वामन-जयादित्य और काशिकावृत्ति: संस्कृत व्याकरण की अमर विरासत (7वीं शताब्दी)
प्रस्तावना: संस्कृत व्याकरण का अनन्त आकाश
संस्कृत वाङ्मय में व्याकरण को 'वेदांग' का मुख माना गया है। प्राचीन ऋषियों ने कहा है:
मुखं व्याकरणं स्मृतम्।
(शिक्षा शास्त्र)
अर्थात, जिस प्रकार शरीर में मुख प्रधान है, उसी प्रकार समस्त विद्याओं में व्याकरण प्रधान है। इस महान व्याकरण परम्परा को वैज्ञानिक स्वरूप देने का श्रेय महर्षि पाणिनि को जाता है। उनकी 'अष्टाध्यायी' मानव बुद्धि की पराकाष्ठा है। किन्तु, पाणिनि के सूत्र संक्षिप्त और गूढ़ थे। इन सूत्रों को जन-साधारण और विद्वानों के लिए सुलभ बनाने हेतु जिस ग्रंथ ने सेतु का कार्य किया, वह है— 'काशिकावृत्ति'। इस महान ग्रंथ के प्रणेता थे वामन और जयादित्य।
7वीं शताब्दी के ये दो मनीषी न केवल वैयाकरण थे, बल्कि उन्होंने संस्कृत शिक्षा पद्धति में एक नई क्रांति का सूत्रपात किया। आज के इस विस्तृत लेख में हम जयादित्य और वामन के जीवन, उनके कालखंड, उनकी रचना पद्धति और काशिकावृत्ति के सांस्कृतिक व शैक्षिक महत्व पर गहराई से चर्चा करेंगे।
1. जयादित्य और वामन: दो व्यक्तित्व, एक कृति
संस्कृत व्याकरण के इतिहास में 'काशिकावृत्ति' एक अनूठा उदाहरण है जहाँ दो विद्वानों ने मिलकर एक ग्रंथ को पूर्ण किया।
जयादित्य का परिचय
जयादित्य संस्कृत के प्रकांड वैयाकरण थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वे न केवल व्याकरण के ज्ञाता थे, बल्कि साहित्य और न्यायशास्त्र में भी उनकी गहरी पैठ थी। बाद के कई महान विद्वानों ने, जैसे आचार्य हेमचंद्र ने अपने ग्रंथ 'शब्दानुशासन' में जयादित्य का उल्लेख अत्यंत सम्मान और रुचिपूर्ण ढंग से किया है।
वामन का परिचय
वामन, जयादित्य के सह-लेखक थे। विद्वानों का मानना है कि अष्टाध्यायी के आठ अध्यायों में से जयादित्य ने प्रथम पाँच अध्यायों पर वृत्ति लिखी, जबकि वामन ने अंतिम तीन अध्यायों (6, 7, और 8) को पूर्ण किया। यह सहभागिता इतनी सटीक थी कि ग्रंथ की शैली में कहीं भी बिखराव नजर नहीं आता।
2. ऐतिहासिक साक्ष्य: चीनी यात्री इत्सिंग का विवरण
जयादित्य और वामन के कालखंड को निर्धारित करने में चीनी यात्री इत्सिंग (I-tsing) का विवरण सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है।
इत्सिंग ने 7वीं शताब्दी (लगभग 671-695 ईस्वी) के दौरान भारत की यात्रा की थी। उसने अपने संस्मरणों में लिखा है कि उस समय भारत के छात्र पाणिनि के सूत्रों को समझने के लिए 'जयादित्य की वृत्ति' का अध्ययन करते थे। इत्सिंग के अनुसार:
जयादित्य का प्रभाव उस समय संपूर्ण भारत में था।
जयादित्य का देहावसान लगभग संवत् 718 विक्रमी (661-662 ईस्वी) के आसपास हुआ होगा।
इत्सिंग के इस प्रमाणिक विवरण से यह स्पष्ट होता है कि जयादित्य 7वीं शताब्दी के मध्य भाग में पूर्णतः प्रतिष्ठित हो चुके थे।
3. काल निर्धारण और अंतःसाक्ष्य
जयादित्य के समय को लेकर विद्वानों में कुछ मतभेद रहे हैं, किन्तु 'काशिका' के भीतर दिए गए उदाहरणों से स्थिति स्पष्ट होती है।
भारवि का संदर्भ: जयादित्य ने अपनी व्याख्या में महाकवि भारवि द्वारा रचित 'किरातार्जुनीयम्' के पद्यांशों को उद्धृत किया है। भारवि का समय 6वीं शताब्दी का उत्तरार्ध माना जाता है।
अनुमानित काल: इन साक्ष्यों के आधार पर जयादित्य का समय संवत् 650 से 700 वि. (लगभग 593 से 643 ईस्वी) के मध्य माना जा सकता है।
येन अक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात्।
कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः॥
जयादित्य इसी पाणिनि परंपरा के ध्वजवाहक थे।
4. काशिका: 'काशी' से जन्मी अमर व्याख्या
ग्रंथ का नाम 'काशिका' क्यों पड़ा? इसके पीछे एक गहरा अर्थ और भौगोलिक संबंध है।
निरुक्ति (Etymology)
संस्कृत के नियम के अनुसार— "काश्यां भवः काशिका" (जो काशी में उत्पन्न हुई हो, वह काशिका है)।
काशी (वाराणसी) प्राचीन काल से ही संस्कृत विद्या, व्याकरण के पठन-पाठन और ग्रंथों के सृजन का प्रधान केंद्र रही है। 'कुशकाशावलंबन न्याय' (तर्क की एक पद्धति) से हमें जयादित्य के बारे में सोचने का अवसर मिलता है। प्रबल संभावना यही है कि जयादित्य काशी के निवासी थे और इसी पावन नगरी में उन्होंने इस व्याख्या ग्रंथ की रचना की। आज भी यदि कोई व्याकरण का गहन अध्ययन करना चाहता है, तो उसे काशी की परंपरा से जुड़ना ही पड़ता है।
5. राजा जयापीड और वामन: कश्मीर का संबंध
कश्मीर के इतिहास ग्रंथ 'राजतरंगिणी' (कल्हण कृत) में एक राजा जयापीड का उल्लेख मिलता है, जो 8वीं शताब्दी (लगभग 667 शताब्दी) में कश्मीर के सिंहासन पर बैठा था। कल्हण के अनुसार, जयापीड के एक मंत्री का नाम 'वामन' था।
विद्वानों का तर्क: कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि यही जयापीड 'जयादित्य' है और उसका मंत्री 'वामन' काशिका का सह-लेखक है।
मैक्समूलर का खंडन: प्रसिद्ध विद्वान मैक्समूलर इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि काशिकाकार जयादित्य, कश्मीर के राजा जयापीड से बहुत पहले हुए थे। इसका सबसे बड़ा कारण इत्सिंग का विवरण है, जिसने 612-625 ईस्वी के आसपास ही जयादित्य की कृति का उल्लेख कर दिया था।
निष्कर्ष: कल्हण द्वारा दिए गए संवत् अक्सर ऐतिहासिक रूप से सटीक नहीं पाए गए हैं, अतः इत्सिंग का प्रमाण अधिक विश्वसनीय माना जाता है।
6. क्या काशिकाकार बौद्ध थे?
'काशिका' के धार्मिक स्वरूप को लेकर भी विद्वानों में विमर्श होता रहा है। काशिका के प्रसिद्ध संपादक और विद्वान बालशास्त्री का एक रोचक मत है। उनके अनुसार काशिका के कर्ता संभवतः बौद्ध थे।
इसके पीछे उन्होंने दो मुख्य तर्क दिए हैं:
मंगलाचरण का अभाव: सनातन परंपरा के ग्रंथों में ग्रंथ के प्रारंभ में देवी-देवताओं की स्तुति (मंगलाचरण) अनिवार्य होती है। काशिका में परंपरागत मंगलाचरण नहीं मिलता।
सूत्रों में परिवर्तन: उन्होंने पाणिनि के मूल सूत्रों के क्रम और स्वरूप में सूक्ष्म हेर-फेर किया, जो प्रायः परंपरावादी वैयाकरण नहीं करते थे।
हालांकि, यह विषय आज भी शोध का विषय है, क्योंकि काशिका की शैली अत्यंत निष्पक्ष और अकादमिक है।
7. काशिका की विशेषताएँ और व्याकरणिक महत्व
अष्टाध्यायी पर पाणिनि के बाद कात्यायन ने 'वार्तिक' लिखे और पतंजलि ने 'महाभाष्य'। किन्तु महाभाष्य अत्यंत दार्शनिक और विशाल था। सामान्य छात्रों के लिए एक ऐसी 'वृत्ति' (व्याख्या) की आवश्यकता थी जो प्रत्येक सूत्र का अर्थ स्पष्ट करे।
काशिका की प्रमुख विशेषताएँ:
पूर्णता: काशिका अष्टाध्यायी के सभी 3995 सूत्रों की क्रमवार व्याख्या करती है।
सरलता: इसमें 'महाभाष्य' की जटिलता के स्थान पर विषय को सुबोध बनाने पर ध्यान दिया गया है।
लुप्त वृत्तियों का समाहार: काशिका से पहले भी 'भर्तीश्वर', 'जयंत' और 'मैत्रेयरक्षित' जैसी कई वृत्तियाँ थीं, लेकिन काशिका की स्पष्टता के सामने वे धीरे-धीरे विलीन हो गईं। आज व्यवहार में केवल काशिका ही शेष है।
8. काशिका की टीका परंपरा: न्यास और पदमंजरी
काशिका इतनी महत्वपूर्ण सिद्ध हुई कि आगे चलकर इस पर भी कई महान टीकाएँ लिखी गईं। इनमें दो ग्रंथ सबसे प्रमुख हैं:
क. काशिका विवरण पंजिका (न्यास)
इसके रचयिता जिनेंद्रबुद्धि थे। यह ग्रंथ 'न्यास' के नाम से जगत प्रसिद्ध है।
यह एक विशालकाय ग्रंथ है जो कई भागों में विभक्त है।
न्यासकार ने पूरी तरह से काशिका के सिद्धांतों का समर्थन किया है और उसकी सूक्ष्मताओं को स्पष्ट किया है।
ख. पदमंजरी
इसके रचयिता हरदत्त मिश्र थे।
हरदत्त ने अपनी व्याख्या में कैयट (महाभाष्य के टीकाकार) का अनुसरण किया है।
पदमंजरी में अनावश्यक विस्तार को हटाकर तार्किक स्पष्टता पर जोर दिया गया है।
9. पाणिनि, जयादित्य और आधुनिक व्याकरण
आज जब हम कंप्यूटर प्रोग्रामिंग और 'कंप्यूटेशनल लिंग्विस्टिक्स' (Computational Linguistics) की बात करते हैं, तो पाणिनि के एल्गोरिदम की चर्चा होती है। जयादित्य और वामन ने 7वीं शताब्दी में ही उन 'एल्गोरिदम' को डिकोड कर दिया था।
पुरुषोत्तमदेव और हरिदत्त जैसे विद्वानों ने अपनी रचनाओं— भाषावृत्ति, अमरटीका सर्वस्व, और अष्टांगहृदय (सर्वांग सुंदरी टीका) में काशिका का उल्लेख करके इसकी प्रामाणिकता पर मुहर लगाई है।
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥
व्याकरण का उद्देश्य केवल शब्द सिद्धि नहीं, बल्कि समाज में शुद्ध संवाद और ज्ञान का प्रसार करना है। काशिका ने यही कार्य किया।
10. निष्कर्ष: एक शाश्वत विरासत
वामन और जयादित्य की 'काशिकावृत्ति' केवल एक व्याकरण ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह भारतीय ज्ञान परंपरा की निरंतरता का प्रतीक है। काशी की गलियों से निकला यह ज्ञान चीनी यात्रियों के माध्यम से विश्व तक पहुँचा।
यदि आप संस्कृत के विद्यार्थी हैं या प्राचीन भारतीय इतिहास में रुचि रखते हैं, तो काशिकावृत्ति का अध्ययन आपको उस काल की बौद्धिक संपदा से परिचित कराएगा जहाँ ज्ञान की कोई सीमा नहीं थी।
मुख्य बिंदु एक नज़र में:
रचयिता: जयादित्य और वामन (7वीं शताब्दी)।
मुख्य ग्रंथ: काशिकावृत्ति (अष्टाध्यायी की व्याख्या)।
ऐतिहासिक साक्ष्य: चीनी यात्री इत्सिंग का विवरण।
प्रमुख टीकाएँ: न्यास (जिनेंद्रबुद्धि) और पदमंजरी (हरदत्त)।
स्थान: काशी (वाराणसी)।
अंतिम शब्द:
संस्कृत व्याकरण के इस सूर्य—जयादित्य और वामन—को हमारा नमन, जिन्होंने कठिन सूत्रों को सरल वृत्ति में ढालकर भाषा को जीवित रखा।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
आशा है कि यह लेख आपको जयादित्य और वामन के ऐतिहासिक और साहित्यिक योगदान को समझने में सहायक सिद्ध होगा। यदि आपको यह जानकारी पसंद आई हो, तो इसे साझा करें और भारतीय संस्कृति के गौरव को जन-जन तक पहुँचाएँ।
SEO Keywords: वामन जयादित्य, काशिकावृत्ति, जयादित्य का जीवन परिचय, संस्कृत व्याकरण का इतिहास, अष्टाध्यायी की व्याख्या, चीनी यात्री इत्सिंग, जिनेंद्रबुद्धि न्यास, हरदत्त पदमंजरी, संस्कृत वैयाकरण, Kashi Grammar Tradition, Vamana Jayaditya Kashika.
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।