी वस्तु को खरीदना (क्री धातु), यह गण जीवन की क्रियाशीलता का प्रतीक है।


क्रयादिगण की मुख्य विशेषताएँ

किसी भी संस्कृत शिक्षार्थी के लिए क्रयादिगण को पहचानने के कुछ विशिष्ट लक्षण निम्नलिखित हैं:

  1. विकरण 'श्ना' (Shna Pratyaya):
    पाणिनि सूत्र के अनुसार: "क्रयादिभ्यः श्ना" (3/1/81)
    इसका अर्थ है कि क्रयादिगण की धातुओं और तिङ्-प्रत्ययों के बीच 'श्ना' (ना) विकरण लगाया जाता है। यह इस गण की सबसे बड़ी पहचान है।

  2. व्यापारिक और सामाजिक संदर्भ:
    इस गण की अधिकांश धातुएं विनिमय, ग्रहण, और सामाजिक व्यवहार से संबंधित हैं।

  3. उभयपदी एवं परस्मैपदी स्वरूप:
    इस गण में 'क्री' जैसी धातुएं उभयपदी (परस्मैपदी और आत्मनेपदी दोनों) होती हैं, जबकि कुछ अन्य केवल परस्मैपदी होती हैं।

  4. पद की प्राप्ति:
    क्रिया का फल जब कर्ता को मिलता है तो आत्मनेपद और जब फल किसी अन्य को मिले तो परस्मैपदी का प्रयोग होता है।


महत्वपूर्ण सूत्र और उनकी व्याख्या

संस्कृत व्याकरण सूत्रों के बिना अधूरा है। क्रयादिगण को समझने के लिए निम्नलिखित सूत्र अनिवार्य हैं:

1. क्रयादिभ्यः श्ना (3/1/81)

वृत्ति: शपोऽपवादः।
व्याख्या: सामान्यतः धातुओं में 'शप' (अ) विकरण लगता है, लेकिन यह सूत्र उसका अपवाद है। यह कहता है कि क्रयादिगण की धातुओं से 'श्ना' प्रत्यय होता है। 'श्ना' में 'श्' की इत्संज्ञा होकर 'ना' शेष बचता है।
उदाहरण: क्री + ना + ति = क्रीणाति।

2. ई हल्यघोः (6/4/113)

व्याख्या: जब 'श्ना' प्रत्यय के बाद कोई ऐसा प्रत्यय आए जिसका आदि वर्ण 'हल्' (व्यंजन) हो (सिवाय घुट् आदि के), तो 'श्ना' के आकार (आ) को ईकार (ई) हो जाता है।
उदाहरण: क्री + ना + तस् = क्रीणीतः।

3. श्राभ्यस्तयोरातः (6/4/112)

व्याख्या: जब 'श्ना' प्रत्यय के बाद 'अन्ति' जैसा अजादि (स्वर से शुरू होने वाला) प्रत्यय आता है, तो 'श्ना' के 'आ' का लोप हो जाता है।
उदाहरण: क्री + ना + अन्ति = क्रीणन्ति।


क्रयादिगण की विस्तृत धातु सूची (अर्थ और उदाहरण सहित)

यहाँ इस गण की कुछ प्रमुख धातुओं की सूची दी जा रही है, जो साहित्य और व्यवहार में सर्वाधिक प्रयुक्त होती हैं:

क्रमसंस्कृत धातुहिंदी अर्थउदाहरण (लट् लकार - वर्तमान काल)
1क्री (क्रीञ्)खरीदनासः पुस्तकं क्रीणाति। (वह पुस्तक खरीदता है।)
2ग्रह्पकड़ना/ग्रहण करनाशिष्यः ज्ञानं गृह्णाति। (शिष्य ज्ञान ग्रहण करता है।)
3मन्थ्मथनासः दधि मथ्नाति। (वह दही मथता है।)
4बन्ध्बाँधनासः गजं बध्नाति। (वह हाथी को बाँधता है।)
5पुपवित्र करनापवनः विश्वं पुनाति। (वायु विश्व को पवित्र करती है।)
6लूनकाटनाकृषकः सस्यं लुनाति। (किसान फसल काटता है।)
7धुहिलाना/काँपनावायुः वृक्षं धुनाति। (हवा वृक्ष को हिलाती है।)
8ज्ञाजाननासः सत्यं जानाति। (वह सत्य जानता है।)
9अश्भोजन करनाबालकः फलं अश्नाति। (बालक फल खाता है।)
10स्तृफैलानासः चटं स्तृणाति। (वह चटाई फैलाता है।)

धातु रूप विश्लेषण: विस्तार से

आइये, क्रयादिगण की प्रतिनिधि धातुओं के रूपों को विभिन्न लकारों में देखते हैं।

1. 'क्री' धातु (खरीदना) - परस्मैपदी (लट् लकार)

'क्री' धातु का प्रयोग विनिमय के लिए होता है।

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषक्रीणातिक्रीणीतःक्रीणन्ति
मध्यम पुरुषक्रीणासिक्रीणीथःक्रीणीथ
उत्तम पुरुषक्रीणामिक्रीणीवःक्रीणीमः

विशेष टिप्पणी: 'क्री' धातु आत्मनेपद में भी चलती है: क्रीणीते, क्रीणाते, क्रीणते...

2. 'ग्रह्' धातु (पकड़ना/ग्रहण करना) - परस्मैपदी (लट् लकार)

इस धातु में 'ग्र' का 'गृ' (सम्प्रसारण) हो जाता है।

पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषगृह्णातिगृह्णीतःगृह्णन्ति
मध्यम पुरुषगृह्णासिगृह्णीथःगृह्णीथ
उत्तम पुरुषगृह्णामिगृह्णीवःगृह्णीमः

क्रयादिगण का विभिन्न लकारों में प्रयोग

संस्कृत व्याकरण में काल और अवस्था को बताने के लिए 10 लकार होते हैं। यहाँ हम मुख्य 3 लकारों का उदाहरण क्रयादिगण के संदर्भ में देखेंगे:

क) लट् लकार (वर्तमान काल - Present Tense)

यह वर्तमान में चल रही क्रिया को दर्शाता है।

  • उदाहरण: "विक्रेता फलानि विक्रीणाति।" (विक्रेता फल बेचता है।)

  • यहाँ 'वि' उपसर्ग लगने से 'क्री' का अर्थ 'बेचना' (विक्रय) हो जाता है।

ख) लङ् लकार (भूतकाल - Past Tense)

यह क्रिया के पूर्ण होने को दर्शाता है।

  • उदाहरण: "सः आपणतः वस्त्रम् अक्रीणात्।" (उसने बाजार से कपड़ा खरीदा।)

  • ग्रह् का रूप: अगृह्णात्, अगृह्णीताम्, अगृह्णन्।

ग) लृट् लकार (भविष्यकाल - Future Tense)

यह आने वाले समय की क्रिया को बताता है।

  • उदाहरण: "त्वं किं क्रेष्यसि?" (तुम क्या खरीदोगे?)

  • ध्यान दें: लृट् लकार में 'श्ना' विकरण नहीं लगता, इसलिए रूप 'क्रेष्यति' बनता है न कि 'क्रीणिष्यति'।


श्लोक और मंत्रों में क्रयादिगण का प्रयोग

संस्कृत साहित्य के महान ग्रंथों में क्रयादिगण की धातुओं का प्रयोग प्रचुर मात्रा में हुआ है।

1. श्रीमद्भगवद्गीता से उदाहरण (ग्रह् धातु):
गहन आध्यात्मिक सत्यों को ग्रहण करने के संदर्भ में:

"तद् विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया..."
यहाँ प्रत्यक्ष रूप से नहीं, पर 'ग्रहण' करने की प्रक्रिया अंतर्निहित है। एक अन्य प्रसिद्ध श्लोक:
"इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।"
यहाँ 'हृ' धातु है, परंतु 'ग्रह्' (ग्रहण करना) का भाव मन को वश में करने के लिए अक्सर प्रयुक्त होता है: "यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः" - यहाँ विषयों को समेटने (ग्रहण करने) की बात है।

2. एक प्रसिद्ध सुभाषित (क्री धातु का भाव):

"विक्रीणीते यथा रत्नं सारज्ञो न तथा जडः।"
अर्थ: जिस प्रकार रत्नों का पारखी (जौहरी) रत्न को बेचता या खरीदता है, वैसा मूर्ख व्यक्ति नहीं कर सकता।

3. शांति मंत्र (पु धातु - पुनाति):

"ॐ पावनः पवतामस्मि..."
'पु' धातु जिसका अर्थ पवित्र करना है, वेदों में बार-बार आती है। "पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम्" – वह सविता देव मुझे पवित्र करे।


क्रयादिगण की धातुओं का व्यावहारिक और आर्थिक महत्व

इस गण की धातुएं हमारे दैनिक जीवन के अर्थशास्त्र (Economics) से जुड़ी हैं:

  1. क्री (Buying): उपभोक्ता संस्कृति का आधार।

  2. विक्री (Selling): व्यापार का आधार।

  3. ग्रह् (Accepting/Grasping): किसी वस्तु या विचार को स्वीकार करना।

  4. बन्ध् (Binding): अनुबंध (Contract) शब्द इसी से निकला है। जब दो पक्ष व्यापारिक रिश्ते में बंधते हैं, तो वह 'अनुबन्ध' कहलाता है।

उदाहरण वाक्य:

  • व्यवसायी लाभं गृह्णाति। (व्यापारी लाभ प्राप्त करता है।)

  • ग्राहकः मूल्यं दत्त्वा वस्तु क्रीणाति। (ग्राहक मूल्य देकर वस्तु खरीदता है।)


चुर स्तेये: एक संक्षिप्त संदर्भ

आपके द्वारा दिए गए विषय में "चुर स्तेये" का उल्लेख है। यद्यपि 'चुर' धातु चुरादिगण (10वें गण) की है, लेकिन कई बार तुलनात्मक अध्ययन में इसका उल्लेख होता है।

  • अर्थ: चोरी करना।

  • सम्बन्ध: जहाँ क्रयादिगण 'वैध' लेन-देन (क्री) की बात करता है, वहीं 'चुर' धातु अनैतिक तरीके से वस्तु प्राप्त करने (स्तेय) को दर्शाती है। व्याकरणिक रूप से इसमें 'णिच्' प्रत्यय लगता है (चोरयति)।


क्रयादिगण सीखने के लिए कुछ महत्वपूर्ण टिप्स

  1. श्ना प्रत्यय को याद रखें: हमेशा ध्यान दें कि धातु और प्रत्यय के बीच 'ना' या 'णी' सुनाई दे रहा है या नहीं (जैसे: क्री-णा-ति)।

  2. णत्व विधान: यदि धातु में 'र' या 'ष' हो, तो 'ना' का 'णा' हो जाता है (जैसे: क्रीणाति)।

  3. अभ्यास: 'क्री' और 'ग्रह्' इन दो धातुओं के रूप पांचों लकारों में कंठस्थ कर लें, बाकी धातुएं इन्हीं के समान चलेंगी।


अभ्यास प्रश्नावली (स्वयं को परखें)

  1. 'क्रीणाति' में कौन सा विकरण है?

  2. 'ग्रह्' धातु का लट् लकार प्रथम पुरुष बहुवचन रूप क्या होगा?

  3. "क्रयादिभ्यः श्ना" सूत्र का क्या कार्य है?

  4. 'जानाति' (ज्ञा धातु) किस गण की धातु है?

(उत्तर: 1. श्ना, 2. गृह्णन्ति, 3. विकरण प्रदान करना, 4. क्रयादिगण)


निष्कर्ष

क्रयादिगण संस्कृत व्याकरण का वह सेतु है जो भाषा को व्यवहार से जोड़ता है। 'क्री' (खरीदना) से लेकर 'ज्ञा' (जानना) तक, यह गण भौतिक और बौद्धिक दोनों प्रकार के विनिमय को समाहित करता है। महर्षि पाणिनि के सूत्रों की वैज्ञानिकता हमें यह सिखाती है कि कैसे एक छोटा सा प्रत्यय 'श्ना' पूरी क्रिया का स्वरूप बदल देता है।

संस्कृत के छात्रों और जिज्ञासुओं के लिए क्रयादिगण का ज्ञान होना अनिवार्य है क्योंकि इसके बिना हम न तो प्राचीन व्यापारिक संहिताओं को समझ सकते हैं और न ही दार्शनिक ग्रंथों में वर्णित 'ज्ञान के ग्रहण' की प्रक्रिया को।

आशा है कि क्रयादिगण पर यह विस्तृत शोध-लेख आपके ज्ञानवर्धन में सहायक सिद्ध होगा। संस्कृत पढ़ते रहें, क्योंकि:
"संस्कृतं नाम दैवी वागन्वाख्याता महर्षिभिः॥"
(संस्कृत को ऋषियों ने ईश्वरीय वाणी कहा है।)


लेखक के बारे में: यह लेख संस्कृत व्याकरण के गहन अध्ययन और प्रामाणिक ग्रंथों के आधार पर तैयार किया गया है ताकि विद्यार्थियों को एक ही स्थान पर संपूर्ण जानकारी मिल सके।


Keywords: संस्कृत व्याकरण, क्रयादिगण, धातु रूप, क्री धातु, ग्रह् धातु, पाणिनि सूत्र, संस्कृत शिक्षण, Sanskrit Grammar, Kryadigan, Dhatu Roop, Panini Ashtadhyayi.


व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।


मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

एक टिप्पणी भेजें

आपके महत्वपूर्ण सुझाव के लिए धन्यवाद |
(SHERE करे )