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व्याकरण आचार्य कैय्यट (12 वीं शताब्दी)

व्याकरण आचार्य कैय्यट

आचार्य कैय्यट और उनका ‘प्रदीप’: संस्कृत व्याकरण शास्त्र के देदीप्यमान नक्षत्र | Kaiyata: The Life and Legacy of the Great Grammarian

प्रस्तावना: संस्कृत व्याकरण की गौरवशाली परंपरा

भारतीय ज्ञान परंपरा में व्याकरण को 'वेदांग' का मुख कहा गया है— "मुखं व्याकरणं स्मृतम्"। जिस प्रकार शरीर के सभी अंगों में मुख प्रधान है, उसी प्रकार समस्त विद्याओं में व्याकरण प्रधान है। इस समृद्ध परंपरा में महर्षि पाणिनी, कात्यायन और पतंजलि की ‘मुनित्रय’ परंपरा के पश्चात यदि किसी आचार्य ने पतंजलि के ‘महाभाष्य’ को पुनर्जीवित करने और उसे सुबोध बनाने का महान कार्य किया, तो वे थे आचार्य कैय्यट (Acharya Kaiyata)

12वीं शताब्दी के महान वैयाकरण कैय्यट का ‘प्रदीप’ (Pradipa) ग्रंथ केवल एक टीका मात्र नहीं है, बल्कि यह लुप्त होती व्याकरण परंपरा के लिए एक संजीवनी बूटी के समान सिद्ध हुआ। इस विस्तृत लेख में हम कैय्यट के जीवन, उनकी रचनाओं, उनकी दार्शनिक अंतर्दृष्टि और उनके त्यागपूर्ण जीवन के अनछुए पहलुओं पर चर्चा करेंगे।


1. आचार्य कैय्यट का परिचय और कालखंड (Historical Context)

इतिहासकारों और संस्कृत विद्वानों के अनुसार, आचार्य कैय्यट का समय 12वीं शताब्दी (12th Century AD) माना जाता है। वे व्याकरण शास्त्र के उत्तरवर्ती आचार्यों में एक स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

संस्कृत साहित्य के इतिहास में ‘कैय्यट’ नाम के दो प्रसिद्ध आचार्य हुए हैं, जिन्हें लेकर अक्सर भ्रम की स्थिति बनी रहती है। यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक है कि:

  1. महाभाष्य प्रदीप के रचयिता कैय्यट: ये व्याकरण के प्रकांड पंडित थे।

  2. देवीशतक के व्याख्याकार कैय्यट: ये व्याकरणकार कैय्यट से सर्वथा भिन्न विद्वान हैं।

कैय्यट ने स्वयं को पतंजलि के महाभाष्य का अनुगामी माना है। उनके समय के बारे में पुख्ता प्रमाण उनके ग्रंथ की शैली और उनके समकालीन विद्वानों के उल्लेख से मिलते हैं।


2. वंश, परिवार और भ्रातृत्व का रहस्य

आचार्य कैय्यट के पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर विद्वानों में रोचक चर्चाएँ रही हैं। उनके पिता का नाम जैयटोपाध्याय (Jaiyatopadhyaya) या संक्षिप्त में 'जैयट' था।

पीटरसन (Peterson) की कश्मीर रिपोर्ट का संदर्भ:
प्रसिद्ध शोधकर्ता पीटरसन ने अपनी कश्मीर की रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण स्थापना दी है। उन्होंने कैय्यट को काव्यशास्त्रीय जगत के शिरोमणि और ‘काव्यप्रकाश’ के रचयिता आचार्य मम्मट (Mammata) का भाई बताया है। इस मत के अनुसार:

  • जैयट (पिता) के तीन पुत्र थे— मम्मट, कैय्यट और उव्वट (या उच्चट)।

  • मम्मट ने काव्यशास्त्र पर कार्य किया, कैय्यट ने व्याकरण पर और उव्वट ने वेदों के भाष्य पर।

हालाँकि, इस पर विद्वानों में मतभेद भी हैं। यजुर्वेदभाष्य की पुष्पिका में औवट (या उच्चट) के पिता का नाम वज्रट बताया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि या तो उव्वट और कैय्यट अलग परिवारों से थे, या फिर इनके नाम और पितृनामों में क्षेत्रीय उच्चारण के कारण भिन्नता आ गई है। परंतु, यह निर्विवाद है कि ये सभी विद्वान कश्मीर की उस महान मेधा की उपज थे जिसने सदियों तक भारत का मार्गदर्शन किया।


3. कश्मीर: आचार्य कैय्यट की जन्मभूमि और तपोभूमि

आचार्य कैय्यट मूलतः कश्मीर के निवासी थे। कश्मीरी ब्राह्मण पंडितों के बीच प्रचलित जनश्रुतियों और अनुश्रुतियों के अनुसार, उनका निवास स्थान पामपुर (जिसे प्राचीन काल में 'पद्मपुर' कहा जाता था) या येच (Yech) गाँव था।

कश्मीर उस समय शारदा पीठ के रूप में विख्यात था। यहाँ के विद्वानों के बारे में कहा जाता था:

"विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतज्ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥"

कैय्यट इसी 'साधु' श्रेणी के विद्वान थे, जिनका ज्ञान केवल विवाद के लिए नहीं बल्कि तत्वबोध के लिए था।


4. कैय्यट का जीवन दर्शन: दरिद्रता, त्याग और स्वाभिमान

कैय्यट का जीवन एक आदर्श ऋषि का जीवन था। वे केवल किताबी पंडित नहीं थे, बल्कि उन्होंने शास्त्र को अपने जीवन में जिया था।

कठिन श्रम और जीविकोपार्जन:
इतने बड़े विद्वान होने के बावजूद, कैय्यट की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी। वे पाणिनि व्याकरण और महाभाष्य को कंठस्थ ही पढ़ाया करते थे। लेकिन ज्ञान दान से वे जीविका नहीं चलाते थे। अपना और अपने परिवार का उदरपोषण करने के लिए वे कृषि (खेती) जैसा शारीरिक श्रम करते थे। यह उनके व्यक्तित्व की महानता थी कि उन्होंने सरस्वती को लक्ष्मी के लिए कभी नहीं बेचा।

पंडित कृष्ण भट्ट की कथा और कैय्यट का वैराग्य:
एक प्रसिद्ध घटना के अनुसार, दक्षिण भारत के एक महान पंडित कृष्ण भट्ट कश्मीर यात्रा पर आए। जब उन्होंने कैय्यट की विद्वत्ता और उनकी विपन्नता के बारे में सुना, तो वे द्रवित हो उठे। कृष्ण भट्ट ने कश्मीर के राजा से भेंट की और उनके माध्यम से कैय्यट के लिए एक गाँव का शासन (जागीर) और भारी मात्रा में धन-धान्य एकत्रित करवाया।

जब कृष्ण भट्ट वह दान और राज-आज्ञा लेकर कैय्यट के पास पहुँचे, तो आचार्य कैय्यट ने उसे स्वीकार करने से विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। उन्होंने कहा कि एक विद्वान का धर्म तपस्या है, न कि राजसी सुविधाओं का भोग। यह घटना भारतीय विद्वत परंपरा के स्वाभिमान का उत्कृष्ट उदाहरण है।


5. कश्मीर से काशी: ज्ञान की यात्रा

माना जाता है कि जीवन के उत्तरार्ध में कैय्यट कश्मीर छोड़कर पैदल ही काशी (वाराणसी) आ गए थे। उस समय काशी शास्त्रार्थ का केंद्र थी। काशी पहुँचकर उन्होंने अपनी विद्वत्ता का लोहा मनवाया और कई बड़े पंडितों को शास्त्रार्थ में पराजित किया।

यही वह समय था जब उन्होंने अपने महान टीका ग्रंथ 'प्रदीप' की रचना पूर्ण की। कहा जाता है कि प्रदीप की प्रभा ने काशी के विद्वत समाज को चकित कर दिया था।


6. मुख्य रचना: 'प्रदीप' (Pradipa) - महाभाष्य की अमर टीका

कैय्यट की कीर्ति का मुख्य आधार उनका ग्रंथ 'महाभाष्य प्रदीप' है। पतंजलि का 'महाभाष्य' अत्यंत गंभीर और दुरुह ग्रंथ है। बिना किसी व्याख्या के उसे समझना लगभग असंभव था।

प्रदीप की विशेषताएँ:

  1. संक्षिप्तता और स्पष्टता: कैय्यट ने बहुत ही सुलझे हुए शब्दों में पतंजलि के गूढ़ अर्थों को प्रकट किया।

  2. भर्तृहरि का आधार: कैय्यट ने स्वयं स्वीकार किया है कि उनके 'प्रदीप' का मुख्य आधार भर्तृहरि (वाक्यपदीय के रचयिता) की महाभाष्य-टीका है। भर्तृहरि की वह टीका वर्तमान में पूर्ण रूप से अप्राप्य है, इसलिए कैय्यट का प्रदीप हमें भर्तृहरि के विचारों से भी अवगत कराता है।

  3. दार्शनिक गहराई: यह केवल व्याकरण का ग्रंथ नहीं है, बल्कि इसमें दर्शन की गहराई है।


7. कैय्यट और स्फोटवाद (Philosophy of Sphota)

कैय्यट के 'प्रदीप' में सबसे महत्वपूर्ण भाग 'स्फोटवाद' का दार्शनिक विवेचन है। व्याकरण शास्त्र में 'शब्द' को ब्रह्म माना गया है— "शब्दब्रह्म"

"अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम्।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः॥" (वाक्यपदीय)

कैय्यट ने पतंजलि और भर्तृहरि की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए स्फोटवाद की सुंदर व्याख्या की। स्फोट वह तत्व है जिससे अर्थ की अभिव्यक्ति होती है। प्रदीप में स्थान-स्थान पर कैय्यट ने यह सिद्ध किया है कि ध्वनि और वर्ण अनित्य हो सकते हैं, परंतु 'स्फोट' नित्य है और वही अर्थ का वाहक है।


8. व्याकरण परंपरा में कैय्यट का स्थान

यदि हम व्याकरण के इतिहास को देखें, तो पाणिनी के सूत्रों पर कात्यायन ने 'वार्तिक' लिखे, और उन दोनों पर पतंजलि ने 'महाभाष्य' लिखा। महाभाष्य के बाद एक लंबा अंतराल आया जिसमें व्याकरण की परंपरा क्षीण होने लगी थी।

कैय्यट ने 'प्रदीप' लिखकर उस परंपरा को पुनः जीवित किया। कैय्यट के बाद जितने भी वैयाकरण हुए (जैसे भट्टोजि दीक्षित, नागेश भट्ट आदि), उन सभी ने कैय्यट को आधार बनाया। नागेश भट्ट ने तो कैय्यट के प्रदीप पर 'उद्योत' नामक टीका लिखी।


9. महत्वपूर्ण श्लोक और मंत्र (Spiritual & Technical Verses)

आचार्य कैय्यट की आराधना और व्याकरण शास्त्र की महत्ता को समझने के लिए निम्नलिखित श्लोक प्रासंगिक हैं:

पाणिनि स्तुति:

येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात्।
कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः॥

अर्थ: जिन्होंने भगवान शिव (महेश्वर) से वर्णमाला प्राप्त कर संपूर्ण व्याकरण शास्त्र का प्रोक्त किया, उन महर्षि पाणिनि को नमस्कार है।

कैय्यट के प्रदीप का ध्येय:
कैय्यट का मानना था कि व्याकरण केवल भाषा सुधारने का साधन नहीं, बल्कि मोक्ष का द्वार है:

"तद्द्वारमपवर्गस्य वाङ्मलानां चिकित्सितम्।
पवित्रं सर्वविद्यानामधिविद्यं प्रकाशते॥"


10. कैय्यट के व्यक्तित्व से जुड़े अनछुए पहलू (Summary of Key Details)

ब्लॉग के इस भाग में हम उन सभी तथ्यों को संकलित कर रहे हैं जो आपने प्रदान किए हैं, ताकि पाठक एक दृष्टि में सब कुछ समझ सकें:

  • समय: 12वीं शताब्दी।

  • पिता: जैयटोपाध्याय (जैयट)।

  • निवास: पामपुर/येच गाँव, कश्मीर।

  • कार्य: पतंजलि के महाभाष्य पर 'प्रदीप' नामक प्रसिद्ध टीका।

  • जीवनशैली: अत्यंत सादगीपूर्ण, कृषि द्वारा आजीविका, दान का त्याग।

  • काशी यात्रा: कश्मीर से पैदल काशी की यात्रा और वहाँ शास्त्रार्थ में विजय।

  • प्रेरणा स्रोत: भर्तृहरि की (अब अप्राप्य) महाभाष्य टीका।

  • अन्य रचनाएँ: केवल 'प्रदीप' ही उनकी प्रामाणिक और कालजयी रचना मानी जाती है (देवीशतक टीकाकार भिन्न हैं)।


11. SEO के लिए विशेष: आचार्य कैय्यट के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: आचार्य कैय्यट ने किस ग्रंथ पर टीका लिखी?
उत्तर: आचार्य कैय्यट ने महर्षि पतंजलि द्वारा रचित 'महाभाष्य' पर 'प्रदीप' नामक अत्यंत प्रसिद्ध टीका लिखी।

प्रश्न 2: कैय्यट और मम्मट का क्या संबंध है?
उत्तर: विद्वान पीटरसन के अनुसार, कैय्यट और आचार्य मम्मट (काव्यप्रकाश के लेखक) भाई थे और उनके पिता का नाम जैयट था।

प्रश्न 3: स्फोटवाद क्या है?
उत्तर: स्फोटवाद व्याकरण दर्शन का एक सिद्धांत है जो यह मानता है कि अर्थ का बोध किसी वर्ण या ध्वनि से नहीं, बल्कि एक अखंड 'स्फोट' (शब्द-तत्व) से होता है। कैय्यट ने इसका विस्तार से वर्णन किया है।

प्रश्न 4: कैय्यट ने दान लेने से क्यों मना कर दिया था?
उत्तर: कैय्यट एक उच्च कोटि के तपस्वी और स्वाभिमानी विद्वान थे। वे अपनी जीविका शारीरिक श्रम (खेती) से चलाना पसंद करते थे और ज्ञान को धन के लिए नहीं बेचना चाहते थे।


निष्कर्ष (Conclusion)

आचार्य कैय्यट का जीवन और उनका 'प्रदीप' ग्रंथ भारतीय मनीषा के उस काल के साक्षी हैं जब विद्वत्ता और सादगी एक ही सिक्के के दो पहलू थे। 12वीं शताब्दी में कश्मीर की धरती से उठकर काशी की गलियों तक अपनी मेधा की धाक जमाने वाले कैय्यट आज भी हर उस विद्यार्थी के लिए प्रेरणास्रोत हैं जो संस्कृत व्याकरण की गहराई में उतरना चाहता है।

उनके 'प्रदीप' ने पतंजलि के विचारों को जो स्पष्टता प्रदान की, उसी के कारण आज हम पाणिनि के व्याकरण को उसके वास्तविक अर्थों में समझ पाते हैं। कैय्यट केवल एक व्याख्याकार नहीं थे, वे एक पथ-प्रदर्शक थे जिन्होंने लुप्त होती हुई भर्तृहरि की परंपरा को बचाकर आने वाली पीढ़ियों को सौंप दिया।

"भाष्याब्धिः क्व अतिगम्भीरः क्व चाहं मन्दकौतुकः..."— जिस विनम्रता के साथ उन्होंने महाभाष्य रूपी समुद्र को पार करने का प्रयास किया, वह उन्हें और भी महान बनाता है।


Keywords: Acharya Kaiyata, Mahabhashya Pradipa, Sanskrit Grammar History, Kaiyata Pradipa, Panini Vyakarana, Patanjali Mahabhashya, Sphotavada, Kashmir Scholars, Mammata and Kaiyata, Indian Philosophy, Sanskrit Literature.


यह लेख आचार्य कैय्यट के जीवन और उनकी साहित्यिक उपलब्धियों पर आधारित एक विस्तृत शोध है। यदि आप संस्कृत व्याकरण या भारतीय दर्शन में रुचि रखते हैं, तो कैय्यट का 'प्रदीप' आपके लिए एक अनिवार्य अध्ययन है। 

व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६

(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन  - 

  • तिङन्त :-  भू, एध्, अद्, अस्, हु, दिव्, पुञ्, तुद्, तन्, कृ रुध्, क्रीञ्, चुर् ।

  • महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।

मम विषये! About the author

ASHISH JOSHI
नाम : संस्कृत ज्ञान समूह(Ashish joshi) स्थान: थरा , बनासकांठा ,गुजरात , भारत | कार्य : अध्ययन , अध्यापन/ यजन , याजन / आदान , प्रदानं । योग्यता : शास्त्री(.B.A) , शिक्षाशास्त्री(B.ED), आचार्य(M. A) , contact on whatsapp : 9662941910

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