पाणिनीय शिक्षा: संस्कृत ध्वनिविज्ञान और उच्चारण का संपूर्ण शास्त्र (An Exhaustive Guide to Paniniya Shiksha)
प्रस्तावना: शिक्षा वेदाङ्ग का महत्त्व
भारतीय ज्ञान परंपरा में वेदों को 'अपौरुषेय' और 'अनादि' माना गया है। वेदों की रक्षा और उनके सही अर्थ को समझने के लिए छह अंगों (षडङ्ग) की रचना की गई, जिन्हें 'वेदाङ्ग' कहा जाता है। इन छह अंगों में सबसे पहला और प्रमुख स्थान 'शिक्षा' को दिया गया है।
शास्त्रों में कहा गया है:
"शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्।"
अर्थात, शिक्षा शास्त्र को 'वेद पुरुष' की नासिका (नाक) माना गया है। जिस प्रकार नासिका श्वास के माध्यम से जीवन का आधार है, उसी प्रकार शिक्षा शास्त्र वेदों के शुद्ध उच्चारण के माध्यम से मंत्रों को जीवंत रखता है। पाणिनीय शिक्षा इसी श्रृंखला का सबसे प्रामाणिक और महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
पाणिनीय शिक्षा का परिचय
पाणिनीय शिक्षा के रचयिता महान वैयाकरण आचार्य पाणिनि हैं। उन्होंने लोक और वेद दोनों के उच्चारण को शास्त्रीय आधार प्रदान करने के लिए इस ग्रंथ की रचना की। यह ग्रंथ पद्यात्मक शैली में है और इसमें मुख्य रूप से ६३ या ६४ श्लोकों का समावेश है (पाठ भेदानुसार)।
ग्रंथ का मंगलाचरण और प्रतिज्ञा श्लोक इस प्रकार है:
अथ शिक्षा प्रवक्ष्यामि पाणिनीयं मतं यथा ।
शास्त्रानुपूर्वं तद्विद्याद् यथोक्तं लोकवेदयोः ॥ १ ॥
हिन्दी व्याख्या: "अब मैं आचार्य पाणिनि के मतानुसार 'शिक्षा' नामक वेदाङ्ग का वर्णन करूँगा। इस शास्त्र को लोक (साधारण भाषा) और वेद (वैदिक मंत्रों) की परंपरा के अनुसार तथा प्राचीन ऋषियों के शास्त्रानुक्रम के अनुसार समझना चाहिए।"
१. वर्णों की संख्या: शम्भु मत और ब्रह्मा का उपदेश
संस्कृत भाषा में ध्वनियों का वर्गीकरण अत्यंत सूक्ष्म है। पाणिनि ने वर्णों की गणना भगवान शिव (शम्भु) के मत के अनुसार की है।
त्रिषष्टिश्चतुः षष्टिर्वा वर्णाः शम्भुमते मताः।
प्राकृते संस्कृते चापि स्वयं प्रोक्ताः स्वयंभुवा ॥ ३ ॥
व्याख्या: शम्भु (भगवान शिव) के मत में तथा संस्कृत एवं प्राकृत दोनों ही भाषाओं में वर्णों की संख्या ६३ या ६४ (Trishashti or Chatushashti) मानी गई है। स्वयं ब्रह्मा जी (स्वयंभू) ने इन वर्णों का उपदेश दिया है।
वर्णों का वर्गीकरण (वर्णगणना):
पाणिनीय शिक्षा के अनुसार वर्णों का विभाजन इस प्रकार है:
स्वर: २१ (२१ स्वर - हृस्व, दीर्घ और प्लुत के भेद से)।
स्पर्श वर्ण: २५ (क-वर्ग से म-वर्ग तक)।
यादि (अन्तःस्थ और ऊष्म): ८ (य, र, ल, व, श, ष, स, ह)।
यम: ४।
अनुस्वार: १।
विसर्ग: १।
जिह्वामूलीय: १ (क और ख से पहले आने वाला विसर्ग सदृश ध्वनि)।
उपध्मानीय: १ (प और फ से पहले आने वाला)।
दुःस्पृष्ट: १ (केवल वेदों में प्रयुक्त 'ळ')।
प्लुत ऌकार: १।
इस प्रकार २१+२५+८+४+१+१+१+१+१ = ६३ वर्ण होते हैं। यदि अनुस्वार के भेदों को गिना जाए तो यह ६४ हो जाते हैं।
२. वर्णोत्पत्ति प्रक्रिया: ध्वनि विज्ञान का मनोवैज्ञानिक आधार
पाणिनि ने ध्वनि के उत्पन्न होने की प्रक्रिया को केवल भौतिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और शारीरिक भी माना है। श्लोक ६ और ७ में इसका विस्तृत वर्णन है:
आत्मा बुद्ध्या समेत्यर्थान्मनो युङ्क्ते विवक्षया ।
मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम ॥ ६ ॥
प्रक्रिया के चरण:
आत्मा: सबसे पहले आत्मा बुद्धि के साथ मिलकर अर्थों को ग्रहण करती है।
बुद्धि: बुद्धि बोलने की इच्छा (विवक्षा) जगाती है।
मन: इच्छा जागने पर मन सक्रिय होता है और शरीर की जठराग्नि (कायाग्नि) पर प्रहार करता है।
मारुत (वायु): वह अग्नि शरीर के भीतर स्थित 'वायु' को ऊपर की ओर प्रेरित करती है।
मारुतस्तूरसि चरन्मन्द्रं जनयति स्वरम् ।
प्रातःसवनयोगं तं छन्दो गायत्रमाश्रितम् ॥ ७ ॥
वायु की गति और स्वर:
हृदय (उरः): जब वायु हृदय में संचरण करती है, तो 'मन्द्र' (गम्भीर) स्वर उत्पन्न होता है, जो प्रातःकाल के यज्ञ (प्रातः सवन) और गायत्री छंद से संबंधित है।
कण्ठ: जब वायु कण्ठ में पहुँचती है, तो 'मध्यम' स्वर उत्पन्न होता है, जो माध्यन्दिन सवन और त्रिष्टुप् छंद से संबंधित है।
शिर (मूर्धा): जब वायु सिर से टकराती है, तो 'तार' (उच्च) स्वर उत्पन्न होता है, जो सायं सवन और जगती छंद से संबंधित है।
३. वर्णों के भेद: उच्चारण की सूक्ष्मता
पाणिनीय शिक्षा में वर्णों के भेद के पांच मुख्य आधार बताए गए हैं:
स्वर (Accent): उदात्त, अनुदात्त, स्वरित।
काल (Duration): हृस्व, दीर्घ, प्लुत।
स्थान (Place of Articulation): जहाँ से ध्वनि निकलती है।
आभ्यन्तर प्रयत्न (Internal Effort): ध्वनि निकलने से पहले की मुख की स्थिति।
बाह्य प्रयत्न (External Effort): ध्वनि निकलने के बाद की वायु की स्थिति।
स्वर और संगीत का संबंध
वैदिक स्वरों और संगीत के सात सुरों के बीच गहरा संबंध श्लोक १२ में बताया गया है:
उदात्ते निषादगान्धारावनुदात्त: ऋषभधैवतौ ।
स्वरितप्रभवा ह्येते षड्जमध्यमपञ्चमा: ॥ १२ ॥
उदात्त स्वर: निषाद (नी) और गान्धार (गा)।
अनुदात्त स्वर: ऋषभ (रे) और धैवत (धा)।
स्वरित स्वर: षड्ज (सा), मध्यम (मा), और पञ्चम (पा)।
४. वर्णों के आठ उच्चारण स्थान (Ashtau Sthanani)
वर्णों के उच्चारण के लिए शरीर के आठ अंगों को मुख्य माना गया है:
अष्टौ स्थानानि वर्णानामुरः कण्ठः शिरस्तथा ।
जिह्वामूलं च दन्ताश्च नासिकोष्ठौ च तालु च ॥ १३ ॥
उरः (Chest/Heart)
कण्ठ (Throat)
शिर (Head/Murtha)
जिह्वामूल (Root of tongue)
दन्त (Teeth)
नासिका (Nose)
ओष्ठ (Lips)
तालु (Palate)
ध्यान दें: चारायणीय शिक्षा में स्थानों की संख्या १९ तक बताई गई है।
५. विसर्ग की आठ गतियाँ (Ushma Gati)
विसर्ग की स्थिति और उसके बाद आने वाले वर्णों के आधार पर विसर्ग के ८ रूपांतरण होते हैं:
ओभावश्च विवृत्तिश्च शषसा रेफ एव च ।
जिह्वामूलमुपध्मा च गतिरष्टविधोष्मणः ॥ १४ ॥
ओकार: विसर्ग का 'ओ' हो जाना।
विवृत्ति: विसर्ग का लोप या सन्धि रहित स्थिति।
शकार (श): विसर्ग का 'श' में बदलना।
षकार (ष): विसर्ग का 'ष' में बदलना।
सकार (स): विसर्ग का 'स' में बदलना।
रेफ (र): विसर्ग का 'र' में बदलना।
जिह्वामूलीय: क/ख के पहले।
उपध्मानीय: प/फ के पहले।
६. हकार और वर्णों का विशिष्ट स्थान
हकार (ह) के उच्चारण के विषय में विशेष नियम हैं:
यदि 'ह' पञ्चम वर्ण (ङ, ञ, ण, न, म) या अन्तःस्थ (य, र, ल, व) के साथ संयुक्त हो, तो उसका उच्चारण 'उरः' (Chest) से होता है।
यदि 'ह' अकेला (असंयुक्त) हो, तो उसका उच्चारण 'कण्ठ' से होता है।
हकारं पञ्चमैर्युक्तमन्तः स्थाभिश्च संयुतम् ।
उरस्यं तं विजानीयात्कण्ठ्यमाहुरसंयुतम् ॥ १६ ॥
७. वर्णोच्चारण स्थानों का विस्तृत विवरण
पाणिनीय शिक्षा के श्लोक १७ और १८ में वर्णों का वैज्ञानिक वर्गीकरण दिया गया है:
| कण्ठ (Throat) | अ, आ, ह, विसर्ग, क-वर्ग | कण्ठ्यावहा... |
| तालु (Palate) | इ, ई, च-वर्ग, य, श | इचुयशास्तालव्या |
| मूर्धा (Head) | ऋ, ट-वर्ग, र, ष | ऋटुरषा मूर्धन्या |
| दन्त (Teeth) | ऌ, त-वर्ग, ल, स | ऌतुलसाः स्मृताः |
| ओष्ठ (Lips) | उ, ऊ, प-वर्ग, उपध्मानीय | ओष्ठजावुपू |
| नासिका (Nose) | अनुस्वार, पञ्चम वर्ण | - |
| कण्ठ-तालु | ए, ऐ | एऐ तु कण्ठतालव्या |
| कण्ठ-ओष्ठ | ओ, औ | ओओ कण्ठोष्ठजौ |
| दन्त-ओष्ठ | व | वः स्मृतौ बुधैः |
८. विशेष वर्ण विचार: ए, ओ, ऐ, औ
इन संयुक्त स्वरों के उच्चारण में 'विवृत' और 'संवृत' का विशेष ध्यान रखा जाता है।
ए और ओ: इनमें अर्धमात्रा कण्ठ्य स्वर की 'संवृत' होती है।
ऐ और औ: इनमें आद्य अर्धमात्रा 'विवृत' होती है।
नियम: सभी घोष वर्ण 'संवृत' होते हैं और अघोष वर्ण 'विवृत' होते हैं।
संवृतं मात्रिकं ज्ञेयं विवृतं तु द्विमात्रिकम् ।
घोषा वा संवृताः सर्वे अघोषा विवृताः स्मृता ॥ २० ॥
९. वर्णोच्चारण की विधि: बाघिन का उदाहरण
पाणिनि ने वर्णों के उच्चारण की कोमलता और स्पष्टता को समझाने के लिए एक बहुत ही सुंदर उदाहरण दिया है:
व्याघ्री यथा हरेत्पुत्रान्दंष्ट्राभ्यां न च पीडयेत् ।
भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद्वर्णान्प्रयोजयेत् ॥ २५ ॥
भावार्थ: जिस प्रकार एक बाघिन अपने बच्चों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते समय उन्हें दांतों से पकड़ती है, किंतु वह इस बात का ध्यान रखती है कि बच्चों को न तो चोट लगे (पीड़ा न हो) और न ही वे नीचे गिरें। ठीक उसी प्रकार, एक पाठक को वर्णों का उच्चारण करना चाहिए—न तो वर्णों को बहुत अधिक दबाकर बोलें और न ही उन्हें इतना ढीला छोड़ें कि वे अस्पष्ट हो जाएं।
१०. रङ्ग, अनुस्वार और कम्प स्वर
रङ्ग: रङ्ग का उच्चारण 'त' के उच्चारण काल के समान होता है और इसकी दो मात्राएँ होती हैं। (हृदय में १, शिर में १/२, नासिका में १/२)।
अनुस्वार: अनुस्वार का उच्चारण लौकी की वीणा की ध्वनि के समान होना चाहिए।
कम्प स्वर: इसे उच्चारण करते समय स्वर के मध्य भाग में कम्पित करना चाहिए।
११. पाठकों के गुण और दोष (The Ethics of Recitation)
पाणिनि ने अधम (बुरे) और उत्तम पाठकों के छह-छह लक्षण बताए हैं, जो आज भी किसी भी वक्ता या गायक के लिए प्रासंगिक हैं।
अधम पाठक (Bad Reciters):
गीती शीघ्री शिरः कम्पी तथा लिखितपाठकः ।
अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः ॥ ३२ ॥
गीती: मंत्रों को गाकर पढ़ने वाला (जहाँ गायन निषिद्ध हो)।
शीघ्री: बहुत जल्दी-जल्दी पढ़ने वाला।
शिरः कम्पी: पढ़ते समय सिर हिलाने वाला।
लिखितपाठकः: अपनी लिखी हुई पोथी देखकर पढ़ने वाला (बिना कण्ठस्थ किए)।
अनर्थज्ञः: अर्थ को बिना समझे पढ़ने वाला।
अल्पकण्ठः: बहुत धीमी आवाज में पढ़ने वाला।
उत्तम पाठक (Good Reciters):
माधुर्यमक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः ।
धैर्य लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः ॥ ३३ ॥
माधुर्यम्: मधुरता।
अक्षरव्यक्तिः: अक्षरों की स्पष्टता।
पदच्छेदः: पदों का सही विभाग।
सुस्वरः: सुंदर स्वर।
धैर्य: धैर्यपूर्वक पढ़ना।
लयसमर्थम्: सही लय और ताल का ज्ञान।
१२. आभ्यन्तर और बाह्य प्रयत्न
ध्वनि को उत्पन्न करने के लिए मुख के भीतर और बाहर जो प्रयत्न किए जाते हैं, वे इस प्रकार हैं:
आभ्यन्तर प्रयत्न:
स्पृष्ट: हल (व्यंजन) वर्णों के लिए।
ईषत्स्पृष्ट: यण् (य, र, ल, व) वर्णों के लिए।
विवृत: अच् (स्वर) और शल् (ऊष्म) वर्णों के लिए।
बाह्य प्रयत्न: इसमें घोष, अघोष, नाद, श्वास आदि का विचार किया जाता है।
१३. हस्त मुद्राओं द्वारा स्वर निर्देश (Hand Mudras)
वैदिक पाठ में हाथ की उंगलियों द्वारा स्वरों (उदात्त, अनुदात्त, स्वरित) को दर्शाने की परंपरा है:
उदात्तं प्रदेशिनीं विद्यात्प्रचयं मध्यतोङ्गुलिम् ।
निहतं तु कनिष्ठिक्यां स्वरितोपकनिष्ठिकाम् ॥ ४४ ॥
उदात्त: तर्जनी (Index finger)।
अनुदात्त: कनिष्ठिका (Little finger)।
स्वरित: अनामिका (Ring finger)।
प्रचय: मध्यमा (Middle finger)।
१४. नौ प्रकार की पदशय्या (Pada Shayya)
स्वरों की स्थिति के आधार पर पदों की ९ स्थितियाँ बताई गई हैं:
१. अन्तोदात्त (जैसे- अग्निः)
२. आद्युदात्त (जैसे- सोमः)
३. उदात्त (जैसे- प्र)
४. अनुदात्त (जैसे- वः)
५. अनुदात्तस्वरित/नीचस्वरित (जैसे- वीर्यम्)
६. मध्योदात्त (जैसे- हविषाम्)
७. स्वरित (जैसे- स्वः)
८. द्व्युदात्त (जैसे- बृहस्पतिः)
९. त्र्युदात्त (जैसे- इन्द्राबृहस्पतिः)
१५. मात्राओं का पशु-पक्षियों से निदर्शन
वर्णों की मात्रा (समय) को समझने के लिए पाणिनि ने प्रकृति का सहारा लिया है:
चाषस्तु वदते मात्रां द्विमात्रं चैव वायसः ।
शिखी रौति त्रिमात्रं तु नकुलस्त्वर्धमात्रकम् ॥ ४९ ॥
नीलकण्ठ (Blue Jay): इसकी आवाज १ मात्रा (हृस्व) के समान है।
कौआ (Crow): इसकी आवाज २ मात्रा (दीर्घ) के समान है।
मयूर (Peacock): इसकी आवाज ३ मात्रा (प्लुत) के समान है।
नेवला (Mongoose): इसकी ध्वनि अर्धमात्रा के समान होती है।
१६. अशुद्ध उच्चारण का दुष्परिणाम
वेदों में उच्चारण की शुद्धता अनिवार्य है। एक गलत स्वर या अक्षर पूरे मंत्र का अर्थ बदल सकता है और वह विनाशकारी हो सकता है।
अनक्षरमनायुष्यं विस्वरं व्याधिपीडितम् ।
अक्षता शस्त्ररूपेण वज्रं पतति मस्तके ॥ ५३ ॥
व्याख्या: जो मंत्र अक्षरहीन (अधूरा) है, वह आयु का नाश करता है। जो विस्वर (गलत स्वर वाला) है, वह रोग पैदा करता है। अशुद्ध उच्चारित शब्द एक शस्त्र बन जाता है और वज्र की तरह बोलने वाले के मस्तक पर गिरता है। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण 'इन्द्रशत्रु' शब्द है, जहाँ स्वर के गलत प्रयोग से मारने वाला ही मारा गया।
निष्कर्ष: साङ्गमधीत्य ब्रह्मलोके महीयते
पाणिनीय शिक्षा केवल व्याकरण का ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह ध्वनि विज्ञान (Phonetics) का सर्वोच्च शिखर है। इसमें वर्णों की उत्पत्ति से लेकर उनके आध्यात्मिक प्रभाव तक का वर्णन है।
तस्मात्साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते ॥ ४२ ॥
जो व्यक्ति वेदों के इन अंगों (विशेषकर शिक्षा और व्याकरण) का विधिपूर्वक अध्ययन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है। आज के आधुनिक युग में भी, भाषा विज्ञान (Linguistics) के छात्र पाणिनीय शिक्षा के सिद्धांतों को देखकर चकित रह जाते हैं कि हजारों वर्ष पूर्व आचार्य पाणिनि ने ध्वनि का इतना सूक्ष्म विश्लेषण कैसे किया।
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Paniniya Shiksha is the primary text for Sanskrit phonetics.
It describes 63 or 64 letters of the Sanskrit alphabet.
The text emphasizes the Atma-Buddhi-Manas connection in sound production.
Proper pronunciation is compared to a tigress carrying her cubs.
Incorrect pronunciation is warned as a Vajra (thunderbolt) on the head.
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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।