मीमांसा दर्शन और अर्थसंग्रह: एक संपूर्ण शास्त्रीय विवेचन | Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara Full Guide
1. मीमांसा दर्शन: पृष्ठभूमि और परिचय
"मीमांसा पूजितविचारः"
अर्थसंग्रह और उसके रचनाकार
लेखक: लौगाक्षिभास्कर पिता: मुद्गल ग्रन्थ स्वरूप: लघुकाय प्रकरण ग्रन्थ (शाबरभाष्य का संक्षिप्त सार) अन्य रचनाएँ: तर्ककौमुदी
2. मङ्गलाचरणम् (Mangalacharan)
वासुदेवं रमाकान्तं नत्त्वा लौगाक्षिभास्करः । कुरुते जैमिनिनये प्रवेशायार्थसङ्ग्रहम् ॥
3. धर्म जिज्ञासा और प्रथम सूत्र का विश्लेषण
अथ: यह 'आनन्तर्य' (निरंतरता) का वाचक है। इसका अर्थ है "वेदाध्ययन के बाद"। अतः: यह 'दृष्टार्थत्व' का बोध कराता है। वेदों का अध्ययन केवल रटने के लिए नहीं, बल्कि अर्थ ज्ञान के लिए है। धर्मजिज्ञासा: 'धर्मस्य जिज्ञासा' (षष्ठी तत्पुरुष)। यहाँ जिज्ञासा का अर्थ केवल 'जानने की इच्छा' नहीं, बल्कि 'विचार' है (विचारे लक्षणा)।
4. धर्म का लक्षण (Definition of Dharma)
“यागादिरेव धर्मः। वेदप्रतिपाद्यः प्रयोजनवदर्थो धर्मः”
धर्म लक्षण के तीन प्रमुख घटक (Padakritya)
वेदप्रतिपाद्य: यदि केवल 'प्रयोजनवद्' कहते, तो 'भोजन' भी धर्म हो जाता क्योंकि भोजन का प्रयोजन तृप्ति है। अतः 'वेदप्रतिपाद्य' कहना आवश्यक है ताकि लोक-सिद्ध क्रियाएँ धर्म की श्रेणी में न आएँ। प्रयोजनवत्: यदि केवल 'वेदप्रतिपाद्य' कहते, तो स्वयं 'स्वर्ग' (जो फल है) भी धर्म बन जाता। किन्तु स्वर्ग 'साध्य' है, धर्म 'साधन' (याग) है। अतः स्वर्ग में अतिव्याप्ति रोकने के लिए 'प्रयोजनवत्' कहा गया। अर्थः: यदि 'अर्थ' पद न होता, तो 'श्येन याग' (शत्रु के विनाश हेतु किया जाने वाला अभिचार यज्ञ) भी धर्म कहलाता। चूँकि श्येन याग अनर्थ (हिंसा) उत्पन्न करता है, इसलिए 'अर्थ' पद उसे धर्म की श्रेणी से बाहर करता है।
“चोदनालक्षणोऽर्थोधर्मः”
5. भावना का स्वरूप (The Concept of Bhavana)
“भावना नाम भवितुर्भवनानुकूलो भावयितुर्व्यापार विशेषः”
(A) शाब्दी भावना (Shabdi Bhavana)
लक्षण: "पुरुषप्रवृत्यनुकूलो भावयितुर्व्यापार विशेष: शाब्दीभावना"। यह 'लिङ्' (विधिलिङ् लकार) का अर्थ है। इसके तीन अंश होते हैं: साध्य (किं भावयेत्?): पुरुष की प्रवृत्ति। साधन (केन भावयेत्?): लिङ् आदि का ज्ञान। इतिकर्तव्यता (कथं भावयेत्?): अर्थवाद के वाक्यों द्वारा स्तुति।
(B) आर्थी भावना (Arthi Bhavana)
लक्षण: "प्रयोजनेच्छाजनित क्रियाविषयव्यापार आर्थीभावना"। यह 'आख्यात' (तिङ् प्रत्यय) का अर्थ है। इसके भी तीन अंश हैं: साध्य: स्वर्ग आदि फल। साधन: याग (यज्ञ)। इतिकर्तव्यता: प्रयाज आदि सहायक अंग।
6. वेद लक्षण और उसके विभाग
“अपौरुषेयं वाक्यं वेदः”
विधि (Injunctions) मन्त्र (Hymns) नामधेय (Proper Names) निषेध (Prohibitions) अर्थवाद (Explanatory passages)
7. विधि विचार (Detailed Study of Vidhi)
“तत्राज्ञातार्थज्ञापको वेदभागो विधि:”
विधि के चार प्रकार:
उत्पत्ति विधि: जो केवल कर्म के स्वरूप का बोध कराए। (उदा. अग्निहोत्रं जुहोति)। विनियोग विधि: जो अंग और प्रधान के संबंध का बोध कराए। इसके 6 सहायक प्रमाण हैं: श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या। प्रयोग विधि: जो अनुष्ठान के क्रम का बोध कराए। अधिकार विधि: जो फल के स्वामी (अधिकारी) का बोध कराए। (उदा. यजेत स्वर्गकामः)।
विनियोग विधि के 6 प्रमाण (Sextuple Evidences):
श्रुति: जो शब्द किसी अन्य की अपेक्षा न रखे (निरपेक्ष शब्द)। जैसे तृतीया विभक्ति 'व्रीहिभिः' (चावलों से)। लिङ्ग: शब्द की सामर्थ्य। (उदा. बहिर्देवसदनं दामि)। वाक्य: शब्दों का एक साथ उच्चारण (समभिव्यावहार)। प्रकरण: जहाँ साध्य-साधन की आकांक्षा बनी रहे। इसके दो भेद हैं: महाप्रकरण और अवान्तरप्रकरण। स्थान: देश या क्रम की समानता। समाख्या: यौगिक शब्द (जैसे 'होतृचमस')।
8. मन्त्र, नामधेय और निषेध
मन्त्र (Mantra)
“प्रयोगसमवेतार्थस्मारका मन्त्राः”
नामधेय (Namadheya)
निषेध (Nishedha)
“पुरुषस्य निवर्तकं वाक्यं निषेधः” जैसे: "कलजं न भक्षयेत्" (विषैला मांस न खाएं)।
9. अर्थवाद: स्तुति और निन्दा
“प्राशस्त्यनिन्दान्यतरपरंवाक्यमर्थवादः”
गुणवाद: जो प्रत्यक्ष के विरुद्ध हो (उदा. 'आदित्यो यूपः' - सूर्य ही यज्ञ का खंभा है - यहाँ गौण अर्थ है)। अनुवाद: जो ज्ञात बात को दोहराए (उदा. 'अग्निर्हिमस्य भेषजम्' - अग्नि पाले की दवा है)। भूतार्थवाद: जो न विरुद्ध हो और न पहले से ज्ञात हो (उदा. 'इन्द्रो वृत्राय वज्रमुदयच्छत्')।
10. कर्म के प्रकार
गुणकर्म (Subsidiary Act): जो द्रव्यों के संस्कार के लिए किए जाते हैं (जैसे चावलों को धोना)। इसके चार रूप हैं: उत्पत्ति, प्राप्ति, विकृति और संस्कृति। अर्थकर्म (Main Act): जो मुख्य फल के लिए किए जाते हैं।
सन्निपत्योपकारक: जो प्रधान के स्वरूप में मदद करें। आरादुपकारक: जो सीधे फल में मदद करें।
11. मीमांसा के अन्य प्रमुख ग्रन्थ और परंपरा
मीमांसा सूत्र: महर्षि जैमिनि शाबरभाष्य: शबर स्वामी तन्त्रवार्तिक/श्लोकवार्तिक: कुमारिल भट्ट शास्त्रदीपिका: पार्थसारथी मिश्र
पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वेदा: स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥
निष्कर्ष
UGC - net सम्पुर्ण संस्कृत सामग्री कोड - २५ पुरा सिलेबस
(क) प्रमुख भारतीय दर्शनों का सामान्य परिचय :-
योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा के संदर्भ में )
(ख) दर्शन-साहित्य का विशिष्ट अध्ययन :-
दर्शन साहित्य के अभ्यास प्रश्न :-