अजन्त स्त्रीलिङ्ग प्रकरण: संस्कृत व्याकरण का गहन विश्लेषण (रमा, सर्वा, मति एवं तिसृ शब्द सिद्धि)
प्रस्तावना: स्त्रीशक्ति और संस्कृत व्याकरण
संस्कृत वाङ्मय में 'स्त्री' शब्द केवल एक लिङ्ग का परिचायक नहीं है, बल्कि यह सृजन, शक्ति और लक्ष्मी का प्रतीक है। पाणिनीय व्याकरण में 'अजन्त स्त्रीलिङ्ग' उन शब्दों को कहा जाता है जिनके अन्त में 'अच्' (स्वर) वर्ण होते हैं और जो स्त्रीत्व का बोध कराते हैं।
भगवान पाणिनि के अष्टाध्यायी और आचार्य वरदराज की लघुसिद्धान्तकौमुदी में इन शब्दों की रूपसिद्धि के लिए विशेष नियमों का प्रावधान किया गया है। आज के इस विस्तृत लेख में हम रमा (आकारान्त), सर्वा (सर्वनाम आकारान्त), मति (इकारान्त) और तिसृ (ऋकारान्त) शब्दों की व्याकरणिक प्रक्रिया को विस्तार से समझेंगे।
मङ्गलाचरणम्
"या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥"
इस वन्दना के साथ हम व्याकरण की उस पावन गंगा में डुबकी लगाते हैं जहाँ शब्दों का संस्कार होता है।
१. आकारान्त स्त्रीलिङ्ग: 'रमा' शब्द (Laxmi)
'रमा' शब्द का अर्थ है 'लक्ष्मी'। यह शब्द 'रम्' धातु से 'टाप्' (आ) प्रत्यय लगकर बना है। 'टाप्' प्रत्यय में 'प' और 'ट' की इत्संज्ञा होकर 'आ' शेष बचता है।
शब्द रूप सारणी (रमा)
| प्रथमा | रमा | रमे | रमाः |
| द्वितीया | रमाम | रमे | रमाः |
| तृतीया | रमया | रमाभ्याम् | रमाभिः |
| चतुर्थी | रमायै | रमाभ्याम् | रमाभ्यः |
| पञ्चमी | रमायाः | रमाभ्याम् | रमाभ्यः |
| षष्ठी | रमायाः | रमयोः | रमाणाम् |
| सप्तमी | रमायाम् | रमयोः | रमासु |
| सम्बोधन | हे रमे! | हे रमे! | हे रमाः! |
प्रमुख सूत्र और सिद्धि प्रक्रिया (Step-by-Step)
(क) प्रथमा विभक्ति
रमा: यहाँ 'रमा + सु' की स्थिति में सूत्र 'हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल्' से सु के 'स्' का लोप हो जाता है। जिससे 'रमा' रूप सिद्ध होता है।
रमे (प्रथमा द्विवचन):
यहाँ सूत्र लगता है: 'औङ आपः' (7/1/18)
वृत्ति: आवन्तादङ्गात्परस्ययौङः शी स्यात्।
अर्थ: आकारान्त (आबन्त) अङ्ग से परे 'औ' (द्विवचन प्रत्यय) को 'शी' आदेश होता है।
प्रक्रिया: रमा + औ → रमा + शी (लशक्कतद्धिते से शकार का लोप) → रमा + ई → रमे (आद् गुणः से गुण होकर)।
रमाः (बहुवचन):
यहाँ 'रमा + जस्' में 'अकः सवर्णे दीर्घः' से दीर्घ प्राप्त होता है, लेकिन 'दीर्घाञ्जसि च' इसका निषेध करता है। अन्ततः 'प्रथमयोः पूर्वसवर्णः' के बाधित होने पर भी सवर्ण दीर्घ होकर 'रमाः' बनता है।
(ख) सम्बोधन
सूत्र: सम्बुद्धौ च (7/3/106)
वृत्ति: आप एकार म्यात्सम्बुद्धौ।
अर्थ: सम्बोधन के एकवचन (सम्बुद्धि) परे होने पर 'आ' को 'ए' आदेश होता है।
सिद्धि: हे रमा + सु → हे रमे + स् → 'एङ्गस्वात्संबुद्धेः' से 'स्' का लोप → 'हे रमे'।
(ग) द्वितीया विभक्ति
रमाम्: 'रमा + अम्' में 'अमि पूर्वः' सूत्र से पूर्वरूप होकर 'रमाम्' सिद्ध होता है।
रमाः (बहुवचन): 'रमा + शस्' की स्थिति में 'प्रथमयोः पूर्वसवर्णः' से दीर्घ होकर 'रमाः' बनता है।
(घ) तृतीया विभक्ति
सूत्र: आङि चापः (7/3/105)
वृत्ति: आङि ओसि चाप एकारः।
अर्थ: 'आङ' (टा) और 'ओस्' प्रत्यय परे होने पर आकारान्त को 'ए' आदेश होता है।
सिद्धि (रमया): रमा + टा (आ) → रमे + आ → (एचोऽयवायावः से ए को अय्) → र म् + अय् + आ = रमया।
(ङ) चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी (याट् आगम)
सूत्र: याडापः (7/3/113)
वृत्ति: आपो ङितो याट्।
अर्थ: आवन्त अङ्ग (आकारान्त) से परे 'ङित्' प्रत्ययों (ङे, ङसि, ङस्, ङि) को 'याट्' का आगम होता है।
रमायै (चतुर्थी): रमा + ङे (ए) → रमा + याट् + ए → रमा + यै (वृद्धिरेचि से वृद्धि) = रमायै।
रमायाः (पञ्चमी/षष्ठी): रमा + ङसि/ङस् → रमा + याट् + अस् = रमायाः।
रमाणाम् (षष्ठी बहुवचन): यहाँ 'ह्रस्वनद्यापो नुट्' से 'नुट्' का आगम होता है और 'अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि' से नकार को णकार होकर 'रमाणाम्' बनता है।
२. आकारान्त सर्वनाम स्त्रीलिङ्ग: 'सर्वा' शब्द
जब हम 'सर्वा' (सब) जैसे सर्वनाम शब्दों की बात करते हैं, तो रमा शब्द से कुछ भिन्नता आती है। यहाँ 'याट्' के स्थान पर 'स्याट्' आगम होता है।
सूत्र: सर्वनाम्नः स्याङ्कस्वश्च (7/3/114)
वृत्ति: आवन्तात्सर्वनाम्नो डितः स्याट् स्यादापश्च ह्रस्वः।
अर्थ: आकारान्त सर्वनाम शब्दों से परे 'ङित्' प्रत्ययों को 'स्याट्' आगम होता है और अङ्ग का आकार 'ह्रस्व' (छोटा) हो जाता है।
सिद्धि (सर्वस्यै):
सर्वा + ङे (ए) → (स्याट् आगम और आकार को ह्रस्व) → सर्व + स्या + ए → (वृद्धि) = सर्वस्यै।
इसी प्रकार: सर्वस्याः, सर्वासाम्, सर्वस्याम्।
३. इकारान्त स्त्रीलिङ्ग: 'मति' शब्द (Intelligence)
'मति' शब्द इकारान्त है। यहाँ 'नदी संज्ञा' और 'घि संज्ञा' का द्वंद्व चलता है, जिससे कुछ रूपों में दो-दो रूप बनते हैं।
शब्द रूप सारणी (मति)
| चतुर्थी | मत्यै / मतये |
| पञ्चमी | मत्याः / मतेः |
| षष्ठी | मत्याः / मतेः |
| सप्तमी | मत्याम् / मतौ |
महत्वपूर्ण सूत्र:
सूत्र: ङिति ह्रस्वश्च (1/4/6)
अर्थ: इकारान्त या उकारान्त शब्द जो नित्य स्त्रीलिङ्ग हों, उनकी 'ङित्' प्रत्यय परे होने पर विकल्प से 'नदी संज्ञा' होती है।
सिद्धि प्रक्रिया:
मत्यै (नदी पक्ष): मति + ए → मति + आट् + ए (आनद्याः सूत्र से) → (वृद्धि और यण) = मत्यै।
मतये (घि पक्ष): मति + ए → (घेर्डिति से गुण) → मते + ए → (अय् आदेश) = मतये।
सूत्र: इदुद्भ्याम् (7/3/117)
अर्थ: नदी संज्ञक इकार/उकार से परे 'ङि' (सप्तमी) को 'आम्' आदेश होता है।
मत्याम्: मति + ङि → मति + आम् → मत्याम् (यण सन्धि)।
मतौ: घि संज्ञा होने पर 'अच्च घेः' सूत्र से 'मतौ' बनता है।
४. संख्यावाचक स्त्रीलिङ्ग: 'तिसृ' और 'चतसृ'
संस्कृत में 'तीन' और 'चार' की संख्या के लिए स्त्रीलिङ्ग में विशेष आदेश होते हैं।
सूत्र: त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृचतसृ (7/2/99)
अर्थ: स्त्रीलिङ्ग में 'त्रि' शब्द को 'तिसृ' और 'चतुर' शब्द को 'चतसृ' आदेश होता है।
सूत्र: अचि र ऋतः (7/2/100)
अर्थ: यदि आगे कोई स्वर (अच्) हो, तो 'तिसृ' और 'चतसृ' के 'ऋ' को 'र्' (रेफ) आदेश हो जाता है।
उदाहरण: तिसृ + जस् (अस्) → तिस्र + अस् = तिस्रः।
सूत्र: न तिसृचतसृ (6/4/4)
अर्थ: षष्ठी बहुवचन (नामि) परे होने पर भी 'तिसृ' और 'चतसृ' को दीर्घ नहीं होता।
उदाहरण: तिसृ + नाम् = तिसृणाम् (न कि तिसृणाम्)।
व्याकरणिक उदाहरणों का आध्यात्मिक महत्व
संस्कृत व्याकरण केवल नियमों का समूह नहीं है। जब हम 'रमा' शब्द की सिद्धि करते हैं, तो हम केवल शब्द नहीं बना रहे होते, बल्कि ऐश्वर्य की देवी की स्तुति के लिए आधार तैयार कर रहे होते हैं।
उदाहरण:
दुर्गा (आकारान्त): रमा के समान। 'दुर्गायै नमः' (चतुर्थी)।
अम्बिका (आकारान्त): 'हे अम्बिके!' (सम्बोधन)।
बुद्धि (इकारान्त): मति के समान। 'बुद्ध्यै स्वाहा'।
निष्कर्ष (Conclusion)
अजन्त स्त्रीलिङ्ग प्रकरण का अध्ययन हमें शब्दों की सूक्ष्मता और लिंग-भेद के आधार पर होने वाले ध्वनि परिवर्तनों से परिचित कराता है। 'याडापः' से लेकर 'ङिति ह्रस्वश्च' तक के सूत्र पाणिनीय बुद्धिमत्ता के साक्ष्य हैं। चाहे वह 'रमा' का ऐश्वर्य हो या 'मति' की प्रखरता, व्याकरण इन शब्दों को एक निश्चित सांचे में ढालकर भाषा को स्थायित्व प्रदान करता है।
आशा है कि यह विस्तृत लेख आपके संस्कृत अध्ययन और परीक्षाओं (जैसे NET, JRF, UPSC, TGT/PGT) के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा।
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संस्कृत व्याकरण रमा शब्द सिद्धि
लेखक: एआई सहायक (संस्कृत व्याकरण विशेषज्ञ)
नोट: यह सामग्री पूर्णतः मौलिक और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए तैयार की गई है।
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।