नागेश भट्ट: व्याकरण शास्त्र के देदीप्यमान नक्षत्र और नव्य-व्याकरण के प्रणेता (Nagesha Bhatta: The Titan of Sanskrit Grammar)
प्रस्तावना: शब्द-ब्रह्म की उपासना और नागेश का प्राकट्य
भारतीय मनीषा में व्याकरण को मात्र भाषा का नियम नहीं, बल्कि 'मोक्ष का द्वार' माना गया है। जैसा कि वाक्यपदीय में भर्तृहरि ने कहा है:
"तद्द्वारमपवर्गस्य वाङ्मलानां चिकित्सितम्। पवित्रं सर्वविद्यानामधिविद्यं प्रकाशते॥"
(व्याकरण मोक्ष का द्वार है, वाणी के दोषों की चिकित्सा है और समस्त विद्याओं में सबसे पवित्र प्रकाशमान विद्या है।)
इसी महान परंपरा के अंतिम महान स्तंभ और नव्य-व्याकरण के मुकुटमणि थे— आचार्य नागेश भट्ट। सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी के संधिकाल में जब संस्कृत व्याकरण जटिलता के भंवर में था, तब नागेश भट्ट ने अपनी तर्कशक्ति और प्रतिभा से उसे एक नई दिशा दी। उन्हें 'अष्टाध्यायी' की परंपरा का पुनरुद्धार करने वाला और 'नव्य-न्याय' की पद्धति को व्याकरण में समाविष्ट करने वाला युगपुरुष माना जाता है।
इस विस्तृत लेख में हम नागेश भट्ट के जीवन, उनकी अद्वितीय कृतियों, उनकी दार्शनिक दृष्टि और व्याकरण जगत में उनके अमिट योगदान का गहन विश्लेषण करेंगे।
१. जीवन परिचय: कुल, जन्म और परिवेश
नागेश भट्ट का जन्म और जीवन काल विद्वानों के अनुसार १६७३ से १७४३ ईस्वी (अठारहवीं सदी का पूर्वार्द्ध) माना जाता है। वे एक ऐसे समय में अवतरित हुए जब भारतीय ज्ञान परंपरा पुनर्जागरण के दौर से गुजर रही थी।
वंश और माता-पिता
नागेश भट्ट मूलतः महाराष्ट्रीय ब्राह्मण थे। उनके पूर्वज महाराष्ट्र से काशी (वाराणसी) आ बसे थे, जो उस समय विद्या का वैश्विक केंद्र था। उनके पिता का नाम शिवभट्ट और माता का नाम सती देवी था।
उनके पिता शिवभट्ट स्वयं एक विद्वान थे, जिन्होंने नागेश के भीतर संस्कारों के बीज बोए। नागेश के लेखन में उनके माता-पिता के प्रति गहरा सम्मान झलकता है। उनके परिवार में शिव की भक्ति और शास्त्र साधना का संगम था।
गुरु परम्परा: हरि दीक्षित का सानिध्य
किसी भी महान विद्वान के पीछे एक महान गुरु का हाथ होता है। नागेश भट्ट के गुरु आचार्य हरि दीक्षित थे। हरि दीक्षित प्रसिद्ध व्याकरणकार भट्टोजि दीक्षित के पौत्र थे। इस प्रकार नागेश भट्ट का संबंध व्याकरण की उस सशक्त धारा से था जिसने 'सिद्धांतकौमुदी' जैसे ग्रंथों के माध्यम से पाणिनीय व्याकरण को सुगम बनाया था।
गुरु की महत्ता बताते हुए शास्त्र कहते हैं:
"गुकारस्त्वन्धकारस्तु रुकारस्तन्निरोधकृत्। अन्धकारविनाशित्वात् गुरुरित्यभिधीयते॥"
नागेश भट्ट ने अपने गुरु से जो ज्ञान प्राप्त किया, वह केवल किताबी नहीं था, बल्कि वह तर्क और दर्शन की कसौटी पर कसा हुआ था।
२. गुरुभक्ति की पराकाष्ठा: १८ बार व्याकरण का अध्ययन
नागेश भट्ट के जीवन की सबसे प्रेरणादायक घटना उनके अध्ययन की सघनता है। कहा जाता है कि उन्होंने अपने गुरु हरि दीक्षित से व्याकरण शास्त्र का १८ बार (अष्टादश कृत्वः) अध्ययन किया था।
यह तथ्य हमें दो बातें सिखाता है:
धैर्य और निरंतरता: व्याकरण जैसा दुरूह विषय भी बार-बार अभ्यास से सिद्ध होता है।
सूक्ष्मता: हर बार अध्ययन करने पर नागेश को व्याकरण के सूत्रों में नए अर्थ और नवीन तार्किकता के दर्शन हुए होंगे।
इसी गहन अध्ययन का परिणाम था कि उन्होंने 'नव्य-न्याय' की भाषा और पद्धति को व्याकरण में उतार दिया, जिसे समझना आज भी बड़े-बड़े विद्वानों के लिए चुनौती है।
३. राजकीय संरक्षण: श्रृंगवेरपुर और राजा रामसिंह
विद्वत्ता जब राजकीय संरक्षण पाती है, तो वह लोक-कल्याण के लिए विस्तृत रूप में सामने आती है। नागेश भट्ट को प्रयाग (इलाहाबाद) के निकट स्थित श्रृंगवेरपुर के राजा रामसिंह का संरक्षण प्राप्त था। राजा रामसिंह स्वयं विद्वानों के कद्रदान थे और उन्होंने नागेश भट्ट को यथोचित सम्मान देकर उनके लेखन कार्य में सहायता की।
श्रृंगवेरपुर वही ऐतिहासिक स्थान है जिसका संबंध रामायण काल में निषादराज गुह से रहा है। यहाँ रहते हुए नागेश ने अपनी कई कालजयी रचनाओं को पूर्ण किया।
४. बहुआयामी व्यक्तित्व: केवल व्याकरण ही नहीं, अपितु सर्वशास्त्र ज्ञाता
यद्यपि नागेश भट्ट की ख्याति मुख्य रूप से एक व्याकरणकार (Vaiyakarana) के रूप में है, लेकिन वे 'सर्वतंत्र स्वतंत्र' थे। उनकी प्रतिभा निम्नलिखित क्षेत्रों में भी विस्तृत थी:
साहित्य शास्त्र (Poetics): काव्य की आत्मा और रस निष्पत्ति पर उनकी पकड़ बेजोड़ थी। उन्होंने 'रसगंगाधर' और 'काव्यप्रकाश' जैसे ग्रंथों की व्याख्याओं को प्रभावित किया।
योगशास्त्र (Yoga): पतंजलि के योगसूत्रों पर उनकी दृष्टि अत्यंत तार्किक और क्रियात्मक थी।
धर्मशास्त्र (Dharma Shastra): आचार, व्यवहार और प्रायश्चित के विषयों पर उन्होंने सूक्ष्म निर्णय दिए।
न्याय और तर्कशास्त्र: व्याकरण को 'नव्य-न्याय' की पारिभाषिक शब्दावली से जोड़ना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी।
५. तात्विक दृष्टि और तंत्र का प्रभाव
नागेश भट्ट के व्यक्तित्व पर 'तंत्रसार' का गहरा प्रभाव था। व्याकरण और तंत्र का संबंध अनादि है। 'परा', 'पश्यंती', 'मध्यमा' और 'वैखरी'—वाणी के इन चार रूपों को तंत्र और व्याकरण दोनों में मान्यता प्राप्त है। नागेश ने व्याकरण को केवल शब्दों का जोड़-तोड़ नहीं माना, बल्कि उसे एक आध्यात्मिक साधना (Shabda Yoga) के रूप में देखा।
भगवान शिव की स्तुति करते हुए वे अक्सर 'शब्द-तत्व' की उपासना करते थे:
"नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्। उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धान् एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्॥"
६. व्याकरण में क्रांतिकारी परिवर्तन: नव्य-न्याय और तार्किकता का समन्वय
नागेश भट्ट से पहले व्याकरण की व्याख्याएँ वर्णनात्मक (Descriptive) अधिक थीं। नागेश ने इसे नव्य-न्याय (Neo-Logic) के साथ समन्वित किया। उन्होंने 'अवच्छेदक-अवच्छिन्न', 'प्रतियोगिता' और 'अनुयोगिता' जैसे तार्किक संप्रत्ययों का प्रयोग व्याकरण के सूत्रों को स्पष्ट करने में किया।
इससे व्याकरण एक कठिन लेकिन अत्यंत सटीक विज्ञान (Exact Science) बन गया। उन्होंने शब्दों के अर्थ बोध (Verbal Cognition) की प्रक्रिया को जिस सूक्ष्मता से 'मञ्जूषा' ग्रंथों में समझाया है, वह विश्व भाषा विज्ञान के इतिहास में अद्वितीय है।
७. नागेश भट्ट की कालजयी रचनाएँ: एक विस्तृत विश्लेषण
नागेश भट्ट एक अत्यंत उर्वर लेखक थे। उनकी रचनाओं की सूची लंबी है, लेकिन यहाँ हम उनकी प्रमुख १० रचनाओं और उनकी विशेषताओं पर चर्चा करेंगे:
१. लघुशब्देन्दुशेखर (Laghushabdendushekhara)
यह भट्टोजि दीक्षित की 'सिद्धांतकौमुदी' पर लिखी गई सबसे प्रसिद्ध टीका है। व्याकरण के छात्रों के लिए "शेखर" का अध्ययन अनिवार्य माना जाता है। इसमें उन्होंने सूत्रों की व्याख्या करते हुए पूर्ववर्ती मतों का खंडन किया और अपने नवीन तर्कों की स्थापना की।
२. बृहच्छब्देन्दुशेखर (Brihatshabdendushekhara)
यह 'लघुशब्देन्दुशेखर' का विस्तृत रूप है। इसमें चर्चाएँ अधिक व्यापक हैं और यह प्रौढ़ विद्वानों के लिए लिखी गई है।
३. परिभाषेन्दुशेखर (Paribhashendushekhara)
व्याकरण में 'परिभाषाओं' (Rules of Interpretation) का बहुत महत्व है। पाणिनीय सूत्रों का सही अर्थ कैसे निकाला जाए, इसके लिए नागेश ने प्राचीन परिभाषाओं को संकलित कर उन पर अपनी अद्वितीय व्याख्या दी। यह ग्रंथ आज भी व्याकरण के विद्यार्थियों की 'अंतिम कसौटी' माना जाता है।
४. वैयाकरणसिद्धान्तमञ्जूषा (Vaiyakarana Siddhanta Manjusha)
यह व्याकरण दर्शन का ग्रंथ है। इसमें स्फोटवाद, शक्ति, लक्षणा और व्यंजना जैसे विषयों पर गंभीर दार्शनिक विमर्श है। यह ग्रंथ व्याकरण को केवल भाषा का नियम नहीं, बल्कि दर्शन का विषय बनाता है।
५. लघुमञ्जूषा (Laghu Manjusha)
'सिद्धान्तमञ्जूषा' का संक्षिप्त लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण रूप। इसमें शब्द और अर्थ के संबंध को बहुत बारीकी से समझाया गया है।
६. परमलघुमञ्जूषा (Paramalaghu Manjusha)
यह विद्यार्थियों के लिए व्याकरण दर्शन की प्रवेशिका है। अत्यंत संक्षिप्त होने के बावजूद इसमें व्याकरण शास्त्र के सार तत्व समाहित हैं।
७. उद्योत टीका (Udyota Commentary)
पतंजलि के 'महाभाष्य' पर कैयट ने 'प्रदीप' टीका लिखी थी। उस 'प्रदीप' पर नागेश भट्ट ने 'उद्योत' नामक टीका लिखी। महाभाष्य जैसे समुद्र के रहस्यों को सुलझाने में यह टीका प्रकाशस्तंभ (Udyot/Light) का कार्य करती है।
८. स्फोटवाद (Sphotavada)
शब्द कैसे अर्थ को प्रकट करता है? इसके लिए 'स्फोट' का सिद्धांत महत्वपूर्ण है। नागेश ने इस ग्रंथ में यह सिद्ध किया कि शब्द नित्य है और उसका अर्थ के साथ स्वाभाविक संबंध है।
९. महाभाष्य-प्रत्याख्यान-सङ्ग्रह (Mahabhashya-Pratyakhyana-Sangraha)
पतंजलि ने अष्टाध्यायी के जिन सूत्रों का प्रत्याख्यान (खंडन या अनावश्यक घोषित) किया है, उनका संग्रह और विश्लेषण इस ग्रंथ में मिलता है।
१०. रसमञ्जरी टीका (Rasamanjari Tika)
भानुदत्त की 'रसमञ्जरी' पर नागेश की यह टीका उनके साहित्य शास्त्र के अगाध ज्ञान का प्रमाण है।
८. स्फोटवाद और शब्द-ब्रह्म का दर्शन
नागेश भट्ट ने भर्तृहरि के 'शब्द-ब्रह्म' सिद्धांत को तार्किकता के उच्चतम शिखर पर पहुँचाया। उनके अनुसार:
"अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम्। विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः॥"
(वह ब्रह्म जो अनादि और अनंत है, जिसका तत्व शब्द है, जो अक्षर है, वही अर्थ के रूप में विवर्तित होकर संपूर्ण जगत की प्रक्रिया को चलाता है।)
नागेश का मानना था कि जब हम कोई शब्द सुनते हैं, तो वर्णों के नष्ट होने के बाद भी एक आंतरिक बोध शेष रहता है, जिसे 'स्फोट' कहते हैं। यही स्फोट अर्थ का वाचक होता है। उन्होंने आधुनिक भाषा विज्ञान के 'Signifier' और 'Signified' के संबंधों को १७वीं सदी में ही विस्तार से समझा दिया था।
९. नागेश भट्ट की शैली और विद्वत्ता का प्रभाव
नागेश भट्ट की लेखन शैली 'नायिका-अलंकार' की तरह नहीं, बल्कि 'वज्र' की तरह कठोर और तर्कपूर्ण है। उनकी भाषा में प्रवाह है, लेकिन वह प्रवाह केवल उन्हीं के लिए सुलभ है जो व्याकरण की गहराई को जानते हैं।
उनके बारे में एक प्रसिद्ध उक्ति है:
"नागेशोक्तं प्रमाणम्" (नागेश ने जो कह दिया, वही अंतिम प्रमाण है।)
काशी के विद्वत समाज में नागेश भट्ट का स्थान सर्वोच्च था। अठारहवीं सदी के बाद जितने भी वैयाकरण हुए, चाहे वे बालशास्त्री हों या शिवकुमार शास्त्री, सभी ने नागेश भट्ट की परंपरा का ही अनुसरण किया।
१०. व्याकरण साधना: १८ बार के अध्ययन का रहस्य
आज के युग में जहाँ हम एक बार विषय पढ़कर उसे छोड़ देते हैं, नागेश का १८ बार व्याकरण पढ़ना हमें 'पुनरावृत्ति' (Repetition) की शक्ति सिखाता है।
प्रथम ९ बार में उन्होंने शब्दों के रूप की सिद्धि सीखी होगी।
अगली ९ बार में उन्होंने उन शब्दों के पीछे छिपे दर्शन और न्याय (Logic) को समझा होगा।
यह साधना हमें सिखाती है कि विद्या 'श्रम' और 'श्रद्धा' का संगम है।
११. वर्तमान युग में प्रासंगिकता: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और व्याकरण
आज के दौर में जब हम Computational Linguistics और Artificial Intelligence (AI) की बात करते हैं, तो पाणिनीय व्याकरण और नागेश भट्ट की तार्किकता सबसे अधिक प्रासंगिक हो जाती है। नागेश भट्ट ने जिस तरह से 'पद-पदार्थ' के संबंधों को व्याख्यायित किया, वह आज के 'Natural Language Processing' (NLP) के लिए एक ब्लूप्रिंट की तरह है।
नागेश भट्ट के 'परिभाषेन्दुशेखर' के नियम एक एल्गोरिदम की तरह काम करते हैं, जो बताते हैं कि यदि दो नियम टकराएँ, तो किसे प्राथमिकता दी जाए।
१२. नागेश भट्ट के जीवन से जुड़े प्रेरक प्रसंग
नागेश भट्ट केवल एक शुष्क विद्वान नहीं थे, बल्कि वे एक तपस्वी ब्राह्मण भी थे। कहा जाता है कि वे अत्यंत सादगी से रहते थे। जब उन्हें जयपुर नरेश सवाई जयसिंह ने अपने दरबार में आमंत्रित किया और बहुत सारा धन भेंट करना चाहा, तो नागेश ने उसे विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा— "मुझे केवल सरस्वती की सेवा करनी है, लक्ष्मी की नहीं।"
उनका यह वैराग्य ही उन्हें 'महामहोपाध्याय' की वास्तविक पदवी प्रदान करता है।
१३. निष्कर्ष: शब्द-साधना का अक्षय दीप
नागेश भट्ट (१६७३-१७४३) का जीवन और कार्य संस्कृत व्याकरण की वह मशाल है, जो कभी बुझ नहीं सकती। उन्होंने अपनी माता सती देवी और पिता शिवभट्ट के नाम को सार्थक करते हुए 'शिव' जैसी कल्याणकारी और 'सती' जैसी तपस्वी वाणी का सृजन किया।
श्रृंगवेरपुर के राजा रामसिंह के संरक्षण में रहकर उन्होंने जो साहित्य रचा, वह आज भी काशी से लेकर कन्याकुमारी तक के गुरुकुलों में गूंजता है। चाहे वह 'लघुशब्देन्दुशेखर' की सूक्ष्मता हो या 'वैयाकरणसिद्धान्तमञ्जूषा' की दार्शनिकता, नागेश हर जगह अपराजेय हैं।
हम इस महान मनीषी को इस श्लोक के साथ नमन करते हैं:
"येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात्। कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः॥"
"तदनु नागेश भट्टं वन्दे शब्द-तत्व-प्रकाशकम्।"
लेख का सारांश (Quick Facts for SEO)
नाम: नागेश भट्ट (Nagoji Bhatta)
काल: १७वीं शताब्दी का अंत और १८वीं शताब्दी का प्रारंभ (1673-1743 ई.)
माता/पिता: सती देवी और शिवभट्ट
गुरु: हरि दीक्षित (भट्टोजि दीक्षित के पौत्र)
प्रमुख क्षेत्र: व्याकरण, साहित्य, योग, धर्मशास्त्र
प्रमुख रचनाएँ: लघुशब्देन्दुशेखर, परिभाषेन्दुशेखर, मंजूषा ग्रंथ, उद्योत
विशेषता: नव्य-न्याय और व्याकरण का समन्वय, १८ बार व्याकरण का अध्ययन।
संरक्षक: श्रृंगवेरपुर के राजा रामसिंह
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
१. नागेश भट्ट का व्याकरण में क्या योगदान है?
नागेश भट्ट ने व्याकरण को नव्य-न्याय की पद्धति से जोड़कर उसे तार्किक बनाया। उन्होंने सिद्धांतकौमुदी और महाभाष्य पर ऐसी टीकाएँ लिखीं जो आज भी मानक मानी जाती हैं।
२. नागेश भट्ट ने व्याकरण का अध्ययन कितनी बार किया था?
उन्होंने अपने गुरु हरि दीक्षित से व्याकरण शास्त्र का १८ बार गहन अध्ययन किया था।
३. नागेश भट्ट की सबसे प्रसिद्ध पुस्तक कौन सी है?
'लघुशब्देन्दुशेखर' और 'परिभाषेन्दुशेखर' उनकी सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय पुस्तकें हैं।
४. नागेश भट्ट का जन्म कहाँ हुआ था?
वे एक महाराष्ट्रीय ब्राह्मण थे, लेकिन उनका अधिकांश जीवन काशी और प्रयाग के समीप श्रृंगवेरपुर में बीता।
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यह लेख संस्कृत साहित्य के शोधार्थियों, छात्रों और भारतीय ज्ञान परंपरा में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए एक व्यापक संदर्भ ग्रंथ के रूप में तैयार किया गया है। नागेश भट्ट का व्यक्तित्व हमें निरंतर सीखने और सत्य की खोज करने की प्रेरणा देता है।
व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
- परिभाषाएँ :- संहिता, संयोग, गुण, वृद्धि प्रातिपदिक, नदी, घि, उपधा, अपृक्त, गति, पद, विभाषा, सवर्ण, टि, प्रगृह्य, सर्वनामस्थान, भ, सर्वनाम, निष्ठा ।
- सुबन्त अजन्त :- पुंल्लिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
- राम, सर्व (तीनों लिंगों में) विश्वपा, हरि, त्रि (तीनों लिंगों में) सखि, सुधी, गुरु, पितृ, गौ, रमा, मति, नदी, धेनु, मातृ, ज्ञान, वारि, मधु
- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
- तिङन्त :- भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।
- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।