कलिकालसर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्रसूरि: भारतीय ज्ञान परंपरा के अद्भुत मनीषी | सम्पूर्ण जीवनवृत्त और साहित्य
प्रस्तावना: ज्ञान के सूर्य का उदय
भारतीय ज्ञान परंपरा और दर्शन के आकाश में आचार्य हेमचन्द्रसूरि एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी चमक शताब्दियों बाद भी फीकी नहीं पड़ी है। 12वीं शताब्दी के भारत में, विशेषकर गुजरात की भूमि पर, उन्होंने साहित्य, व्याकरण, योग, तर्कशास्त्र और धर्म के क्षेत्र में जो कार्य किया, उसने उन्हें 'कलिकालसर्वज्ञ' (कलियुग के सर्वज्ञ) की उपाधि से विभूषित किया।
जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के गौरव, आचार्य हेमचन्द्र केवल एक धर्माचार्य नहीं थे, बल्कि वे एक महान समाज सुधारक, गणितज्ञ और अद्भुत प्रतिभाशाली मनीषी थे। संस्कृत और प्राकृत भाषाओं पर उनका समान अधिकार था, जो उनकी रचनाओं में स्पष्ट झलकता है।
मंगलाचरण एवं मंत्र
जैन परंपरा में किसी भी शुभ कार्य का प्रारंभ 'णमोकार मंत्र' से होता है। आचार्य हेमचन्द्र की स्मृति में यह वंदना उपयुक्त है:
"नमो अरिहंताणं, नमो सिद्धाणं, नमो आयरियाणं।
नमो उवज्झायाणं, नमो लोए सव्वसाहूणं॥"
1. जीवनवृत्त: चांगदेव से हेमचन्द्रसूरि तक का सफर
आचार्य हेमचन्द्र का जन्म उस कालखंड में हुआ था जब भारत सांस्कृतिक और बौद्धिक पुनर्जागरण के दौर से गुजर रहा था। उनका प्रारंभिक जीवन किसी चमत्कार से कम नहीं था।
जन्म और बाल्यकाल
उनका जन्म गुजरात के अहमदाबाद से लगभग 100 किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम में स्थित धंधुका नगर में हुआ था। वह ऐतिहासिक तिथि थी विक्रम संवत 1145 की कार्तिकी पूर्णिमा की रात्रि।
माता-पिता: उनके पिता का नाम चाचिंग और माता का नाम पाहिणी देवी था। वे मोढ वंशीय वैश्य थे। उनके माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती के अनन्य उपासक थे, जिससे पता चलता है कि उनके परिवार में धार्मिक सहिष्णुता और भक्ति का वातावरण था।
बाल्यकाल का नाम: बचपन में उन्हें 'चांगदेव' के नाम से पुकारा जाता था।
दीक्षा और गुरु का सानिध्य
चांगदेव की कुशाग्र बुद्धि को देखकर श्वेताम्बर सम्प्रदायान्तर्गत 'व्रजशाखा' के आचार्य चन्द्रदेवसूरी अत्यंत प्रभावित हुए। मात्र 5 वर्ष की अल्पायु में ही चांगदेव ने वैराग्य के मार्ग को चुना और उनका नाम 'सोमचन्द्र' रखा गया। बाद में, उनकी प्रतिभा और ज्ञान की गहराई को देखते हुए, उन्हें 'सूरी' पद प्रदान किया गया और वे हेमचन्द्रसूरि के नाम से विख्यात हुए।
2. कलिकालसर्वज्ञ: एक विलक्षण व्यक्तित्व
हेमचन्द्रसूरि को 'कलिकालसर्वज्ञ' कहा जाता है। इस उपाधि का अर्थ है - वह व्यक्ति जिसे इस कलियुग में सब कुछ ज्ञात हो। उनकी मेधा ऐसी थी कि उन्होंने ज्ञान की लगभग हर शाखा पर अपनी लेखनी चलाई।
महापण्डित और बहुमुखी प्रतिभा: वे एक साथ कवि, व्याकरण के विद्वान, काव्यशास्त्र के आचार्य, योगशास्त्र के मर्मज्ञ, और महान कोशकार थे।
जैन धर्म और दर्शन के स्तंभ: उन्होंने जैन दर्शन को तार्किक आधार प्रदान किया और समाज में अहिंसा के सिद्धांतों को दृढ़ता से स्थापित किया।
3. व्याकरण के क्षेत्र में क्रांति: सिद्धहेमशब्दानुशासन
आचार्य हेमचन्द्र की कीर्ति का सबसे बड़ा आधार उनका व्याकरण ग्रंथ 'सिद्धहेमशब्दानुशासन' है। यह ग्रंथ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि संस्कृत और प्राकृत व्याकरण का एक विशाल विश्वकोश है।
ग्रंथ की संरचना
कुल सूत्र: इस व्याकरण में कुल 3566 सूत्र हैं।
विभाजन: यह आठ अध्यायों में विभाजित है।
संस्कृत व्याकरण: इसके प्रारंभिक 7 अध्यायों के 28 पादों में संस्कृत व्याकरण का विस्तार से वर्णन है। यहाँ केवल लौकिक शब्द सिद्धि का उल्लेख है, जो इसे व्यावहारिक बनाता है।
प्राकृत व्याकरण: आठवां अध्याय विशेष रूप से प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं के लिए समर्पित है, जिसने उस समय की लोकभाषाओं को व्याकरणिक ढांचा प्रदान किया।
ग्रंथ का महत्व:
कहा जाता है कि जब यह ग्रंथ पूर्ण हुआ, तब गुजरात के महाराजा सिद्धराज जयसिंह ने इसे हाथी पर रखकर पूरे नगर में गौरव यात्रा निकाली थी। यह किसी ग्रंथ को मिला अब तक का सबसे बड़ा सम्मान था।
4. हेमचन्द्रसूरि की कालजयी रचनाएँ
आचार्य हेमचन्द्र ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में सैकड़ों ग्रंथों की रचना की। उनके प्रमुख कार्यों को निम्नलिखित श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
क. व्याकरण ग्रन्थ
सिद्धहेमशब्दानुशासन: यह उनका मुख्य व्याकरण ग्रंथ है।
सिद्धहेमलिङ्गानुशासन: शब्दों के लिंग निर्धारण के नियमों पर आधारित।
धातुपारायण: संस्कृत धातुओं (Verbs) का विस्तृत विवेचन।
शब्दानुशासन: भाषा के अनुशासन और शुद्धि पर केंद्रित।
ख. कोशग्रन्थ (Lexicography)
मध्यकालीन कोशकारों में हेमचन्द्र का स्थान सर्वोच्च है। उन्होंने न केवल संस्कृत बल्कि प्राकृत और अपभ्रंश के शब्दों को भी संरक्षित किया।
अभिधानचिन्तामणीमाला: यह एक पर्यायवाची कोश है।
अनेकार्थसङ्ग्रह: एक ही शब्द के विभिन्न अर्थों का संग्रह।
निघण्टुशेष: वनस्पति शास्त्र और औषधीय शब्दों का कोश।
देशीनाममाला (प्राकृत-अपभ्रंश कोश): यह ग्रंथ ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें उन्होंने उन 'देशी' शब्दों का संग्रह किया जो संस्कृत से नहीं बल्कि लोकभाषाओं से आए थे।
ग. काव्यशास्त्र और साहित्य
काव्यानुशासन: यह काव्य के गुणों, दोषों, अलंकारों और रस पर आधारित एक 'संग्रह ग्रंथ' है। इसमें उन्होंने काव्य के शास्त्रीय पक्ष को बहुत ही सरल ढंग से समझाया है।
5. दार्शनिक और धार्मिक योगदान: योगशास्त्र और अहिंसा
आचार्य हेमचन्द्र ने जैन दर्शन को जन-जन तक पहुँचाने के लिए 'योगशास्त्र' की रचना की। उन्होंने राजा कुमारपाल को अहिंसा का उपदेश दिया और पूरे गुजरात में पशु-वध पर रोक लगवाई।
उनका एक प्रसिद्ध श्लोक जो सत्य और ज्ञान की महिमा बताता है:
"प्रमाणनयतत्त्वालोकात् स्याद्वादमञ्जरी।
योगशास्त्रं च धर्मस्य रहस्यं प्रकटीकृतम्॥"
(अर्थ: प्रमाण और नय के प्रकाश से, स्याद्वाद की मंजरी से और योगशास्त्र के माध्यम से धर्म के रहस्यों को प्रकट किया गया है।)
6. गणित और विज्ञान में योगदान
अनेक विद्वानों का मानना है कि 'फाइबोनाची श्रेणी' (Fibonacci Sequence) से भी पहले आचार्य हेमचन्द्र ने अपनी रचनाओं में उन गणितीय अनुक्रमों का वर्णन किया था। उन्होंने छंदशास्त्र में मात्राओं की गणना के दौरान इन संख्याओं का उपयोग किया, जिन्हें आज 'हेमचन्द्र श्रेणी' के नाम से भी जाना जाता है।
7. ऐतिहासिक महत्व: सोलंकी वंश और हेमचन्द्र
आचार्य हेमचन्द्र का संबंध गुजरात के सोलंकी राजाओं से अत्यंत घनिष्ठ था।
सिद्धराज जयसिंह: राजा जयसिंह के वे राजगुरु के समान थे। राजा ने उनकी विद्वत्ता का सम्मान करते हुए व्याकरण ग्रंथ का नाम 'सिद्ध-हेम' (सिद्धराज + हेमचन्द्र) रखा।
राजा कुमारपाल: जयसिंह के उत्तराधिकारी कुमारपाल को आचार्य हेमचन्द्र ने ही जैन धर्म की दीक्षा दी थी। कुमारपाल ने उनके मार्गदर्शन में गुजरात को एक 'अहिंसक राज्य' घोषित किया।
8. SEO हेतु मुख्य तथ्य (Quick Facts)
| नाम | आचार्य हेमचन्द्रसूरि |
| उपाधि | कलिकालसर्वज्ञ |
| जन्म | विक्रम संवत 1145 (कार्तिकी पूर्णिमा) |
| जन्म स्थान | धंधुका, गुजरात |
| गुरु | आचार्य चन्द्रदेवसूरी |
| प्रमुख ग्रंथ | सिद्धहेमशब्दानुशासन, देशीनाममाला, काव्यानुशासन |
| भाषा | संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश |
| योगदान | व्याकरण, कोश, योग, गणित, समाज सुधार |
9. निष्कर्ष: उनकी प्रासंगिकता
आचार्य हेमचन्द्रसूरि ने अपने 84 वर्ष के जीवनकाल (वि. संवत 1145 से 1229) में जो ज्ञान का भंडार छोड़ा, वह आज भी शोधार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। वे केवल एक संन्यासी नहीं थे, बल्कि एक 'इन्साइक्लोपीडिया' थे। उन्होंने भाषा को नियमबद्ध किया, शब्दों को कोश में संजोया और धर्म को तर्क की कसौटी पर कसा।
आज के युग में, जब हम भाषाई शुद्धता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की बात करते हैं, तो आचार्य हेमचन्द्र के विचार और उनकी कृतियाँ और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती हैं।
उपसंहार मंत्र:
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥"
(ज्ञान पूर्ण है, और उस पूर्ण सत्ता से जो भी सृजन होता है, वह भी पूर्ण ही होता है। आचार्य हेमचन्द्र का ज्ञान ऐसा ही पूर्ण था।)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. आचार्य हेमचन्द्र को 'कलिकालसर्वज्ञ' क्यों कहा जाता है?
उनकी असाधारण विद्वत्ता और व्याकरण, साहित्य, दर्शन, योग और गणित जैसे विविध क्षेत्रों में उनके व्यापक ज्ञान के कारण उन्हें यह उपाधि दी गई।
2. 'सिद्धहेमशब्दानुशासन' की मुख्य विशेषता क्या है?
इसकी मुख्य विशेषता यह है कि इसमें संस्कृत के साथ-साथ प्राकृत और अपभ्रंश का भी व्याकरण दिया गया है, जो किसी अन्य प्राचीन व्याकरण ग्रंथ में दुर्लभ है।
3. क्या हेमचन्द्रसूरि ने गणित में भी योगदान दिया?
हाँ, उन्होंने छंदों के विस्तार की गणना करते समय उन संख्याओं का वर्णन किया जिन्हें आज पश्चिमी जगत में फाइबोनाची संख्याएँ कहा जाता है।
4. आचार्य हेमचन्द्र का जन्म कहाँ हुआ था?
उनका जन्म गुजरात के धंधुका नगर में हुआ था।
आशा है कि आचार्य हेमचन्द्रसूरि पर आधारित यह विस्तृत लेख आपको उनके महान व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने में सहायक सिद्ध होगा। भारतीय संस्कृति और इतिहास के ऐसे ही गौरवशाली व्यक्तित्वों के बारे में जानने के लिए हमारे ब्लॉग से जुड़े रहें।
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व्याकरण एवं भाषाविज्ञान भाग - ६
(ख) व्याकरण का विशिष्ट अध्ययन -
- भाषा विज्ञान - भारतीय आर्यभाषाएं
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- सुबन्त अजन्त :- स्त्रीलिङ्गाः
- सुबन्त अजन्त :- नपुंसकलिङ्गाः
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- हलन्त :-पुंल्लिङ्गाः,स्त्रीलिङ्गाः,नपुंसकलिङ्गाः - लिह्, विश्ववाह, चतुर (तीनों लिंगों में), इदम(तीनों लिंगों में), किम(तीनों लिंगों में), तत् (तीनों लिंगी में), राजन मघवन् पथिन, विद्वस् अस्मद, युष्मद
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- कृदन्त :- तव्य/तव्यत्, आनीयर्, यत् ण्यत्, क्यप्, शतृ, शनच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् ।
- महाभाष्य (पस्पशाह्निक) :- शब्दपरिभाषा, शब्द एवं अर्थ संबंध, व्याकरण अध्ययन के उद्देश्य, व्याकरण की परिभाषा, साधु शब्द के प्रयोग का परिणाम, व्याकरण पद्धति।