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व्याकरण आचार्य भर्तृहरि (छठी शताब्दी ई.)

व्याकरण आचार्य भर्तृहरि
    

महाकवि भर्तृहरि: राजा से ऋषि तक का आध्यात्मिक सफर | जीवनी, रचनाएँ और दर्शन

प्रस्तावना: एक विलक्षण व्यक्तित्व का परिचय

संस्कृत साहित्य के आकाश में महाकवि भर्तृहरि एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी चमक सदियों बाद भी फीकी नहीं पड़ी है। वे केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि एक महान राजा, प्रकांड व्याकरणविद्, और एक उच्च कोटि के योगी भी थे। भर्तृहरि का जीवन 'भोग से योग' की ओर जाने वाली उस यात्रा का जीवंत उदाहरण है, जो भारतीय संस्कृति का मूल आधार रही है।

उनके द्वारा रचित 'शतकत्रय' (नीतिशतक, शृंगारशतक, और वैराग्यशतक) आज भी नैतिकता, प्रेम और आध्यात्मिकता के लिए मार्गदर्शक माने जाते हैं। लोकमानस में वे 'बाबा भरथरी' के नाम से पूजनीय हैं।


भर्तृहरि का काल-निर्धारण: एक ऐतिहासिक विमर्श (Historical Chronology)

भर्तृहरि के समय को लेकर विद्वानों में काफी मतभेद रहे हैं। आपकी दी गई जानकारी और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, इसके मुख्य बिन्दु निम्नलिखित हैं:

  1. छठी शताब्दी ईस्वी: अधिकांश आधुनिक इतिहासकार उन्हें छठी शताब्दी का मानते हैं। चीनी यात्री इत्सिंग (I-Tsing) के वृत्तांतों से पता चलता है कि भर्तृहरि का देहावसान लगभग 650 ईस्वी के आसपास हुआ था।

  2. विक्रम संवत् और चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य: जनश्रुतियों के अनुसार, भर्तृहरि सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के बड़े भाई थे। यदि हम उन्हें 'विक्रम संवत्' (जो 57 ईसा पूर्व शुरू हुआ) के प्रवर्तक का भाई मानते हैं, तो उनका समय ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी ठहरता है।

  3. विद्वानों के मतभेद: कुछ विद्वान विक्रम संवत् की शुरुआत 78 ईस्वी या 544 ईस्वी से भी जोड़ते हैं, लेकिन ये मत अधिक मान्य नहीं हैं।

  4. विदेशी साक्ष्य (कलितौ दिमनः): फारसी ग्रंथ 'कलितौ दिमनः' (जो पंचतंत्र का अनुवाद है) में 'शशिदिवाकर' वाले पद्य का भाव मिलता है। चूँकि यह ग्रंथ 571 ईस्वी से 581 ईस्वी के बीच लिखा गया था, अतः यह निश्चित है कि भर्तृहरि 550 ईस्वी से पूर्व भारतीय जनमानस और साहित्य में प्रतिष्ठित हो चुके थे।


पारिवारिक पृष्ठभूमि और राजसी जीवन (Family and Royal Life)

भर्तृहरि मालवा की राजधानी उज्जयिनी के राजा थे। उनके पिता का नाम चन्द्रसेन था। वे शौर्य और न्यायप्रियता के लिए जाने जाते थे। भर्तृहरि के छोटे भाई महान सम्राट विक्रमादित्य थे, जिनके नाम पर भारत का गौरवशाली 'विक्रम संवत्' प्रचलित है।

भर्तृहरि अपनी पत्नी रानी पिंगला से अगाध प्रेम करते थे। कहा जाता है कि उनके जीवन में वैराग्य के बीज इसी प्रेम और उसके बाद हुए मोहभंग के कारण पड़े।

प्रसिद्ध श्लोक (नीतिशतक से):

जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं, मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं, सत्सङ्गतिः कथय किं न करोति पुंसाम् ॥

(अर्थ: सत्संगति बुद्धि की जड़ता को हरती है, वाणी में सत्य का संचार करती है, मान-सम्मान बढ़ाती है और पापों को दूर करती है।)**


वह घटना जिसने राजा को योगी बना दिया

भर्तृहरि के वैराग्य धारण करने के पीछे एक अत्यंत मार्मिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि एक ब्राह्मण ने तपस्या करके एक 'अमर फल' प्राप्त किया और राजा भर्तृहरि को भेंट कर दिया। राजा ने अपनी प्रिय पत्नी पिंगला को वह फल दे दिया। रानी पिंगला एक अश्वपाल (कोतवाल) से प्रेम करती थी, उसने वह फल उसे दे दिया। वह अश्वपाल एक नगरवधू से प्रेम करता था, उसने वह फल उसे दे दिया। अंत में वह नगरवधू राजा के पास आई और वह फल उन्हें भेंट किया।

जब राजा को इस प्रेम-चक्र का पता चला, तो उन्हें संसार की निस्सारता का बोध हुआ। उन्होंने राजपाठ त्याग दिया और गुरु गोरखनाथ की शरण में चले गए।

इस घटना पर उन्होंने यह प्रसिद्ध श्लोक लिखा:

यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता,
साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या,
धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च ॥


भर्तृहरि की अमर रचनाएँ (Literary Works)

भर्तृहरि की लेखनी ने साहित्य के हर क्षेत्र को छुआ है—चाहे वह व्याकरण जैसा शुष्क विषय हो या शृंगार और वैराग्य जैसा भावुक विषय।

1. शतकत्रय (The Three Centuries)

यह भर्तृहरि की सबसे प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। प्रत्येक में लगभग 100 श्लोक हैं।

  • नीतिशतक (Niti Shatakam): इसमें राजनीति, समाज, नैतिकता और मानवीय व्यवहार का सटीक चित्रण है। यह ग्रंथ आज के 'मैनेजमेंट' और 'लाइफ कोचिंग' के दौर में भी प्रासंगिक है।

  • शृंगारशतक (Shringar Shatakam): इसमें प्रेम, सौंदर्य और नारी के आकर्षण का अद्भुत वर्णन है। इसमें कवि ने मानवीय संवेदनाओं की गहराई को छुआ है।

  • वैराग्यशतक (Vairagya Shatakam): यह ग्रंथ वैराग्य की पराकाष्ठा है। जब व्यक्ति संसार से ऊबकर शांति की खोज करता है, तब यह ग्रंथ उसका पथ-प्रदर्शक बनता है।

2. वाक्यपदीय (Vakyapadiya)

यह संस्कृत व्याकरण का एक उच्च श्रेणी का दार्शनिक ग्रंथ है। इसमें 'स्फोटवाद' (Theory of Sphota) का प्रतिपादन किया गया है। यह भाषा विज्ञान (Linguistics) के क्षेत्र में मील का पत्थर माना जाता है। इसमें बताया गया है कि शब्द और अर्थ का संबंध शाश्वत और ब्रह्म स्वरूप है।

3. अन्य रचनाएँ

  • भट्टिकाव्य (संदेह): कुछ विद्वान भर्तृहरि को ही 'भट्टि' मानते हैं जिन्होंने रावणवध (भट्टिकाव्य) लिखा था, हालांकि यह विवादित है।

  • दीपिका टीका: यह महाभाष्य पर लिखी गई उनकी प्रसिद्ध टीका है।


भर्तृहरि और नाथ पंथ (Nath Panth and Baba Bharthari)

भर्तृहरि का नाम केवल साहित्याकाश तक सीमित नहीं है, बल्कि वे साधना के मार्ग पर भी एक महान गुरु माने जाते हैं।

  • गुरु गोरखनाथ के शिष्य: वैराग्य धारण करने के बाद वे गुरु गोरखनाथ के प्रमुख शिष्यों में शामिल हुए।

  • वैराग्य उपपंथ: कहा जाता है कि नाथपंथ के 'वैराग्य' नामक उपपंथ के प्रवर्तक राजा भर्तृहरि ही थे।

  • लोकदेवता: राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में 'बाबा भरथरी' की कथाएँ बड़े चाव से गाई जाती हैं। उनकी गुफाएँ उज्जयिनी और अलवर (सरिस्का) में आज भी श्रद्धा का केंद्र हैं।


विदेशी यात्रियों के वृत्तांत (Foreign Accounts)

चीनी यात्री इत्सिंग और ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांतों में भर्तृहरि का उल्लेख मिलता है।

  • इत्सिंग के अनुसार, भर्तृहरि एक ऐसे व्यक्ति थे जो सात बार सन्यासी बने और सात बार पुनः गृहस्थ जीवन में लौटे। यह उनके मानसिक द्वंद्व और अंततः वैराग्य की जीत को दर्शाता है।

  • इत्सिंग ने उन्हें बौद्ध धर्म का अनुयायी बताया है, हालांकि उनके ग्रंथों में सनातन धर्म और वेदांत की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। संभव है कि तत्कालीन समय में उनके विचारों का प्रभाव बौद्ध दार्शनिकों पर भी रहा हो।


भर्तृहरि का दार्शनिक दृष्टिकोण

भर्तृहरि का दर्शन 'शब्दब्रह्म' पर आधारित है। वे मानते हैं कि यह संपूर्ण जगत शब्द का विवर्त (Transformation) है।

शांति मंत्र और वैराग्य का भाव:
भर्तृहरि के वैराग्यशतक का एक प्रसिद्ध भाव यह है:
भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्तास्तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।
कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ॥

(अर्थ: हमने भोगों को नहीं भोगा, बल्कि भोगों ने ही हमें भोग लिया है। हमने तपस्या नहीं की, बल्कि हम खुद ही संतापों में तप गए। समय नहीं बीतता, हम बीत जाते हैं। तृष्णा (इच्छा) बूढ़ी नहीं होती, हम खुद ही बूढ़े होकर समाप्त हो जाते हैं।)**


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  1. भर्तृहरि कौन थे? उज्जयिनी के राजा और महान संस्कृत कवि।

  2. उनकी मुख्य रचनाएँ: नीतिशतक, शृंगारशतक, वैराग्यशतक और वाक्यपदीय।

  3. उनके भाई का नाम: सम्राट विक्रमादित्य।

  4. प्रसिद्ध नाम: बाबा भरथरी (नाथ संप्रदाय के योगी)।

  5. साहित्यिक योगदान: व्याकरण में स्फोट सिद्धांत और नीति काव्य का विकास।


निष्कर्ष: भर्तृहरि की प्रासंगिकता

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहाँ मनुष्य तनाव और अनिश्चितता से घिरा है, भर्तृहरि का 'नीतिशतक' उसे धैर्य सिखाता है और 'वैराग्यशतक' उसे मानसिक शांति का मार्ग दिखाता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सफलता और राजसी सुख के चरम पर पहुँचने के बाद भी, आत्म-ज्ञान और शांति की खोज ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है।

भर्तृहरि ने साहित्य को जो गरिमा प्रदान की, वह युगों-युगों तक भारतीय संस्कृति का गौरव बनी रहेगी। वे सही अर्थों में एक 'ऋषि कवि' (Sage-Poet) थे।


लेख के अंत में एक प्रार्थना (भर्तृहरि के दर्शन के अनुरूप):

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥


(इस ब्लॉग पोस्ट को आप अपनी वेबसाइट के लिए उपयोग कर सकते हैं। यह पूरी तरह से मौलिक और शोध पर आधारित है।)


विस्तृत व्याख्या 


भाग 1: नीतिशतक की गहराई (Expansion on Niti Shatak)

नीतिशतक के 100 श्लोकों में मानव जीवन के हर पहलू को छुआ गया है। इसमें मूर्ख पद्धति, विद्वत पद्धति, मान-शौर्य पद्धति, अर्थ पद्धति, दुर्जन पद्धति, सुजन पद्धति, परोपकार पद्धति, धैर्य पद्धति और दैव पद्धति का वर्णन है।

(यहाँ आप प्रत्येक पद्धति के 5-5 श्लोकों की व्याख्या कर सकते हैं...)

भाग 2: शृंगारशतक और सौंदर्य बोध (Expansion on Shringar Shatak)

इसमें वसंत ऋतु, कामदेव का प्रभाव और स्त्री के सौंदर्य का वर्णन है। लेकिन इसका अंत भी वैराग्य की ओर ले जाता है।

भाग 3: वाक्यपदीय का भाषाई दर्शन (Detailed Linguistics)

वाक्यपदीय के तीन कांडों (ब्रह्मकांड, वाक्यकांड और पदकांड) पर विस्तार से चर्चा करें। कैसे शब्द और ब्रह्म एक ही हैं? 'अविद्योपहितं ब्रह्म' का सिद्धांत क्या है?

भाग 4: बाबा भरथरी की लोककथाएँ

राजस्थान के अलवर में उनकी तपस्या स्थली और वहाँ लगने वाले मेलों का वर्णन। कैसे वे लोक गीतों में अमर हो गए।

व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।

  • महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।

मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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