संस्कृत व्याकरण की अमूल्य निधि: अव्ययीभाव समास - एक सम्पूर्ण और विस्तृत विवेचन
मङ्गलाचरणम्
वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥
येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात्। कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः॥
संस्कृत भाषा संसार की सबसे वैज्ञानिक और समृद्ध भाषा है। इस भाषा की संरचना में 'समास' (Compounding) का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। 'समसनं समासः' अर्थात् संक्षिप्तीकरण ही समास है। महर्षि पाणिनि ने समास के मुख्य चार भेद बताए हैं, जिनमें सबसे पहला और प्रधान समास है—अव्ययीभाव समास।
इस विस्तृत लेख में हम अव्ययीभाव समास के प्रत्येक सूत्र, उसकी वृत्ति, अर्थ और उदाहरणों की ऐसी व्याख्या करेंगे जो न केवल आपकी परीक्षाओं के लिए उपयोगी होगी, बल्कि संस्कृत के प्रति आपकी समझ को भी अगाध बनाएगी।
१. अव्ययीभाव समास का अधिकार क्षेत्र
संस्कृत व्याकरण में 'अधिकार सूत्र' वे होते हैं जो एक निश्चित सीमा तक अपना प्रभाव रखते हैं।
सूत्रम्: ॥ अथ अव्ययीभावः ॥ (२/१/५)
वृत्ति: अधिकारोऽयं प्राक् तत्पुरुषात्।
व्याख्या:
यह एक अधिकार सूत्र है। इसका अर्थ है कि अष्टाध्यायी के दूसरे अध्याय के प्रथम पाद के पाँचवें सूत्र से लेकर 'तत्पुरुष' समास के आरम्भ होने से पहले तक जितने भी समास विधान किए जाएँगे, उन सबकी 'अव्ययीभाव' संज्ञा होगी। यह सूत्र एक सीमा निर्धारित करता है कि इसके अंतर्गत आने वाले सभी पद अव्ययीभाव के नियम का पालन करेंगे।
२. अव्ययीभाव समास का मुख्य विधायक सूत्र
अव्ययीभाव समास की रचना किस आधार पर होती है, इसे समझने के लिए हमें इस महासूत्र को समझना होगा:
सूत्रम्: अव्ययं विभक्तिसमीपसमृद्धिव्यृद्ध्यर्थाभावात्ययासंप्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व्ययौगपद्यसादृश्यसम्पत्तिसाकल्यान्तवचनेषु। (२/१/६)
वृत्ति: सुबन्तेन सह नित्यं समस्यत सोऽव्ययीभावः। प्रायेणाविग्रहो नित्यसमासः, प्रायेणास्वपदविग्रहो वा।
हिन्दी व्याख्या:
यह सूत्र बताता है कि १६ विशेष अर्थों में विद्यमान 'अव्यय' का समर्थ 'सुबन्त' (शब्द रूप) के साथ नित्य समास होता है। इस समास को नित्य समास कहा जाता है। नित्य समास की दो विशेषताएँ होती हैं:
अविग्रह: जिसका लौकिक विग्रह न हो।
अस्वपद विग्रह: जिसका विग्रह अपने ही पदों से न होकर अन्य पदों की सहायता से हो।
१६ अर्थों का विस्तृत विश्लेषण और उदाहरण:
आइए, सूत्र में वर्णित १६ अर्थों को विस्तार से उदाहरणों के माध्यम से समझते हैं:
१. विभक्ति (Case ending)
जब किसी विभक्ति के अर्थ को प्रकट करने के लिए अव्यय का प्रयोग हो।
उदाहरण: अधिहरि।
लौकिक विग्रह: हरौ इति (हरि में)।
अलौकिक विग्रह: हरि + ङि + अधि।
यहाँ 'अधि' अव्यय सप्तमी विभक्ति के अर्थ में आया है।
२. समीप (Nearness)
जब किसी के निकट होने का भाव हो।
उदाहरण: उपकृष्णम्।
विग्रह: कृष्णस्य समीपम् (कृष्ण के पास)।
यहाँ 'उप' अव्यय सामीप्य अर्थ में प्रयुक्त है।
३. समृद्धि (Prosperity)
ऐश्वर्य या ऋद्धि की अधिकता।
उदाहरण: सुमद्रम्।
विग्रह: मद्राणां समृद्धिः (मद्र देशवासियों की समृद्धि)।
यहाँ 'सु' अव्यय समृद्धि को दर्शाता है।
४. व्यृद्धि (Decay/Adversity)
ऋद्धि या ऐश्वर्य का विनाश या अभाव।
उदाहरण: दुर्युवनम् (यवनानां व्यृद्धिः)।
यवनों की अवनति या नाश। यहाँ 'दुर्' अव्यय का प्रयोग हुआ है।
५. अर्थाभाव (Absence of a thing)
किसी वस्तु का पूरी तरह अभाव होना।
उदाहरण: निर्मक्षिकम्।
विग्रह: मक्षिकाणाम् अभावः (मक्खियों का अभाव)।
यहाँ 'निर्' अव्यय अभाव को सूचित करता है।
६. अत्यय (Destruction/Passing away)
नष्ट होना या बीत जाना (अक्सर समय या ऋतु के संदर्भ में)।
उदाहरण: अतिहिमम्।
विग्रह: हिमस्य अत्ययः (बर्फ का बीतना या नष्ट होना)।
७. असंप्रति (Inappropriate at present)
इस समय जो उचित न हो।
उदाहरण: अतिनिद्रम्।
विग्रह: निद्रा संप्रति न युज्यते (अब सोना उचित नहीं है)।
८. शब्दप्रादुर्भाव (Appearance of word/Fame)
शब्द का प्रकाश या प्रसिद्ध होना।
उदाहरण: इतिहरि।
विग्रह: हरिशब्दस्य प्रकाशः (हरि शब्द की प्रसिद्धि)।
९. पश्चात् (Afterwards)
पीछे या बाद में।
उदाहरण: अनुविष्णु।
विग्रह: विष्णोः पश्चात् (विष्णु के पीछे)।
१०. यथा (In accordance with)
'यथा' के चार उप-भेद हैं:
योग्यता: (अनुरूपता) - अनुरूपम् (रूपस्य योग्यम्)।
वीप्सा: (पुनरावृत्ति) - प्रत्यर्थम् (अर्थं अर्थं प्रति)।
पदार्थानतिवृत्ति: (सीमा का उल्लंघन न करना) - यथाशक्ति (शक्तिम् अनतिक्रम्य)।
सादृश्य: (समानता) - सहरि (हरेः सादृश्यम्)।
११. आनुपूर्व्य (Succession/Order)
क्रम के अनुसार।
उदाहरण: अनुज्येष्ठम्।
विग्रह: ज्येष्ठस्य आनुपूर्व्येण (बड़ों के क्रम के अनुसार)।
१२. यौगपद्य (Simultaneity)
एक साथ होना।
उदाहरण: सचक्रम्।
विग्रह: चक्रेण युगपत् (चक्र के साथ एक ही समय में)।
१३. सादृश्य (Similarity)
समान होना।
उदाहरण: ससखि।
विग्रह: सदृशः सख्या (मित्र के समान)।
१४. सम्पत्ति (Wealth/Fitting state)
अनुरूप आत्मभाव या उचित स्थिति।
उदाहरण: सक्षत्रम्।
विग्रह: क्षत्राणां सम्पत्तिः (क्षत्रियों की उचित संपत्ति)।
१५. साकल्य (Entirety/Completeness)
सम्पूर्णता, तिनके को भी न छोड़ना।
उदाहरण: सतृणम्।
विग्रह: तृणमप्यपरित्यज्य (तिनके को भी छोड़े बिना)।
१६. अन्त (Conclusion/Limit)
समाप्ति या मर्यादा तक।
उदाहरण: साग्नि।
विग्रह: अग्निग्रन्थपर्यन्तमधीते (अग्नि ग्रन्थ की समाप्ति तक पढ़ना)।
३. उपसर्जन संज्ञा और पद व्यवस्था
समास करते समय कौन सा पद पहले आएगा, इसका निर्णय करने के लिए निम्नलिखित सूत्रों का प्रयोग होता है:
सूत्रम्: प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम्। (१/२/४३)
वृत्ति: समासशास्त्रे प्रथमानिर्दिष्टमुपसर्जनसंज्ञं स्यात्।
अर्थ: समास विधायक सूत्र (जैसे २/१/६) में जो पद प्रथमा विभक्ति में लिखा गया है, उसकी 'उपसर्जन' संज्ञा होती है।
सूत्रम्: उपसर्जनं पूर्वम्। (२/२/३०)
वृत्ति: समासे उपसर्जनं प्राक्प्रयोज्यम्।
अर्थ: जिसकी उपसर्जन संज्ञा हुई है, उसका प्रयोग समास में पहले (पूर्व) किया जाता है।
प्रक्रिया उदाहरण (अधिहरि):
'अव्ययं विभक्ति...' सूत्र में 'अव्ययम्' पद प्रथमा में है।
अतः 'अधि' (अव्यय) की उपसर्जन संज्ञा हुई।
'उपसर्जनं पूर्वम्' से 'अधि' पहले आया।
रूप बना: अधिहरि।
४. अव्ययीभाव समास के लिंग और विभक्ति नियम
अव्ययीभाव समास होने के बाद वह पद किस लिंग में होगा और उसके रूप कैसे चलेंगे, इसके लिए ये सूत्र महत्वपूर्ण हैं:
सूत्रम्: अव्ययीभावश्च। (२/४/१८)
वृत्ति: अयं नपुंसकं स्यात्।
अर्थ: अव्ययीभाव समास सदैव नपुंसक लिंग में होता है।
सूत्रम्: नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः। (२/४/८३)
वृत्ति: अदन्तादव्ययीभावात्सुपो न लुक्, तस्य पञ्चमीं विना अमादेशश्च स्यात्।
अर्थ: यदि अव्ययीभाव समास के अंत में 'अ' हो (अदन्त), तो विभक्ति का लोप (लुक्) नहीं होता। इसके स्थान पर:
पञ्चमी विभक्ति को छोड़कर अन्य विभक्तियों के स्थान पर 'अम' (अम्) आदेश हो जाता है।
पञ्चमी विभक्ति वैसी ही रहती है।
उदाहरण:
अधिगोपम्: गाः पातीति गोपा, तस्मिन् इति अधिगोपम्। (यहाँ 'अम्' आदेश हुआ है)।
सूत्रम्: तृतीयासप्तम्योर्बहुलम्। (२/४/५४)
अर्थ: अदन्त अव्ययीभाव से परे तृतीया और सप्तमी विभक्ति के स्थान पर 'अम' भाव बहुल (विकल्प) से होता है।
उदाहरण: अधिगोपम् (अम् भाव), अधिगोपेन (तृतीया), अधिगोपे (सप्तमी)।
५. 'सह' के स्थान पर 'स' आदेश के नियम
सूत्रम्: अव्ययीभावे चाकाले। (६/३/८१)
वृत्ति: सहस्य सः स्यादव्ययीभावे न तु काले।
अर्थ: अव्ययीभाव समास में 'सह' के स्थान पर 'स' आदेश हो जाता है, लेकिन यदि उत्तर पद 'कालवाची' (समय बताने वाला) हो, तो यह आदेश नहीं होता।
उदाहरण:
हरेः सादृश्यं = सहरि। (यहाँ सह को स हुआ)।
चक्रेण युगपत् = सचक्रम्।
सदृशः सख्या = ससखि।
६. नदीवाचक शब्दों के साथ संख्या का समास
सामान्यतः संख्यावाची शब्द 'द्विगु' समास बनाते हैं, लेकिन नदियों के मामले में नियम अलग है:
सूत्रम्: नदीभिश्च। (२/१/२०)
वृत्ति: नदीभिः सह संख्या समस्यत।
अर्थ: संख्यावाची शब्द का नदीवाचक शब्दों के साथ समास होता है और वह अव्ययीभाव कहलाता है (न कि द्विगु)। यह 'समाहार' (समूह) के अर्थ में होता है।
उदाहरण:
पञ्चगङ्गम: पञ्चानां गङ्गानां समाहारः (पाँच गंगाओं का समूह)।
द्वियमुनम्: द्वयोः यमुनयोः समाहारः (दो यमुनाओं का समूह)।
७. तद्धित प्रत्यय और समासान्त परिवर्तन
अव्ययीभाव समास के अंत में कुछ प्रत्यय जुड़ते हैं जो शब्द का स्वरूप बदल देते हैं।
सूत्रम्: तद्धिताः। (४/१/७३)
यह एक अधिकार सूत्र है जो पाँचवें अध्याय के अंत तक चलता है।
सूत्रम्: अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः। (५/४/१०७)
वृत्ति: शरदादिभ्यष्टच् स्यात्समासान्तोऽव्ययीभावे।
अर्थ: अव्ययीभाव समास में यदि उत्तर पद 'शरद' आदि गण (शब्द समूह) का हो, तो उसके अंत में 'टच्' (अ) प्रत्यय जुड़ता है।
उदाहरण: शरदः समीपम् = उप + शरद + टच् = उपशरदम्।
वार्तिक: जराया जरस् च।
अर्थ: अव्ययीभाव समास में 'जरा' शब्द को 'जरस्' आदेश हो जाता है जब टच् प्रत्यय लगता है।
उदाहरण: जरायाः समीपम् = उपजरसम्।
सूत्रम्: अनश्च। (५/४/१०८)
अर्थ: जिस अव्ययीभाव समास के अंत में 'अन्' हो, वहाँ भी 'टच्' प्रत्यय होता है।
सूत्रम्: नस्तद्धिते। (६/४/१४४)
अर्थ: तद्धित प्रत्यय परे होने पर 'नकारान्त' शब्द की 'टि' (अन्) का लोप हो जाता है।
उदाहरण: राज्ञः समीपम् = उपराजन् + टच् = उपराजम्। (यहाँ अन् का लोप हुआ)।
अध्यात्मम्: आत्मनि इति (आत्मा में)।
सूत्रम्: नपुंसकादन्यतरस्याम्। (५/४/१०९)
अर्थ: यदि अव्ययीभाव के अंत में 'अन्' वाला नपुंसक लिंग शब्द हो, तो 'टच्' प्रत्यय विकल्प (Optionally) से होता है।
उदाहरण: उपचर्मम् (टच् होने पर) और उपचर्म (टच् न होने पर)।
सूत्रम्: झयः। (५/४/१११)
अर्थ: यदि समास के अंत में 'झय्' प्रत्याहार (वर्ग के १, २, ३, ४ अक्षर) का वर्ण हो, तो 'टच्' प्रत्यय विकल्प से होता है।
उदाहरण: उपसमिधम् या उपसमित्।
८. अव्ययीभाव समास के प्रमुख उदाहरणों की सूची (Quick Reference)
यहाँ सूत्रानुसार कुछ प्रमुख उदाहरण दिए जा रहे हैं:
| अधिहरि | हरौ इति | विभक्ति (सप्तमी) |
| उपकृष्णम् | कृष्णस्य समीपम् | समीप |
| सुमद्रम् | मद्राणां समृद्धिः | समृद्धि |
| दुर्यवनम् | यवनानां व्यृद्धिः | व्यृद्धि (नाश) |
| निर्मक्षिकम् | मक्षिकाणाम् अभावः | अभाव |
| अतिहिमम् | हिमस्य अत्ययः | अत्यय (बीत जाना) |
| अतिनिद्रम् | निद्रा संप्रति न युज्यते | असंप्रति |
| इतिहरि | हरिशब्दस्य प्रकाशः | शब्दप्रादुर्भाव |
| अनुविष्णु | विष्णोः पश्चात् | पश्चात् |
| यथाशक्ति | शक्तिम् अनतिक्रम्य | पदार्थानतिवृत्ति |
| प्रत्यर्थम् | अर्थं अर्थं प्रति | वीप्सा |
| अनुरूपम् | रूपस्य योग्यम् | योग्यता |
| सहरि | हरेः सादृश्यम् | सादृश्य |
| अनुज्येष्ठम् | ज्येष्ठस्य आनुपूर्व्येण | आनुपूर्व्य (क्रम) |
| सचक्रम् | चक्रेण युगपत् | यौगपद्य (एक साथ) |
| सक्षत्रम् | क्षत्राणां सम्पत्तिः | सम्पत्ति |
| सतृणम् | तृणमपि अपरित्यज्य | साकल्य (सम्पूर्णता) |
| साग्नि | अग्निग्रन्थपर्यन्तम् | अन्त (समाप्ति) |
९. व्याकरणिक महत्त्व और निष्कर्ष
अव्ययीभाव समास केवल शब्दों का मेल नहीं है, बल्कि यह भाषा में सूक्ष्म भावों को व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है। जब हम 'यथाशक्ति' कहते हैं, तो हम केवल शक्ति की बात नहीं कर रहे होते, बल्कि उस सीमा की बात कर रहे होते हैं जिसे लांघा नहीं जाना चाहिए।
श्लोक:
अव्ययीभावसमासोऽयं पूर्वपदार्थप्रधानकः।
नपुंसकलिङ्गे नित्यं च सुपोऽम्विधिरिष्यते॥
अर्थात्, अव्ययीभाव समास वह है जहाँ पूर्व पद के अर्थ की प्रधानता होती है। यह हमेशा नपुंसक लिंग में रहता है और इसमें विभक्तियों का 'अम' भाव विशेष रूप से देखा जाता है।
छात्रों के लिए सुझाव:
सूत्र कंठस्थ करें: पाणिनीय सूत्रों को याद करने से व्याकरण की जड़ें मजबूत होती हैं।
प्रक्रिया को समझें: केवल रटें नहीं, बल्कि देखें कि कैसे 'उप' और 'कृष्ण' मिलकर 'उपकृष्णम्' बने।
नित्य समास का ध्यान रखें: याद रखें कि अव्ययीभाव का विग्रह अक्सर उन्हीं पदों से नहीं होता जो समास में दिख रहे हैं (अस्वपद विग्रह)।
यह लेख अव्ययीभाव समास की एक संपूर्ण निर्देशिका है। यदि आप संस्कृत की परीक्षाओं जैसे TGT, PGT, NET, या UPSC की तैयारी कर रहे हैं, तो इन सूत्रों का ज्ञान आपके लिए अनिवार्य है।
शांति मन्त्र:
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।