न्याय दर्शन और न्यायसिद्धान्तमुक्तावली (अनुमान खण्ड): एक गहन विश्लेषण | Nyaya Philosophy & Anumana Khanda
1. न्याय दर्शन: अर्थ, व्युत्पत्ति एवं परिचय
"नीयते विवक्षितार्थः अनेन इति न्यायः"
“प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः” अर्थात् प्रमाणों के माध्यम से किसी विषय की परीक्षा करना ही न्याय है।
2. न्याय दर्शन के १६ पदार्थ (Categories)
प्रमाण: ज्ञान के साधन (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द)। प्रमेय: ज्ञान के विषय (आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, अर्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, दुःख, अपवर्ग)। संशय: अनिश्चय की स्थिति। प्रयोजन: कार्य का उद्देश्य। दृष्टान्त: उदाहरण। सिद्धान्त: स्थापित मत। अवयव: न्याय वाक्य के अंग। तर्क: ऊहापोह। निर्णय: निष्कर्ष। वाद: सत्य की खोज हेतु चर्चा। जल्प: विजय हेतु चर्चा। वितण्डा: केवल विपक्षी के खंडन हेतु चर्चा। हेत्वाभास: तर्क के दोष। छल: शब्दों का हेर-फेर। जाति: असंगत उत्तर। निग्रहस्थान: पराजय का आधार।
3. न्याय दर्शन का ऐतिहासिक विकास: प्राचीन एवं नव्य न्याय
(A) प्राचीन न्याय (Prachina Nyaya)
(B) नव्य न्याय (Navya Nyaya)
4. न्यायसिद्धान्तमुक्तावली: अनुमान खण्ड (Anumana Khanda)
(A) अनुमिति और परामर्श (Inference and Deliberation)
“व्यापारस्तु परामर्श: करणं व्याप्तिधीर्भवेत् ॥66॥"
"व्याप्यस्य पक्षवृत्तित्वधी: परामर्श उच्यते" जब हमें यह ज्ञान होता है कि 'व्याप्ति' (जैसे धुएँ और आग का अविनाभावी संबंध) से युक्त हेतु (धुआँ) पक्ष (पर्वत) में विद्यमान है, तो उसे 'परामर्श' कहते हैं। इसी परामर्श से 'अनुमिति' (पर्वत आग वाला है) पैदा होती है।
(B) व्याप्ति (Universal Concomitance)
"साध्येन हेतोरैकाधिकरण्यं व्याप्तिरुच्यते ॥69॥" जहाँ-जहाँ धुआँ है, वहाँ-वहाँ आग है—यह साहचर्य नियम ही व्याप्ति है।
(C) पक्ष (Locus of Inference)
"सिषाधयिषया शून्या सिद्धिर्यत्र न तिष्ठति । स पक्षस्तत्र..." ॥70॥ जहाँ साध्य (आग) का होना संदिग्ध हो और उसे सिद्ध करने की इच्छा हो, उसे 'पक्ष' कहते हैं (जैसे धुआँ उठता हुआ पर्वत)।
5. हेत्वाभास: तर्क के दोष (Fallacies of Inference)
"अनैकान्तों विरुद्धश्चाऽप्यसिद्धः प्रतिपक्षितः । कालात्ययापदिष्टश्च हेत्वाभासास्तु पञ्चधा" ॥71॥
अनैकान्तिक (सव्यभिचार): जो हेतु साध्य के साथ एकांत (निश्चित) न हो। इसके तीन भेद हैं: साधारण: जो सपक्ष और विपक्ष दोनों में रहे (उदा: पर्वत आग वाला है क्योंकि वह प्रमेय है—यहाँ 'प्रमेय' होना आग के बिना भी संभव है)। असाधारण: जो केवल पक्ष में रहे (उदा: शब्द नित्य है क्योंकि इसमें शब्दत्व है)। अनुपसंहारी: जिसका कोई दृष्टान्त न मिले।
विरुद्ध: जो साध्य का ही विरोधी हो (उदा: शब्द नित्य है क्योंकि वह कार्य है—जबकि कार्य होना अनित्यता का लक्षण है)। असिद्ध: जिसका आधार ही सिद्ध न हो। इसके तीन भेद हैं: आश्रयासिद्ध: (उदा: आकाशकमल सुगंधित है—यहाँ आश्रय 'आकाशकमल' ही असत्य है)। स्वरूपासिद्ध: (उदा: झील द्रव्य है क्योंकि इसमें धुआँ है—झील में धुआँ संभव ही नहीं)। व्याप्यत्वासिद्ध: जिसमें हेतु का साध्य के साथ संबंध दोषपूर्ण हो।
सत्प्रतिपक्ष (प्रकरणसम): जब एक साध्य को सिद्ध करने वाले हेतु के विरुद्ध दूसरा समान बल वाला हेतु खड़ा हो जाए। कालात्ययापदिष्ट (बाध): जब प्रत्यक्ष प्रमाण से ही हेतु का साध्य बाधित हो जाए (उदा: आग शीतल है क्योंकि वह द्रव्य है—जबकि प्रत्यक्ष से आग उष्ण सिद्ध है)।
6. पञ्चावयव वाक्य (The Nyaya Syllogism)
प्रतिज्ञा: साध्य का निर्देश (पर्वतो वह्निमान्—पर्वत आग वाला है)। हेतु: कारण बताना (धूमात्—क्योंकि वहाँ धुआँ है)। उदाहरण: व्याप्ति का दृष्टान्त (यत्र यत्र धूमः तत्र तत्र वह्निः यथा महानसम्—जहाँ धुआँ है वहाँ आग है, जैसे रसोई)। उपनयन: हेतु का पक्ष के साथ उपसंहार (तथा चायम्—वैसा ही धुआँ इस पर्वत पर भी है)। निगमन: सिद्धान्त की पुनः स्थापना (तस्मात्तथा—इसलिए यह पर्वत आग वाला है)।
7. न्याय दर्शन के प्रमुख आचार्य और ग्रन्थ
मेधातिथि गौतम: न्याय के प्राचीन प्रवर्तक। वात्स्यायन: 'न्यायभाष्य' (प्रथम प्रामाणिक भाष्य)। उद्योतकर: 'न्यायवार्तिक'। वाचस्पति मिश्र: 'तात्पर्यटीका'। जयन्त भट्ट: 'न्यायमञ्जरी' (अत्यंत विद्वत्तापूर्ण ग्रन्थ)। उदयन: 'न्यायकुसुमाञ्जलि' (ईश्वर की सिद्धि हेतु सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ)। अन्नंभट्ट: 'तर्कसंग्रह' (प्रारंभिक विद्यार्थियों हेतु)। विश्वनाथ: 'न्यायसिद्धान्तमुक्तावली'।
8. ज्ञान का स्वरूप: प्रमा और अप्रमा
मुख्य प्रमा (अनुव्यवसाय): "अहं घटं जानामि" (मैं घड़े को जानता हूँ)। गौण प्रमा (व्यवसाय): "अयं घटः" (यह घड़ा है)।
निष्कर्ष
UGC - net सम्पुर्ण संस्कृत सामग्री कोड - २५ पुरा सिलेबस
(क) प्रमुख भारतीय दर्शनों का सामान्य परिचय :-
योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा के संदर्भ में )
(ख) दर्शन-साहित्य का विशिष्ट अध्ययन :-
दर्शन साहित्य के अभ्यास प्रश्न :-