संस्कृत व्याकरण का गहन सागर: क्रयादिगण (Kryadigan) – नियम, धातु रूप और व्यावहारिक रहस्य
प्रस्तावना: संस्कृत व्याकरण और धातुओं का महत्व
भ्वादिगण अदादिगण जुहोत्यादिगण दिवादिगण स्वादिगण तुदादिगण रुधादिगण तनादिगण क्रयादिगण (Kryadigan) चुरादिगण
क्रयादिगण का परिचय: अर्थ और दर्शन
क्रयादिगण की मुख्य विशेषताएँ
विकरण 'श्ना' (Shna Pratyaya): पाणिनि सूत्र के अनुसार: "क्रयादिभ्यः श्ना" (3/1/81)। इसका अर्थ है कि क्रयादिगण की धातुओं और तिङ्-प्रत्ययों के बीच 'श्ना' (ना) विकरण लगाया जाता है। यह इस गण की सबसे बड़ी पहचान है। व्यापारिक और सामाजिक संदर्भ: इस गण की अधिकांश धातुएं विनिमय, ग्रहण, और सामाजिक व्यवहार से संबंधित हैं। उभयपदी एवं परस्मैपदी स्वरूप: इस गण में 'क्री' जैसी धातुएं उभयपदी (परस्मैपदी और आत्मनेपदी दोनों) होती हैं, जबकि कुछ अन्य केवल परस्मैपदी होती हैं। पद की प्राप्ति: क्रिया का फल जब कर्ता को मिलता है तो आत्मनेपद और जब फल किसी अन्य को मिले तो परस्मैपदी का प्रयोग होता है।
महत्वपूर्ण सूत्र और उनकी व्याख्या
1. क्रयादिभ्यः श्ना (3/1/81)
2. ई हल्यघोः (6/4/113)
3. श्राभ्यस्तयोरातः (6/4/112)
क्रयादिगण की विस्तृत धातु सूची (अर्थ और उदाहरण सहित)
धातु रूप विश्लेषण: विस्तार से
1. 'क्री' धातु (खरीदना) - परस्मैपदी (लट् लकार)
2. 'ग्रह्' धातु (पकड़ना/ग्रहण करना) - परस्मैपदी (लट् लकार)
क्रयादिगण का विभिन्न लकारों में प्रयोग
क) लट् लकार (वर्तमान काल - Present Tense)
उदाहरण: "विक्रेता फलानि विक्रीणाति।" (विक्रेता फल बेचता है।) यहाँ 'वि' उपसर्ग लगने से 'क्री' का अर्थ 'बेचना' (विक्रय) हो जाता है।
ख) लङ् लकार (भूतकाल - Past Tense)
उदाहरण: "सः आपणतः वस्त्रम् अक्रीणात्।" (उसने बाजार से कपड़ा खरीदा।) ग्रह् का रूप: अगृह्णात्, अगृह्णीताम्, अगृह्णन्।
ग) लृट् लकार (भविष्यकाल - Future Tense)
उदाहरण: "त्वं किं क्रेष्यसि?" (तुम क्या खरीदोगे?) ध्यान दें: लृट् लकार में 'श्ना' विकरण नहीं लगता, इसलिए रूप 'क्रेष्यति' बनता है न कि 'क्रीणिष्यति'।
श्लोक और मंत्रों में क्रयादिगण का प्रयोग
"तद् विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया..." यहाँ प्रत्यक्ष रूप से नहीं, पर 'ग्रहण' करने की प्रक्रिया अंतर्निहित है। एक अन्य प्रसिद्ध श्लोक: "इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।" यहाँ 'हृ' धातु है, परंतु 'ग्रह्' (ग्रहण करना) का भाव मन को वश में करने के लिए अक्सर प्रयुक्त होता है: "यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः" - यहाँ विषयों को समेटने (ग्रहण करने) की बात है।
"विक्रीणीते यथा रत्नं सारज्ञो न तथा जडः।" अर्थ: जिस प्रकार रत्नों का पारखी (जौहरी) रत्न को बेचता या खरीदता है, वैसा मूर्ख व्यक्ति नहीं कर सकता।
"ॐ पावनः पवतामस्मि..." 'पु' धातु जिसका अर्थ पवित्र करना है, वेदों में बार-बार आती है। "पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम्" – वह सविता देव मुझे पवित्र करे।
क्रयादिगण की धातुओं का व्यावहारिक और आर्थिक महत्व
क्री (Buying): उपभोक्ता संस्कृति का आधार। विक्री (Selling): व्यापार का आधार। ग्रह् (Accepting/Grasping): किसी वस्तु या विचार को स्वीकार करना। बन्ध् (Binding): अनुबंध (Contract) शब्द इसी से निकला है। जब दो पक्ष व्यापारिक रिश्ते में बंधते हैं, तो वह 'अनुबन्ध' कहलाता है।
व्यवसायी लाभं गृह्णाति। (व्यापारी लाभ प्राप्त करता है।) ग्राहकः मूल्यं दत्त्वा वस्तु क्रीणाति। (ग्राहक मूल्य देकर वस्तु खरीदता है।)
चुर स्तेये: एक संक्षिप्त संदर्भ
अर्थ: चोरी करना। सम्बन्ध: जहाँ क्रयादिगण 'वैध' लेन-देन (क्री) की बात करता है, वहीं 'चुर' धातु अनैतिक तरीके से वस्तु प्राप्त करने (स्तेय) को दर्शाती है। व्याकरणिक रूप से इसमें 'णिच्' प्रत्यय लगता है (चोरयति)।
क्रयादिगण सीखने के लिए कुछ महत्वपूर्ण टिप्स
श्ना प्रत्यय को याद रखें: हमेशा ध्यान दें कि धातु और प्रत्यय के बीच 'ना' या 'णी' सुनाई दे रहा है या नहीं (जैसे: क्री-णा-ति)।
णत्व विधान: यदि धातु में 'र' या 'ष' हो, तो 'ना' का 'णा' हो जाता है (जैसे: क्रीणाति)।
अभ्यास: 'क्री' और 'ग्रह्' इन दो धातुओं के रूप पांचों लकारों में कंठस्थ कर लें, बाकी धातुएं इन्हीं के समान चलेंगी।
अभ्यास प्रश्नावली (स्वयं को परखें)
'क्रीणाति' में कौन सा विकरण है?
'ग्रह्' धातु का लट् लकार प्रथम पुरुष बहुवचन रूप क्या होगा?
"क्रयादिभ्यः श्ना" सूत्र का क्या कार्य है?
'जानाति' (ज्ञा धातु) किस गण की धातु है?
निष्कर्ष
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- संज्ञाप्रकरणम् - लघुसिद्धान्तकौमुदी
- सन्धि - अच सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - हल सन्धि, (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सन्धि - विसर्ग सन्धि (लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार )
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तद्धित :- अपत्यार्थक एवं मत्वर्थीय (सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार)
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- स्त्री प्रत्यय :- लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रकरण :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
- कारक प्रथमा विभक्ति
- कारक द्वितीया विभक्ति
- कारक तृतीया विभक्ति
- कारक चतुर्थी विभक्ति
- कारक पञ्चमी विभक्ति
- कारक षष्ठी विभक्ति
- कारक सप्तमी विभक्ति
- कारक सम्बोधन विभक्ति
- परस्मैपद एवं आत्मनेपद विधान :- सिद्धान्तकौमुदी के अनुसार
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